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Monday, February 10, 2020

हर इकन्नी खर्च कर बैठे//रेक्टर कथूरिया

पड़ी मुश्किल तो देखा हर चवन्नी खर्च कर बैठे!
जमा पूंजी बहुत थी पर सभी हम खर्च कर बैठे!
लड़कपन भी, जवानी भी, बुढापा खर्च कर बैठे!

कमाया था बहुत सम्भाल न पाए मगर हम सब,
पड़ी मुश्किल तो देखा हर चवन्नी खर्च कर बैठे!

मोहब्बत ने कहा था मान लो मेरा कहा अब तो,
कहा माना मगर दिल और दुनिया खर्च कर बैठे!

बड़े सपने सजाए थे, बड़े तिकड़म लड़ाए था,
खुली जब नींद तो देखा वो सब कुछ खर्च कर बैठे!

मोहब्बत की हकीकत उलझनों के भंवर सी निकली,
फंसे इस भंवर में तो हर इकन्नी खर्च कर बैठे।

सफर इस जन्म का दुशवार था, दुशवार ही निकला;
हकीकत तब खुली जब हर हकीकत खर्च कर बैठे।

मोहब्बत में बहुत अब फर्क जीने और मरने का;
कि जीना था जिसे तक के, उसी को खर्च कर बैठे!
                                              --रेक्टर कथूरिया
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Tuesday, December 31, 2019

शायद इस बार भी बस कैलेंडर ही बदलेगा//रेक्टर कथूरिया

जाते हुए साल 2019 के नाम मन में उठी कुछ पंक्तियां 
क्या करना है सन 2020?
क्या देगा?
अच्छे दिन?
क्या बदलेगा?
महंगाई रोकेगा या रोज़गार देगा?
शायद कुछ भी नहीं बदलेगा!
यह ऐसा कुछ भी नहीं देगा!
फिर भी
तारीख, सन और कैलेंडर तो बदलेगा ही....!
दिल की खुशियां चाहे वही रहें।
दिल के गम भी चाहे वही रहें।
उदासी और
चिंताएं भी चाहे वही रहें।
उम्मीदों का सिलसिला भी बेशक वही होगा !
फिर भी कुछ तो बदलेगा...!
शायद
कैलेंडर और डायरियां बनाने वालों के दिन फिरें!
शायद सच में आ जाएं उनके अच्छे दिन!
शायद उनको चार पैसों की आमदन हो जाये!
कुछ तो बदलेगा!
ज़रूर--बदलेगा!
दिखावे के लिए ही सही,
कुछ लोगों के लिए ही।
कुछ तो बदलेगा!
अब तो हमें भी
अपने पुराने गम अच्छे लगते हैं।
नया गम न जाने कैसा हो?
यही ठीक हैं...!
अब वाले गम...!
अब वाले आंसू...!
कम से कम
अपने और जाने पहचाने तो हैं।
देखो मेरे जाने पहचाने मित्रो !
बेशक सारी दुनिया बदल जाये !
तुम न बदलना!
तुम बेवफाई न करना!
तुम अपनेपन का यह रिश्ता न तोडना!
क्या करना है हमें नया साल?
यही ठीक था--2019
पता नहीं 2020
क्या गुल खिलायेगा!
आसार तो बहुत भयानक हैं।
अब तो डर लगता है!
अखबार में छपी खबरों से।
सड़कों पर नारे लगाते हजूमों से।
नए नए कानूनों से।
संविधान में हो रही तब्दीलियों से।
बहुमत से पारित प्रस्तावों से।
हमें कुछ भी नहीं चाहिए!
न रोज़गार, न ही सस्ती चीज़ें
न ही अच्छे दिन।
न ही15-15 लाख रूपये।
न ही दो करोड़ नौकरियां।
हमें कुछ भी नहीं चाहिए!
बस हमें शांति से रहने दो
यूंही एक दुसरे के साथ!
हमें मिलजुल कर गाने दो!
सारे जहां से अच्छा वाला गीत
मिलजुल कर सुनाने दो!
हमें बीते दिन ही लौटाने दो!
                   ---रेक्टर कथूरिया  

Thursday, July 12, 2018

ज़िंदगी ने जो कहा था; मौत ने भी सुन लिया था

पर हमीं वो सुन न पाए; जो मोहब्बत ने कहा था !
साभार चित्र 
मिल जाये मुस्कान कोई;
मौत का वरदान कोई। 
देख ले कुछ दर्द मेरे;
काश अब भगवान कोई। 

भरम है भगवान का भी;
यूं ही डर शैतान का भी। 
मन शिवाला बन गया है;
डर  है पर अहसान का भी। 

दिल के अंदर वेदना है;
और ज़रा सी चेतना है। 
खेल भी अब सामने है;
पर किसे अब खेलना है !

आ रहा हर पल बुलावा;
छोड़ दे दुनिया छलावा;
तोड़ भी डाले ये बंधन;
इक तेरी चाह के अलावा ...! 

सोचता हूँ चल पड़ें अब;
उस तरफ भी हैं मेरे सब। 
कोई न लौटा वहां से;
देखते हैं कब मिलें अब !

ज़िंदगी ने जो कहा था;
मौत ने भी सुन लिया था। 
पर हमीं वो सुन न पाए;
जो मोहब्बत ने कहा था। 
                                       ---रेक्टर कथूरिया
(19  जून 2018 की रात को करीब 10:55 बजे)