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Friday, September 26, 2025

28 सितंबर को प्रीत साहित्य सदन का एक और आयोजन

दो साहित्यिक पुस्तकों का होगा विमोचन 

लुधियाना: 26 सितंबर 2025: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::


हिंदी में साहित्य साधना लगातार जारी है।
हिंदी में लिखने वाले लगातार इस दिशा में सक्रिय हैं। एक और पुस्तक-परिचर्चा  एवं क्षकाव्य-संध्या  28 सितंबर को लुधियाना के समराला चौंक में हो रही है। लुधियाना के समरल चौंक क्षेत्र में एक पूरी टीम हिंदी और साहित्य के लिए सक्रिय रहती है। इस बार 28  सितंबर को भी प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना में एक पुस्तक का विमोचन कर रही है। इस सदन से जुड़े लोग अक्सर ही कुछ न कुछ करते रहते हैं जिसका साहित्य के क्षेत्र में बहुत अर्थ होता है। 

इस बार के आयोजन में भी पुस्तकों का विमोचन हो रहा है जिसका नाम है: मेरी-तेरी कहानी (लघुकथा-संग्रह)  इसकी रचनाकार हैं डॉ. विभा कुमरिया शर्मा। 

एक अन्य पुस्तक है: पिताजी का व्हाट्सएप  यह कविता-संग्रह। इस पुस्तक की रचनाकार हैं-सपना।  इस मौके पर  मुख्य-अतिथि डॉ. इरादीप होंगीं और कार्यक्रम की अध्यक्ष: डॉ. पूनम सपरा रहेंगी।  

तारीख और समय एक बार फिर बता दें 28 सितंबर 2025 को बाद दोपहर 03:00 से...शुरू। 

हिन्दी लेखक संघ पंजाब का सहयोग भी रहेगा और अन्य संगठन भी आएँगे। प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना आपके में आपकी इंतज़ार में रहेगा ही. वहां बहुत से और भी साहित्य सद्धक होंगें जिनसे आप मिल पाएंगे। 

Thursday, July 25, 2024

हिंदी लेखक और पत्रकार मनोज धीमान के लिए नया सम्मान

25th July 2024 at 3:31 PM

GNDU ने धीमान को हिंदी विषय में बोर्ड ऑफ स्टडीज (पीजी) में शामिल किया

लुधियाना: 25 जुलाई 2024: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

लंबे समय तक पंजाब के सीमावर्ती लोगों के दर्द को लेकर रिपोर्टिंग करने वाले हिंदी लेखक और पत्रकार मनोज धीमान अब कई दश्कों से लुधियाना के साथ जुड़े हुए हैं। आंधी आए जा तूफ़ान मनोज धीमान अपनी लेखन और पत्रकारिता की ड्यूटी में मगन रहते हैं। उन्हें किसी ने भी किसी भी तरह की गट बंदी में रूचि लेते नहीं देखा। ुको ले कर अब ख़ुशी की नै खबर आई है।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय (जीएनडीयू), अमृतसर ने हिंदी लेखक और पत्रकार मनोज धीमान को 01-07-2024 से 30-06-2026 तक की अवधि के लिए हिंदी विषय में बोर्ड ऑफ स्टडीज (पीजी) में शामिल किया है।

कलम के क्षेत्र में इस  लेकर ख़ुशी के लहर है कि धीमान को कल शाम विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार कार्यालय से इस नियुक्ति के संबंध में आधिकारिक सूचना प्राप्त हुई।

उन्होंने इस नियुक्ति के लिए जीएनडीयू के कुलपति को धन्यवाद दिया है। साथ ही, उन्होंने जीएनडीयू में डीन, भाषा संकाय और विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग प्रो (डॉ) सुनील का भी इस नियुक्ति के लिए आभार व्यक्त किया।  

Saturday, September 16, 2023

"हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में हिन्दी शिक्षक संघ का विशेष आयोजन 17 सितम्बर को

मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन में होगा कार्यक्रम 

लुधियाना: 15 सितम्बर 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब के पंजाबी परिवारों और सिख परिवारों में से
बहुत से कलमकार ऐसे हैं जिन्होंने उन दिनों भी हिंदी से अपना गहरा प्रेम बनाए रखा जब हिंदी के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे था। भाषा और साहित्य को भी कुछ लोग अपनी अपनी सियासत के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। हिंदी का साहित्य भी पंजाब के पर्यावरण की गहरी बातें करता है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी साहिब की कालजयी कहानी को पढ़े बरसों हो गए लेकिन वह आज भी ज़हन में है उसे पढ़ते हुए जहां पंजाब का रूमानी पर्यावरण सजीव हो उठता है वहीं युद्ध की भयानक वि विभिप्षा भी आने लगती है--अब भी जवानों के शहीद होने की खबरें उसी माहौल की याद दिलाने लगती हैं जिस का रूमानी सा लेकिन क़ुरबानी भरा रंग इस प्रसिद्ध कहानी-उसने कहा था में उभरता है--एक दिव्य प्रेम और एक युद्ध की कहानी का रंग---आज भी वह दिव्य प्रेम  और भावनाएं हमारे दिलों में है लेकिन युद्ध की कलि छाया निरंतर फैलती चली जा रही है-प्रेम और क़ुरबानी के उस रंग को गहरा करता है हर वह कार्यक्रम जो हिंदी दिवस के नाम पर मनाया जाता है-- "उसने कहा था" पर बहुत बाद में प्रसार भारती ने दूरदर्शन पर एक विशेष फिल्म भी बनाई थी। 

हिन्दी शिक्षक संघ (रजि.) पंजाब द्वारा "हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में 17 सितम्बर, 2023  दिन रविवार को मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना में कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें सरकारी स्कूलों के 8वीं,10वीं,12 वीं कक्षा बोर्ड परीक्षा में 95% अंक प्राप्त करने वाले छात्र एवं उनके अध्यापक सम्मानित किये जायेंगे।

इसमें प्रमुख वक्ता डॉ. बलवेन्द्र सिंह (सहायक आचार्य) स्नातकोत्तर हिन्दी-विभाग डी.ए.वी. कॉलेज जालन्धर और डॉ. राजेन्द्र साहिल, एसोसिएट प्रोफेसर गुरु हरगोबिन्द खालसा कॉलेज, गुरुसर सुधार, लुधियाना होंगे।  इस अवसर पर श्रीमती डिम्पल मदान, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, स. बलदेव सिंह, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, श्रीमती मंजू भारद्वाज, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शिक्षा, ए.शि) फतेहगढ़ साहिब , आशीष कुमार, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) शहीद भगत सिंह नगर, स. जसविंदर सिंह विर्क, उप जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, मनोज कुमार, उप जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, नीलम गुप्ता, प्रांत संरक्षक, भारत विकास परिषद पंजाब, श्री रूपेंद्र शर्मा, हिंदी अधिकारी पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय बठिंडा, डॉ. मुकेश अरोड़ा सीनेटर, पंजाब विश्व विद्यालय पंजाब, श्री मनोज प्रीत, प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना।

श्री अशोक थापर राष्ट्रीय अध्यक्ष, शहीद सुखदेव थापर मैमोरियल ट्रस्ट, त्रिलोक चन्द भगत समाज सेवी विशेष महमान के रूप में पधारेंगे। 

 डॉ. नीरोत्तमा शर्मा, एसोसिएट प्रोफ़ेसर  मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना कार्यक्रम प्रबंधक होंगे। यह जानकरी मनोज कुमार हिन्दी शिक्षक संघ (रजि. ) पंजाब ने दी। यकीन रखिए इस बार भी यह प्रोग्राम याद गारी होगा। 

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Monday, August 15, 2022

चल अकेला गाते गाते चले गए डाक्टर भारत

उनके बिन सब मेले सूने हो गए


लुधियाना
: 14 अगस्त 2022: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

कल फिर आ रही है 15 अगस्त की तारीख। स्वतंत्रता दिवस के आयोजन कल भी होंगें। कल फिर फहराए जाएंगे तिरंगे लेकिन डाक्टर भारत के बिन सब सूना लगेगा कल भी। वह इस बरस भी नज़र नहीं आएंगे। उन्होंने पूरी उम्र होश संभालते ही स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आयोजन मनाने शुरू कर दिए थे। हम लोग कई बरसों से इस आयोजन को लुधियाना के सिविल लाईन्स इलाके में स्थित न्यू कुंदनपुरी इलाके में देख रहे थे। इसके इलावा अयोध्या, फैज़ाबाद, आज़मगढ़, दिल्ली, मुंबई, भोपाल और कई अन्य जगहों पर भी भी डाक्टर भारत एफ आई बी के बैनर तले इस तरह के आयोजन करवाते रहे। इस बार भी उनकी अनुपस्थिति खटकती रहेगी। प्रस्तुत हैं सबसे पहले उनकी स्मृति में कुछ पंक्तियां: 

डाक्टर भारत ने झंडा उठाया था यह! 

उम्र भर हां तिरंगा झुलाया था यह!

आखिरी साँस तक वह समर्पित रहे! 

इसी की बात की, इस पर लड़ते रहे!

अपनी हर सांस इस पर न्योछावर करी!

अपनी पूरी उम्र इस के ही नाम की!

इन्हीं गलियों में झंडा फहराया था यह!

साल में दो समागम उन्हीं के तो थे!

साल में ये दो मेले उन्हीं के तो थे!

देश भक्ति के गीत वो गाते रहे!

देशभक्ति की बातें जगाते रहे!

सबसे मिलते रहे और मिलाते रहे!

झंडा ऊंचा रहे ये ही गाते रहे!

हर एक घर में तिरंगा पहुँचाया था यह!

ज़िंदगी भर वो खुद मुश्किलों में रहे!

फिर भी हंसते रहे, मुस्कराते रहे!

देश भक्ति के मेले लगाते रहे!

देश भक्ति की महफिल सजाते रहे!

चाय समोसों के लंगर लगाते रहे!

देश भक्ति के नारे लगाते रहे!

देश भक्ति का मकसद जगाया था यह!

उनके बिन आज सूनी न्यू कुंदनपुरी!

उनके बिन आज वैसी कोई महफिल नहीं!

न वो तंबू. कनातें, न वो कुर्सियां, 

उनके बिन आज गीतों की महफिल नहीं!

खो गए रूठ कर हमसे जाने कहां!

वो तिरंगा न जाने किसे दे गए!

उनके बिन कैसा मौसम अब आया है यह!

15 अगस्त 2018 को स्वतंत्रता दिवस पर जो आयोजन हुआ वह भी यादगारी था। डाक्टर भारत की सहयोगी टीम में सोनू शर्मा और उनके साथी राजू बंगा और दुसरे नौजवान पूरी तरह सक्रिय थे। बेलन ब्रिगेड की अनीता शर्मा भी विशेष तौर पर उस आयोजन में आईं। भाजपा की महिला नेत्री सुधा खन्ना ने विशेष हाज़िरी लगवाई। कांग्रेस के पार्षद डाक्टर जय प्रकाश भी पहुंचे थे। पड़ोस के ही लोकप्रिय डाक्टर राज गिल्होत्रा हमेशां इस तरह के आयोजनों में सक्रिय रह कर काम करवाते लेकिन खुद परदे के पीछे बने रहते। उस समय भी डाक्टर भारत की रहनुमाई में चलने वाले जानेमाने संगठन FIB ने कहा था कि सियासत से ऊपर उठ कर तिरंगे से जुड़ा भी जाए और सभी को जोड़ा भी जाए। वो कितना पहले सक्रिय थे तिरंगे  को घर घर ले जाने के लिए। 

कभी कभी जुबां पर शिकवा शिकयत भी आता है। डाक्टर साहिब आपके बिन कौन है यहाँ---बहुत जल्दी कर दी आप ने जाने में। कितनी लम्बी योजनाएं बना लीं थी।  क्या बनेगा अब उन योजनाओं का? उन पर काम भी शुरू था लेकिन आप अचानक हम सभी से रूठ गए।  आखिर ऐसा भी क्या हुआ था? काश उस दुनिया में कोई फोन मिल जाता या उस दुनिया का कुछ पता मिल जाता। लेकिन नामुमकिन जैसा ही है सब। बस अब उनकी बातें ही याद रह गयीं। वो भी बहुत कम लोग ही कर पाते हैं। जो बातें आप ने बतायीं थी उन्हें जल्द ही कलम से सबके सामने लाना भी है। अफ़सोस जिन्होंने चाईना गेट वाली टीम में हर सहयोग का वायदा किया था वही लोग डाक्टर साहिब के जाते ही बदल गए। और और मामलों में उलझ गए। शायद यही है दुनिया। 

उनकी पुरानी तस्वीरें अक्सर सामने आ जाती हैं तो बहुत सी पुरानी याद भी दिलाती हैं। उस दौर को एक बार तो फिर से जीवंत कर देती हैं ये तस्वीरें। हर तस्वीर बहुत कुछ याद दिला देती है--

तिरंगा हमेशां ऊंचा रहे-डाक्टर भारत राम का मकसद था यह और जीवन भर रहा। उसमें कभी उन्होंने समझौता न किया।  तिरंगे की बात आती तो वह पूरी तरह अड़ जाते। उनके लिए सबसे ऊपर था तिरंगा। 

देश हमेशां सुरक्षित हाथों में रहे उनका मिशन भी रहा। उनके स्रोत और साधन सीमित थे। फिर भी वह जासूसी में काम आने वाले सामान मंगवाते रहते। छुपे हुए कैमरे उनके पास अक्सर रहते जिन्हें उन्होंने अपनी टीम के ख़ास लोगों में बांटा भी था किसी न किस खास मिशन के लिए। अगर किसी को किसी ख़ास ख़ुफ़िया मिशन पर भेजते तो खतरों का पूरा आकलन करते। छुपे रह कर एक एक्स्ट्रा टीम ले कर उसके पीछे पीछे या आसपास रहते। अपने किसी जासूस या टीम को कभी खतरे में न पड़ने देते। कभी कभी तो हम हैरान रह जाते जिस जिस की डयूटी लगाई होती उसे आगाह करते हुए कहते आज घर परिवार के साथ जहाँ जा रहे हो वहां का प्रोग्राम रद्द कर दो। खतरा है वहां। इस तरह अपने लोगों को बचा भी लेते। डाक्टर भारत को किसी का पारिवारिक प्रोग्राम कैसे पता चलता थे यह आज भी रहस्य है। 

देश भक्ति डाक्टर भारत राम  की रग रग में रची हुई थी। बहुत सी देश विरोधी वारदातों को उन्होंने समझ से पहले सूंघ लें और फिर झट से इसकी सूचना सुरक्षा तंत्र को भी देनी। आतंकी खतरों से जगह करके बहुत सी जानें बचाई। कभी कभी आतंकी लोग भी आ जाते कि जो लेना है लो लेकिन हमारे कामों में टांग मत अड़ाओ। डाक्टर भारत सब कुछ नकार देते। उल्टा उन्हें कहते जो करना है करो लेकिन निर्दोषों का खून मत बहाओ। मेरे देश की तरफ आंख उठा कर मत देखो। मैं तिरंगे के दुश्मनों से कोई समझौता नहीं कर सकता। कभी कभी तो अपनी बातों से उनका ह्रदय परिवर्तन भी कर देते। आतंकी धमकियों की प्रवाह किए बगैर उन्हें सीधी राह पर-सद मार्ग पर  लाने के लिए डाक्टर भारत हमेशां प्रयासशील रहे। 

कांग्रेस की नीतियों से उन्हें इश्क था। शायद उनकी सियासत कांग्रेस के निकट रही हो। बड़े बड़े नेताओं से वह मिलते भी रहे। उनकी आलोचना भी करते रहे। अपने समय की लौह महिला इंदिरा गांधी के फैन भी रहे। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहिब का तो बेहद आदर करते थे। उम्र भर देश उनके लिए सर्वोप्रिय रहा। आखिरी सांस तक यह भावना नहीं बदली। 

बड़े बड़े लोगों से मिलना जुलना रहा लेकिन उन्होंने कभी इसका फायदा नहीं उठाया। चाहते तो लाल बत्ती वाली गाड़ी, बंगला फ़्लैट सब ले सकते थे लेकिन नहीं। भावुक थे। दिल से सोचते थे। नफा नुकसान तो कभी नहीं सोचा उन्होंने। 

उनके लिए देश किसी इमारत का नाम नहीं था बल्कि देश की जनता थी असली भारत। समाज में एकता बनी रहे इसके लिए वह आखिरी सांस तक प्रयासशील रहे। साम्प्रदायिक और फूट डालने वालों के खिलाफ हर दिन लड़ते रहे।  फुट और नफरत की सियासत से उन्हें सख्त नफरत थी। प्रेम के पुजारी थे, प्रेम के ही दूत थे। हर तरफ प्रेम ही चाहते थे। प्रेम की रक्षा के लिए हर जंग भी लड़ सकते थे।  

डाक्टर भारत ज़िंदगी भर अभावों में रहे लेकिन मुस्कराते रहे। कोई नियमित आमदनी तो थी नहीं। फक्कड़ सवभाव लेकिन दिल में बादशाही भी। इसके बावजूद मेहमानों के लिए चायपानी का खर्चा कभी कभी हर रोज़ तीन सो रुपयों से भी ज़्यादा बढ़ जाता। किसी दिन किसी को खाना खिलाना पड़ जाता या शाम को जाम चला तो खर्चा और भी बढ़ भी जाता। जो भी आता इन्हीं बातों में खर्च हो जाता। उन्होंने दोस्तों की आवभगत में कभी कोई कसर न छोड़ी. कभी कोई कंजूसी न की। दोमोरिया  दोमोरिया पुल की मार्कीट में बहुत ही पुराने बने हुए प्रीतम ढाबे में कभी कभी शाम को ओंकार पुरी साहिब भी खर्चे पानी से हाथ खड़े कर जाते और दुसरे लोग भी। इसके बावजूद महफ़िल जारी रहती। प्रीतम ढाबे के मालिक को थोड़ी सी आशंका होती कि कि डाक्टर साहिब की जेब संकट में हैं। वह आ कर हाथ जोड़ कर कहता डाक्टर साहिब आपका अपना ही ढाबा है। कोई चिंता मत करना। हिसाब किताब होता रहेगा। और महफ़िल जारी रहती। डेस्क पर पड़ा उनका जासूसी छल्ला आसपास की खबर लेता रहता।  हम लोग नाराज़ भी होते लेकिन डाक्टर भारत मुस्करा कर सब माहौल हल्का बना देते। जवाबी सवाल करते अरे भाई कोई फैज़ाबाद से आ रहा है, कोई मुंबई से, कोई दिल्ली से तो कोई आज़मगढ़ से क़ज़ा उन्हें जलपान भी न कराया जाए? 

उम्र के आखिरी दिनों में बिजली बोर्ड वाले उनका मीटर काट गए। बिल अदा नहीं हो पाया था। इसका गहरा सदमा लगा उन्हें। वह उदास रहने लगे। बिल की रकम कुछ हज़ारों में ही थी लेकिन फिर भी बहुत बड़ी न थी। दोस्तों से मिल जल कर भी वह रकम भी अदा न हुई।

उदास थे। जिन लोगों के लिए मैंने कभी अपना कुछ न बनाया। किसी बड़े से बड़े मामले में समझौता न किया। उन लोगों ने मुझे बिल की रकम के लायक भी न समझा! एक अकाली लीडर ने कहा अच्छा ही हुआ अब जल्दी घर जाया करोगे। यूं भी पंखे की हवा से सेहत खराब होती है। उसने शायद मज़ाक में कहा था लेकिन उन बातों ने भी उनको गहरी ठेस पहुंचाई। डाक्टर भारत ने इन्हें दिल पर ले लिया। एक दिन दिल का दर्द अचानक शिद्दत से उठा और पूरी टीम को अकेला छोड़ गए। शायद कह रहे थे-यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! कभी कभी लगता है अच्छा हुआ इस मतलबी दुनिया को छोड़ गए यहां दिल की बातें कौन समझता है? लेकिन उनके बाद पैदा हुई उदासी भी नहीं जाती। 

अब पूरी टीम में कोई नहीं है उन जैसा। डाक्टर भारत FIB टीम के सक्रिय सदस्यों को चाईना गेट टीम बोला करते थे। सारी उम्र उन्होंने इस टीम के प्रेम में काटी लेकिन हम लोग उन्हें हार्ट अटैक से बचा नहीं पाए। वह अपने FIB दफ्तर से अपनी बेटी की कार से घर की तरफ गए और फिर कभी लौट कर नहीं आए। हम इंतज़ार कर रहे थे शाम हो गई अभी आए  क्यूं नहीं! उस आखिरी दिन के घटनाक्रम को सोच सोच कर स्वयं पर ही आत्म ग्लानी  होती है हम कैसे दोस्त थे उन्हें सही वक्त पर किसी महंगे अस्पताल में नहीं लेजा पाए। 

अब भी दिल में दर्द उठता है उनके जाने के बाद। कोई तो आगे आए जो उनके मिशन को आगे ले जाने को राज़ी हो। पूरे समाज के लिए अपूरणीय क्षति है उनका इस तरह चले जाना--

-----आज भी उनके पड़ोस में रहना याद आता है।  उनके बिना अब न वो सिविल लाईन्ज़ का न्यू कुंदनपुरी वाला इलाका अच्छा लगता है न ही यहाँ मोहाली का इलाका जहां हमने एकसाथ आना था। वो भी अकेले चले गए। हम भी अकेले रह गए। याद आता है वो गीत चल अकेला चल अकेला चल अकेला! तेरा मेला पीछे छूटा बाबू चल अकेला!

                  --रेक्टर कथूरिया

               पंजाब स्क्रीन मीडिया समूह

बहुत सी यादें हैं बाकी फिर कभी सही---

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शांतिनिकेतन में पढ़ने का वो सपना टूट गया 

Friday, July 22, 2022

कविता कथा कारवां की ओर से 'सावन कवि दरबार' का आयोजन

18th July 2022 at 09:14 PM

 जानेमाने शायर सरदार पंछी मुख्य अतिथि के रूप में पधारे 


लुधियाना: 18 जुलाई 2022: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

शायरी तभी सम्भव होती है जब इन्दगी दर्द भी देती है, संवेदना भी देती है, दर्द भी देती है। इस जहां अनुभूति के बाद कोई कोई ही होता है जो इस सरे अनुभव की अभिव्यक्ति कर सकता है। जैसे जैसे यह अनुभूतियां गहरी होती आती है वैसे वैसे अभिव्यक्ति का रंग भी गहराता जाता है। लोग कहने लगते हैं आपकी कविता बहुत सुंदर हो गई है। बस ऐसे अनुभवों का अहसास करते करते ही जसप्रीत कौर फलक ने श्री अटल बिहारी वाजपेयी साहिब  की कविता पर पीएचडी कर ली। यानि जीवन में भी कविता, शोध में भी कविता और इन्दगी के आयोजनों में भी कविता। कुल मिला कर जसप्रीत कौर फलक का पूरा जीवन ही कवितामय बन गया है। इसकी चमक अब तो चेहरे पर भी स्पष्ट नज़र आने लगी है। 

कविता कथा कारवाँ (रजि.) की ओर से 'सावन कवि दरबार' का आयोजन माया नगर में किया गया।  वरिष्ठतम शायर सरदार पंछी  इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। इस अवसर पर संस्था की अध्यक्षा डॉ जसप्रीत कौर फ़लक ने आमंत्रित कवियों एवं उपस्थित गणमान्य काव्य प्रेमियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रसिद्ध भजन गायिका सरोज वर्मा के सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना गायन से हुआ। 

इसके बाद कविगणों एवं शायरों ने सावन ऋतु को केंद्र में रखकर अपनी-अपनी बेहतरीन कविताएं और ग़ज़लें प्रस्तुत कीं। रचनाकारों ने अपनी खूबसूरत ग़ज़लों, गीतों और कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। साहित्य के साथ साथ संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था। 

कवि दरबार में  डॉ जसप्रीत कौर फ़लक, डॉ जगतार धीमान, दानिश भारती, डॉ राजेंद्र साहिल, अमृतपाल गोगिया, हरदीप बिरदी, रश्मि अस्थाना, गुरचरण नारंग, नवप्रीत हैरी और डॉ रविंदर सिंह चंदी ने अपनी उच्च स्तरीय रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया। मशहूर शायर दानिश भारती ने प्रभावशाली ढंग से मंच का संचालन किया। 

अंत में सुश्री रश्मि अस्थाना, सचिव, कविता कथा कारवाँ (पंजीकृत) ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा। कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण रहे मालपुए और खीर। सभी साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों ने स्वादिष्ट मालपुए-खीर का आनंद लिया और श्रावण मास का शगुन भी पूरा किया।


चलते चलते कुछ पंक्तियां 

कोई किस्से नहीं होते कोई बातें नहीं होतीं

महकते दिन नहीं होते मधुर रातें नहीं होतीं

कहीं पर दूर रहकर भी कोई दूरी नही होती

कहीं पर पास रहकर भी मुलाकातें नहीं होतीं

-डॉ कविता'किरण"

Friday, February 18, 2022

एक आयोजन "निर्मल ऋषि" मैम के साथ

साहित्यिकदीप वेलफेयर सोसाइटी ने कराया विशेष कार्यक्रम 

लुधियाना:17 फरवरी 2022: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
साहित्यिकदीप वेलफेयर सोसाइटी (रजि) की ओर से प्रकाशित करवाए गए सांझे संकलन "काव्य-क्यारी"को साहित्य प्रेमियों को समर्पित करने से पहले पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री में अपना नाम कमाने वाले "निर्मल ऋषि"मैम को भेंट किया गया। ऋषि मैम एक बढ़िया अदाकारा होने के साथ-साथ एक बहुत ही नरम दिल इंसान भी हैं जिन्होंने हमारी पूरी टीम की हिम्मत बढ़ाते हुए पुस्तक काव्य-क्यारी को बेहद प्यार और आशीर्वाद दिया। साहित्य के प्रति उनका प्रेम एवं अपनी मातृभाषा पंजाबी के प्रति उनकी रूचि देख हम सभी को उनसे बेहद कुछ सीखने को मिला। ईश्वर की असीम कृपा से पुस्तक काव्य-क्यारी को जल्दी ही साहित्य प्रेमियों को समर्पित किया जाएगा। 

Wednesday, February 16, 2022

नहीं रहे बेनू परवाज़ के माता अजीत कौर जी

कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे लुधियाना में हुआ निधन 

लुधियाना: 16 फरवरी 2022: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

कुछ लोग दुःख से टूट जाते हैं। कुछ बहादुर लोग  टुकड़ों को फिर से उठा क्र जोड़ लेते हैं और चल पड़ते हैं नए जोश के साथ  पर। जब प्रोफेसर सतीश कांत का अचानक निधन हो गया तो उनके परिवार के लिए सब कुछ टूट गया। सभी सपने बिखर गए। जो अपने थे उनके पास पहले से ही उनके अपने झमेले थे। जो अपने नहीं हैं वे भी या तो हालत का फायदा उठग्ने लगते हैं या फिर औपचारिक अफ़सोस व्यक्त करने के बाद लौट जाते हैं अपनी अपनी दुनिया में। कौन किसका दुःख बंटा पाता और सा ही दुःख बंटाने की बात सम्भव भी नहीं होती। सती प्रथा को मानने वाली महिलाएं तो आग में जल कर रख हो जाती रहीं लेकिन इस आग से ज़्यादा पीड़ादायक होती है बिरहा की आग। उसमें जीवन भर एक एक सांस सती होते रहना होता है। इसके साथ ही घर परिवार और दुनिया की रस्में भी निभानी होती हैं। सभी ज़िम्मेदारियां भी उठानी होती हैं। इस धर्मयुद्ध से भागने की सिफारिश न  न ही समाज। परिवार, समाज और स्वयं की ज़िम्मेदारियों से भाग कर की गई पूजा भी स्वीकारयोग्य नहीं होती। 

प्रोफेसर सतीश कांत का निधन होने के बाद यह सभी चुनौतियां मैडम बेनु के सामने थी। पति चल बसे तो सती जैसी प्रथाएं शुरू करने और चलाए रखने वाला समाज पत्नी का मुस्कराना भी ठीक नहीं समझता। ढंग से कपड़ा पहन ले तो उसे दूसरी ही निगाहों से देखने लगता है। लेकिन ज़िंदगी की जंग में मुस्कराना भी पड़ता है और ढंग के कपड़े भी पहनने पड़ते हैं। 
बेनू मैडम के पिता बहुत ही प्रगतिशील थे। उन पर वाम के विचारों का काफी असर था। एक तरह से कामरेडों वाली लुक थी इस परिवार की। पीटीआई का साथ छूटा तो उन्हें पिता भी बहुत याद आए लेकिन वह भी तो पास नहीं न थे। 
इस दूरी के बावजूद पिता के अपनाए  विचारों ने बेनू मैडम और उनके परिवार को शक्ति दी कि समाज से डर कर नहीं बल्कि उन्हीं सिद्धांतों को अपना कर चला जाता है जो पूरे समाज का भला करने वाले हों। 
उस बेहद नाज़ुक माहौल में जिसने स्नेह और मातृत्व के साथ आगे बढ़ने की शक्ति दी वह बेनू की मां थी। हम से कुछ लोगों ने उस महान शख्सियत माता अजीत कौर जी के दर्शन भी किए हुए हैं। उस महान माता ने बेनू को हौंसला दिया। पूरी हिम्मत से काम करने के लिए ढांढ़स बंधाई। समाज आड़े आया तो बेनू की माता जी ने पूरे समाज के साथ टक्कर  ले कर उसे अपने साथ चलने पर मजबूर किया। बेनू को साहित्य सृजना के लिए उत्साहित किया। 
बेनू को टूटने से बचाने वाली वह महान शख्सियत अब इस दुनिया में नहीं रही। इस महीने की 15 फरवरी को उनका निधन हो गया। वह कुछ दिन से बीमार तो चल रहे थे लेकिन ऐसी आशंका तो कदापि भी नहीं थी। शायद यही होती है अनहोनी। जो हम सोचना भी नहीं चाहते वही हो कर रहता है। वह बेनू और परिवार को छोड़ कर चली गयीं उस सफर पर जहां से कोई नहीं लौटता। दुःखद मन से उन्हें सिविल लाईन्ज़ के श्मशान घाट में अंतिम दर्शनों के बाद विदा कर दिया गया। चिता की अग्नि के साथ ही ज्योति के साथ ज्योति मिल गई। अब यादें शेष हैं। उनके दिए आशीर्वाद शेष हैं। उनकी बातें अब भी कानों में सुनाई देती रहेंगी। जहां जहां वह उठते बैठते थे वहां वहां से उनके होने का भरम होता रहेगा।  उन्हें खोने के बाद उनकी अहमियत हर पल बढ़ती रहेगी। हम सोचते रहेंगे काश आज फिर वह हमारे पास होते लेकिन कौन आया है उस जहां से लौट कर। वह अदृश्य हो गई हैं लेकिन वह हमारे आपस ही तो हैं। बस अब नज़र नहीं आएंगी। 

Tuesday, December 14, 2021

मीरा, महादेवी वर्मा और अमृता प्रीतम-परंपरा की उत्तराधिकारिणी:जसप्रीत कौर फ़लक

पुस्तक लोकार्पण के आयोजन में शामिल हुई प्रमुख शख्सियतें 


लुधियाना
: 12 दिसंबर 2021: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

पाकिस्तान की मरहूम लेखिका बानो कुदसिया ने एक लम्बी कहानी या फिर नावलैट जैसी एक रचना लिखी थी आठवां रंग। यह कहानी बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हो कर भी छपी। जिस जिस ने भी इस कहानी को पढ़ लिया वह इसे भूल नहीं पाया। हमारी ही ज़िंदगी में हमारे ही आसपास ऐसा बहुत कुछ घटित होता है जिसकी झलक का अहसास इस कहानी में  मिलता है। वैसे खतरा भी कि यह कहानी बहुत से लोगों को चिंताजनक हद तक निराशा में भी धकेल सकती है। इसे पढ़ पाना और फिर पहले की तरह बने रहना सब के बस का नहीं है। पंजाबी में इस अनुवाद को सर्वप्रथम अमृता प्रीतम ने अपनी लोकप्रिय रही पत्रिका "नागमणि" में प्रकशित किया था। फिर इस कहानी को अमृता जी ने अपने संकलन "13 अवाज़ां" में भी शामिल किया जिसे प्रकशित किया था दिल्ली के उस समय के जाने माने प्रकाशक राज पैकेट बुक्स ने। शयद चली पचास वर्ष पूर्व। बाद में यह किताब भी नज़र नहीं आ सकी और न ही यह कहानी भी। फिर शब्द नाम की पत्रिका ने जब बानो कुदसिया पर विशेषांक प्रकाशित किया थी फिर इस कहानी की चर्चा दोबारा से शुरू हुई। जब जसप्रीत कौर फलक की नयी पुस्तक मार्किट में आयी तो बानो कुदसिया की कहानी भी फिर से ज़हन में आ गई। इसी तरह आठवें रंग की तलाश में बेचैन लोगों की तलाश हमारी टीम को भी रहती है। वास्तव में कुछ गिनेचुए लोग ही ारहवें रंग में भटकना को गले लगते हैं। इसी तलाश में मुलाकात हुई जसप्रीत फलक से। वह भी आठवें रंग की तलाश में है। खूबसूरती के साथ साथ कलम का जूनून और अध्यापन का प्रोफेशन। आम तौर पर ऐसे लोग बेहद व्यस्त रहते हैं।आराम का भी वक्त नहीं मिल पाता लेकिन जसप्रीत फलक ने तो साहित्य साधना के लिए पुरा वक्त निकाला। 

साहित्यिक संस्था 'कविता कथा कारवां' (रजि.) एवं 'कथा कारवां प्रकाशन' की ओर से प्रसिद्ध हिन्दी कवयित्री जसप्रीत कौर फ़लक के नये पंजाबी कविता संग्रह 'अठवें रंग दी तलाश' का लोकार्पण पंजाबी भवन, लुधियाना में पंजाबी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. रविंदर भट्ठल की अध्यक्षता में आयोजित एक भव्य समारोह सम्पन्न हुआ। ज़िला भाषा अधिकारी श्री संदीप शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। 

कनाडा से प्रवासी साहित्यकार मीता खन्ना विशिष्ट अतिथि के रूप में तशरीफ़ लाईं। वरिष्ठ साहित्यकार त्रिलोचन लोची ने सभी उपस्थित साहित्य प्रेमियों का स्वागत करते हुए जसप्रीत कौर फ़लक को पंजाब की श्रेष्ठ संभावनाशील कवयित्रियों में स्थान दिया। इस अवसर पर पुस्तक 'अठवें रंग दी तलाश' पर एक सारगर्भित विचार चर्चा भी करवाई गई। 

विख्यात साहित्यकार-आलोचक प्रिंसिपल डॉ. गुरइकबाल सिंह ने जसप्रीत कौर फ़लक के संवेदना एवं रचना संसार पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए उन्हें भोगे हुए यथार्थ की कवयित्री सिद्ध किया और हिंदी भाषी होते हुए भी उत्कृष्ट पंजाबी सृजन के लिए उनकी सराहना की। विचार चर्चा को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ शायर सरदार पंछी समेत हरमीत विद्यार्थी, मनिंदर गोगिया, सहजप्रीत मांगट, परमजीत सिंह सोहल, चरनजीत सिंह, करमजीत ग्रेवाल, शैली वधवा,अजमेर सिंह आदि ने जसप्रीत कौर फ़लक के रचना संसार के विविध पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। राजेन्द्र साहिल ने उनकी अनुभूति की प्रामाणिकता और सच्चाई को रेखांकित करते हुए उन्हें मीरा, महादेवी वर्मा और अमृता प्रीतम की परंपरा की उत्तराधिकारिणी सिद्ध किया। 

इसी के साथ-साथ संंस्था 'कविता कथा कारवां' के न्यूज लैटर का भी उपस्थित साहित्य प्रेमियों के कर-कमलों के द्वारा विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध गायक धर्मेंद्र मसाणी, जतिंदर जीतू एवं गुरदर्शन धूरी और मीता खन्ना ने जसप्रीत कौर फ़लक को जन्मदिन की बधाई देते हुए उनकी ग़ज़लों का सुमधुर गायन प्रस्तुत किया। समारोह में आयोजित कवि दरबार में अमरजीत शेरपुरी, हरमीत पोएट, हरजीत लाडवा, जसकीरत सिंह, नवकमल सिंह, नवप्रीत सिंह, सारा सैफ़ी आदि ने जसप्रीत फ़लक की काव्य रचनाएं प्रस्तुत करते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अतिरिक्त संस्था द्वारा करवाए गए यू-ट्यूब लाइव कार्यक्रम में भाग लेने वाले नवोदित कवि-कवयित्रियों नभराज सिंह, हर सिमर सिंह एवं दिलप्रीत कौर को विशेष पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर तरसेम नूर, सागर सियालकोटी, अमृतपाल गोगिया, हरदीप विरदी, वरिंदर जटवाणी, इरादीप त्रेहन, राजदीप तूर, मीनू कटारिया, सिमरन धुग्गा, सिमरतजीत कौर, मनिंदर कौर मन, अनु शर्मा, अनु पुरी एवं अन्य साहित्यिक व्यक्तित्व उपस्थित थे। कार्यक्रम में उपस्थित समस्त साहित्य प्रेमियों, साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। मंच संचालन की परिश्रम साध्य भूमिका प्रसिद्ध गीतकार प्रभजोत सोही ने निभाई। अंत में धर्मेंद्र शाहिद एवं जसप्रीत कौर फ़लक ने समस्त आगंतुकों को सहृदय धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए आभार प्रकट किया।

Wednesday, December 1, 2021

भाषा विभाग की ओर से फलक की नई पुस्तक रिलीज़

 जसप्रीत फ़लक का काव्य संग्रह 'अठवें रंग दी तलाश' अब मार्किट में 


लुधियाना
: 1 दिसंबर 2021: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो):: 

उर्दू के साथ साथ हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में अपना हाथ आज़माने वाली शायरा जसप्रीत कौर फलक का नाम किसी जान पहचान का मोहताज नहीं है। उसने लगातार लिखा है और सक्रिय हो कर उसे छपवाया भी है। लिख लिख कर पांडुलिपियों का ढेर लगाने वाले ज़माने में जसप्रीत कौर फलक ने प्रकाशक ढूंढे या प्रकाशकों ने इस शायरा को ढून्ढ ´निकाला लेकिन कुछ कुछ अंतराल के बाद जसप्रीत कौर फलक की कोई न कोई पुस्तक सामने आती रही। इन पुस्तकों पर चर्चा  भी काफी हुई। इस बार जसप्रीत कर फलक सामने ै है अपनी नई पंजाबी पुस्तक को लेकर। पुस्तक का नाम है आठवें रंग की तलाश। फलक की इस नई पुस्तक को रिलीज़ करने का  यादगारी आयोजन करवाया भाषा विभाग पंजाब ने। आयोजन में बहुत से नामी कलमकार शामिल हुए।  

प्रसिद्ध हिन्दी कवयित्री जसप्रीत कौर फ़लक के नये पंजाबी कविता संग्रह 'अठवें रंग दी तलाश' का लोकार्पण भाषा विभाग पंजाब की ओर से आयोजित 'पंजाबी माह' के भव्य 'विदाई समारोह' में मुख्य अतिथि शिरोमणि पंजाबी आलोचक डॉ. जसविंदर सिंह, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. सुरजीत लीअ, विशेष मेहमान शिरोमणि पंजाबी साहित्यकार निंदर घुंघिआणवी और पंजाबी, हिंदी, उर्दू साहित्य के अनेक प्रमुख हस्ताक्षरों के कर-कमलों के द्वारा सम्पन्न हुआ। 

भाषा विभाग की डायरेक्टर श्रीमती करमजीत कौर ने जसप्रीत कौर फ़लक की इस सृजनात्मक उपलब्धि पर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें भविष्य में निरंतर सृजनशील रहने के लिए प्रेरित किया। जसप्रीत कौर फ़लक ने इस पल को अपने जीवन का अविस्मरणीय पल बताया। इस समारोह में विख्यात पंजाबी गायिका अमर नूरी विशेष रूप से उपस्थित थीं। इसके अतिरिक्त इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार ओमप्रकाश गासो, दीपक जालंधरी, सरदार पंछी, सतनाम सिंह, वीरपाल कौर आदि समेत अनेक गणमान्य साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

Thursday, September 23, 2021

सोनिया पाहवा की दूसरी पुस्तक "कीमती जज़्बात" हुई रिलीज़

Thursday 23rd September 2021 at 08:22 PM Whatsapp

GCG लुधियाना में सहायक प्रोफेसर हैं मिस सोनिया पाहवा


लुधियाना: 23 सितंबर 2021: (अमृतपाल सिंह//कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

लुधियाना के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में से एक है लड़कियों का राजकीय कालेज अर्थात जीसीजी। इस शिक्षण संस्थान में जहां सिलेबस की पढ़ाई होती है हुए उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है वहीं साहित्य और कला के क्षेत्र में ऊँची उड़ान का मौका सभी को दिया जाता है। इसका अहसास हुआ एक नई पुस्तक के विमोचन को देख कर। 

अपनी पहली पुस्तक "ट्यून इनटू द वर्ल्ड ऑफ रेडियो" की शानदार सफलता के बाद गवर्नमेंट कॉलेज गर्ल्स, लुधियाना में सहायक प्रोफेसर का तौर पर कार्यरत्त सोनिया पाहवा ने आज अपनी दूसरी पुस्तक, कीमती जज़्बात का विमोचन किया।  

पुस्तक का विमोचन करते हुए सहायक प्रोफेसर सोनिया पाहवा ने कहा कि वह लंबे समय से अपनी भावनाओं को पाठकों तक पहुंचाना चाहती थीं।  इस पुस्तक में लिखी गई शायरी के माध्यम से उन्होंने अपनी अनमोल भावनाओं को लोगों के सामने पेश किया है और उम्मीद है कि पहली किताब की तरह इस किताब को भी लोगों का प्यार मिलेगा| यह किताब Amazon, Flipkart आदि पर मिल सकती है।

इस पुस्तके के विमोचन की औपचारिक रस्म अदा करते हुए गवर्नमेंट कॉलेज गर्ल्स, लुधियाना की प्रिंसिपल डॉ सुखविंदर कौर ने कहा कि यह उनके कॉलेज के लिए बहुत ही गर्व की बात है।  मैडम सोनिया पाहवा की इस किताब में शायरी को बेहद खूबसूरत अंदाज में पेश किया गया है और वे ना केवल अध्यापन के क्षेत्र में नाम कमा रही हैं बल्कि लेखन के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना रही हैं। 

इस तरह यह कॉलेज व समस्त स्टाफ के लिए फखर की बात है।  पुस्तक के विमोचन के अवसर पर श्रीमती कृपाल कौर (उप प्रधानाचार्य), श्रीमती गुरजिन्दर बराड़ (अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष) तथा अन्य स्टाफ सदस्य उपस्थित थे। अन्य साहित्य प्रेमियों ने भी ीा आयोजन में भाग लिया। 

Tuesday, September 14, 2021

हर पल सुनहरा:हिंदी के साथ--पूनम बाला

 14th September 2021 at 12:20 PM

प्रताप कालेज आफ ऐजुकेशन ने भी मनाया हिंदी दिवस 


लुधियाना
: 14 सितंबर 2021: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

शायद कोविड नियमों की मजबूरियां इस बार भी आड़े आ रही हों वरना प्रताप कालेज आफ ऐजुकेशन, लुधियाना आयोजनों को भव्य अंदाज़ में किया करता है। इस मामले में यह कालेज हमेशां ही बहुत अच्छी कारगुज़ारी दिखाता रहा है। इस बार कालज द्वारा "हिंदी दिवस" के उपलक्ष्य में बहुत ही सादगी से हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। इस बार भी जिन संस्थानों से बड़े पैमाने पर हिंदी दिवस मनाए जाने की अपेक्षा थी उनमें प्रताप कालेज ऑफ़ एजुकेशन भी एक था। मौजूदा हालात में इतना भी बहुत है। 

इस बार भी हिंदी दिवस आया तो कालेज का वही जाना पहचाना चेहरा आगे आया-प्रोफेसर पूनम बाला का। कालेज में ही कार्यरत्त हिंदी की सहायक शिक्षिका श्रीमती पूनम बाला ने संयोजिका के रूप में समूह स्टाफ सदस्यों व विद्यार्थियों को हिंदी दिवस की बधाई देते हुए समारोह की शुरुआत की। सरस्वती वंदना के पश्चात अपने सम्बोधन में उन्होंने हिंदी दिवस मनाये जाने का औचित्य बताया।उन्होंने अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से सभी को हिंदी भाषा अपनाने के लिए प्रेरित किया। भारत की नई शिक्षा नीति के अनुसार हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात महाविद्यालय के भावी शिक्षकों द्वारा हिंदी को समर्पित कविताओं का काव्य पाठ किया गया।इस अवसर पर उपस्थित समूह स्टाफ सदस्यों ने भावी अध्यापकों द्वारा उच्चरित कविताओं की सराहना की। उल्लेखनीय है कि पूनम बाला बहुत ही अच्छी शायरी करती हैं। दिल को छू लेने वाली शायरी। साथ ही मंच संचालन में भी किसी प्रोफेशनल एंकर से काम नहीं हैं उनकी कला। 

कालेज डायरेक्टर डा.बलवंत सिंह तथा प्रिंसिपल डा.मनप्रीत कौर ने एक संदेश द्वारा सभी को हिंदी दिवस की बधाई दी।अंत में समारोह की संयोजिका श्रीमती पूनम बाला ने सभी का धन्यवाद  किया। गौरतलब है कि हिंदी और साहित्य के मामले में कालेज की प्रिंसिपल डा. मनप्रीत कर बहुत ही गहरा ज्ञान रखती हैं। 

Saturday, September 11, 2021

मनोज धीमान ने लिखी एक और हिंदी फिक्शन किताब

'ये मकान बिकाऊ है' (लघुकथा संग्रह) बाजार में भी चर्चा में भी  

पुस्तक समाज के कई पहलुओं, व्यवस्था और शासकों की कार्यशैली को करती है उजागर

लुधियाना: 11 सितंबर 2021: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::

आज के युग की पत्रकारिता आसान नहीं होती। लगातार इसका अभ्यास करते करते निष्ठुरता सी आने लगती है। घटनाओं की खबर बनाते वक़्त स्पेस और टाईम को देखते हुए उसकी बेरहमी से कांटछांट करनी पड़ती है। सामूहिक हत्याकांड की खबर आ जाए तो आंसू बहाने से पहले खबर कवर करनी होती है। इसके बावजूद हमारे पुराने मित्र मनोज धीमान ने अपनी संवेदना बचाए रखी। उसे मरने नहीं दिया। अपनी मासूमियत भी बचाए रखी जिसका बचना आज के युग में असम्भव सा ही हो गया है। मनोज की जीवन शैली से ही निकली है मनोज की चौथी पुस्तक। फ़िलहाल पढ़िए पुस्तक के आने की खबर बाकी बात फिर कभी करते हैं मनोज धीमान पर भी और मनोज जी की साहित्यिक रचना पर भी।  --रेक्टर कथूरिया 


पंजाब में पिछले तीन दशकों से अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार मनोज धीमान ने
एक और हिंदी फिक्शन किताब 'ये मकान बिकाऊ है' (लघुकथा संग्रह) लिखी है, जिसका औपचारिक रूप अभी विमोचन नहीं हुआ है। लेकिन, यह किताब बाजार में आ गई है और पाठकों के हाथ में पहुंचते ही यह चर्चा का विषय बन गई है।

इस लघुकथा संग्रह में धीमान ने लगभग सभी विषयों जैसे राजनीति, धर्म, आर्थिक समस्या, सामाजिक विषमता, प्रेम, खराब संबंध और मीडिया पर अपनी कलम चलाई है। उन्होंने मानव मन में उत्पन्न हुई निराशा, दहशत, भय, त्रासदी को मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया है। लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार पांडे ने कहा, "जिस तरह ये सभी विषय एक-दूसरे से संबंधित हैं, उसी तरह लघुकथाएं एक के बाद एक समस्याओं को व्यक्त करती रहती हैं।" 

लघु कथाओं के बारे में बोलते हुए डॉ पांडे ने कहा कि प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण है। उन्होंने कहा कि लघु कथाएँ समाज के कई पहलुओं, व्यवस्था और शासकों की कार्यशैली को उजागर करती हैं। उन्होंने कहा कि लाखों प्रयासों के बावजूद भ्रष्टाचार सामाजिक नीति का हिस्सा बना हुआ है। जिन पर भ्रष्टाचार को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे इसे फलने-फूलने का धंधा कर रहे हैं। लघुकथा 'सोने की मुर्गी' में लेखक ने एक व्यापारी की कहानी के बहाने पुलिस व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। कैसे एक पुलिस केस में व्यापारी को फंसाया जाता है और उसका फायदा उठाया जाता है। इसी तरह लेखक ने लघुकथा 'नया धंधा' में पथराव की घटनाओं का जिक्र किया है। यह लघुकथा एक बेरोजगार युवक के भाग्य के बारे में बताती है। लघुकथा 'राजा और प्रजा' में राजा स्वयं भगवान बन जाता है। यदि राजा कोई नेक कार्य करे तो प्रजा उसे भूल जाती है। अब क्योंकि हर राजा चाहता है कि जनता उसके 'दरबार' में उसकी प्रशंसा करने के इरादे से उपस्थित हो, तो भारतीय राजनेताओं में उनके द्वारा किए गए नेक कामों को गलत कामों में बदलने की कला है। बाढ़ से बचाव के लिए बनाए गए मजबूत बांध को कमजोर करने के लिए राजा ने ऐसा किया।

डॉ पांडे ने कहा, "इस तरह, हर छोटी कहानी सच्चाई और आज की वास्तविकता के बहुत करीब है", "लेखक अपने समय की कहानियों को खुली आंखों से व्यक्त करता है।"

लघुकथा संग्रह 'ये मकान बिकाऊ है' के लेखन की शुरुआत कैसे हुई? इस सवाल का जवाब देते हुए धीमान ने कहा कि साल 2020 में कोरोना काल में वह व्हाट्सएप पर प्रसिद्ध हिंदी लेखकों के समूह "पाठक मंच" से जुड़े। "पाठक मंच" में कुछ लघु कथाएँ पोस्ट करने पर पाठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली, जिससे लेखन की निरंतरता बनी रही। इस तरह इन लघुकथाओं ने आखिरकार एक किताब का रूप ले लिया।

धीमान ने इस पुस्तक को प्रसिद्ध कवि, नाटककार और आलोचक डॉ. नरेंद्र मोहन को समर्पित किया है। उन्होंने  कहा कि डॉ. नरेंद्र मोहन ने न केवल उन्हें लघु कथाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें अपने प्रकाशक - अकादमिक प्रकाशन, दिल्ली से बात करने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने कहा, "मुझे जीवन भर पछताना पड़ेगा कि डॉ. नरेंद्र मोहन ने किताब प्रकाशित होने से पहले ही इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। नहीं तो आज अगर वह जिंदा होते तो किताब प्रकाशित होने के पश्चात जश्न का माहौल कुछ और होता।"

हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष व विख्यात लेखक कमलेश भारतीय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, "लघुकथाएं रोजमर्रा की घटनाओं या जीवन की स्थितियों से निकलती हैं। रचनाएं जमीन से जुड़ी हुई हैं। समाचार पत्रों की सुर्खियां, राजनीति में कोई भी मोड़ या हमारे चारों ओर का जीवन लेखक की लघु कथाओं की दुनिया है।"

पंजाब के जाने-माने हिंदी उपन्यासकार व पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि हिंदी साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अजय शर्मा ने कहा, "लघु कथाएँ एक पूरी कहानी कहती हैं। ऐसी तकनीक बहुत कम लघु कथाकारों में देखी जाती है।"  अंजू खरबंदा, संचालिका, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल (दिल्ली शाखा) ने कहा, "लघुकथा पढ़ते समय पाठक भी उन लघु कथाओं के साथ चलने लगता है। लघु कथाएँ जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हैं, जो सीधे लोगों के दिलों तक पहुँचती हैं।" दोआबा साहित्य एवं कला अकादमी, फगवाड़ा (पंजाब) के अध्यक्ष डॉ. जवाहर धीर ने कहा, "लघुकथाएं बहुत कम शब्दों में एक बड़ा संदेश देने में सक्षम हैं।"

एकैडमिक पब्लिकेशन, दिल्ली के राजेश कुमार ने कहा कि पुस्तक में आज के जीवन और घटनाओं से ओत-प्रोत लघु कथाएँ हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक निश्चित रूप से हिन्दी साहित्य में एक विशेष स्थान बनाएगी। उन्होंने कहा कि किताब जल्द ही अमेज़न पर उपलब्ध होगी।

लघुकथा संग्रह 'ये मकान बिकाऊ है' में कुल 164 पृष्ठ हैं और इसमें 120 लघु कथाएँ हैं।

यहां बताया जाता है कि मनोज धीमान ने इससे पहले तीन हिंदी पुस्तकें लिखी हैं। ये पुस्तकें थीं: 'लेट नाइट पार्टी' (कहानी संग्रह), 'बारिश की बूंदे' (कविता संग्रह) और 'शुन्य की ओर' (उपन्यास)। 'लेट नाइट पार्टी' पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित हो चुका है। अंग्रेजी अनुवाद प्रोफेसर शाहीना खान द्वारा किया गया था।

Sunday, March 7, 2021

नारी मन की थाह पाने का प्रयास था महिला काव्य मंच का आयोजन

एक्सटेंशन लायब्रेरी में हुआ महिलाओं का विशेष शायरी आयोजन 

लुधियाना
: 7 मार्च 2021: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
नारी के हुसन और प्रेम को लेकर अगर पुरुष अक्सर लालायित रहा है तो शायद प्रकृति भी यही चाहती है। प्रेम की इन सदियों पुरानी कहानियों में निरंतर दोहराव जारी है लेकिन फिर भी इसका नयापन कायम है। ये किस्से ये कहानियां कभी पुराने नहीं हो सके। इसे प्रकृति और प्रेम का करिश्मा ही कहा जा सकता है। हर युग में प्रेम में पड़ने वाले युवाओं को यही महसुस होता है कि शायद उन्हीं का प्रेम ही नया है। शायद पहली बार उन्होंने ही प्रेम किया है। जो लोग जिस्म तक ठहर जाते हैं उन्हें इसकी गहराई का भान कभी नहीं हो पाता।  जो लोग तन से आगे जा कर मन तक उतरते हैं, फिर दिल तक पहुँचते हैं और उसके बाद अंतरात्मा का रास्ता तलाश कर लेते हैं उन्हीं को अर्धनारीश्वर के रहस्यों का पता चलना शुरू होता है। 
नारी को अर्धांगनी कहना आसान लग सकता है लेकिन इस आधे अंग के हर दर्द और हर अहसास को महसूस करना जीवन भर की साधना भी हो सकती है। गृहस्थ आश्रम में यही सच्ची भावना है जो मोक्ष तक ले जाती है। कुंडलिनी जागरण क्या होता है इसी से पता चलने के दरवाज़े खुलने लगते हैं। महादेव क्यूं महादेव कहे जाते हैं इसकी अनुभूति होनी शुरू होती है। आदियोगी ने क्या समझाया था इसका विवरण बिना किताबों को पढ़े मिलना शुरू हो जाता है। गृहस्थ को त्यागने वाले जब दुनिया को एक परिवार मानने की बातें करते हैं तो उनकी बातों पर शक होना शुरू हो जाता है। गृहस्थ में ही भगवान दीखनेके चमत्कार प्रेम से ही सम्भव हैं। 
कहते हैं कपड़ा सीने वाली सूई कहाँ राखी है इसका पता घर की महिला को होगा। नमक मिर्च कहां पड़ा है इसका पता भी उसे होगा। ज़रूरी कागज़ात कहाँ रखे हैं इसकी संभाल भी वही करती है। कब किसके यहां आना जाना है इसका पता भी उसी को होगा लेकिन इन सारे झमेलों में उसकी जगह कहां है यह पूछने पर उसकी आंखों में शायद आंसू आ जाएँ। वह बता नहीं पायेगी। 
जहां अपने मायके और शहर के साथ साथ सभी कुछ यहां तक कि सारी दुनिया छोड़ कर किसी बेगाने परिवार को अपना मान कर रहने आ जाती है तो यह घर सारी उम्र उसका नहीं हो पाता। उसके पति का हो सकता है, उसके बच्चों का हो सकता है, उसके परिवार का हो सकता है लेकिन उसका नहीं हो सकता। इसी दर्द की बात हुई पंजाब यूनिवर्सिटी के रीजनल सेंटर की एक्सटेंशन लाईब्रेरी में हुए आयोजन के दौरान। यह आयोजन महिला काव्य मंच का था। महिलाओं का था। शायरी का था। 
पूंजीवाद के इस दौर में नारी को एक बाजार की चीज़ बना दिया गया। टायर बेचने हों तो भी नारी की चर्चा, परफ्यूम बेचना हो तो भी नारी की चर्चा अर्थात हर मामले में नारी देह को एक व्यापर बना दिया गया है। इस अन्याय और इस दर्द की चर्चा तो अब हर रोज़ करनी पड़ेगी। पूरे वर्ष में केवल एक महिला दिवस काफी नहीं है। हमें पूरा वर्ष हर रोज़ नारी पर हो रहे हो रहे हमलों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करनी होगी। 
नारी के स्वतंत्र अस्तित्व की चर्चा करने वालों के इस सारे आयोजन के संचालन में डाक्टर बबीता जैन, प्रिंसिपल नरिंदर कौर संधु, प्रिंसिपल मनप्रीत कौर, पंजाब हरियाणा और चंडीगढ़ की प्रभारी-श्रीमती शारदा मित्तल, ट्राईसिटी चंडीगढ़ की अध्यक्ष-राशि श्रीवास्तव, कानून विभाग की समन्वयक-डा. आरती पुरी, पंजाब इकाई की प्रधान-डा. पूनम गुप्ता, और उनके साथ साथ समाज के बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं बेनू सतीश कान्त, छाया शर्मा, एकता पूजा शर्मा, नीलू बग्गा लुधियानवी बहुत ही मौन और गंभीर भूमिका अदा करती रहीं। पंजाब यूनिवर्सिटी रीजनल सेंटर के केंद्रीय निदेशक डा. रवि इंद्र सिंह आयोजन के अंत तक सभी को बहुत ही ध्यान से सुनते रहे। उन्होंने अपने गहन गंभीर विचार भी रखे। 
शायरी के दौर में जहां छात्राओं ने कमाल की रचनाएँ रखीं वहीं बड़ी उम्र में कदम रख चुकी लेखिकाओं ने भी अपने दिल की बातें कहीं। कार्तिका सिंह की काव्य रचना गौरी लंकेश को समर्पित रही जिस  तालियां बटोरी। रीता मक्क्ड़ ने बहुत ही खूबसूरती से नारी के अधिकारों की बात कही जो उसे सारी उम्र नहीं मिल पाते। प्रिंसिपल मनप्रीत कौर ने नारी की चर्चा करते हुए छाया अर्थात परछाईं के महत्व को भी समझाया और कैफ़ी आज़मी साहिब के शेयरों के ज़रिये भी नारी के मन की थाह समझने का प्रयास किया। 
शायरी के आयोजनों में अपना अलग स्थान बनाने वाली जसप्रीत कौर फलक ने अपने अलग से अणदाय में अपनी मौजूदगी का अहसास कराया। 
महिला काव्य मंच के इस प्रोग्राम का यह यादगारी आयोजन पंजाब यूनिवर्सिटी रीजनल सेंटर की  एक्सटेंशन लाइब्रेरी के एनी बसंत हाल में किया गया।  अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष में पंजाब यूनिवर्सिटी रीजनल सेंटर का यह सक्रिय सहयोग वास्तव में नारी शक्ति और नारी गरिमा को सैल्यूट करने जैसा ही था। गौरतलब है कि इसके आयोजक   पुरुष अर्थात नरेश नाज़ साहिब ने की और इसकी बागडोर महिलाओं को संभाल दी। आजकल यह मंच अक्सर कोई न कोई आयोजन देश के  भागों  में करता ही रहता है। पंजाब और चंडीगढ़ में इसकी सक्रियता तेज़ी से बढ़ी है। इसका पूरा विवरण हिंदी स्क्रीन में देख सकते हैं। --रेक्टर कथूरिया 

Wednesday, July 1, 2020

जानीमानी शायरा इरादीप त्रेहन से बात करने का सुनहरी अवसर

 पहली जुलाई को फेसबुक पर आमने सामने रात्रि 9 बजे 
फाईल फोटो
लुधियाना: 30 जून 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
जब हालात दमनपूर्ण हो। साम्प्रदायिकता हर तरफ छुपी नज़र आने लगे। विचारधारक  विरोध को हिंसा के सहारे दबाने की बात आम होने लगे तो सच कहना बहुत ही कठिन हो जाता है। कहना तो दूर की बात सच को सोचते वक़्त भी मन  कंपकंपी सी छिड़ने लगती है। ऐसे में भी बहुत ही सलीके से सच कह पाना कितना कठिन होता होगा इसका अनुमान आप सहज ही लगा सकते हैं। 
आज यहां यह ज़िक्र किया  रहा है जानीमानी शायरा और शिक्षाविद इरादीप त्रेहन की काव्य रचना को लेकर। एक राजकीय कालेज में इकोनॉमिक्स का अध्यापन और साथ में कविता रचना। कई बार बहुत ही हैरानी भी होती है। कितना कठिन होता होगा इकोनॉमिक्स और कविता के दरम्यान समंजस्य बैठाना।
तकरीबन हर आयोजन में मैंने इरादीप को पूरी तरह सहज देखा। मंच संचालन करते हुए भी,  सभी शायर लोगों को उत्साहित करते हुए भी और साथ ही साथ इशारो इशारों में चाय-पानी और समोसों के प्रबंध पर नज़र रखते हुए भी। कविता को वशिष्ठ सभाओं और गिनेचुने लोगों के आयोजनों से निकाल कर आम जन जन तक ले जाने में बहुत योगदान दिया है।  
युवा वर्ग के शायरों को नामी ग्रामी मंचों तक लेजाने में भी सक्रिय रहती हैं इरादीप त्रेहन। उनकी सुनंने और उनसे बात करने का एक यादगारी और सुनेहरा अवसर आ रहा है पहली जुलाई को। 
पहली जुलाई 2020 को रात्रि 9 बजे इरादीप त्रेहन साहिबा को राष्ट्रीय कवि संगम की पंजाब इकाई  लाईव कर रही है। इसमें लाईव होने के सम्पर्क कर सकते हैं मोबाईल फोन नंबर:98728 88174 और 80549 31143 पर। फेस टू फेस आमने सामने लोकप्रिय शायरा इरादीप त्रेहन से सवाल पूछने का सुअवसर हमेशां के लिए संजो लीजिये। 

Sunday, June 21, 2020

अपनत्व को गले लगाएं, अंकों को नहीं

थोड़ा सा अपनापन और तनाव छू-मंतर 

लुधियाना: 21 जून 2020: (*रुबिता अरोड़ा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखिका रुबिता अरोड़ा 

आज रिया का बाहरवीं का नतीजा आने वाला है। मां-पापा की इच्छा है कि  रिया 90% से अधिक अंक लेकर इंजीनियरिंग करे। उधर रिया का दिल बैठा जा रहा है। परीक्षा पेपर मुश्किल थे तो ज्यादा अच्छा नहीं कर पाई थी। डर के मारे बुरा हाल था। खाना-पीना छोड दरवाजा बंद कर यही सोच रही हैं अब क्या होगा? पापा ने साफ शब्दों में कहा था किसी भी हालत मे 90% से कम अंक नहीं आने चाहिए। रिया की शुरू से ही पढाई में कम और नृत्य में ज्यादा रूचि थी पर पापा को पसंद नहीं था। साफ शब्दों में कहा-कुछ नहीं रखा नृत्य में और न ही अच्छे परिवार की लडकियों को शोभा देता है। इसे भूलकर पढाई में मन लगाओ और फिर रिया मन-मसोस कर रह गई। उसे याद आ रहा था इम्तिहान शुरू होने से कुछ रोज पहले चाचा परिवार सहित उनके घर आए। कितना मन था चचेरी बहनों साथ ढेरों बातें करने का पर मां ने कहा अपने कमरे में जाकर पढाई करो। चाची ने रोकना चाहा पर मां नही मानी। पिछले छह महीनों में उसे नहीं याद कभी घर से बाहर निकल कोई मस्ती की हो या फिर टैलीविजन में कोई मनपसंद कार्यक्रम देख पाई हो। हर वक्त बस एक ही बात सुनने को मिलती पढो पढो बस पढो। तंग आ चुकी थी पढाई से। सोचा जैसे-तैसे इम्तिहान हो गए तो शायद कुछ चैन मिले पर अगले दिन पापा ने कहा एंटरैंस की तैयारी शुरू कर दो। मतलब फिर से पढो और आज तो रिया को साफ पता था वह मां-पापा की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पायेगी। न जाने क्या क्या सुनना पडेगा। 

दोस्तों आज रिया जैसे न जाने कितने बच्चे तनावग्रस्त माहौल में जी रहे हैं।  कारण कोई और नही उनके अपने अभिभावक है, जो आज इतने स्वार्थी हो चुके है कि अपनी इच्छाएं बच्चों पर थोंप देते है, बिना सोचे समझे कि बच्चे क्या चाहते हैं।  नतीजा तनाव रूपी राक्षस हमारे समाज में सिर चढ नाच रहा है। हम क्यों भूल गए परिवार में या फिर हमउम्र दोस्तों के साथ रहकर बच्चे वे सब कुछ अपने-आप सीख सकते हैं जो किताबें नहीं सिखा सकती। जिस प्रकार बहता पानी अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है ठीक वैसे ही हमारे बच्चे भी अपना भविष्य खुद बना सकते हैं। आइये आज से ही इन नन्ही कलियों को पूरा खिलने की आजादी दे अपना प्यार, दोस्ती, अपनापन देकर। जहां तनाव हमारे अपनों को हमसे छीन रहा है वही थोडा सा अपनापन हमें उनके बहुत करीब ला देगा।

 *रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं

Friday, June 12, 2020

एक कटोरी सब्जी : रुबिता अरोड़ा

ज्यादा निकटता कहीं जी का जंजाल  न बन जाये !!!

लुधियाना: 12 जून, 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::
लेखिका : रुबिता अरोड़ा 
मेरा बचपन बेहद गरीबी मे बीता। पिता जी नहीं थे माँ मेहनत करके घर का खर्चा चलाती। घर मे आर्थिक तगी के चलते मेरीे स्कूल की फीस, कापी किताबों का खर्च उठाना माँ के लिए बहुत मुश्किल हो फिर भी माँ के चेहरे पर एक भी शिकन देखने को न मिलती। उनका बस एक ही सपना था मैं पढलिख कर अपने पैरों पर खडी हो जाऊ।खाने के नाम पर तो हम माँ बेटी रूखासूखा खाकर ही खुश हो लेती। तभी हमारे पडोस मे शर्मा आन्टी रहने को आई। पढी लिखी, समझदार, बाणी मे प्रेम सभी गुण तो थे उनमें। एक दिन जब वे हमारे घर आई तो हम माँ बेटी खाना खा रही थी। हमारी थाली मे पडे खाने को देखकर उन्हें बहुत बुरा लगा। वे झट से अपने घर से खाना ले आई। माँ ने मना करने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके हठ के आगे एक न चली। उनके हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाकर मेरी तो आत्मा ही जैसे तृप्त हो गई औऱ फिर उस दिन से शुरू हो गया शर्मा आन्टी के घर से कटोरियो का आना जाना। वे जब भी कुछ अच्छा बनाती पहले हमारे घर देने जरूर आती। माँ ने कई बार सकोच दिखाया पर वे न मानी। अब तो अक्सर वे हमारे घर आती, बडे प्यार से मुझे पास बिठाकर खाना खिलाती,पढाई मे भी पूरी मदद करती। माँ की बिमारी हो या मेरी परिक्षा मुझे पूरा सहयोग मिलता। मेरे लिए तो वे मेरी दूसरी माँ जैसी थी। समय बीतता गया। मै उच्च शिक्षा के लिए शहर आ गई। उनके भी पति का तबादला कहीं औऱ हो गया। फिर हम कभी मिल तो न पाई लेकिन जो अपनापन मुझे उनसे मिला, शायद कोई अपना भी नहीं दे पाता। आज मै उच्च पद पर कार्यरत हूँ लेकिन यहाँ तक पँहुच कर जो कामयाबी मुझे मिली इसमें आँटी का बहुत बडा हाथ है।
अभी कुछ दिन पहले हम यहाँ नई कालोनी मे रहने आए। मैंने दफ्तर से दो दिन की छुट्टी ले ली ताकि अपना सामान सही से जमा लूँ। पति को दफ्तर व बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अभी अपना काम शुरू ही किया था कि डोरबैल बजी। पास मे रहने वाली मिसेज खन्ना हाथ मे सब्जी की कटोरी लिए मुझसे मिलने आई। उनका अभिवादन किया औऱ फिर शुरू हुआ उनकी बातों का सिलसिला या यूँ कहो पास मे रहने वाली मिसेन खुराना की बुराइयों का सिलसिला, जो खत्म होने का नाम ही नही ले रहा था। तकरीबन तीन घंटे बीतने के बाद मिसेज खन्ना यह कहते हुए अपने घर गई कि अभी आपको बहुत काम है, सो जल्दी जा रही है, फिर कभी बैठकर ढेरों बातें करेगी। दोपहर हो चुकी थी। बच्चे स्कूल से आते होगे यह सोचकर खाना बनाने मे जुट गई बाकी काम यूँ का त्यों पडा रहा। अगले दिन बडी उम्मीद से शुरू किया तभी हाथ मे कटोरी लिए इस बार मिसेज खुराना चली आई। फिर से बातों का सिलसिला चला। इस बार मिसेज खन्ना की बुराइयाँ मुख्य विषय रही। जैसे तैसे उन्हें उनके घर भेज कर मैंने चैन की साँस ली। ये दो सब्जी की कटोरियाँ मेरे लिए जी का जन्जाल बन चुकी थी। मैंने इन दो छुट्टियों मे जो काम करने थे वे सब धरे के धरे रह गए।मैं सोच रही थी समय बीतने के साथ इन सब्जी की कटोरियो के स्वरूप मे कितना परिवर्तन आ गया है। पहले जहां सब्जी की कटोरी मे अपनेपन,प्रेम, समर्पण की भावना होती थी वही आज नफरत, स्वार्थ, ईष्या का तडका लगाया जाता है। अगले दिन हम सुबह पार्क मे मार्निग वाक के लिए निकले तो साथ मे दोनों कटोरियाँ भी उठा ली। कुछ ही दूरी पर मिसेज खन्ना औऱ फिर मिसेज खुराना भी मिल गई। हमने उनको धन्यवाद देते हुए उनकी कटोरियाँ वापस की औऱ साथ ही विनम्रता से कहा हम तो नौकरी पेशा है सुबह दफ्तर के लिए निकलते है तो शाम तक ही घर लौटते है। माफ कीजिये लेकिन ये कटोरियो के लेनदेन का सिलसिला आगे नहीं बढा सकते। निरसदेह पडोसी एक दूसरे के सुख दुख के साथी होते है लेकिन एक दूसरे की चुगलियाँ करना या इधर उधर की हाँकने के लिए आज की सभ्य व शिक्षित पीढी के पास समय ही कहाँ है। --*रुबिता अरोड़ा   
*रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।  

Monday, June 1, 2020

भरोसा अपनी परवरिश पर

संतान का मार्गदर्शक बने, मार्गभक्षक नही

लुधियाना: 23 मई, 2020:: (*रुबिता अरोड़ा)::
लेखिका : रुबिता अरोड़ा 
मैं स्कूल से छुट्टी लेकर घर आई। सोचा कुछ देर आराम करूँगी तभी फोन की घंटी बजी। फोन मेरी पुरानी सहेली ज्योति का था। मुझसे मिलना चाहती थी। मैंने उसे शाम को घर आने को कहा। शाम ठीक पाँच बजे ज्योति अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ मेरे घर आई। दोनों बच्चे इतने प्यारे थे कि उनसे नजर ही नहीं हट रही थी। मैंने बच्चों से बात शुरू की। बड़ा बेटा रियान पाँचवी मे व छोटी बेटी सुनैना तीसरी मे पढती है। कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद ज्योति ने अपनी परेशानी मेरे साथ शेयर की। उसका मानना था कि उसके बच्चे पढाई मे बिलकुल रूचि नहीं ले रहे। बहुत कोशिश करने के बाद भी परिक्षा मे अच्छे अन्क नहीं लाते। शायद उनके दिमाग ही कमजोर है। उसने कहा कि वह उनके भविष्य को लेकर बहुत परेशान है। एक ही झटके मे ज्योति ने इतनी सारी बातें बोल तो दी लेकिन मैं यह सब सुनकर बहुत आहत हुई। वो दो छोटे छोटे बच्चे जिनके साथ बचपन भी अभी अठखेलियाँ करता नहीं थका उनके लिए इतना सब कुछ कह दिया ज्योति ने। क्या परिक्षा मे कम अंक आने से यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि बच्चों के पास दिमाग कम है या ये बच्चे भविष्य मे कुछ नहीं कर सकते।  क्या तीन घंटे की परीक्षा मे आने वाले अंक किसी बच्चे की प्रतिभा को देखने का मापदंड हो सकते है। अरे बालमन तो कच्ची गीली मिट्टी की तरह होता है जिसे थोड़ी सी मेहनत करके मनचाहा आकार दिया जा सकता है। एक पौधे को अगर सही पोषण मिलेगा तो वह समय के साथ साथ एक दिन मजबूत पेड़ बनेगा। लेकिन अगर किसी पौधे को पोषण देने की बजाय कमजोर मानकर अनदेखा किया जाए तो एक दिन जरूर मुरझा जाएगा। लगातार प्रयास करते रहने से तो एक दिन असंभव भी संभव हो जाता है, फिर क्या हम बच्चों पर लगातार मेहनत नहीं कर सकते। ये सच है कि जिस प्रकार हाथों की पाँचो उगलियाँ एक समान नहीं होतीं ठीक उसी प्रकार हर बच्चे के सीखने का ढंग, उसकी ऊर्जा शक्ति भी अलग अलग हो सकती है। जरूरत है बस अपने बच्चो को थोड़ा समझने की,उन्हे वक्त देने की,उनके अन्दर छुपी प्रतिभा को बाहर निकालने की,फिर यही बच्चे अपना भविष्य खुद बनाते है। इसके इलावा यह भी जरूरी नहीं कि हर बच्चा अच्छा पढ लिख कर ही अपना भविष्य बना सकता है।हमारे सामने ऐसे सैकड़ों उदाहरण है, जिन्होंने कम पढे लिखे होने के बावजूद अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। अतः ज्योति जैसे माँ बाप से मै यही कह सकती हूँ कि अपने बच्चों पर भरोसा रखिए, आपको उनका मार्गदर्शक बनना है, मार्गभक्षक नही। सबसे बडी बात हमारे बच्चे हमारा ही अक्स है, सो भरोसा रखिए अपने आप पर,अपनी परवरिश पर।--*रुबिता अरोड़ा 
*रुबिता अरोड़ा व्यवसायिक तौर पर शिक्षिका हैं। 

Saturday, May 23, 2020

दाम्पत्य जीवन का आधार

अपनी खुशी त्यागना ही शादी का असल अर्थ 

लुधियाना: 23 मई 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::

लेखिका: रुबिता अरोड़ा
पति पत्नी सुख दुःख के साथी होते है। यह एक ऐसा रिश्ता होता है जिसमें प्यार, अपनापन, विश्वास, त्याग, समर्पण हो तो जिंदगी जन्नत लगती हैं। यही एक ऐसा रिश्ता है जो जन्म से नहीं जुडते पर अन्त तक साथ रहता है। कुछ ऐसे ही विचारों कें साथ मैंने दाम्पत्य जीवन की शुरुआत की  मीता के साथ। मीता कालेज के दिनों में मेरे साथ पढती था। उस समय मै उससे इतना आकर्षित था कि मैंने उसे अपनो जीवन संगिनी बनाने का विचार कर लिया। मीता एक अमीर परिवार की इकलौती बेटी थी जबकि मै एक मध्यवर्गीय परिवार से था। दोनों के रहन सहन में जमीन आसमान का अंतर था। यह बात माँ बाबूजी ने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उस वक्त यह सब समझने के लिए मै बिलकुल तैयार न था। शायद ख्वाबों की दुनिया में जी रहा था, परंतु जल्दी ही हकीकत से सामना हो गया। मीता अपने आप को हमारे घर के रहन सहन के अनुरूप न ढाल सकी नतीजा वहीं हुआ जो मै कभी नहीं चाहता था। बचपन से ही घर में माँ बाबूजी के छोटी छोटी बात को लेकर झगड़ा होते देखा था, लेकिन उसके पीछे छुपा उनके आपसी प्रेम को कभी समझ नहीं सका। आज मै मीता के साथ सब दोहराना नहीं चाहता था इसलिए खुद को ही उसके अनुरूप ढालना शुरू किया। माँ के साथ या बहन रश्मि के साथ मीता का कोई मनमुटाव हो जाता तो मैं अक्सर माँ को या रश्मि को ही एडजस्टमेंट करने को बोलता। लेकिन हालात फिर भी न सुधरे। मीता सब छोड़ कर अपने पिता के यहाँ रहने चली गई। न चाहते हुए भी मुझे मीता के साथ उसके पिता के यहाँ रहना पड़ा।  यह बात अच्छी तरह जानने के बावजूद कि मेरे परिवार ने मीता के साथ एडजस्टमेंट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आखिर अपने ही मन को समझाया कि रिश्तो को जोडे रखने के लिए कभी अंधा,कभी गूगा तो कभी बहरा भी होना पडता है लेकिन आखिर कब तक समझ नहीं पा रहा था। बहन रश्मि की शादी तय हुई। बाबूजी पर यकायक अनेकों जिम्मेदारियां आ खडी हुई शादी के इन्जामो को लेकर। इस वक्त मेरे परिवार को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी आखिर अपनापन, परवाह, थोड़ा समय यही तो वह दौलत है जो मेरे अपने मुझसे चाहते थे। सोचा था माँ बनने के बाद मीता भी इन परिवारिक मूल्यों को कुछ हद तक समझ जायेगी लेकिन नहीं। उसने शादी में जाने से साफ मना कर दिया लेकिन मेरे परिवार को आज मेरी जरूरत है, मै यह कैसे भूल सकता था। आज अपना अन्धापन, गूगापन,बहरापन  सब छोड़ कर अपने पिता के कंधे से कन्धा मिलाकर खडे होने का समय था। मैंने बेटे को साथ लिया और पॅहुच गया माँ बाबूजी के घर जहां मेरी आत्मा थी। सबने खुशी खुशी गले लगाया लेकिन मीता के न आने से थोड़ा उदास जरूर हुए। खैर खुशी खुशी शादी सम्पन्न हुई। इस बीच अनेकों बार मीता के फोन आए वापस आने केलिए लेकिन मुझपर उसकी अब किसी बात का कोई असर न हुआ।  मै जिन दाम्पत्य झगडों से दूर रहना चाहता था वे आज अपनी चरमसीमा पर थे। समझ में आ चुका था  कि पति पत्नी का रिश्ता तराजू के दो पंडो की तरह होता है।  जब एक अपने अंहकार को लेकर बहुत ऊपर चला जाता है, तो दूसरे पर जिम्मेदारियों, मूल्यों का बोझ बहुत हावी हो जाता है। अतः यह जरूरी है कि विश्वास, प्यार, दोस्ती, स्नेह से दोनों पलडो को बराबर रखे। अब मीता भी अपने बेटे की दूरी ज्यादा देर न सह सकी। कुछ ही दिनों में वापस आ गई तब मैंने उसे समझाया कि आज मात्र दो साल के बेटे की दूरी उससे सहन न हुई तो मेरे माँ बाबूजी के साथ तो मेरा बरसों पुराना नाता है। भला वे मुझसे दूर कैसे रह सकते हैं, वो भी बुढापे में जब वे बिलकुल अकेले हैं। आज मीता मेरी उन सब भावनाओं को समझ पाई जिन्हें मै शान्त रहकर कबसे समझाना चाहता था। आपसी सहमति से हमने इकट्ठे रहकर दोनों तरफ के माँ बाबूजी का ख्याल रखने का निश्चय किया और साथ ही एक बडी सीख भी मिली कि छोटे मोटे मनमुटाव तो खुशहाल दाम्पत्य जीवन का आधार है। दो अलग अलग सोच रखने वालों के विचार जब आपस में टकराते हैं तो थोड़ा बहुत मनमुटाव होना संभव है लेकिन अंहकार को अलग रखते हुए आपसी सहमति से हम उन्हें सुलझा सकते है हाँ उससे पहले दोनों को अपने मत रखने का समान अधिकार मिलना चाहिए। एक दूसरे केलिए अपनी खुशी कुरबान करना ही शादी के असल मायनों को दर्शाता है।--*रुबिता अरोड़ा
*रुबिता अरोड़ा एम्स टुटोरिअल्स और श्री जी एजुकेशन पॉइन्ट में कोर्डिनेटर के तौर पर कार्यरत हैं। 

Sunday, December 8, 2019

वाटसअप ग्रुपों में साहित्य//कभी रिटायर न होना//sirjndhara

7 दिसंबर 2019 को जगजीत सिंह ने 23:16 पर पोस्ट की  
कामरेड गुरनाम सिद्धू धार्मिक प्रवचन दे कर भी लोगों को यही समझते हैं कि व्यक्ति को कभी रिटायर नहीं होना चाहिए 

Sirjandhara ग्रुप 
रिटायर्ड आदमी को,
सब फालतू समझते हैं।
वे छोटी छोटी बातों में, 
बार बार बमकते हैं।
बात करो तो, 
अपनी ही हाँकते हैं।
मैंने ये किया, वो किया, 
यही फांकते हैं! 
                    पत्नी कहती है --
                    दिन भर कुर्सी तोड़ते हो। 
                    मोबाइल में आंखे फोड़ते हो,
                    जाओ बाजार से, 
                    कुछ सामान ही ले आओ!
बहु कहती है --
मुन्ना रो रहा है, 
उसे घुमाने ले जाओ।
चाय बनाने में भी, 
वह शर्त लगाती है। 
मुन्ना को घुमा लाऊँ, 
तब चाय पिलाती है!
                    रिटायर क्या हुआ,
                    जैसे मेरी सरकार ही गिर गई।
                    सात जन्मों की साथी पत्नी भी, 
                    रूलिंग पार्टी से मिल गई!
टीवी देखता हूँ, 
तो बच्चे रिमोट छीन लेते हैं।
कार्टून चैनल देख कर, 
आस्था लगा देते है!
हम आस्था लायक हैं, 
ये कैसे जान लेते हैं?
एक पैर कब्र में गया, 
ये कैसे मान लेते हैं?
                   लेडीज जिमनास्टिक्स देखता हूँ,
                    _तो लोग मुझे देखते हैं।_
                    जैसे कहते हों, बूढ़े हो गये,
                   मगर अब भी आँखें सेकते हैं!
एक दिन नाती पूछ रहा था,
दादाजी, आज पेपर में, 
कितने एड आये हैं?
मेरी अनभिज्ञता पर बोला --
मम्मी तो कहती है, 
आप पेपर चाट जाते हैं।
इतना भी नहीं मालूम, 
तो सिर क्यों खपाते हैं?
                    योगा करता हूँ तो कहते हैं, 
                    मरने से ऐसे डरते हैं।
                    जैसे दुनियाँ में कभी,
                    किसी के बाप नहीं मरते हैं!
मैं कहता हूँ अरे भाई, 
अभी रिटायर हुआ हूँ, 
कुछ पेंशन तो खाने दो।
बेटा कहता है -- 
मूलधन तो ले ही लिया, 
अब ब्याज को जाने दो!
                       सोचता हूँ,
                      रिटायरमेन्ट के बाद, 
                      ऐसा क्या हो जाता है?
                      आफिस का बॉस, 
                      घर में जगह नहीं पाता है!
उसकी सलाह मशविरा, 
निरर्थक हो जाती हैं।
उसके बोलने पर, 
क्यों घर वाले झल्लाते हैं?
चाहता हूँ कहूँ, 
घर का मुखिया न रहा,न सही,
एक सम्मानित सदस्य, 
तो बने रहने दो
                      न सुनना हो मत सुनो, 
                      मगर बात तो कहने दो।
                      बोलने की आदत है,
                      धीेरे धीरे छूटेगी।
                      स्वयं को सब कुछ, 
                      समझने की धारणा, 
                      धीरे धीरे टूटेगी!
कुछ समय के बाद मैं भी,
बालकनी में बैठा चुपचाप, 
सड़क की ओर देखूंगा।
आती जाती भीड़ में, 
वे कुछ चेहरे खोजूंगा।
जो मुझे, 
फालतू बैठा देखकर भी, 
फालतू न समझें।_
हमेशा टें टें करने वाला, 
पालतू न समझें!_

!!! सेवा निवृत्त आदरणीयों को समर्पित और होने वाले महानुभावों को पूर्व सूचना!! 

जगजीत सिंह जी का मोबाईल नंबर है:+918427088470
इस ग्रुप के एडमिन हैं डा. गुरचरण कौर कोचर, के एस औजला, बलवीर जस्वाल, देविंदर अन्य 
ज्वाइन करने के लिए डा. कोचर का नंबर है:+91 94170 31464

Thursday, December 27, 2012

बालीवुड में गौरव सग्गी

फ़िल्मी दुनिया में फिर लुधियाना की मौजूदगी का अहसास
पंजाबी फिल्मों की बात चले तो जो नाम और चेहरे एकदम जहन में आते है उनमें से एक चेहरा है सरदार भाग सिंह का। चंडीगढ़ के बस स्टैंड से बाहर निकलते ही सडक पार करके उनके घर में जाना किसी वक्त रोज़ की बात हुआ करती थी। वक्त की गर्दिश में फिर यह सिलसिला न चाहते हुए ही लगातार कम होता चला गया। यहाँ रोज़ी रोटी के फ़िक्र में ऐसे सिलसिले अक्सर कम हो जाते हैं। पर उनकी जो बातें अब तक जहन में हैं उनमें से एक है सोमवार। वह सोमवार को उपवास रखते थे। भगवान् शिव में उनकी गहरी आस्था थी। शिव का नटराज रूप उनके ड्राईंग रूम में भी सजा होता। कभी मूड होने पर वह भगवान् शिव और कला की विस्तृत चर्चा भी करते। 
Photo Courtesy:Sara Tariq
इसी तरह गायन और अभिनय के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाने वाली सुलक्षना पंडित भी बहुत अध्यात्मिक थी।सर्दी हो या ओले बरस रहे हों हर रोज़ सुबह पूरे केशों सहित स्नान करना और फिर पूजा पाठ में काफी समय गुज़ारना उनकी दिनचर्या में शामिल था। उनकी आवाज़ में भी जादू सा था और अभिनय में भी। बहुत सी लोकप्रिय फिल्मों में यादगारी भूमिका निभा पाना और फिर फिल्म फेयर एवार्ड भी हासिल कर लेना कोई आसान बात नहीं थी। हालाँकि उनके सामने चुनौती भी सख्त थी और प्रतियोगिता भी। 
दर्शकों के मन में हनुमान जी की छवि बनने के बाद दारा सिंह जी भी धर्म कर्म में बहुत रुचि लेने लगे। शायद यही कारण है कि दर्शक उनमें हनुमान जी को ही देखने लगे। पहले पहले मुझे लगता था की शायद इस तरह के सात्विक किस्म के लोग तामसिक प्रवृतियों से भरी फ़िल्मी दुनिया में सफल नहीं हो सकेंगे। पर इन सबकी सफलता देख कर दुनिया के साथ साथ मैं खुद भी हैरान रह गया। पंजाबी फ़िल्मी दुनिया के महारथी भाग सिंह ने किस तरह अपनी बेटी बरखा को पत्रकारिता की बारीकियों से अवगत करा कर एक कुआलिफाईड पत्रकार बनाया। अभिनय में नई जान डालने 
पठानकोट में गौरव सग्गी के भक्ति रस में झूमते भक्त 
वाली अपनी धर्मपत्नी कमला भाग सिंह के साथ किस तरह कदम दर कदम मिला कर कठिन से कठिन रास्तों पर चल कर सफलता की ऊंचाइयों को छुआ यह किसी करामत से कम नहीं। मुझे उनके परिवार के साथ इतय एक एक पल बिना किसी कोशिश के अब तक याद है। भाग सिंह जी का गोरा   रंग और मेहंदी रंगी भूरी दाड़ी कुल मिलकर उनकी शख्सियत बहुत ही आकर्षक लगती रिटायर्मेंट के बाद इस तरह की  सहेज पान तभी संभव होता है जब दिल और दिमाग के ख्याल भी बहुत खूबसूरत हों। ज़िन्दगी के सभी रंगों को उन्हों ने मुस्करा कर समझा। हर मुश्किल को उन्होंने हर बार सुस्वागतम कहा। एक आम इंसान की तरह ज़िंदगी जीते जीते वह अचानक ही अपनी सहजता के कारण खास हो जाते। मुझे याद है एक बार एक फ़िल्मी मेले के आयोजन को लेकर कुछ पत्रकार दोस्तों ने काफी कुछ विरोध में लिखा पर जब वे भाग सिंह जी के सम्पर्क में आये तो उनका नजरिया पूरी तरह बदल गया। वे समझ गए कि मामले को देखना अपनी अपनी सोच पर भी निर्भर करता है। जादू केवल जादूगर की छड़ी में नहीं शब्दों में भी होता है। बाद में यह विरोध दोस्ती में बदल गया। वे पत्रकार दोस्त दिल्ली से उन्हें मिलने विशेष तौर पर चंडीगढ़ आते।
लुधियाना का गौरव सग्गी 
इसी तरह दारा सिंह जी ने भी धमकियों और चुनौतियों को बहुत ही सहजता से सवीकार करके ज़िन्दगी जीने के नए अदाज़ सिखाये। चंडीगढ़ में दारा स्टूडियो की स्थापना का काम आसान नहीं था। मुझे पता चला कि उन्हें उतनी जगह नहीं मिली जितनी वह चाहते थे। किसी सनसनीखेज़ खबर की चाह में मैंने दारा जी से इसी मुद्दे पर सवाल कर दिया। दारा जी मुझे देखकर मुस्कराए और बहुत ही सहजता से बोले अगर सरकार यह जगह भी न देती तो हम क्या कर लेते? दारा जी जैसे महान लोगों ने जिंदगी को जो सलीके और सबक सिखाये उनकी अहमियत वक्त के साथ साथ लगातार बढती रहेगी। उनके पास बैठ कर, उनसे बातें करके एक नई ऊर्जा का अहसास होता था।
आज अचानक यह सब कुछ मुझे याद आ रहा है एक नए युवा चेहरे को देख कर। लुधियाना का गौरव सग्गी भी फ़िल्मी दुनिया को समर्पित है लेकिन पूरी तरह सात्विक रहते हुए। तकरीबन तकरीबन हर रोज़ उपवास, हर रोज़ पूजा पाठ, हर रात्रि मेडिटेशन। सोने में चाहे आधी रात हो जाये लेकिनउठना वही रात को दो बजे और ठंडे पानी से नहा कर रम जाना पूजा पाठ में। मेडिटेशन, रियाज़ या फिर शूटिंग, रिकार्डिंग या कोई और परफोर्मेंस बस यही है गौरव की दिनचर्या। मैंने कभी गौरव को आम लडकों की तरह इधर उधर आलतू फालतू बातों में नहीं देखा। लुधियाना से मुम्बई और मुम्बई से विदेश तक यही है उसका लाइफ स्टाइल।
कहते हैं धरती गोल भी है बहुत छोटी भी। बस इसी सिद्धांत पर एक बार हमारी मुलाकात पठानकोट में हुई। सुबह मूंह अँधेरे से लेकर देर शाम तक हम एक साथ रहे। यह सब किसी प्रोजेक्ट को लेकर था और इसके बारे में वहां शायद किसी को खबर भी नहीं थी लेकिन हमें वहां बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के जाना पड़ा एक ही आयोजन में। हम सब ने जलपान किया लेकिन गौरव का उपवास था। खाना तो दूर जल या चाये की एक बूँद भी नहीं। अचानक ही मेरे सामने किसी आयोजक ने मंच पर गौरव का नाम अनाऊंस करवा दिया और उसके बाद कमरे में आ कर कहा कि अब आप मंच पर आ जाइये अगली बारी आपकी है। सुन कर मुझे चिंता हुई। मुझे मालूम था कि गौरव ने सुबह से कुछ नहीं खाया। 
चाये या पानी का एक घूँट भी नहीं। मुझे लगा कि शायद यह लड़का कहीं मंच पर गिर न पड़े। इसके साथ ही न वहां गौरव की टीम थी न ह साज़ और संगीत का पर्याप्त प्रबंध। पर गौरव के चेहरे पर न चिंता, न डर, न ही घबराहट। आशंकित मन के साथ कुछ ही पलों के बाद मैं भी पीछे पीछे बाहर बने मंच पर चला गया।वहां मेरे देखते ही देखते गौरव ने भगवान् का नाम लेकर अपना गायन शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में वहां मौजूद सभी लोग पहले तो मस्त हुए फिर उठ कर गौरव के साथ साथ झूमने लगे।मुझे वह दिन अब भी याद आता है तो मुझे फिर फिर हैरानी होने लगती है। सुबह से लेकर रात तक मैंने गौरव पर से आँख नहीं हटाई तां कि वह छुप कर कहीं कुछ खा तो नहीं रहा पर सचमुच उसने सारा दिन कुछ नहीं खाया-पीया। मुझे लगता है कि इस के बावजूद इतनी अच्छी परफारमेंस किसी दैवी शक्ति से ही संभव हो सकी। गौरतलब है की मेडिटेशन करने वालों की कार्यक्षमता अक्सर बढ़ जाती है। मन की शक्ति एकाग्र हो जाने से उनकी योग्यता विकसित होती है।यही कारण है गौरव एक्टिंग में भी काम कर रहा है और गीत संगीत में भी। इसके साथ ही कैमरे की बारीकियों  को भी वह बहुत ही अच्छी तरह से समझता है। अपनी लोकप्रिय एल्बम "रब दा सहारा" में उसने गायन और अभिनय दोनों में अपना जादू दिखाया है। आखिर में एक बात और इस सबके लिए वह अपने पिता अश्विनी सग्गी और माता के आशीर्वाद को ही एक वरदान मानता है।-रेक्टर कथूरिया 


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तेज़ी से बुलंदियां छू रहा गौरव सग्गी