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Sunday, September 14, 2025

हिन्दी दिवस पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह का संदेश

 गृह मंत्रालय//Azadi Ka Amrit Mahotsav//प्रविष्टि तिथि: 14 SEP 2025 9:50 AM by PIB Delhi

मिलकर चलो, मिलकर सोचो, मिलकर बोलो........

*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड चल रहा है

*हिंदी दिवस पर केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएं तकनीक, विज्ञान, न्याय, शिक्षा और प्रशासन की धुरी बनें

*मिलकर चलो, मिलकर सोचो, मिलकर बोलो, यही हमारी भाषाई सांस्कृतिक चेतना का मूल मंत्र रहा है

*डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस युग में मोदी सरकार भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सक्षम बना रही है

नई दिल्ली: 14 सितंबर 2025:(PIB Delhi//हिंदी स्क्रीन)::

प्रिय देशवासियों,

आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

अपना भारत मूलतः भाषा-प्रधान देश है। हमारी भाषाएँ सदियों से संस्कृति, इतिहास, परंपराओं, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने की सशक्त माध्यम रही हैं। हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर दक्षिण के विशाल समुद्र तटों तक, मरुभूमि से लेकर बीहड़ जंगलों और गाँव की चौपालों तक, भाषाओं ने हर परिस्थिति में मनुष्य को संवाद और अभिव्यक्ति के माध्यम से संगठित रहने और एकजुट होकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया है।

मिलकर चलो, मिलकर सोचो और मिलकर बोलो, यही हमारी भाषाई-सांस्कृतिक चेतना का मूल मंत्र रहा  है।

भारत की भाषाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने हर वर्ग और समुदाय को अभिव्यक्ति का अवसर दिया। पूर्वोत्तर में बीहू का गान, तमिलनाडु में ओवियालू की आवाज, पंजाब में लोहड़ी के गीत, बिहार में विद्यापति की पदावली, बंगाल में बाउल संत के भजन, कजरी गीत, भिखारी ठाकुर की ‘बिदेशिया’, इन सबने हमारी संस्कृति को जीवन्त और लोककल्याणकारी बनाया है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि भाषाएँ एक दूसरे की सहचर बनकर, एकता के सूत्र में बंधकर आगे बढ़ रही हैं। संत तिरुवल्लुवर को जितनी भावुकता से दक्षिण में गाया जाता है, उतनी ही रुचि से उत्तर में पढ़ा जाता है। कृष्णदेवराय जितने लोकप्रिय दक्षिण में हुए, उतने ही उत्तर में भी हुए। सुब्रमण्यम भारती की राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत रचनाएँ हर क्षेत्र के युवाओं में राष्ट्रप्रेम को प्रबल बनाती है। गोस्वामी तुलसीदास को हर एक देशवासी पूजता है, संत कबीर के दोहे तमिल, कन्नड़ और मलयालम अनुवादों में भी पाए जाते हैं। सूरदास की पदावली दक्षिण भारत के मंदिरों और संगीत परंपराओं में आज भी प्रचलित है। श्रीमंत शंकरदेव, महापुरुष माधवदेव को हर एक वैष्णव जानता है। और, भूपेन हजारिका को हरियाणा का युवा भी गुनगुनाता है।

गुलामी के कठिन दौर में भी भारतीय भाषाएँ प्रतिरोध की आवाज बनीं। आजादी के आंदोलन के राष्ट्रव्यापी बनने में हमारी भाषाओं की बड़ी भूमिका रही। हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने जनपदों की भाषाओं में, ग्राम-देहात की भाषाओं को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। हिंदी के साथ ही सभी भारतीय भाषाओं के कवियों, साहित्यकारों और नाट्यकारों ने लोकभाषाओं में, लोककथाओं में, लोकगीतों और लोकनाटकों के माध्यम से हर आयु, वर्ग और समाज के भीतर स्वाधीनता के संकल्प को प्रबल बनाया। वन्दे मातरम् और जय हिंद जैसे नारे हमारी भाषाई चेतना से ही उपजे और स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान के प्रतीक बने।

जब देश आजाद हुआ, तब हमारे संविधान निर्माताओं ने भाषाओं की क्षमता और महत्ता को देखते हुए इस पर विस्तार से विचार-विमर्श किया और 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया। संविधान के अनुच्छेद 351 में यह दायित्व सौंपा गया है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार हो और वह भारत की सामासिक संस्कृति का प्रभावी माध्यम बने।

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड आया है। चाहे संयुक्त राष्ट्रसंघ का मंच हो,

चाहे जी-20 का सम्मेलन हो, SCO में संबोधन हो, मोदी जी ने हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद कर भारतीय भाषाओं का स्वाभिमान बढाया है।

मोदी जी ने आजादी के अमृत काल में गुलामी के प्रतीकों से देश को मुक्त करने के लिए जो पंच प्रण लिए थे, उसमें भाषाओं की बड़ी भूमिका है। हमें अपनी संवाद और आपसी संपर्क भाषा के रूप में भारतीय भाषा को अपनाना चाहिए।

राजभाषा हिंदी ने 76 गौरवशाली वर्ष पूरे किए हैं। राजभाषा विभाग ने अपनी स्थापना के स्वर्णिम 50 वर्ष पूर्ण कर हिंदी को जनभाषा और जनचेतना की भाषा बनाने का अद्भुत कार्य किया है।

2014 के बाद से सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को निरंतर बढ़ावा दिया गया है। 2024 में हिंदी दिवस पर ‘भारतीय भाषा अनुभाग’ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के बीच सहज अनुवाद सुनिश्चित करना है। हमारा लक्ष्य यह है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम न रहकर तकनीक, विज्ञान, न्याय, शिक्षा और प्रशासन की धुरी बनें। डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस युग में हम भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सक्षम, प्रासंगिक और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत को अग्रणी बनाने वाली शक्ति के रूप में विकसित कर रहे हैं।

मित्रों, भाषा सावन की उस बूँद की तरह है, जो मन के दुःख और अवसाद को धोकर नई उर्जा और जीवन शक्ति देती है। बच्चों की कल्पना से गढ़ी गई अनोखी कहानियों से लेकर दादी-नानी की लोरियों और किस्सों तक, भारतीय भाषाओं ने हमेशा समाज को जिजीविषा और आत्मबल का मंत्र दिया है।

मिथिला के कवि विद्यापति जी ने ठीक ही कहा:

“देसिल बयना सब जन मिट्ठा।”

अर्थात् अपनी भाषा सबसे मधुर होती है।

आइए, हिंदी दिवस के इस अवसर पर हम हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करने और उन्हें साथ लेकर आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी तथा विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ें।

आप सभी को एक बार फिर से हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। वंदे मातरम्।

*****

आरके / वीवी / आरआर / पीआर//(रिलीज़ आईडी: 2166448)

Saturday, September 16, 2023

"हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में हिन्दी शिक्षक संघ का विशेष आयोजन 17 सितम्बर को

मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन में होगा कार्यक्रम 

लुधियाना: 15 सितम्बर 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब के पंजाबी परिवारों और सिख परिवारों में से
बहुत से कलमकार ऐसे हैं जिन्होंने उन दिनों भी हिंदी से अपना गहरा प्रेम बनाए रखा जब हिंदी के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे था। भाषा और साहित्य को भी कुछ लोग अपनी अपनी सियासत के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। हिंदी का साहित्य भी पंजाब के पर्यावरण की गहरी बातें करता है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी साहिब की कालजयी कहानी को पढ़े बरसों हो गए लेकिन वह आज भी ज़हन में है उसे पढ़ते हुए जहां पंजाब का रूमानी पर्यावरण सजीव हो उठता है वहीं युद्ध की भयानक वि विभिप्षा भी आने लगती है--अब भी जवानों के शहीद होने की खबरें उसी माहौल की याद दिलाने लगती हैं जिस का रूमानी सा लेकिन क़ुरबानी भरा रंग इस प्रसिद्ध कहानी-उसने कहा था में उभरता है--एक दिव्य प्रेम और एक युद्ध की कहानी का रंग---आज भी वह दिव्य प्रेम  और भावनाएं हमारे दिलों में है लेकिन युद्ध की कलि छाया निरंतर फैलती चली जा रही है-प्रेम और क़ुरबानी के उस रंग को गहरा करता है हर वह कार्यक्रम जो हिंदी दिवस के नाम पर मनाया जाता है-- "उसने कहा था" पर बहुत बाद में प्रसार भारती ने दूरदर्शन पर एक विशेष फिल्म भी बनाई थी। 

हिन्दी शिक्षक संघ (रजि.) पंजाब द्वारा "हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में 17 सितम्बर, 2023  दिन रविवार को मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना में कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें सरकारी स्कूलों के 8वीं,10वीं,12 वीं कक्षा बोर्ड परीक्षा में 95% अंक प्राप्त करने वाले छात्र एवं उनके अध्यापक सम्मानित किये जायेंगे।

इसमें प्रमुख वक्ता डॉ. बलवेन्द्र सिंह (सहायक आचार्य) स्नातकोत्तर हिन्दी-विभाग डी.ए.वी. कॉलेज जालन्धर और डॉ. राजेन्द्र साहिल, एसोसिएट प्रोफेसर गुरु हरगोबिन्द खालसा कॉलेज, गुरुसर सुधार, लुधियाना होंगे।  इस अवसर पर श्रीमती डिम्पल मदान, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, स. बलदेव सिंह, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, श्रीमती मंजू भारद्वाज, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शिक्षा, ए.शि) फतेहगढ़ साहिब , आशीष कुमार, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) शहीद भगत सिंह नगर, स. जसविंदर सिंह विर्क, उप जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, मनोज कुमार, उप जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, नीलम गुप्ता, प्रांत संरक्षक, भारत विकास परिषद पंजाब, श्री रूपेंद्र शर्मा, हिंदी अधिकारी पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय बठिंडा, डॉ. मुकेश अरोड़ा सीनेटर, पंजाब विश्व विद्यालय पंजाब, श्री मनोज प्रीत, प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना।

श्री अशोक थापर राष्ट्रीय अध्यक्ष, शहीद सुखदेव थापर मैमोरियल ट्रस्ट, त्रिलोक चन्द भगत समाज सेवी विशेष महमान के रूप में पधारेंगे। 

 डॉ. नीरोत्तमा शर्मा, एसोसिएट प्रोफ़ेसर  मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना कार्यक्रम प्रबंधक होंगे। यह जानकरी मनोज कुमार हिन्दी शिक्षक संघ (रजि. ) पंजाब ने दी। यकीन रखिए इस बार भी यह प्रोग्राम याद गारी होगा। 

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Thursday, August 17, 2023

विद्युत मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक का आयोजन

 प्रविष्टि तिथि: 17 AUG 2023 6:48 PM by PIB Delhi

आयोजन हुआ दि अशोक होटल, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में संपन्‍न


नई दिल्ली
: 17 अगस्त 2023: (पीआईबी//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

विभिन्न सरकारी विभागों और संगठनों ने भाषा और साहित्य के विकास में निरंतर सहयोग दिया है। तकरीबन तकरीबन हर विभाग में ऐसे कक्ष या टीम का गठन रहता ही है। इस रूचि से सबंधित लोग अक्सर भाषा और साहित्य से जुड़े आयोजनों में भाग भी लेते हैं। 

विद्युत मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की बैठक केंद्रीय विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री आर.के. सिंह की अध्‍यक्षता में दिनांक 17 अगस्त, 2023 को दि अशोक होटल, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में संपन्‍न हुई। बैठक में विद्युत मंत्रालय के विशेष सचिव एवं वित्‍तीय सलाहकार एवं मंत्रालय के अन्‍य अधिकारीगण उपस्थित थे। विद्युत मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में संसद सदस्य, अपने विषय के विशेषज्ञ गैर-सरकारी सदस्य तथा विद्युत मंत्रालय के नियंत्रणाधीन सभी उपक्रमों के वरिष्ठ अधिकारी सम्मिलित हैं।

बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री श्री आर.के. सिंह ने कहा कि राष्ट्र निर्माण एवं राष्ट्रीय एकता के लिए एक राष्ट्रभाषा का होना अति आवश्यक है जिसमें हिंदी पहले से ही अपनी भूमिका निभा रही है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए आपसी संवाद की आवश्यकता पर भी बल दिया। श्री आर.के. सिंह ने कहा कि आजादी के अमृत काल में हम सभी ने संपन्‍न भारत का संकल्‍प लिया है। राष्‍ट्र निर्माण में उसकी भाषा की संपन्‍नता भी निहित है इसलिए हमें अपनी राजभाषा हिंदी को भी जन-जन की भाषा बनाते हुए संपन्‍न बनाना है।

बैठक में माननीय सदस्यों द्वारा बैठकों का नियमित आयोजन, पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन, हिंदी पुस्तकों की खरीद तथा पुस्तकों की पठनीयता बढ़ाना, शीर्षस्थ स्तर पर मूल रूप से हिंदी में कार्य करना आदि बहुमूल्य सुझाव दिए गए। तदुपरांत, बैठक के लिए राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देते हुए प्रशंसनीय कार्य करने के लिए वर्ष 2021-22 तथा वर्ष 2022-23 हेतु विभिन्न सीपीएसयूज़ को एनटीपीसी राजभाषा शील्ड से सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर माननीय मंत्री श्री आर.के. सिंह के कर कमलों द्वारा विद्युत मंत्रालय के नियंत्रणाधीन सभी उपक्रमों द्वारा प्रत्येक वर्ष प्रकाशित की जाने वाली पत्रिकाओं का विमोचन किया गया।

माननीय मंत्री जी को औपचारिक धन्यवाद के साथ ही यह बैठक समाप्त हुई। कितना अच्छा हो अगर इस तरह के आयोजन करते समय भाषा और साहित्य से जुड़े उन लोगों को भी विशेष तौर पर निमंत्रित किया  जाए जिनकी न तो इन विभागों में कोई पहुंच होती है और न ही उनकी आर्थिक दशा अच्छी होती है। 

***PIB//PIB DELHI | DJM (रिलीज़ आईडी: 1949955) 


Friday, July 2, 2021

काव्य गोष्ठी: नारी मन की थाह पाने का प्रयास रहा इस बार भी

Thursday: 1st July 2021 at 4:50 PM Via WhatsApp

महिला काव्य मंच ने किया एक और यादगारी आयोजन 

लुधियाना//ऑनलाइन मंच (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

जुनून नज़र तो आ जाता है पर फिर भी इसे किस्मत वाले लोग ही देख पाते हैं। न तो यह सभी की किस्मत में होता है न ही सभी को यह नज़र आ पाता है। बस एक तूफ़ान सा मन में उठता है जिसे संभालना सभी के बस में होता भी नहीं। इसका अहसास हुआ जब पिछली बार लॉकडाउन लगा। इसके बाद कर्फ्यू का एलान हो गया। सब लोग अपने अपने घरों में बंद। कोरोना के आतंक ने और भी निराश कर दिया था। कभी कभी--हर हफ्ते जा हर महीने किसी न किसी शायरी  में पहुंचना एक अलग सा आनंद देता था। अपनी शायरी सुनना, दूसरों की सुनना-एक अलग सा परिवार बनता जा रहा। था। जनाब नरेश नाज़ और उनकी धर्मपत्नी के प्रयास रंग ला रहे हैं। शायरी के मैदान में निकलीं इन महिला कलमकारों का काफिला विशाल होता जा रहा है।

आप शायरी के वक़्त मुस्करा रही इन कलमकारों के चेहरों को ज़रा ध्यान से देखें तो आपको मुस्कान के पीछे छिपी हुई स्ट्रगल भी बहुत ही आसानी से नज़र आएगी। इनकी शायरी की पंक्तियां ज़िंदगी की आंख से आंख मिला कर बात करती हैं। पुरुष प्रधान समाज की सभी चालों को इनकी शायरी बहुत ही सलीके से बेनकाब कर देती हैं। इनके आयोजन होते रहते हैं। अब फर्क सिर्फ इतना कि आमने सामने या साथ साथ बैठ कर गरमा गर्म समोसे, गुलाब जामुन और चाय का मज़ा आम नहीं  रहा। जल्द ही वे दिन दोबारा आएंगे इसकी उम्मीदें सभी को हैं। इस बार का ऑनलाइन आयोजन भी अच्छा रहा। देखिए एक संक्षिप्त सी रिपोर्ट। 

महिला काव्य मंच, लुधियाना इकाई की मासिक काव्य गोष्ठी 29 जून 2021 को आजकल के चलन को सामने रखते हुए आनलाइन आयोजित की गई। लुधियाना इकाई की अध्यक्षा सुश्री बेनु सतीशकांत जी ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। डा. मोनिका शर्मा नें मंच संचालन बखूबी निभाया।  श्रीमती बेनु सतीशकांत ने गोष्ठी में जुड़ी सभी कवयित्रियों का स्वागत किया और मुख्य अतिथि पंजाब इकाई की उपाध्यक्ष श्रीमती इरादीप त्रेहन जी का स्वागत भी किया। गोष्ठी में उपस्थित सभी तीस कवयित्रियों ने बहुत ही बढिया विषयों को उठाया और सुंदर भावों के साथ प्रस्तुत कर समां बाँध दिया।

सीमा भाटिया, पूनम सपरा, पूर्वा सिंह, ममता जैन, रश्मि अस्थाना, मोनिका चौधरी, ममता शर्मा, शालू, मोनिका कटारिया, अनुराधा कटारिया, ममता वडेहरा, अलका शर्मा, रचना गुलाटी, संतोष गोतम, नीतू जोशी, बृज बाला, राधा शर्मा, अनु बहल, सोनिया बुधिराजा, श्रुति, निधि सागर, नैंसी शर्मा,ज्योति बजाज,श्रद्धा शुक्ला,अंशु मदान, सविता अबरोल, बेनु सतीशकांत ,इरादीप त्रेहन और डा. मोनिका शर्मा जी ने नारी मन, आंखों, नारी अस्मिता से जुड़े सवालों, प्रेम की सुकोमल भावनाओं, देश भक्ति और मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं पर बहुत ही खूबसूरत और भावपूर्ण रचनाओं से समां बांधा।

 कार्यक्रम के अंत में लुधियाना इकाई की अध्यक्ष श्रीमती बेनु सतीशकांत जी ने सबको धन्यवाद दिया।

Wednesday, February 24, 2021

राजभाषा हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन हेतु विशेष प्रयास

 Wednesday: 24th February 2021 at 16:03 IST

 राजभाषा गौरव पुरस्कार योजना-वर्ष 2020 के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित

नई दिल्ली: 24 फरवरी 2021: (पीआईबी//हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::

राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन के लिए चलाई जा रही निम्नलिखित पुरस्कार योजनाओं के लिए 01.01.2020 से 31.12.2020 के दौरान प्रकाशित पुस्तकें आमंत्रित हैं।  इस योजना में दो वर्गों में पुरस्‍कार दिए जाते हैं।

1. केन्द्र सरकार के कार्मिकों (सेवानिवृत्त सहित) के लिए हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन हेतु राजभाषा गौरव पुरस्कार जिनकी पात्रता/शर्ते  निम्‍न हैं:

(I) पुस्तक के लेखक केन्द्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों/उनके सम्बद्ध/अधीनस्थ कार्यालयों, केन्द्र सरकार के उपक्रमों, राष्ट्रीयकृत बैंकों/वित्तीय संस्थानों तथा केन्द्र सरकार के स्वामित्व में या नियंत्रणाधीन स्वायत संस्थाओं/केंद्रीय विश्वविद्यालयों/प्रशिक्षण संस्थानों के सेवारत/सेवानिवृत्त अधिकारी/कर्मचारी हों। (II) सेवारत लेखक अपनी प्रविष्टि अपने विभाग के अध्यक्ष द्वारा सत्यापन एवं संस्तुति तथा सेवानिवृत्त लेखक अपनी प्रविष्टि पीपीओ की प्रति के साथ इस विभाग को सीधे भेजें।

2. भारत के नागरिकों के लिए हिंदी में ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन हेतु राजभाषा गौरव पुरस्कार

पुस्तक इंजीनियरी, इलेक्ट्रिनिक्स, कंप्यूटर विज्ञान, भौतिकी, जैव विज्ञान, ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्विज्ञान, रसायन विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, मनोविज्ञान आदि तथा समसामयिक विषय जैसे उदारीकरण, भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद, मानवाधिकार, प्रदूषण नियंत्रण आदि।आधुनिक तकनीकी/विज्ञान की किसी विधा अथवा समसामयिक विषय पर लिखी हो सकती है।

भारत का कोई भी नागरिक इस पुरस्कार योजना में भाग ले सकता है। उपर्युक्त योजनाओं के संबंध में प्रपत्र तथा पूरा विवरण विभाग की वेबसाइट http://rajbhasha.gov.in पर उपलब्ध है। पुस्तकें भेजने की अंतिम तिथि 01.05.2021 है।

***

एन डब्‍ल्‍यू/आर के/प्र क/ए डी/डी डी डी

Wednesday, September 23, 2020

टेली-लॉ कार्यक्रम पर सफलता की कहानियों की पहली पुस्तिका

23-सितम्बर-2020 10:15 IST

'रीचिंग द अनरिच्‍ड-वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' जारी


 नई दिल्ली: 23 सितंबर 2020: (पीआईबी//हिंदी स्क्रीन)::

न्याय विभाग ने टेली-लॉ कार्यक्रम पर सफलता की कहानियों की पहली पुस्तिका का ई-संस्करण 'रीचिंग द अनरिच्‍ड - वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' शीर्षक के तहत जारी किया। 

टेली-लॉ कार्यक्रम ने 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के 115 आकांक्षी जिलों सहित 260 जिलों के दूरदराज के क्षेत्रों में 3 लाख से अधिक लाभार्थियों को कानूनी सलाह प्रदान की समय पर एवं बहुमूल्य कानूनी सलाह प्रदान करने के लिए इस पहल के तहत गरीब, दलित, कमजोर और दूरदराज के समूहों एवं समुदायों को पैनल के वकीलों से जोड़ने के लिए स्मार्ट तकनीकों का उपयोग किया गया। 

केंद्रीय न्‍याय विभाग ने अपने टेली-लॉ कार्यक्रम की यात्रा को मनाने के लिए 'टेली-लॉ - रीचिंग द अनरिच्ड, वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' शीर्षक के तहत अपनी पहली पुस्तिका जारी की है। यह लाभार्थियों की वास्तविक जीवन की कहानियों और टेली-लॉ कार्यक्रम के तहत उन्‍हें विवादों को सुलझाने के लिए दी गई कानूनी सहायता का एक मनोरम पठनीय संग्रह है। इस प्रकार के विवाद दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। वर्तमान में इस कार्यक्रम के तहत 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के 260 जिलों (115 आकांक्षी जिलों सहित) और 29,860 सीएससी के जरिये भौगोलिक रूप से दुर्गम एवं दूरदराज के क्षेत्रों में 3 लाख से अधिक लाभार्थियों को कानूनी सलाह दी गई है।

यह पठनीय पुस्तिका कानूनी सहायता के एक अनिवार्य घटक के तौर पर कानूनी सलाह लेने के लिए ग्रामीणों को शिक्षित करने और उन्‍हें प्रोत्साहित करने में पैरालीगल स्वयंसेवकों और ग्रामीण स्तर के उद्यमियों की भूमिका को उजागर करती है। यह वैकल्पिक विवाद तंत्र के माध्यम से अपने विवादों को निपटाने में आम आदमी के डर और मिथकों को सफलतापूर्वक तोड़ती है। बहुत ही सरल कहानियों में यह 6 श्रेणियों को उजागर करता है जिनमें अन्याय के खिलाफ लड़ाई, संपत्ति विवादों का निपटान, कोविड पीडि़तों को राहत देना, सूचना के साथ सशक्तिकरण, प्रक्रियागत बाधाओं से निपटना और घरेलू शोषण के खिलाफ कार्रवाई शामिल हैं।

भारत सरकार के 'डिजिटल इंडिया विजन' के अुनरूप न्याय विभाग इस कार्यक्रम को गति देने और न्‍याय तक सभी की पहुंच को वास्‍तविक बनाने के लिए 'उभरते' और 'स्‍वदेशी' डिजिटल प्लेटफॉर्मों का उपयोग कर रहा है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वर्ष 2017 में टेली-लॉ कार्यक्रम को लॉन्‍च किया गया था ताकि मुकदमेबाजी से पहले के चरण में ही विवादों को निपटाया जा सके। इस कार्यक्रम के तहत पंचायत स्तर पर कॉमन सर्विस सेंटर के व्‍यापक नेटवर्क के तहत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए स्‍मार्ट तकनीक, टेलीफोन/ इंस्टेंट कॉलिंग आदि सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। इन सुविधाओं का उपयोग गरीब, दलित, कमजोर, दूरदराज के समूहों एवं समुदायों को पैनल के वकीलों से जोड़ने के लिए जाता है ताकि उन्‍हें समय पर एवं बहुमूल्य कानूनी सलाह दी जा सके।

कानूनी विवादों का शुरू में ही पता लगाने, उनमें हस्तक्षेप करने और उनकी रोकथाम की सुविधा उपलब्‍ध के लिए विशेष तौर पर डिजाइन की गई टेली-लॉ सेवा सीएससी- ई जीओवी और एनएएलएसए द्वारा उपलब्‍ध कराए गए अग्रणी स्वयंसेवकों के एक कैडर जरिये समूहों और समुदायों तक पहुंचती है। ये जमीनी स्‍तर के योद्धा अपने क्षेत्र में गतिविधियों के दौरान आवेदकों के पंजीकरण और अपॉइंटमेंट के लिए एक मोबाइल एप्लिकेशन से लैस होते हैं। लाभार्थियों को निरंतर कानूनी सलाह एवं परामर्श प्रदान करने के लिए समर्पित वकीलों के एक समूह को तैनात किया गया है। समृद्ध आईईसी को उसके सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड किया गया है जिसे https://www.tele-law.in पर एक्सेस किया जा सकता है। वास्तविक समय में डेटा हासिल करने और प्रदान की गई सलाह की प्रकृति को देखने के लिए एक अलग डैशबोर्ड तैयार किया गया है। निकट भविष्य में जिला स्तर पर विस्‍तृत विवरण सुनिश्चित करने के लिए डेटा को पीएमओ प्रेयर्स पोर्टल पर भी डाला जा रहा है। 

देश के सभी जिलों को कवर करने की आकांक्षा और कानूनी सहायता श्रृंखला के तहत टेली-लॉ को एक अद्भुत स्तंभ के रूप में स्थापित करने के लिए न्याय विभाग तिमाही आधार पर इस प्रकार की परिवर्तनकारी एवं सशक्तिकरण वाली कहानियों का प्रकाशन जारी रखेगा।

'टेली-लॉ - रीचिंग द अनरिच्ड, वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' पुस्तिका देखने के लिए यहां क्लिक करें

******** नई पुस्तिकाएं//हिंदी स्क्रीन 

Friday, June 12, 2020

एक कटोरी सब्जी : रुबिता अरोड़ा

ज्यादा निकटता कहीं जी का जंजाल  न बन जाये !!!

लुधियाना: 12 जून, 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::
लेखिका : रुबिता अरोड़ा 
मेरा बचपन बेहद गरीबी मे बीता। पिता जी नहीं थे माँ मेहनत करके घर का खर्चा चलाती। घर मे आर्थिक तगी के चलते मेरीे स्कूल की फीस, कापी किताबों का खर्च उठाना माँ के लिए बहुत मुश्किल हो फिर भी माँ के चेहरे पर एक भी शिकन देखने को न मिलती। उनका बस एक ही सपना था मैं पढलिख कर अपने पैरों पर खडी हो जाऊ।खाने के नाम पर तो हम माँ बेटी रूखासूखा खाकर ही खुश हो लेती। तभी हमारे पडोस मे शर्मा आन्टी रहने को आई। पढी लिखी, समझदार, बाणी मे प्रेम सभी गुण तो थे उनमें। एक दिन जब वे हमारे घर आई तो हम माँ बेटी खाना खा रही थी। हमारी थाली मे पडे खाने को देखकर उन्हें बहुत बुरा लगा। वे झट से अपने घर से खाना ले आई। माँ ने मना करने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके हठ के आगे एक न चली। उनके हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाकर मेरी तो आत्मा ही जैसे तृप्त हो गई औऱ फिर उस दिन से शुरू हो गया शर्मा आन्टी के घर से कटोरियो का आना जाना। वे जब भी कुछ अच्छा बनाती पहले हमारे घर देने जरूर आती। माँ ने कई बार सकोच दिखाया पर वे न मानी। अब तो अक्सर वे हमारे घर आती, बडे प्यार से मुझे पास बिठाकर खाना खिलाती,पढाई मे भी पूरी मदद करती। माँ की बिमारी हो या मेरी परिक्षा मुझे पूरा सहयोग मिलता। मेरे लिए तो वे मेरी दूसरी माँ जैसी थी। समय बीतता गया। मै उच्च शिक्षा के लिए शहर आ गई। उनके भी पति का तबादला कहीं औऱ हो गया। फिर हम कभी मिल तो न पाई लेकिन जो अपनापन मुझे उनसे मिला, शायद कोई अपना भी नहीं दे पाता। आज मै उच्च पद पर कार्यरत हूँ लेकिन यहाँ तक पँहुच कर जो कामयाबी मुझे मिली इसमें आँटी का बहुत बडा हाथ है।
अभी कुछ दिन पहले हम यहाँ नई कालोनी मे रहने आए। मैंने दफ्तर से दो दिन की छुट्टी ले ली ताकि अपना सामान सही से जमा लूँ। पति को दफ्तर व बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अभी अपना काम शुरू ही किया था कि डोरबैल बजी। पास मे रहने वाली मिसेज खन्ना हाथ मे सब्जी की कटोरी लिए मुझसे मिलने आई। उनका अभिवादन किया औऱ फिर शुरू हुआ उनकी बातों का सिलसिला या यूँ कहो पास मे रहने वाली मिसेन खुराना की बुराइयों का सिलसिला, जो खत्म होने का नाम ही नही ले रहा था। तकरीबन तीन घंटे बीतने के बाद मिसेज खन्ना यह कहते हुए अपने घर गई कि अभी आपको बहुत काम है, सो जल्दी जा रही है, फिर कभी बैठकर ढेरों बातें करेगी। दोपहर हो चुकी थी। बच्चे स्कूल से आते होगे यह सोचकर खाना बनाने मे जुट गई बाकी काम यूँ का त्यों पडा रहा। अगले दिन बडी उम्मीद से शुरू किया तभी हाथ मे कटोरी लिए इस बार मिसेज खुराना चली आई। फिर से बातों का सिलसिला चला। इस बार मिसेज खन्ना की बुराइयाँ मुख्य विषय रही। जैसे तैसे उन्हें उनके घर भेज कर मैंने चैन की साँस ली। ये दो सब्जी की कटोरियाँ मेरे लिए जी का जन्जाल बन चुकी थी। मैंने इन दो छुट्टियों मे जो काम करने थे वे सब धरे के धरे रह गए।मैं सोच रही थी समय बीतने के साथ इन सब्जी की कटोरियो के स्वरूप मे कितना परिवर्तन आ गया है। पहले जहां सब्जी की कटोरी मे अपनेपन,प्रेम, समर्पण की भावना होती थी वही आज नफरत, स्वार्थ, ईष्या का तडका लगाया जाता है। अगले दिन हम सुबह पार्क मे मार्निग वाक के लिए निकले तो साथ मे दोनों कटोरियाँ भी उठा ली। कुछ ही दूरी पर मिसेज खन्ना औऱ फिर मिसेज खुराना भी मिल गई। हमने उनको धन्यवाद देते हुए उनकी कटोरियाँ वापस की औऱ साथ ही विनम्रता से कहा हम तो नौकरी पेशा है सुबह दफ्तर के लिए निकलते है तो शाम तक ही घर लौटते है। माफ कीजिये लेकिन ये कटोरियो के लेनदेन का सिलसिला आगे नहीं बढा सकते। निरसदेह पडोसी एक दूसरे के सुख दुख के साथी होते है लेकिन एक दूसरे की चुगलियाँ करना या इधर उधर की हाँकने के लिए आज की सभ्य व शिक्षित पीढी के पास समय ही कहाँ है। --*रुबिता अरोड़ा   
*रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।  

Tuesday, March 3, 2020

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर होगा कविता कथा कारवां का विशेष आयोजन

आपके दिलों पर दस्तक देगा यह आयोजन तांकि आप जाग सकें
लुधियाना: 03 मार्च 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
समय की नब्ज़ पर हाथ रख कर उसे पहचानना और अगर सब कुछ विपरीत भी चल रहा हो तब भी अपने निश्चित उद्देश्य की ओर आगे बढ़ना सभी के बस में नहीं होता। अँधियों के सामने चिराग जलाने की हिम्मत हर किसी में कहाँ!  जसप्रीत कौर फलक और उनके सहयोगियों की टीम अपने संगठन कविता-कथा-कारवां के बैनर तले एक बार फिर लेकर आ रही हैं एक विशेष काव्य आयोजन। इस बार का आयोजन समर्पित होगा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को। महिला सशक्तिकरण के दावों का सच, क्या है आज भी समाज की हकीकत, कहां खड़े हैं हम सब...ऐसे बहुत से सवालों की चर्चा होगी लेकिन कविता के मधुर से अंदाज़ में। समझने वाले समझ जायेंगे और  जो नहीं समझना चाहेंगे उनके दिलों में भी एक तड़प तो उठा ही जायेगा यह आयोजन। कितने सच्चे हैं हमारे दावे? आपके दिलों पर दस्तक देगा यह आयोजन तांकि आप जग सकें। 
कविता- कथा- कारवाँ (रजि.) के तत्वावधान से जसप्रीत कौर फ़लक की अध्यक्षता में एक बैठक बुलाई गई। इस अवसर इस संस्था के सहयोगी सदस्यों विभा कुमारिया शर्मा, अनु पुरी, रश्मि अस्थाना, अनू कौल, जसविंदर कौर  ने भाग लिया। सर्व सम्मति से यह निर्णय लिया गया कि-इस अवसर पर समाज के लिए समर्पित , समाज में जागरूकता पैदा करने वाली, विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली खेल,कला, साहित्य में महिलाओं वर्चस्व सिद्ध करने वाली विभूतियों को सम्मानित किया जाएगा।नई कलमों के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आमन्त्रित सुप्रसिद्ध कवयित्रियां  को कविता वाचन के लिए पहुचेंगी। समाज में नारी और उसकी स्थिति पर विचार गोष्ठी आयोजित किया जाएगा जिसमें समाज के कुछ प्रतिष्ठित व जिम्मेदार नागरिकों को विचार- विमर्श के लिए आमंत्रित किया जाएगा। कार्यक्रम का समापन स्मृति प्रतीक चिन्ह तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान कर के किया जाएगा। सम्पूर्ण कार्यक्रम 8 मार्च को सतलुज क्लब में ठीक 10:30 बजे प्रारम्भ होकर 1:30 बजे सम्पन्न होगा।  इसमें कौन कौन शामिल होगा इसका विस्तृत विवरण भी आजकल में ही जारी किया जायेगा।  अपने कैलेंडर पर भी निशान लगा लीजिये और डायरी पर भी। इस आयोजन में आ कर आप फायदे में ही रहेंगे।दिमाग में ज्ञान और दिलों में संवेदना जगायेगा यह आयोजन।  

Sunday, February 16, 2020

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी गुरदासपुर पंजाब में

एक दिवसीय विशेष आयोजन दिनांक 14 मार्च, 2020 को
साथियो,
राजकीय महाविद्यालय, गुरदासपुर, पंजाब द्वारा साहित्य संचय फाउंडेशन, दिल्ली एवं बोहल शोध मंजूषा, भिवानी, हरियाणा के सहयोग से एक दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी, दिनांक 14 मार्च, 2020 को  ‘भारतीय संस्कृति में संस्कृत एवं हिंदी भाषा का योगदान’, विषय पर आयोजित किया जायेगा ।
संगोष्ठी स्थल:-  
राजकीय महाविद्यालय, गुरदासपुर, पंजाब
उपविषय:
1 वैदिक कालीन शिक्षा पद्धति 
2. वैदिक कालीन ग्राम्यजीवन 
3. भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संचेतना  
4. वेदों में नारी की भूमिका  
5. भारतीय संस्कृति में पंजाबी भाषा का योगदान 
6.  भारतीय संस्कृति में छतीसगढ़ी भाषा का योगदान 
7.  भारतीय संस्कृति में डोगरी भाषा का योगदान 
8.  भारतीय संस्कृति में पाली भाषा का योगदान 
9 भारतीय संस्कृति में क्षेत्रीय भाषाओँ का योगदान
10. भारतीय संस्कृति और सिनेमा 
11. भारतीय संस्कृति और मीडिया 
12. भारतीय संस्कृति और लोकनाट्य 
13. भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्य 
14. भारतीय संस्कृति और रंगमंच 
15. भारतीय संस्कृति और लोकपर्व
16. भारतीय संस्कृति में धर्म एवं पंथ 
17. भारतीय संस्कृति और प्रवासी साहित्य
18.  पंजाब के हिन्दी साहित्यकार
19.  विदेशो में भारतीय संस्कृति और पंजाब के प्रवासी साहित्यकार
20.  पंजाब का हिन्दी साहित्य में योगदान
21.  हिन्दी सिनेमा और पंजाब
22. अग्रेजी साहित्य और पंजाब
23.  संस्कृत साहित्य को पंजाब का योगदान
24.  पंजाब में रचित सन्त साहित्य
25. डी.ए.वी. संस्थाओ का हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान
26. आर्य समाज का हिन्दी, संस्कृत साहित्य में योगदान
27. पंजाब के सिक्ख गुरूओं का भारतीय संस्कृति में योगदान  
उक्त शीर्षकों के अतिरिक्त मुख्य विषय से जुड़े अन्य विषयों पर भी शोधालेख भेजे जा सकते हैं। विषय चयन से पूर्व संयोजक से विचार करना उचित होगा।

शोध आलेख आमंत्रित हैं- आलेख संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी एवं पंजाबी में भाषा मे आलेख स्वीकार किये जायेंगे।

● आप अपने मौलिक शोध् आलेख seminar14march20@gmail.com
 पर 14 फ़रवरी 2020 तक कृतिदेव, वॉकमैन चाणक्य 901-95 अथवा यूनिकोड में वर्ड फाइल में भेज सकते हैं। पी.डी.एफ. एवं स्कैन फाइल स्वीकार नहीं की जायेंगी ।
शोधालेखों में सन्दर्भ आलेख के अंत में दिए जायें. संदर्भ देना अनिवार्य होगा. 
● आलेख ISBN नंबर अंकित पुस्तक में प्रकाशित होंगे। आलेख कम से कम 2000 शब्दों का हो।
● स्वीकृत आलेखों को पुस्तकीय रुप में लोकार्पण किया जायेगा।
● 15 चयनित शोध्-पत्रों को प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा एवं उन्हें विशेष ‘स्मृति चिह्न' से सम्मानित किया जाएगा। 
● सभी प्रतिभागियों को निशुल्क , स्मृतिचिह्न, प्रमाणपत्र एवं पुस्तक प्रदान किये जाएंगे।
● स्मृतिचिह्न उन्हीं प्रतिभागियों को दिये जाएंगे जिनका आलेख एवं पंजीकरण 14 फ़रवरी 2020 तक प्राप्त होगा एवं संगोष्ठी में उपस्थित होंगे।
● शोध् पत्र के अन्त में अपना पूरा नाम, घर/कॉलेज का पता, मोबाइल नं., ईमेल अवश्य लिखें। इसके अभाव में शोध् पत्र को निरस्त किया जा सकता है।
(यदि किसी कारणवश आप संगोष्ठी में नही आ पाते हैं तो सिर्फ पुस्तक एवं प्रमाणपत्र ही पोस्ट किए जाएंगे, स्मृतिचिह्न पोस्ट नही किया जाएगा)
पंजीकरण शुल्क
14 फ़रवरी 2020 से पूर्व 
प्राध्यापक : 700
शोधार्थी तथा अन्य प्रतिभागी : 500
14 फ़रवरी से पश्चात्
प्राध्यापक : 900
शोधार्थी तथा अन्य प्रतिभागी : 600
डाक खर्च : 150 
बैंक विवरण
Paytm, phone pay, google pay - 9136175560
खाता संख्या- 6729179894
खाता धारक का नाम : साहित्य संचय 
Ifsc- IDIB000S216
Bank- Indian Bank
Branch- Sonia vihar, Delhi
संयोजक : डॉ. केवल  कृष्ण मल्होत्रा -9815242960
आयोजक : 
साहित्य संचय फाउंडेशन
अध्यक्ष, मनोज कुमार 9136175560
डॉ नरेश सिहाग 'एडवोकेट' 8708822674 (राजस्थान)
सुमन रानी- 9050289680 (हरियाणा)
डॉ विनोद तनेजा पंजाब 
9876865695
संजय कुमार- 8769406872(राजस्थान)
डॉ संगम वर्मा-9463603737(पंजाब)
ज्योति कुशवाहा-8223002666(छत्तीसगढ़)
वीरेंदर तिवारी- 9140671058 (उत्तर प्रदेश),
डॉ विनोद कुमार-9876758830 (पंजाब)
अभय कुमार -8507440700 (बिहार)
रवि कुमार -7780960421 (जम्मू)
सुशील भगत- 8803035823 (जम्मू)
कमलेश- 8699801601 (पंजाब)
 भारती- 9599091536 (हिमाचल प्रदेश)
डॉ विनय श्रीवास्तव- 7080820498 (उत्तराखंड)
रेखा -9530752446 (पंजाब)
डिंपल -783785820 (पंजाब)
संरक्षक : बी आर राणा, प्रिंसीपल, राजकीय महाविद्यालय, गुरदासपुर, पंजाब

Monday, February 10, 2020

हर इकन्नी खर्च कर बैठे//रेक्टर कथूरिया

पड़ी मुश्किल तो देखा हर चवन्नी खर्च कर बैठे!
जमा पूंजी बहुत थी पर सभी हम खर्च कर बैठे!
लड़कपन भी, जवानी भी, बुढापा खर्च कर बैठे!

कमाया था बहुत सम्भाल न पाए मगर हम सब,
पड़ी मुश्किल तो देखा हर चवन्नी खर्च कर बैठे!

मोहब्बत ने कहा था मान लो मेरा कहा अब तो,
कहा माना मगर दिल और दुनिया खर्च कर बैठे!

बड़े सपने सजाए थे, बड़े तिकड़म लड़ाए था,
खुली जब नींद तो देखा वो सब कुछ खर्च कर बैठे!

मोहब्बत की हकीकत उलझनों के भंवर सी निकली,
फंसे इस भंवर में तो हर इकन्नी खर्च कर बैठे।

सफर इस जन्म का दुशवार था, दुशवार ही निकला;
हकीकत तब खुली जब हर हकीकत खर्च कर बैठे।

मोहब्बत में बहुत अब फर्क जीने और मरने का;
कि जीना था जिसे तक के, उसी को खर्च कर बैठे!
                                              --रेक्टर कथूरिया
 आप इसे यहां Your Quotes पर भी देख सकते हैं यहां क्लिक करके 

Wednesday, January 29, 2020

हम तन्हा हर बार चले//*पुष्पिंदर कौर "नीलम"

क्या बतलायें  कैसे हमपे  दुनिया के सब वार चले!
दोधारी तलवार था जीवन फिर भी हम हर बार चले!
मौत से आँख मिलाई हमने तांकि घर संसार चले!

आग का इक दरिया था जीवन फिर भी हमने कदम रखा;
तांकि शायद सकूं का जीवन हमको भी उस पार मिले! 

किसने सपने दिखलाये और किसने सपने तोड़ दिए;
लाख भुलाया लेकिन दिल में सोच वही हर बार चले!

इक इक सांस था मुश्किल फिर भी चेहरे पर मुस्कान रही;
क्या बतलायें  कैसे हमपे  दुनिया के सब वार चले!

बेगानों का क्या कहना है अपने भी अपने न हुए;
फिर भी जीवन की हर राह पर हम तन्हा हर बार चले!

मौत इशारे करती थी और रस्ता भी आसान सा था;
लेकिन हमको जीना था कि अपना घर परिवार चले!

कदम मिलाये, कदम बढ़ाये, फिर राहों में छोड़ गए!
आज भी लगता है कि शायद फिर उनका इकरार मिले!

हर मुस्कान में गम होता है, हर गम में कोई ख़ुशी छुपी;
ध्यान से देखो रातों में भी किरणों का इज़हार मिले! 

इक उजियारा, इक अँधियारा बार बार मिलते ही रहे;
समझ न पाए कब नफरत और कब कब किसका प्यार मिले! 

हम तो हम हैं, फिर भी खुद ही समझ न पाए खुद को हम;
फिर भी चाहत है कि हमको भगवन का इज़हार मिले!
                                                ---*पुष्पिंदर कौर "नीलम" 
*जन्म भी चंडीगढ़।  कर्मभूमि भी चंडीगढ़। कुराली और खरड़ के साथ बहुत सा भावुक लगाव। औपचारिक पढ़ाई लिखाई के बाद घर गृहस्थी में रहना चाहा था लेकिन पति की मौत एक बहुत बड़ा हादसा भी थी और चुनौती भी। रोज़ी रोटी की तलाश अकाउन्टस की तरह ले आई। फिर LIC में भी भाग्य आज़माया। चुनौतिओं का सामना करने की हिम्मत और सीख वहां से भी मिली। फिर ज़िंदगी पत्रकारिता की तरफ भी ले आई। पंजाब स्क्रीन मीडिया समूह से जुड़ना कुछ ऐसा ही साबित हुआ। यहीं से मन में दबी शायरी भी जाग उठी। तब से हालात की आंधिओं में गुम हुई डायरियों का शिकवा छोड़ कर फिर से लिखना शुरू किया है। जानती हूँ बहुत सी कमियां हैं। आप सभी लोग बताते रहना। --पुष्पिंदर कौर "नीलम" 

Sunday, January 26, 2020

एक कोर्स नुमा गीत//कहां है शाहीन बाग//कार्तिका सिंह

दिल में है जज़्बा, हथेली पे जान है! वहां बैठी हर एक औरत महान है
कहां है शाहीन बाग! कहां है शाहीन बाग!
पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!
जहां से बुलन्द हुई देश की आवाज़ है!
जहां पे छिड़ा है कुर्बानियों का साज़ है!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!

आज नया तीर्थ है, आज वही धाम है!
जिसने सुनाया हमें सच का पैगाम है!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!

छाया था अंधेरा पर वह चांदनी सा छा गया!
हर एक माथे में चिराग बन आ गया!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!

सुनो सुनो आती यहां ज़ोर से आवाज़ है!
हिम्मत और एकता की ऊंची परवाज़ है!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!

माई भागो बन के जहां औरतें हैं आ गईं!
झांसी वाली रानी का हैं रूप दिखला रहीं!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!

दिल में है जज़्बा, हथेली पे जान है!
वहां बैठी हर एक औरत महान है!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!

देश की चुनौती जिसने कर ली कबूल है!
जगह जगह खिला जहां इन्कलाबी फूल है।
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग! 

तिलक करो कि वहां माटी भी महान है!
एकता की आन जहां सब की ही आन है!
वही है शाहीन बाग! वही है शाहीन बाग!

पूछते हैं आज सभी कहां है शाहीन बाग!
                              ---कार्तिका सिंह
(इसका गायन/मंचन करने के इच्छुक अपना सम्पर्क//विवरण 9915322407 पर वाटसअप करें)

Friday, January 10, 2020

विश्व हिंदी दिवस 2020 पर कार्तिका सिंह की विशेष काव्य रचना

हिंदी में फिल्में देखी और गीत सुने ! हिंदी में ही बातें की और स्वप्न बुने!
हिंदी में जो अपनत्व है वह और कहां !
हिंदी में जो ममत्त्व है वह और कहां !

हिंदी में कुछ कहें तो अपना लगता है !
बाकी सब कुछ सपना सपना लगता है !

हिंदी में ही सोचना अच्छा लगता है !
हिंदी में ही बोलना अच्छा लगता है !

होश संभाला आरती सुन कर हिंदी में !
बड़े हुए जन गण मन पढ़ कर हिंदी में।

हिंदी में फिल्में देखी और गीत सुने !
हिंदी में ही बातें की और स्वप्न बुने।

हिंदी में ही गणित है और विज्ञान भी !
हिंदी में ही है अंतरिक्ष का ज्ञान भी !

दुनिया भर में पहुंच बढ़ी है हिंदी की !
दुनिया भर में बात चली है हिंदी की !

हिंदी का सम्मान ही अपना गौरव है !
हिंदी का यह मान ही अपना गौरव है !

आओ मिल कर सब हिंदी की बात करें !
हिंदी सब की अपनी बस यह बात करें !
                                        --कार्तिका सिंह 

Wednesday, January 8, 2020

नीलिमा शर्मा की काव्य रचना सफेद कुरता सीधा दिल में उतरती है

इसके बाद कौंधती हैं दिमाग में यादों की बिजलियां 
अब तुम कही भी नही हो
कही भी नही
ना मेरी यादो में
न मेरी बातो में
अब मैं मसरूफ रहती हूँ
दाल के कंकड़ चुन'ने में
शर्ट के दाग धोने में
क्यारी में टमाटर बोने में
एक पल भी मेरा
कभी खाली नही होता
जो तुझे याद करूँ
या तुझे महसूस करू
मैंने छोड़ दिए
नावेल पढने
मैंने छोड़ दिए है
किस्से गढ़ने
अब मुझे याद रहता हैं बस
सुबह का अलार्म लगाना
मुंह अँधेरे उठ चाय बनाना
और सबके सो जाने पर
उनको चादर ओढ़ाना
आज तुमको यह कहने की
क्यों जरुरत आन पढ़ी हैं
सामने आज मेरी पुरानी
अलमारी खुली पड़ी हैं
किस्से दबे हुए हैं जिस में
कहानिया बिखरी सी
और उस पर मुह चिडाता
तेरा उतारा सफ़ेद कुरता भी
नही नही !! अब कही भी नही हो
न मेरी यादो में न मेरी बातो में
फिर भी अक्सर मुझको सपने में
यह कुरता क्यों दिखाई देता हैं...... --नीलिमा शर्मा 
नीलिमा शर्मा के ब्लॉग में उनकी यह काव्य रचना "सफेद कुरता" एक यादगारी प्रभाव छोडती है। सीधा दिल में उतरती है और फिर दिमाग में किसी बिजली की तरह कौंधने लगती है। उन अहसासों की अनुभूति कराती है जब हम बहुत कुछ भूलना चाहते हैं।  खुद को इधर उधर व्यस्त करते हैं लेकिन फिर भी खुद बेबस सा पाते हैं। जल्द ही यूं लगता है जैसे हार रहे हैं।  कभी कभी तो हारने का मन भी होता है।  लेकिन दिल की बातें न समाज सुनता है न ही दिमाग। उस उधेड़बुन के अहसास को महसूस करना, पकड़ पाना पाना या शब्दों में बांध पाना आसान कहां? इसके बावजूद  इसे बहुत ही सादगी और खूबसूरती से प्रस्तुत किया है नीलिमा शर्मा ने सफेद कुरता नाम की अपनी काव्य रचना में। 
कभी जानमाने शायर अहमद फ़राज़ साहिब ने कहा था न--
पहले पहले का इश्क अभी याद है फ़राज़!
दिल खुद यह चाहता था कि रुसवाईयां भी हों! इसके साथ ही उनका एक और शेयर याद आता है---
वो मुझ से बिछड़ कर खुश है तो उसे खुश रहने दो “फ़राज़ “
मुझ से मिल कर उस का उदास होना मुझे अच्छा नहीं लगता…
मोहब्बत में कैसे कैसे उतराव चढ़ाव आते हैं, कैसे कैसे ख्याल  हैं उनको पकड़ पाना या याद रख पाना आसान नहीं होता। ज़िंदगी के फ़र्ज़ों और ज़िम्मेदारियों का गहन अंधेरा और उस अंधेरे में कौंध जाना यादों की बिजलियों का।  जैसे बिजली का कौंध जाना बरसात के मौसम में किसी कठिन पहाड़ी रास्ते में पल भर में रास्ता दिखा जाता है बस उसी तरह यादों का अहसास ज़िंदगी में भी मार्गदर्शन करता है। उस अहसास को महसूस करना भी आसान नहीं होता जिसे पकड़ने में सफलता पाई है नीलिमा शर्मा जी ने। इस सफल रचना के लिए एक बार फिर से बधाई। --रेक्टर कथूरिया 

Tuesday, December 31, 2019

शायद इस बार भी बस कैलेंडर ही बदलेगा//रेक्टर कथूरिया

जाते हुए साल 2019 के नाम मन में उठी कुछ पंक्तियां 
क्या करना है सन 2020?
क्या देगा?
अच्छे दिन?
क्या बदलेगा?
महंगाई रोकेगा या रोज़गार देगा?
शायद कुछ भी नहीं बदलेगा!
यह ऐसा कुछ भी नहीं देगा!
फिर भी
तारीख, सन और कैलेंडर तो बदलेगा ही....!
दिल की खुशियां चाहे वही रहें।
दिल के गम भी चाहे वही रहें।
उदासी और
चिंताएं भी चाहे वही रहें।
उम्मीदों का सिलसिला भी बेशक वही होगा !
फिर भी कुछ तो बदलेगा...!
शायद
कैलेंडर और डायरियां बनाने वालों के दिन फिरें!
शायद सच में आ जाएं उनके अच्छे दिन!
शायद उनको चार पैसों की आमदन हो जाये!
कुछ तो बदलेगा!
ज़रूर--बदलेगा!
दिखावे के लिए ही सही,
कुछ लोगों के लिए ही।
कुछ तो बदलेगा!
अब तो हमें भी
अपने पुराने गम अच्छे लगते हैं।
नया गम न जाने कैसा हो?
यही ठीक हैं...!
अब वाले गम...!
अब वाले आंसू...!
कम से कम
अपने और जाने पहचाने तो हैं।
देखो मेरे जाने पहचाने मित्रो !
बेशक सारी दुनिया बदल जाये !
तुम न बदलना!
तुम बेवफाई न करना!
तुम अपनेपन का यह रिश्ता न तोडना!
क्या करना है हमें नया साल?
यही ठीक था--2019
पता नहीं 2020
क्या गुल खिलायेगा!
आसार तो बहुत भयानक हैं।
अब तो डर लगता है!
अखबार में छपी खबरों से।
सड़कों पर नारे लगाते हजूमों से।
नए नए कानूनों से।
संविधान में हो रही तब्दीलियों से।
बहुमत से पारित प्रस्तावों से।
हमें कुछ भी नहीं चाहिए!
न रोज़गार, न ही सस्ती चीज़ें
न ही अच्छे दिन।
न ही15-15 लाख रूपये।
न ही दो करोड़ नौकरियां।
हमें कुछ भी नहीं चाहिए!
बस हमें शांति से रहने दो
यूंही एक दुसरे के साथ!
हमें मिलजुल कर गाने दो!
सारे जहां से अच्छा वाला गीत
मिलजुल कर सुनाने दो!
हमें बीते दिन ही लौटाने दो!
                   ---रेक्टर कथूरिया  

Saturday, September 15, 2018

लुधियाना में हिंदी भवन की मांग तो उठनी ही थी

कल को हो सकती है उर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषा भवनों की भी मांग 
लुधियाना: 14 सितंबर 2018: (हिंदी स्क्रीन टीम)::
हम लोगों की एक खासियत है कि हम सारा साल बेशक कुछ न करें लेकिन कोई विशेष दिवस आते ही एक दुसरे दे बढ़ कर सक्रिय हो जाते हैं। यही कुछ हिंदी दिवस पर भी होता नज़र आया। शहर के शिक्षण संस्थानों और साहित्यिक संगठनों की तरफ में शुक्रवार को हिंदी दिवस अपने अपने अंदाज़ में मनाया गया। कुछ नए संकल्प लिए गए कुछ नई मांगें उठीं। अलग अलग स्थानों पर इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। सभी ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की। लेकिन अंग्रेजी-फ्रेंच और जर्मन सीख कर विदेश जाने की इच्छा रखने वालों को तो याद भी नहीं था कि आज हिंदी दिवस है। उनकी सोच अपनी जगह सही है। हिंदी सीखने से अच्छा रोज़गार और जीवन की सुविधाएँ थोड़े मिलती हैं। उनका मानना है की फायदे में तो अंग्रेजी सीखने वाले ही रहते हैं। 
हिंदी भवन की मांग ने फिर पकड़ा ज़ोर 
लुधियाना में साहित्यिक आयोजनों के लिए गुरुनानक भवन और पंजाबी भवन पहले से ही मौजूद है। लेकिन पंजाबी साहित्य अकादमी के तत्वविधान में चलने वाले इस पंजाबी भवन में अक्सर पंजाबी को वरीयता दी जाती है। हालांकि यहाँ हिंदी पुस्तकें भी रिलीज़ होती रही हैं लेकिन फिर भी यहाँ पंजाबी का बोलबाला ही समझा जाता है। यहाँ का किराया-खर्चा और अन्य शर्तें भी कई बार लोगों को सख्त लगती हैं। ऐसे में हिंदी भवन की मांग उतनी जायज़ ही थी। पंजाब हिंदी परिषद की ओर से सतीश चंद्र धवन (एससीडी) गवर्नमेंट कॉलेज और राज भाषा कार्यान्वयन समिति आयकर विभाग लुधियाना के संयुक्त तत्वावधान में राज्य स्तरीय हिंदी दिवस समारोह मनाया गया। इस दौरान कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. धर्म सिंह संधू, सुरेंद्र भटुआ, ओम प्रकाश, यशपाल बांगिया, यश पाल छाबड़ा, मदन बस्सी मौजूद रहे। यशपाल बांगिया ने हिंदी की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए इसे राष्ट्र भाषा का गौरव प्रदान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि पंजाब में एक हिंदी भवन जरूर होना चाहिए, ताकि हिंदी के प्रचार-प्रसार को सुदृढ़ दिशा प्रदान की जा सके। हिंदी प्रेमियों की यह मांग यथाशीघ्र पूरी हो ऐसी इच्छा भी है और आकांक्षा भी लेकिन क्या बनेगा उर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से जुड़े लोगों का।  आखिर वे भी तो कर सकते हैं अपने अलग भवन की मांग।  
इस अवसर पर सुरेंद्र भाटूआ ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से राष्ट्रीय भावना प्रबल होती है। कॉलेज के हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं ने समूह गान, एकल गीत व नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में 51 मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। इस मौके पर ज्योति शर्मा और भरपूर कौर को ग्यारह-ग्यारह सौ रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया। इस मौके पर डॉ. मुकेश अरोड़ा, डॉ. सौरभ कुमार, प्रो. सोनदीप, प्रो. इंद्रजीत पासवान मौजूद रहा। एसडीपी कॉलेज में आज हिंदी का रंग छाया रहा। 
इसी तरह एसडीपी कॉलेज फार वूमेन में हिंदी विभाग की ओर से हिंदी दिवस कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कार्यकारिणी प्रिंसिपल मंजू भाषिणी ने की। हिंदी में मेधावी रहने वाली छात्राओं को पुरस्कृत किया गया। कुल मिला कर आयोजन यादगारी रहा। गौरतलब है की यह कालेज हर बार इस दिन पर विशेष आयोजन करता है। 
हिंदी दिवस का आयोजन मालवा सेंट्रल कॉलेज में भी 
मालवा सेंट्रल कॉलेज ऑफ एजूकेशन में भी हिंदी दिवस के मौके पर कविता, भाषण व स्किट प्रतियोगिताएं कराई गई। हिंदी विभाग के प्रमुख डॉ. नरोत्तम शर्मा ने हिंदी भाषा के इतिहास और हिंदी की वर्तमान स्थिति के बारे में अवगत कराया। उल्लेखनीय है की यह संस्थान भी लुधियाना के पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से है। 
देवकी देवी जैन कॉलेज भी विशेष आयोजन 
लुधियाना के किदवई नगर में स्थित देवकी देवी जैन कॉलेज में हिंदी साहित्य परिषद के अंतर्गत हिंदी दिवस मनाया गया। हिंदी विभाग की ओर से भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें 11 छात्राओं ने हिंदी भाषा के इतिहास और विकास पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रिंसिपल डॉ. सरिता बहल ने हिंदी भाषा को सभी भाषाओं की जननी बताया। गौरतलब है की इस कालेज में भी हिंदी और अन्य सबंधित विषयों पर अक्सर सेमिनार कराये जाते रहते हैं। 
आर्य कॉलेज में हुआ सम्मान 
आर्य कॉलेज ग‌र्ल्स सेक्शन में हिंदी के मौके पर हिंदी विषय में 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाली छात्राओं को सम्मानित किया गया। बीए द्वितीय वर्ष की अंजू गुप्ता को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। कॉज छात्राओं ने हिंदी दिवस के मौके पर कविताएं भी पेश की। प्राचार्य डॉ. सविता उप्पल और प्रभारी सूक्ष्म आहलूवालिया ने हिंदी भाषा के प्रचार एवं प्रसार के लिए छात्राओं को प्रोत्साहित किया।
मध्यप्रदेश से ऊषा व्यास ने इस विशेष दिन पर लिखा है:
आज हम हिन्दुस्तानी हिन्दी भाषा को जो राजभाषा भीहै विशेष याद कर रहे हैं और हिंदी -दिवस मना रहे ।वास्तव में यह हमारे लिए गर्व की बात है क्योंकि हिन्दी ही वह भाषा है जो हमें भारतीय होने का एहसास कराती है और एकता की भावना को जागृत कराती है। अब हम जानते हैं कि हिंदी भारत और विश्व में बोली जाने वाली सर्वाधिक भाषाओं में से एक है।इसकी जड़ें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा मेंतलाशी जा सकती है। परंतुहिन्दी साहित्य की जड़ें ज
मध्ययुगीनभारत की ब्रज, अवधी, मारवाड़ीऔर मैथिली जैसी भाषाओं के साहित्य में पाई जाती है। हिंदी में गद्य का विकास बहुत बाद में हुआ पहले इसनेअपनी शुरूआत कविता के माध्यम से जो ज्यादातर लोकभाषा के रूप में प्रयोग कर , विकसित किया है। हिन्दी का आरंभिक साहित्य अपभ्रंश में मिलता है हिन्दी में तीन प्रकार का साहित्य मिलता है गद्य ,पद्य,चम्पू । अब हम इसके इतिहास पर भी प्रकाश डालें तो वास्तव में हिंदी साहित्य का विकास आठवीं शताब्दी से माना जाता है और यह वह काल है जब सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई थी और भारत में अनेक छोटे छोटे-छोटे शासन केन्द्र स्थापित होंगे लगे थे, जो परस्पर संघर्ष रत थे। हिंदी साहित्य के इतिहास को आलोचक सुविधा के लिए पांच ऐतिहासिक चरणों में देखते हैं।जो इस तरह _एक_आदिकाल जो १४००ई से पहले,,दूसरा भक्ति काल,१३७५-१७००ई.,तीसरा-रीतिकाल-१६००-१९००, चौथाआधुनिकाल -१८५०ई के पश्चात,और फिर-नव्योत्तरकाल-१९८०ई के पश्चात।और जैसे कि हम और आप जानते हैं कि संविधान में इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया है। भारत में तीन चौथाई से ज्यादा लोग हिंदी भाषा बोलते और समझते हैं। भाषा का प्रयोग केवल संप्रेषण के लिए नहीं वल्कि तर्क, कल्पना, विचार और सृजन के लिए भी होता है। और मानव का भाषाई विकास जन्म से ही हो जाता है,और जीवन पर्यन्त तक रहता है। शब्द,वाक्य, ध्वनियां और छन्द , अलंकार यह ही किसी भाषा को सजाते हैं व्यवस्थित रूप देते हैं। फिर हमारी "हिंदी" तो व्याकरण, कविता ,और साहित्य , इत्यादि रूप में बहुत विशाल और विविधताओं कोभरे हुए हैं। इसलिए हिन्दी ही हमारी पहचान है। जय हिन्दी जय हिन्द। जय भारत 🙏
इसी तरह अन्य कई संगठनों ने भी हिंदी दिवस पर विशेष आयोजन किये। इनका विवरण अलग से दिया जा रहा है।  इस दिवस पर प्राप्त हुए विचारों को भी अलग पोस्ट में प्रकाशित किया जा रहा है। 
आवाज़ के जादू की जानीमानी आर जे और शायरा छिंदर कौर सिरसा ने अपने भाव कुछ इस अंदाज़ में व्यक्त किये   

Friday, September 14, 2018

" हिंदी " दिवस पर पी के तिवारी जी की काव्य रचना

Sep 13, 2018, 11:36 PM
संस्कृत से आया ये हिंदी

हिंदी है शान , हिंदी है मान,
हिंदी है देश की शान |
हिन्दू हैं हम, हिंदी हो तुम,
हिंदी हैं, हम सब लोग |
हिंदी है हमारी सबसे प्यारी,
सूरज और गगन से भारी |
भारत में हैं अनेक भाषाएँ,
हिंदी को है उसमें से लाएं |
संस्कृत से आया ये हिंदी,
लगाना मत भूलना तुम बिंदी |
कोई बोले अंग्रेजी दिन भर,
तो कोई है हिंदी पर निर्भर |
हिंदी है हमारी मन की भावनाएँ,
हिंदी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ |

भाषा को सियासत का हथियार बनने से बचाना होगा

तभी कायम हो सकेगा हिंदी और अन्य भाषाओं का आपसी सौहार्द 
लुधियाना: 14  सितंबर 2018:( हिंदी स्क्रीन टीम)::
करीब तीन-चार वर्ष पूर्व जब किसी एक सप्ताह लम्बे आयोजन में भाग लेने के लिए मैं कोयम्बतूर (तमिलनाडू) गया तो भाषा के मामले में मेरे अनुभव काफी नए थे। मुझे लगता था की दश्कों के बाद हिंदी से नफरत केवल कम ही नहीं होगी बल्कि शायद प्रेम में भी तब्दील हो गयी होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। मैंने किसी रेहड़ीवाले से हिंदी में बात करने की कोशिश की तो वो मेरे साथ झगड़ने की सुर में बोला... नो हिंदी नो हिंदी। ओनली तमिल ऑर इंग्लिश। उसके परिवार की एक महिला--शायद उसकी पत्नी ने हिंदी बोल कर मेरी सहायता करनी चाही तो उसने उसे भी डांट दिया। वह भी चुप हो गयी। फिर मैंने वहां पहुंची किसी लाल झंडे वाली वाम महिला से सहायता चाही वह उत्तर भारत से वहां गयी लगती थी; शायद हिमाचल प्रदेश से। 
इसके बाद मेरी बात करने की मुश्किल आसान हुई। लेकिन इसके साथ ही मन में पैदा हुए कई सवाल। भाषा तो जोडती है फिर इसके नाम पर विवाद क्यूँ? सोच के सागर में डुबकी कुछ और गहरी हुई तो याद आया कैसे पंजाब के  टुकड़े भाषा के नाम पर ही किये गए थे। भाषा, साहित्य, संस्कृति, धर्म और कला जैसे गैर सियासी क्षेत्रों में सियासत की दखलंदाजी कुछ कुछ समझ में आने लगी। सत्ता लोलुप लोग क्या क्या कर सकते हैं यह भी दिखने लगा। अब 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के अवसर ऐसा बहुत कुछ याद आने लगा है। जब पंजाब के पंजाबी भाषी लोगों ने सियासी आदेशों के चलते अपनी भाषा पंजाबी की बजाये हिंदी लिखवाई थी। इसी गलतबयानी से शुरू हुई थी पंजाब की समस्या जो बाद  में विकराल बनी। 
साथ ही यह भी याद आया कि तमिलनाडू में हिंदी का विरोध 1937 से चला आ रहा है। वर्ष 1960 के दशक में जब यह आंदोलन और भड़का तो 65-66 में 25 जनवरी के दिन काले झंडे लहराए गए। मदुरई में आंदोलन हिंसक हो उठा। स्थानीय कांग्रेस कार्यालय के बाहर आठ लोगों को जिंदा जला दिया गया। यह हिंसक विरोध कम से कम दो सप्ताह तक चला।  अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 70 लोगों की जान गयी। अनुमान लगा कर देखें भाषा के नाम पर खूनखराबा किस ने किया कराया होगा? काम से काम भाषा प्रेमी तो नहीं करेंगे हाँ सियासतदान ऐसा माहौल बना सकते हैं। 
हालात बेहद नाज़ुक थे। यहां तक कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी हिंदी थोपे जाने के सख्त ख़िलाफ़ थे। यह थोपे जाने की आशंका और भावना ही बवाल का कारण बनी होगी। दक्षिण भारत के सभी राज्य भी इसके विरोध में खुल कर खड़े थे। केवल इतना ही नहीं विरोध करने वालों में दक्षिण के कांग्रेस शासित राज्य भी थे। नेहरू और शास्त्री का ज़माना था। कहीं जनसंघ का होता तो शायद बात ही और बनी होती। 
हालात निरतंर बिगड़ते रहे। विरोध प्रदर्शनों के परिणाम स्वरूप उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को आश्वासन देना पड़ा। उन आश्वासनों को तत्कालीन सूचना और प्रसारणमंत्री इंदिरा गांधी ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन के जरिए अंग्रेज़ी को सहायक राज भाषा का दर्जा देकर अमल में लाया। इससे कुछ शांति बहाल हुई। लेकिन कड़ुवाहट अभी तक काम नहीं हुई। 
इन हालातों पर टिप्पणी करते हुए मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंटल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक वीके नटराज ने कभी कहा था कि विरोध प्रदर्शनों के बिना हिंदी को संरक्षण देने वाले लोग मज़बूत हो जाते।  गौरतलब है की तमिल अपनी भाषाई पहचान को अन्य लोगों की तुलना में अधिक गंभीरता से लेते हैं। उनको इस बात का अहसास है कि भाषा को खत्म करके पूरी संस्कृति को ही समाप्त किया जा सकता है। ऐसा कई जगहों पर हो भी चुका है शायद। अब उन जगहों के लोगों का मूल स्वरूप ही बदल गया है। 
इसी तरह एरा सेज़ियान कहते हैं  कि हालात अन्य जगहों पर भी ठीक नहीं हैं। अब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी अंग्रेज़ी सीखने को प्रोत्साहन दे रहे हैं। अब हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। राज्य पहले से अधिक मजबूत हुए हैं और केंद्र अब पहले की तरह ताकतवर नहीं रहा। ऐसे में अंग्रेजी भाषा और कल्चर सभी क्षेत्रों में निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। 
कुछ ही समय पूर्व पंजाब में भी हिंदी को पंजाबी पर हमला समझा गया था। पंजाबी को दूसरे दर्जे की भाषा समझे/बनाये जाने के जवाब में सड़कों पर लिखे साईन बोर्डों से हिंदी पर कालिख पोत दी गयी थी। अगर हिंदी को हमलावर माना जाता रहा या बनाया जाता रहा तो भाषा का सौहार्द खतरे में है। पंजाब के जिन लेखकों ने हिंदी-पंजाबी दोनों में साहित्य रचा है उनका शुद्ध स्नेह खतरे में है। भाषा को सियासत का हथियार बनने से बचाना होगा।