Saturday, May 23, 2020

दाम्पत्य जीवन का आधार

अपनी खुशी त्यागना ही शादी का असल अर्थ 

लुधियाना: 23 मई 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::

लेखिका: रुबिता अरोड़ा
पति पत्नी सुख दुःख के साथी होते है। यह एक ऐसा रिश्ता होता है जिसमें प्यार, अपनापन, विश्वास, त्याग, समर्पण हो तो जिंदगी जन्नत लगती हैं। यही एक ऐसा रिश्ता है जो जन्म से नहीं जुडते पर अन्त तक साथ रहता है। कुछ ऐसे ही विचारों कें साथ मैंने दाम्पत्य जीवन की शुरुआत की  मीता के साथ। मीता कालेज के दिनों में मेरे साथ पढती था। उस समय मै उससे इतना आकर्षित था कि मैंने उसे अपनो जीवन संगिनी बनाने का विचार कर लिया। मीता एक अमीर परिवार की इकलौती बेटी थी जबकि मै एक मध्यवर्गीय परिवार से था। दोनों के रहन सहन में जमीन आसमान का अंतर था। यह बात माँ बाबूजी ने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उस वक्त यह सब समझने के लिए मै बिलकुल तैयार न था। शायद ख्वाबों की दुनिया में जी रहा था, परंतु जल्दी ही हकीकत से सामना हो गया। मीता अपने आप को हमारे घर के रहन सहन के अनुरूप न ढाल सकी नतीजा वहीं हुआ जो मै कभी नहीं चाहता था। बचपन से ही घर में माँ बाबूजी के छोटी छोटी बात को लेकर झगड़ा होते देखा था, लेकिन उसके पीछे छुपा उनके आपसी प्रेम को कभी समझ नहीं सका। आज मै मीता के साथ सब दोहराना नहीं चाहता था इसलिए खुद को ही उसके अनुरूप ढालना शुरू किया। माँ के साथ या बहन रश्मि के साथ मीता का कोई मनमुटाव हो जाता तो मैं अक्सर माँ को या रश्मि को ही एडजस्टमेंट करने को बोलता। लेकिन हालात फिर भी न सुधरे। मीता सब छोड़ कर अपने पिता के यहाँ रहने चली गई। न चाहते हुए भी मुझे मीता के साथ उसके पिता के यहाँ रहना पड़ा।  यह बात अच्छी तरह जानने के बावजूद कि मेरे परिवार ने मीता के साथ एडजस्टमेंट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आखिर अपने ही मन को समझाया कि रिश्तो को जोडे रखने के लिए कभी अंधा,कभी गूगा तो कभी बहरा भी होना पडता है लेकिन आखिर कब तक समझ नहीं पा रहा था। बहन रश्मि की शादी तय हुई। बाबूजी पर यकायक अनेकों जिम्मेदारियां आ खडी हुई शादी के इन्जामो को लेकर। इस वक्त मेरे परिवार को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी आखिर अपनापन, परवाह, थोड़ा समय यही तो वह दौलत है जो मेरे अपने मुझसे चाहते थे। सोचा था माँ बनने के बाद मीता भी इन परिवारिक मूल्यों को कुछ हद तक समझ जायेगी लेकिन नहीं। उसने शादी में जाने से साफ मना कर दिया लेकिन मेरे परिवार को आज मेरी जरूरत है, मै यह कैसे भूल सकता था। आज अपना अन्धापन, गूगापन,बहरापन  सब छोड़ कर अपने पिता के कंधे से कन्धा मिलाकर खडे होने का समय था। मैंने बेटे को साथ लिया और पॅहुच गया माँ बाबूजी के घर जहां मेरी आत्मा थी। सबने खुशी खुशी गले लगाया लेकिन मीता के न आने से थोड़ा उदास जरूर हुए। खैर खुशी खुशी शादी सम्पन्न हुई। इस बीच अनेकों बार मीता के फोन आए वापस आने केलिए लेकिन मुझपर उसकी अब किसी बात का कोई असर न हुआ।  मै जिन दाम्पत्य झगडों से दूर रहना चाहता था वे आज अपनी चरमसीमा पर थे। समझ में आ चुका था  कि पति पत्नी का रिश्ता तराजू के दो पंडो की तरह होता है।  जब एक अपने अंहकार को लेकर बहुत ऊपर चला जाता है, तो दूसरे पर जिम्मेदारियों, मूल्यों का बोझ बहुत हावी हो जाता है। अतः यह जरूरी है कि विश्वास, प्यार, दोस्ती, स्नेह से दोनों पलडो को बराबर रखे। अब मीता भी अपने बेटे की दूरी ज्यादा देर न सह सकी। कुछ ही दिनों में वापस आ गई तब मैंने उसे समझाया कि आज मात्र दो साल के बेटे की दूरी उससे सहन न हुई तो मेरे माँ बाबूजी के साथ तो मेरा बरसों पुराना नाता है। भला वे मुझसे दूर कैसे रह सकते हैं, वो भी बुढापे में जब वे बिलकुल अकेले हैं। आज मीता मेरी उन सब भावनाओं को समझ पाई जिन्हें मै शान्त रहकर कबसे समझाना चाहता था। आपसी सहमति से हमने इकट्ठे रहकर दोनों तरफ के माँ बाबूजी का ख्याल रखने का निश्चय किया और साथ ही एक बडी सीख भी मिली कि छोटे मोटे मनमुटाव तो खुशहाल दाम्पत्य जीवन का आधार है। दो अलग अलग सोच रखने वालों के विचार जब आपस में टकराते हैं तो थोड़ा बहुत मनमुटाव होना संभव है लेकिन अंहकार को अलग रखते हुए आपसी सहमति से हम उन्हें सुलझा सकते है हाँ उससे पहले दोनों को अपने मत रखने का समान अधिकार मिलना चाहिए। एक दूसरे केलिए अपनी खुशी कुरबान करना ही शादी के असल मायनों को दर्शाता है।--*रुबिता अरोड़ा
*रुबिता अरोड़ा एम्स टुटोरिअल्स और श्री जी एजुकेशन पॉइन्ट में कोर्डिनेटर के तौर पर कार्यरत हैं। 

Tuesday, May 5, 2020

Online साहित्य चर्चा//लॉकडाउन पर नया डिजिटल सीरीज

 डिफरेंट मूड्स ऑफ़ लॉकडाउन पर विशेष चर्चा इस पोस्ट में ख़ास 
नई दिल्ली4 मई 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
लॉक डाउन ने सभी को घरों में बंद कर दिया लेकिन दिल और दिमाग में छुपी रचनात्मक ऊर्जा का क्या करे? यह ऊर्जा कहां बंद होती है? ये जज़्बात कहाँ रुकते हैं? यह भावनाएं कहां बंद होती हैं? इन्होने जो नया रास्ता निकाला उसकी चर्चा बहुत तेज़ी से हो रही है। लॉक डाउन के दिनों में कलम के इस ऐतिहासिक प्रयोग का श्री जाता है मातृ भारती को और इसकी लेखक मंडली को। विस्तृत विवरण पढिये नीचे दी गई पोस्ट में। आपको यह अनूठा प्रयोग कैसा लगा इस पर अपने विचार भी अवश्य भेजें। --कार्तिका सिंह
ये वक्त सबके लिए नया है। क्वारंटाइन...लॉक डाउन...कोविड 19... कोरोना वायरस जैसे नामों से पूरी दुनिया परिचित हो रही है। पहली बार हम सब घरों में कैद हैं। बाहर की दुनिया से डरे हुए हैं। इस वक्त का सही उपयोग करने और पॉजिटिव बने रहने के लिए हर कोई अपने स्तर पर बहुत कुछ कर रहा है। मातृभारती एप ने इस वक्त को रेखांकित करते हुए 21 लेखकों द्वारा लिखी एक सीरिज बनाई है डिफरेंट मूड्स ऑफ लॉकडाउन। इस सीरिज में हर दिन एक नया लेखक लॉक डाउन की कहानी लिखेगा।
इस सीरिज का संपादन कर रही हैं जयंती रंगनाथन और नीलिमा शर्मा। 
नीलिमा शर्मा इसके पहले भी हिंदी डिजिटल साहित्य के पहले उपन्यास  आईना सच नही बोलता का  संपादन  कर चुकी है जिसको मातृभारती पर हजारों पाठकों ने पढ़ा। 
मातृभारती एप के जनक महेंद्र शर्मा इस सीरिज के बारे में कहते हैं, ‘इस समय मातृभारती एप में दस लाख से ज़्यादा हिंदी के पाठक जुड़े हैँ। हम चाहते हैं अधिक से अधिक लेखकों को हिंदी भाषा से जोड़ना। जो लिखना चाहते हैं, उन्हें मोटिवेट करना, एक मंच देना हमारा उद्देश्य है। नामचीन और नए इक्कीस लेखकों द्वारा लिखा गया यह सीरीज नए पाठकों को भी जोड़ेगा। इसके अलावा एक ग्रुप में साथ रहने से एक धारा सा बनती है और क्षमतावानों को आगे बढ़ने का मौका मिलता है।’
लॉक डाउन के माहौल ने कुछ लोगों को बुरु तरह से निराश क्र दिया है, कुछ को आलसी बना दिया है-वे सारा सारा दिन सोते ही रहते हैं। ऐसे माहौल में बहुत कम लोग हैं जो कुछ न कुछ क्रिएटिव भी कर पाते हैं। इतने लेखकों कोएक साथ एक ही प्रोजेक्ट में जोड़ पाना आसान न रहा होगा। इसकी सफलता बताती है कि यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा। इसमें बहुत क्षमतावान कलमकार शामिल हैं। Mahendra SharmaJayanti RanganathanManisha Kulshreshtha,Rashmi Ravija,Shilpa SharmaPoonam JainPratishtha Singh,  Pratima PandeyUpasna SiagKshama SharmaNeelima SharrmaAmrita V ThakurPritpal KaurRinki VaishChandidutt Shukla SagarDivya VijayShuchita MitalAmrendra, Dhyandera,Jyoti इत्यादि सभी ने इसे एक मिशन समझते हुए सफल बनाया है। एक एक कहानी पढ़ने वाले के मन पर अपना असर छोडती है। बिना कोई राजनीतिक विचार या धार्मिक प्रवचन बने अपना प्रभाव किसी ऐसे इंजेक्शन की तरह छोड़ जाती है जिसे लगने का पता ही नहीं चलता। हम कोशिश करेंगे इस पर और चर्चा भी हो सके। 
इस तरह के प्रयोगों का सिलसिला शुरू करने वाले मंच मातृभारती के संचालक/संस्थापक जनाब  महेंद्र शर्मा बताते हैं कि उनके ज्यादातर पाठक मध्यप्रदेश और राजस्थान से हैं। इसके बाद उत्तरप्रदेश का नंबर आता है। कई पाठक बिहार और विदेशों से भी है। हिंदी को टीयर 2 और टीयर 3 सिटीज तक पहुंचाने के लिए कई ग्रुप ऑन लाइन और ऑफ लाइन काम कर रहे हैं। ताकि वहां हिंदी के इच्छुक लेखकों को मातृभारती एप से जोड़ सकें। भविष्य में उनका इरादा है एप में प्रकाशित कहानियों पर वेब सीरिज और फिल्म भी बने। इसके लिए कई प्रोडक्शन हाउस से उनकी बातचीत चल रही है। हिंदी के वो पाठक जो पढ़ने से ज्यादा सुनने में रुचि रखते हैं उनके लिए जल्द ही ऑडियो बुक ऐप लॉन्च होगा।
बहुत जल्द नया प्रोजेक्ट डिफरेंट शेड्स ऑफ लॉक डाउन का भी ऑडियो वर्जन लाने की तैयारी है।
                                                                                                                         --हिंदी स्क्रीन डेस्क


Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Wednesday, April 8, 2020

क्रिएटिव राइटर्स ग्रुप ने लॉक डाउन के दौर में भी कराया मुशायरा

इस बार का विषय था पत्ते, जिन पर बहुत ही खूबसूरती से लिखा गया
लुधियाना: 7 अप्रैल 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
कोरोना का कहर टूटा तो इससे बचाव के लिए लॉक डाऊन सबसे आवश्यक था। लॉक डाउन के बिना कोई और चारा  भी नहीं था लेकिन इसके लागू होते ही ज़िंदगी थम सी गई। लोग अपने अपने घरों में कैद हो कर रह गए। कोरोना के कारण हुए इस लॉक डाउन में हालत नज़रबंदी जैसी हो कर रह गई। दुनिया की रफ्तार एक दम थम गई। इस थमे हुए माहौल में वे लोग फिर भी सक्रिय रहे जो थमने जानते ही नहीं। वे लोग जिन्हें तूफानों के सामने चिराग जलाने की हिम्मत नसीब में मिली है। जो वे लॉक डाउन की पालना करते हुए नहीं थमे। घरों में कैद हो कर भी वे  नहीं रुके। उनकी सोच चलती रही। उनके जज़्बात चलते रहे। उनकी कलम भी चलती रही। कोरोना ने उन्हें अपने अपने घरों में कैद तो करवा दिया लेकिन उनके ख्यालों की उड़ान जारी रही। युवा कलमकारों के दिलों की धड़कन जसप्रीत कौर फलक ने इस दिशा में बहुत ही शिद्दत से सोच विचार की। इस गहरी सोच विचार के बाद एक स्पेशल किस्म का आईडिया उनके दिमाग में उतरा। बात बहुत ज़बरदस्त थी लेकिन उसे प्रेक्टिस में लाना आसान भी नहीं था। इसे सोचना तो  मुश्किल था ही लेकिन इसे लागू करके दिखाना और भी मुश्किल था। फिर उन्होंने यह आईडिया वरिष्ठ कलमकार और विज्ञानी डाक्टर जगतार सिंह धीमान के साथ भी शेयर किया और इसकी सफलता के लिए उनका आशीर्वाद मांगा।  बात डाक्टर धीमान के भी दिल को लगी। उन्होंने भी इस पर गंभीरता से सोचा। उनके अंतरमन में बैठे कवि ने इसे अपने ढंग से सोचा, उम्र भर विज्ञान का अध्यन करने वाली सोच के सिस्टम ने अपने ढंग से सोचा और रजिस्ट्रार के पद पर बैठे प्रशासक ने अपने नज़रिये से अपना मशवरा दिया। फैसला हुआ कि अपने अपने घर में बैठ कर साहित्य की सरगर्मी चलाई जाये। एक ऑनलाइन मुशायरा शुरू किया जाये जिसमें नयी उम्र के कलमकारों को पहल दी जाये। बस यहीं से शुरू हुआ एक विशेष मुशायरा। इसमें कोरोना का दर्द भी था,कोरोना की बंदिशें भी और लॉक डाउन की ज़िंदगी के कड़वे मीठे अनुभव भी। यह आइडिया पत्रकारिता में उम्र गुजरने वाले अश्वनी जेतली को भी बेहद जचा और उन्होंने आखिर मूल तौर पर तो वह भी शायर ही ठहरे। शायरी ने युवा अवस्था में ही बहुत जनून में थी और बाद में पत्रकारिता ने भी अपना रंग उनकी शख्सियत में जोड़ दिया। वह भी इस काफिले में शामिल हो गए। उसके बाद शुरू लॉक डाऊन के नियमों की पालना करते हुए मुशायरा कराने का सिलसिला। अब यह सिलसिला हर रोज़ चलता है। हर रोज़ ही कोई नया विष भी सुझाया जाता है। नयी कलमों प्रोत्साहित करने के लिए उनका मार्गदर्शन भी होता है और आलोचना भी। देखिये इसका थोड़ा सा रंग यहाँ भी , इन रचनाओं को विस्तृत रूप से अलग से भी प्रकाशित किया जा रहा है। साहित्य स्क्रीन में भी। 
जब इस ग्रुप में पत्तों पर कुछ लिखने को कहा गया तो गुरवीर सियाण ने लिखा:
पत्तों जैसे बन सकते हो क्या..!
हवाओं से लड़ सकते हो क्या..!
है क्या तुझमें इतनी क़ुव्वत..!
खुशी-खुशी झड सकते हो क्या..!
पत्तों जैसे बन सकते हो क्या..!
इसी तरह सिद्धार्थ ने भी इसी विषय पर बहुत ही सफलता से अपना हाथ आज़माया। उन्होंने कहा:
 बात पेंड़ो की,शाखा की हर कोई करता है,
बिछड़े हुए पत्तों की कौन सुना करता है।।
ये जो नए हैं डाली पर शान से खड़े हैं,
कल गिर जो गए तो बेजान से पड़े हैं।।
कालेज की छात्रा नवयोवना शायरा सारा सैफी ने तो कमाल ही कर दिया। भावनायों को बहुत ही संगीतमय अंदाज़ में प्रस्तुत करते हुए आज के इंसान पर गहरी चोट भी की:
सूखा पत्ता तेज़ हवा से 
उड़कर मेरे घर आया
इक ठोकर से मैनें उसको
जब आगे को सरकाया

बोला यूँ ना ठुकरा मुझको
मुझ पर भी हरियाली थी
पँछी भी सब खुश थे मुझसे
खुश मुझसे हर डाली थी
मैं तपता था कड़ी धूप में
करता था तुम पर साया

आज भी आग में जलकर मैं
सेक तुम्हें दे सकता हूँ
अपने ऊपर आज भी तेरे
 दुःख सारे ले सकता हूँ
 वो तो एक इन्सान है जिसने
 काम लिया और ठुकराया
सरू जैन साहिबा ने भी कमाल के अंदाज़ में अपनी बात कही। ज़रा आप भी पढिये:
यह सच है टूटा पत्ता
वापिस नहीं आता शाख़ पर।                                                             
पर नयी कोंपले फूटी                                         
अक्सर पतझड़ के बाद ही।
यह पत्ता टूटकर भी वफ़ा ही करे।                 
कितनी सुंदर चाह लिए दिल में।                         
चाहे मैं बिछुड़ूँ भी पेड़ से;                                 
फिर भी यह तो हरा भरा रहे।
इसी तरह कार्तिका सिंह ने भी पत्तों पर लिखते हुए उम्र और इंसानी ज़िंदगी की व्यथा को ही लिखा:
 पत्ते बस पत्ते होते हैं!
उग आते हैं--झड़ जाते हैं!
हरे रंग से पीले रंग तक 
रोज़ कहानी कह जाते हैं!
बात पते की कह जाते हैं!

Monday, March 30, 2020

ज़िंदगी से जितना इश्क वाम के लोग करते हैं शायद और कोई नहीं

लेकिन कामरेड समता तदबीरों को छोड़ कर लकीरों की तरफ क्यूं?
लुधियाना: 30 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
जब जब भी मुलाकात हुई मुझे हर बार जसप्रीत कौर समता वाम विचारधारा से प्रभावित लडकी लगी।  कभी कभी तो मुझे उस पर यह प्रभाव जनून की हद तक भी महसूस हुआ। फिर कई बार नज़दीक से भी उसकी बातें सुनी। बार बार लगा कि उसके दिल में कोई दर्द है जिसे उसने छुपा लिया है। जैसे पंजाबी के जानेमाने शायर प्रोफेसर मोहन सिंह कहते हैं न--
होली होली बन गया 
मित्रां दा गम 
लोकां दा  गम  
बस समता मुझे हर बार उसी प्रक्रिया से गुज़रती हुई लगी। अपने गम को जनता के गम में तब्दील करती हुई। वह गमा क्या था मैंने कभी नहीं पूछा। मुझे ऐसे सवाल कभी भी अच्छे नहीं लगते। कुछ भी ऐसा पूछने पर मुझे लगता जैसे मैं नियमों के विपरीत जा रहा हूँ। अंग्रेजी में एक शब्द आता है-एन्क्रोचमेंट। बस कुछ भी ऐसा पूछना मुझे एनक्रोच करना ही लगता। समय गुज़रता रहा।  इसके साथ ही एक दर्द समता के चेहरे पर हर वक़्त रहने वाली मुस्कान के पीछे छुपा सा झलकता रहा। फिर दबे सुर की कुछ बातें भी सुनीं जो इधर सुन कर उधर से निकल भी जाती रहीं। जब जब भी मुझे अपनी कवरेज में कोई मुश्किल महसूस होती तब तब समता मुझे सहायता देने को सामने होती। जब उसने पहली बार कैमरे के सामने माईक पकड़ा तो सबके लिए हैरानी थी। उस दिन पंजाबी भवन में जस्टिस कोलसे पाटिल एक विशेष आयोजन में आये हुए थे। माईक समता के हाथों में था और कैमरा मैंने खुद संभाल लिया। मैं जस्टिस कोलसे की यादगारी तस्वीरों को कैमरे में कैद क्र लेना चाहता था। जब मन में ऐसी भावना हो तो ध्यान पूरी तरह कैमरे में रखना पड़ता है। मैं भी ध्यान मग्न था लेकिन मन में चिंता थी कि अब उनसे ऐसे बौद्धिक सवाल कौन पूछेगा जो उनके स्तर के भी हों। ऐसे में समता ने कमाल कर दिए। उसने बहुत अच्छे सवाल पूछे। स्टोरी भी बहुत अच्छी बनी। इसके इसी ग्रुप में रहने वाला कामरेड अरुण उसे हर बार मज़ाक मज़ाक में एक दिन की पत्रकार बता कर बार बार हंसाता।  लेकिन वह पंजाब स्क्रीन टीम की एक ऐसी सदस्य बन गयी थी जिसे आड़े वक़्तों की साथी कहा जा सकता है। जब जब भी फेसबुक खोलता तो समता की कोई न कोई पोस्ट सामने होती। हर पोस्ट में लोगों के साथ हो रहे अन्याय की बात का ज़िक्र होता। मुझे हैरानी भी होती कि क्या इस लड़की को अपना कोई गम ही नहीं? समय अलग अलग रंग दिखाता रहा। आज फेसबुक पर समता की पोस्ट बिलकुल ही अलग रंग की थी। उसने काव्यपूर्ण शब्दों में कहा:
मुकम्मल हुआ हो इश्क़ जिसका
उसकी हथेली देखनी है,

कैसी होती है वो
 " लक़ीर "
जो मेरे हाथों में नहीं है...!!!
मेरे लिंए यह पोस्ट किसी हैरानी से कम नहीं थी। हर समय लोगों के दर्द की बात करने वाली लड़की आज अपने दिल के दर्द की बात कर रही थी। मैंने झट से एक कुमेंट करते हुए समता से कहा:
शायद किसी ने सही कहा है:

हाथों की चंद लकीरों का!
यह खेल है बस तकदीरों का!

पे इसी गीत में आगे चल कर इसका जवाब भी है:
तक़दीर है क्या, में क्या जानूँ,
में आशिक हूँ तदबीरों का...!

....और कामरेड तक़दीर पर नहीं तदबीर पर भरोसा करते हैं Jaspreet Kaur Samta जी...
इस बात को कभी भूलना नहीं।

वैसे प्रकृति के नियमों में मैंने कई बार इसे सच होते देखा कि जब प्रकृति किसी चीज़ को छीनती है तो वास्तव में जल्द ही उससे बेहतर हमें थमा भी देती है।

सो हिम्मत और हौंसला ज़रूरी है।

किसी शायर ने बहुत पहले कहा था:
हालात के कदमों पे कलन्दर नहीं गिरता।
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता।
गिरते हैं समंदर में आ आ के कई दरिया!
लेकिन किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता!
           देखना एक दिन आपको मेरी बातें याद आएंगी। हिम्मत रखना।
                                                 --रेक्टर कथूरिया 
               (समता पर और चर्चा फिर कभी सही फ़िलहाल इतना ही)

Monday, March 9, 2020

कविता-कथा कारवां ने किया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर शानदार आयोजन

नई और स्थापित कलमों ने अपने कलाम से समाज को झंकझौरा
लुधियाना: 8 मार्च, 2020: (*हिंदी स्क्रीन टीम)::
सतलुज क्लब में आज आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम कई मायनों में अलग था। बिलकुल  सुखद अहसास। 
साहित्यिक और अन्य विविध क्षेत्रों से सबंधित लोगों से भरी यह सभा उस प्यार का अहसास करवा रही थी  जो आजकल ऐसे आयोजनों से लुप्त होता जा रहा है। एक लंबे समय के बाद यह अनोखी लेकिन सुखद सभा देखी जिसमें सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था। सारा कार्यक्रम घड़ी की सुइयों के अनुसार चल रहा था। यूं लगता था जैसे  उपस्थित लोगों के दिलों का प्राकृतिक सौंदर्य बाहर सभी के सामने भी व्यक्त हो रहा हो। बहुत से अन्य आयोजनों की तरह यहाँ कोई किसी को मंच से घूर नहीं रहा था। कोई भी मनमानी करने या करवाने के लिए अपनी आँखों से किसी को कोई ऐसा इशारा नहीं कर रहा था कि ऐसा नहीं ऐसा करो।
यह एक  ऐसा आयोजन था जिसमें न तो किसी पार्टी के हक में कोई नारे लग  न ही और न ही किसी राजनीतिक दल का विरोध या समर्थन हो रहा था। केवल कलम का रंग और महिलाओं की स्थिति-इसी पर था सारा फोकस। कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर  ही ध्यान केंद्रित किया गया था। अपने इस मकसद को सफल बनाने के लिए शायरी भी हो रही थी, साहित्य चर्चा भी, सम्मान भी और पैनल चर्चाएँ भी।  सब कुछ बहुत दिलचस्प था।सबसे बड़ी बात यह कि आज का यह साहित्यिक आयोजन गुटबंदियों और तिकड़मबाज़ियों से पूरी तरह मुक्त था।
इस कार्यक्रम का आयोजन सतलुज क्लब लुधियाना में कविता-कथा कारवां की तरफ से किया गया था। यह संगठन पूरी तरह साहित्य को समर्पित है। इस कार्यक्रम ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को बहुत ही सशक्त ढंग से मनाया। पूरे आयोजन को संस्थान की अध्यक्षा जसप्रीत कौर फलक के नेतृत्व में सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। किरण बाला (आईआरएस) संयुक्त आयुक्त जेएसटी, जालंधर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। विशिष्ट अतिथि किरण साहनी भाषा विभाग पंजाब थे। महिलाओं से सबंधित मुद्दे बहुत प्रमुखता से। 
उभरती हुई युवा कलमों में जो अधिकतर कालेज की लड़कियां थीं उनके कविता पाठ  शुभारम्भ रमा शर्मा द्वारा किया गया। जबकि रश्मि अस्थाना ने मंच का संचालन किया। वाणीप्रीत कौर, रूप कंवल, सारा, दीपिका, कार्तिका, अयान सूद और लखविंदर कौर ने कविता पाठ किया। प्रख्यात कवियों के सत्र का मंच संचालन अनु शर्मा कौर ने किया। सुश्री सरिता जैन और डाक्टर सीमा ग्रेवाल ने भी कविता का पाठ किया।
इसके बाद सम्मान पत्र देकर सभी को सम्मानित किया गया। पार्थ पुरस्कार दीप्ति सलूजा को दिया गया। मदर टेरेसा अवार्ड प्रकाश कौर (यूनिक होम जालंधर) को दिया गया जो छोटे बच्चों के पालन पोषण उल्लेखनीय काम कर रही हैं।  माता गुजरी पुरस्कार मनराज कौर को, दिलीप कौर टिवाणा पुरस्कार इंद्रजीतपाल कौर को, राजबीर कौर राव पुरस्कार पुष्पिंदर कौर को,वाग्देवी पुरस्कार प्रिंसिपल प्रवीण शर्मा को दिया गया।
इस कार्यक्रम के दौरान ही जसप्रीत कौर फलक की काव्य पुस्तक 'रेत पर रंगोली' का दूसरा संस्करण भी लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया था। इसी तरह, यह पुरस्कार ग्रैंड-मदर अवार्ड संतोष गुप्ता, कमला कौशल, निर्मल खन्ना, हरजीत कौर गोगिया और सत्या बजाज को दिया गया। जसप्रीत कौर फलक पूरे कार्यक्रम की जान रहीं। इस शानदार कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए दर्शकों द्वारा भारी संख्या में  बधाई दी गई। इस अवसर पर एक फोटो प्रदर्शनी का भी आयोजन किया  गया। अमलतास की इन तस्वीरों  को क्लिक किया था जानीमानी शायरा जस प्रीत कौर ने। जस प्रीत की इन तस्वीरों ने हाल ही में इन तस्वीरों ने हाल ही बहुत लोकप्रियता हासिल की है और दिखाया है कि कुछ सीखने या करने का जनून हो तो किसी भी उम्र में कौशल हासिल किया जा सकता है। लोग जस प्रीत शायरा को कैमरे से कविता लिखने वाली शायरा  जानते हैं।  
आज जस प्रीत ने एक और कमाल दिखाया। टप्पे सुनाते सुनाते उन्होंने गया-तेरे विच्चों रब्ब दिस्सदा, तनुं सजदा मैं तां कीता। इसी तरह अन्य मेहमानों ने भी अपना अपना कमाल दिखाया। 
जालंधर से आई मोहतरमा नूपुर संधू ने लड़कियों की वशिष्ठता पर एक खास नुक्ता उठाया। उन्होंने कहा  कि लड़कों से उनकी तुलना न करें। मत कहो हमारी बेटी एक लड़के की तरह है। ऐसा कह कर वास्तव में लड़कों को उच्च  बताने की कोशिश की जाती है और लड़कियों को अपमानित किया जाता है। लड़कियों को लड़कों की तरह बुलाना एक तरह से लड़कियों का अपमान है।
कार्यक्रम में उपस्थित साहित्य जगत के लेखक, संपादक और कवि राजेंद्र साहिल ने कहा, मैं हमेशा अपनी बेटी को बेटी कहकर खुश होता हूं। इस प्रकार एक विचार शुरू हुआ कि बेटी को बेटी कहा जाना चाहिए। कई लोगों ने अपनी सोच को  में मिलाया जिसे आज की विशेष उपलब्धि कहा जा सकता है। विभिन्न कॉलेजों की युवा लड़कियों ने अपनी कलम का रंग दिखाया और कमाल कर दिया। 
उनकी शायरी में महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों का जिक्र था, लेकिन रोना नहीं था। इस उत्पीड़न के खिलाफ एक जोरदार संघर्ष की घोषणा की गई थी। "भविष्य हमारा है" - इस स्वर का जाप था। 
इस आयोजन में जालंधर, अमृतसर, हिसार, चंडीगढ़, दिल्ली और अन्य शहरों के व्यक्ति शामिल थे। अपनी विकलांगता को व्यक्त करने में एडवोकेट दीपू सलूजा का साहस एक मिसाल था। इसी तरह बठिंडा से पहुंची मैडम सीमा ग्रेवाल ने कई शानदार बातें कही। उन्होंने अपनी खूबसूरत किताब के बारे में हिंदी स्क्रीन की टीम से भी बात की।
डाक्टर बबीता जैन, प्रो.साल भारद्वाज, मैडम रमा शर्मा, मैडम अनु शर्मा, सरिता जैन, मैडम जतिंदर कौर संधू, मिस वनिता, श्वेता शर्मा और अन्य।   इनकी बातें दिल में उतरते समय हम सभी को कुछ करने की प्रेरणा मिली। इन सभी रिपोर्टों को भी अलग से प्रस्तुत किया जा रहा है। इस आयोजन के आठ अलग-अलग खंड थे और हर भाग का प्रधानगी मंडल और मंच सचिव अलग था।
कुल मिलाकर, यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन था जिसमें हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी और उर्दू से जुड़े  कलमकार भी मौजूद थे।  यह आयोजन लंबा अवश्य था, लेकिन फिर भी, दर्शकों और दर्शकों ने इस का आनंद लेना जारी रखा।
संपूर्ण कार्यक्रम के समापन में, डाक्टर जगतार सिंह धीमान, रजिस्ट्रार सी टी यूनिवर्सिटी ने अपने विचार दिए। अध्यापन से जुडी शायरा रश्मि अस्थाना ने धन्यवाद के शब्द कहे।
अंत में बात किताबों की भी। हो सकता है कि इस समारोह में किसी अतिथि का स्वागत न किया गया हो। जो कोई भी किताब सीमा ग्रेवाल और राजिंदर साहिल ह्यूरन को लेनी चाहिए, ने पुस्तक को सभी के लिए बहुत सम्मान और सम्मान के साथ प्रस्तुत किया। दिलचस्प तथ्य यह है कि ये किताबें सस्ती नहीं थीं। बहुत महंगे प्रिंट बहुत स्टाइलिश थे।
यदि किसी को भी कीमत चुकानी चाहिए, तो लेखक और प्रबंधक बहुत विनम्र थे और केवल इतना कहा कि उन्हें इसे पढ़ना चाहिए। मेहमानों ने घर-घर जाकर किताबें लीं।
(*हिंदी स्क्रीन टीम में इस आयोजन की कवरेज पर कृतिका सिंह, रेक्टर कथूरिया और अन्य सदस्य। कुछ और सामग्री देखें  हिंदी और पंजाबी  की कुछ दूसरी पोस्टों में)

Tuesday, March 3, 2020

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर होगा कविता कथा कारवां का विशेष आयोजन

आपके दिलों पर दस्तक देगा यह आयोजन तांकि आप जाग सकें
लुधियाना: 03 मार्च 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
समय की नब्ज़ पर हाथ रख कर उसे पहचानना और अगर सब कुछ विपरीत भी चल रहा हो तब भी अपने निश्चित उद्देश्य की ओर आगे बढ़ना सभी के बस में नहीं होता। अँधियों के सामने चिराग जलाने की हिम्मत हर किसी में कहाँ!  जसप्रीत कौर फलक और उनके सहयोगियों की टीम अपने संगठन कविता-कथा-कारवां के बैनर तले एक बार फिर लेकर आ रही हैं एक विशेष काव्य आयोजन। इस बार का आयोजन समर्पित होगा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को। महिला सशक्तिकरण के दावों का सच, क्या है आज भी समाज की हकीकत, कहां खड़े हैं हम सब...ऐसे बहुत से सवालों की चर्चा होगी लेकिन कविता के मधुर से अंदाज़ में। समझने वाले समझ जायेंगे और  जो नहीं समझना चाहेंगे उनके दिलों में भी एक तड़प तो उठा ही जायेगा यह आयोजन। कितने सच्चे हैं हमारे दावे? आपके दिलों पर दस्तक देगा यह आयोजन तांकि आप जग सकें। 
कविता- कथा- कारवाँ (रजि.) के तत्वावधान से जसप्रीत कौर फ़लक की अध्यक्षता में एक बैठक बुलाई गई। इस अवसर इस संस्था के सहयोगी सदस्यों विभा कुमारिया शर्मा, अनु पुरी, रश्मि अस्थाना, अनू कौल, जसविंदर कौर  ने भाग लिया। सर्व सम्मति से यह निर्णय लिया गया कि-इस अवसर पर समाज के लिए समर्पित , समाज में जागरूकता पैदा करने वाली, विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली खेल,कला, साहित्य में महिलाओं वर्चस्व सिद्ध करने वाली विभूतियों को सम्मानित किया जाएगा।नई कलमों के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आमन्त्रित सुप्रसिद्ध कवयित्रियां  को कविता वाचन के लिए पहुचेंगी। समाज में नारी और उसकी स्थिति पर विचार गोष्ठी आयोजित किया जाएगा जिसमें समाज के कुछ प्रतिष्ठित व जिम्मेदार नागरिकों को विचार- विमर्श के लिए आमंत्रित किया जाएगा। कार्यक्रम का समापन स्मृति प्रतीक चिन्ह तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान कर के किया जाएगा। सम्पूर्ण कार्यक्रम 8 मार्च को सतलुज क्लब में ठीक 10:30 बजे प्रारम्भ होकर 1:30 बजे सम्पन्न होगा।  इसमें कौन कौन शामिल होगा इसका विस्तृत विवरण भी आजकल में ही जारी किया जायेगा।  अपने कैलेंडर पर भी निशान लगा लीजिये और डायरी पर भी। इस आयोजन में आ कर आप फायदे में ही रहेंगे।दिमाग में ज्ञान और दिलों में संवेदना जगायेगा यह आयोजन।