Wednesday, December 1, 2021

भाषा विभाग की ओर से फलक की नई पुस्तक रिलीज़

 जसप्रीत फ़लक का काव्य संग्रह 'अठवें रंग दी तलाश' अब मार्किट में 


लुधियाना
: 1 दिसंबर 2021: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो):: 

उर्दू के साथ साथ हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में अपना हाथ आज़माने वाली शायरा जसप्रीत कौर फलक का नाम किसी जान पहचान का मोहताज नहीं है। उसने लगातार लिखा है और सक्रिय हो कर उसे छपवाया भी है। लिख लिख कर पांडुलिपियों का ढेर लगाने वाले ज़माने में जसप्रीत कौर फलक ने प्रकाशक ढूंढे या प्रकाशकों ने इस शायरा को ढून्ढ ´निकाला लेकिन कुछ कुछ अंतराल के बाद जसप्रीत कौर फलक की कोई न कोई पुस्तक सामने आती रही। इन पुस्तकों पर चर्चा  भी काफी हुई। इस बार जसप्रीत कर फलक सामने ै है अपनी नई पंजाबी पुस्तक को लेकर। पुस्तक का नाम है आठवें रंग की तलाश। फलक की इस नई पुस्तक को रिलीज़ करने का  यादगारी आयोजन करवाया भाषा विभाग पंजाब ने। आयोजन में बहुत से नामी कलमकार शामिल हुए।  

प्रसिद्ध हिन्दी कवयित्री जसप्रीत कौर फ़लक के नये पंजाबी कविता संग्रह 'अठवें रंग दी तलाश' का लोकार्पण भाषा विभाग पंजाब की ओर से आयोजित 'पंजाबी माह' के भव्य 'विदाई समारोह' में मुख्य अतिथि शिरोमणि पंजाबी आलोचक डॉ. जसविंदर सिंह, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. सुरजीत लीअ, विशेष मेहमान शिरोमणि पंजाबी साहित्यकार निंदर घुंघिआणवी और पंजाबी, हिंदी, उर्दू साहित्य के अनेक प्रमुख हस्ताक्षरों के कर-कमलों के द्वारा सम्पन्न हुआ। 

भाषा विभाग की डायरेक्टर श्रीमती करमजीत कौर ने जसप्रीत कौर फ़लक की इस सृजनात्मक उपलब्धि पर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें भविष्य में निरंतर सृजनशील रहने के लिए प्रेरित किया। जसप्रीत कौर फ़लक ने इस पल को अपने जीवन का अविस्मरणीय पल बताया। इस समारोह में विख्यात पंजाबी गायिका अमर नूरी विशेष रूप से उपस्थित थीं। इसके अतिरिक्त इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार ओमप्रकाश गासो, दीपक जालंधरी, सरदार पंछी, सतनाम सिंह, वीरपाल कौर आदि समेत अनेक गणमान्य साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

Monday, November 1, 2021

लुधियाना के पंजाबी भवन में हुआ अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन

डॉ. अंजना कुमार की पुस्तक "कुछ मेरे दिल ने कहा" का विमोचन 


लुधियाना
: 31 अक्टूबर 2021: (ज्योति बजाज//हिंदी स्क्रीन)::

ईश्वर के आशीर्वाद से साहित्यक दीप वेलफेयर सोसाइटी (रजि) द्वारा तिथि 31 अक्टूबर, 2021 दिन रविवार को शहर लुधियाना के पंजाबी भवन में अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन एवं डॉ. अंजना कुमार जी की लिखी हुई पुस्तक "कुछ मेरे दिल ने कहा" का विमोचन समारोह भी आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में श्रीमती डॉ. अंजना कुमार जी कानपुर से यहां उपस्थित हुई। सुप्रसिद्ध गज़लकार एवं लेखक श्री सागर सियालकोटी जी और श्री तरसेम नूर जी ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि की भूमिका निभाई। मुख्य मेहमान के रूप में अजय सिंह जी(अंबाला),  विवेक जी, गौरव जी तथा धरेंद्र सिंह जी भी शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत ज्योति प्रज्वलन करने के बाद  कुमारी श्वेता जी ने सरस्वती वंदना पढ़ के की। मंच संचालन का कार्य बड़ी ही शालीनता एवं प्रेम से श्रीमती शैली  वाधवा जी एवं श्री अकरम बलरामपुरी जी ने संभाला। इस कवि सम्मेलन में नेपाल से फयाज़ फैज़ी जी, योगेंद्र सुन्द्रियाल जी दिल्ली से, शब्द दीप्ती जी करनाल से, मनोज मनमौजी जी फरीदाबाद से, चंद्रमणि चंदन जी दिल्ली से, क्रांति पांडे दीप क्रांति जी मध्य प्रदेश से, शिवेश ध्यानी जी सहारनपुर से, हरी  बहादुर सिंह प्रतापगढ़ से, प्रांशु जैन देवबन्द से, गिरीश सोनवाल राजस्थान से शामिल हुए। इसके अतिरिक्त लुधियाना से मलकीत सिंह मालधा जी, मोनिका कटारिया जी, पूनम सपरा जी, सिमरन धुग्गा जी, सुखमनदीप कौर मिनी जी, छाया शर्मा जी, रंजीत कौर सवी जी एवं इरादीप त्रेहन जी ने इस कवि सम्मेलन में अपनी अनूठी प्रस्तुतियां पेश कर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। 

साहित्यक दीप  वेलफेयर सोसाइटी (रजि) कार्यक्रम में पहुंच कर अपना स्नेह एवं आशीर्वाद देने वाले हर साहित्य प्रेमी को  प्रेम पूर्वक धन्यवाद करती है।  कार्यक्रम के अंत में इस संस्था की संस्थापिका कुमारी रमनदीप कौर (हरसर जाई) जी, सह संस्थापिका ज्योति बजाज जी एवं सेक्रेटरी सरदार बूटा सिंह काहने के कार्यक्रम की कामयाबी के लिए सच्चे दिल से ईश्वर को धन्यवाद देते हो यही प्रार्थना की कि हमारी संस्था द्वारा साहित्य की सेवा होती रहे एवं संस्था को साहित्य प्रेमियों से प्रेम मिलता रहे। --ज्योति बजाज 

Saturday, October 16, 2021

इस बार पुस्तक चर्चा "कोई ख़ुशबू उदास करती है''

हिंदी पुस्तक में पंजाबी का रंग इसे और भी  यादगारी  बना देता है


नई दिल्ली
: 16 अक्टूबर 2021: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

ज़िंदगी और किस्मत जब रंग बदलती हैं तो सचमुच इसका पता तक नहीं चलने देती। गिरगिट भी मात खा जाता है। बदलाहट के बाद ही अहसास होता है कि अब पहले जैसा वो सब नहीं रहा। इसके बावजूद सतर्क कलमकार और बुद्धिजीवी इस बदलाहट को उसी वक्त पहचान लेते हैं जब यह दस्तक दे रही होती है। नीलिमा शर्मा ने बदलाहट का पता देने वाली उस मूक दस्तक की भयभीत करने वाली ख़ामोशी भरी आवाज़ के सूक्ष्म क्षणों को सफलता से पकड़ा है। उस हत्यारे दौर की तबाही को कलात्मक ढंग से कलमबद्ध किया है नीलिमा शर्मा ने। उस ज़हर को नीलकंठ की तरह पीने का प्रयास भी किया, कुछ सफलता भी मिली लेकिन वह नीलिमा थी न जिसके पास इंसान की सीमित शक्तियां होती हैं। वह देव न बन सकी। नीलकंठ न बन सकी। लेकिन इस प्रयास ने उसे बहुत ऊंचाई प्रदान की है। यह पुस्तक उस दौर की गहन उदासी से निकली है जिसकी टीस अभी सदियों तक महसूस की जाएगी। यह पुस्तक-"कोई ख़ुशबू उदास करती है'' बहुत ही विशिष्ट पुस्तक है। इसकी अनुभूति भी नीलिमा शर्मा ही कर सकती थी और इसकी अभिव्यक्ति की कला और क्षमता भी महांदेव ने नीलिमा को ही प्रदान की। तबाही अभी जारी है। तबाही की खामोश सी दस्तक भी अभी जारी है। नीलिमा जी अभी भी सुन रही हैं। इस किताब को पढ़ कर शायद आप बच सकें इस तबाही की मार से जो हम सभी की नियति ही बन गई लगती है। इस किताब को पढ़ना तो फायदेमंद रहेगा ही लेकिन पहले पढ़ लीजिए थोड़ा सा साराँश कि कैसे बनी यह पुस्तक? कैसे रखा गया  इसका नाम? यह दास्तान आपको भी उदास कर देगी लेकिन ज़िंदगी के लिए यह उदासी भी बेहद आवश्यक है। एक आवश्यक औषधि की तरह। -रेक्टर कथूरिया  

नीलिमा जी बताती हैं-एकांत की क्या कहूँ,बरसों से भीड़ के साथ रहते हुए भी मन का एक कोना अकेला है लेकिन उदास कभी नही रहता था। खुल कर ठहाके लगाना मेरी आदतों में शुमार था शायद मेरे ठहाकों को मेरी ही नज़र लग गयी। उस दिन किसी ने कहा तुमने अपनी कहानी की किताब का नाम "कोई ख़ुशबू उदास करती है'' क्यों रखा। आजकल तुम उदास लिखती हो तुम उदास लगने लगी हो, ज्यादा उदास रहने से उदासी की आदत बन जायेगी बस तब से सोच में हूँ ...

उदास होना तो प्रकृति ने सबकी नियति में लिखा है। हर कोई किसी न किसी क्षण में उदास होता है, लेकिन अवसाद को हावी नही होने देता । मैंने  तो कई बार उदासियों के महासागर देखे है लेकिन मेरे मन की छोटी सी नाव उम्मीद की पतवार के सहारे वास्को डी गामा बनकर अपनी  बाकी बचीकुची जिंदगी की तलाश में है। मन की यात्राएँ मुझे बहुत पसंद है औऱ हर बार सामने वाले को उदास देखकर अपनी ज़िन्दगी की खुशियों के लिए ईश्वर का शुकराना भी अदा करती हूँ।

आजकल मूडी हो गयी हूँ ,यस (चाहे तो) आप बूढ़ी भी पढ़ सकते है। आजकल कार की पिछली सीट पर बैठे बैठे मोबाइल में सर घुसाए रहती हूँ। शहनाज ओर सिद्धार्थ  के वीडियो देखती रहती हूँ।  परिजनों से 'कोई कंपनी मेरे बिना लॉस में नही जायेगी' के ताने उलाहने सुनती रहती हूँ। बार बार सबके कहने पर फोन को कुछ देर के लिए चार्जिंग रूपी ऑक्सिजन का मास्क पहनाती हूँ तो नजरें बाहर घूमती है कि "ओह यह तो दिल्ली है मेरी जान"। मुझे पता ही नही चलता कि दिल्ली है देहरादून ,मुज़फ्फरनगर है या मेरठ।  हवाओ की ठंडक कभी कभार ही अहसास दिलाती है कि जिस शहर में आजकल तुम रहती हो न वहाँ का मौसम थोड़ा नम है, ख़ुश्क है या  सर्द क्योंकि मन का मौसम तो आजकल खोया खोया रहता है।

खैर बात हो रही थी कार के बाहर झाँकने की।  कल दिल्ली कैंट की एक सड़क पर रेड लाइट पर ट्रैफिक काफी ज्यादा था। कारें धीरे धीरे सरक रही थी।अचानक एक काली बाइक आगे आयी। हेलमेट पहने कोई मध्यम कद काठी का लड़का (या आदमी) ड्राइव कर रहा था। एक मोटी लड़की (मुझसे कम) बाइक पर उसके पीछे बैठी थी।  झटके से एकदम मेरी विंडो के साथ  बाइक रुकी थी तो नज़र जाना स्वाभाविक ही था।  पाकिस्तानी लॉन प्रिंट का पलाज़ो सूट पहने उस लड़कीं का हाथ उस लड़के की कमर पर था और आगे से उसकी शर्ट को मुठ्ठी में हल्का पकड़ा हुआ था।  लड़के ने बड़े प्यार से उस हाथ को थामा औऱ अपने होठों तक ले जाकर हौले से चूम लिया । हेलमेट की  वजह से  उसका चेहरा नजर नही आया लेकिन लम्बी सी नाक हेलमेट के आगे शीशा/प्लास्टिक न लगे होने से बाहर तक नजर आ रही थी।  

न जाने वो दोनो कौन थे लेकिन उनको देख कर  एक प्यारा सा अहसास हुआ।  हर रेडलाइट पर फेविकॉल के जोड़ की तर्ज पर चिपके लड़के लड़कियां नजर आ जाते है लेकिन यह तो .......मौसम सुहाना सा लगने लगा था। 

फिर तो नज़र उस बाइक के साथ साथ चलती रही। कभी कार के आगे कभी कहीं पीछे बाइक हमारे साथ साथ रही। वेगास मॉल के फ़ूड कोर्ट में उस प्रिंट सूट को फिर मैंने अपने से आगे वाली टेबल पर बैठे देखा। अकेली बैठी वो चुपचाप फोन में एक तस्वीर देख रही थी। एक लड़के के साथ तस्वीर, लेकिन तस्वीर वाला लड़का साथ आये लड़के से अलग था।  मेरे बच्चे भी मेरे लिए खाना लेने के लिए गए थे। हर कोई आता और हम खाली कुर्सी ले सकते है कहकर  झुकने लगता। हर बार मना करती मेरी नजर उस महिला के सामने रखी खाली कुर्सी पर थी। जिसपर ज़ारा का शॉपिंग बैग था। तभी अचानक किसी का कॉल उसके फ़ोन पर आया।  

मंद स्वर से फुसफुसाती सी वो बोली.... " आहो बीजी आज मैनू मॉल लेके आये ने, पिज़्जा लेण गए ने , मैं नही रहणा एथ्थे,  मैं काके नू मिस कर रहिया। उन्ने रोटी खादी आज?  नही प्रशांत चंगा हेगा लेकिन  देव वर्गा तां नही हो सकदा न। बीजी जे कोरोना न  होंदा ते आज देव मेरे नाल हौंदा।" उसकी ख़ामोश सिसकियां सिर्फ मुझे सुनाई दी । मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा औऱ वो भीगी आँखों से मुस्कुरा दी।

आप  नही समझे न माजरा ? 

नामुराद कोरोना ने कितने घरों के चिराग बुझा दिए। कितने तकिये अंदर तक आँसुओं की सीलन से भीगे हुए है। लेकिन कुछ ऊँची दीवारों के बीच मंद बुझती आँखों ने उम्मीद नहीं छोड़ी।  ज़िन्दगी की उम्मीद, आने वाले कल की उम्मीद, अमावस की रात में जुगनुओं की रोशनी की उम्मीद, सुबह के आने की उम्मीद। उन बुझती उम्मीदों ने अपने बड़े बेटे के जाने के बाद  छोटे  बेटे की शादी बड़े की पत्नी से कर दी। छोटे ने मेरी लाइफ मेरा रूल मेरे सपने न कहकर उस ज़िम्मेदारी को प्यार से सम्हाल लिया।  (है न हमारी परिवार संस्था  महान)

नया  उनका नया नया रिश्ता है। अचानक  जुलाई में ही उन दोनो के रिश्ते ने  नाम और रंग बदला है। उनके रिश्ते की ख़ुशबू बदल गयी है सो लड़कीं के 4 साल के बच्चे को दादी ने साथ रख लिया कि अब यह दोनों आपस मे एक दूसरे को समझें। फिर बाकी सब अबकि बार साथ रहेंगे। पंजाब के गांव में ज़मीन बेचने की तैयारी चल रही है। खेती करने वाला किसान बेटा अब नही रहा। बूढ़ा बाप कब तक माफियाओं से ज़मीन बचायेगा।  द्वारका में फ्लैट खरीदने की बात चल रही है। अब जितनी ज़िंदगी बची है सब साथ  साथ बिताएँगे। 

अब बताओ ऐसी खुशबुएँ उदास करेंगी न .... चाहे उम्मीद भरी ख़ुशबू है। 

बहुत सी खुशबुएँ मेरे कहानी संग्रह में भी समाहित है ।

कुछ दोस्त मेरी किताब 'कोई ख़ुशबू उदास करती है'  मंगवाना चाहते है  तो उनके लिए यह लिंक दे रही हूँ ।आप Shivna Prakashan से सीधे  भी पुस्तक मँगवा सकते है । 

Koi Khushbu Udas Karti Hai, Neelima Sharma 

http://www.amazon.in/dp/B08YN5D7YF


Thursday, September 30, 2021

भारतीय अर्थव्यवस्था को परत दर परत खोलती है--पुस्तक "उलटी गिनती"

 Thursday: 30th September 2021 at 5:40 PM

"उलटी गिनती" पुस्तक में हैं बहुत से सबंधित सवालों का जवाब 

नई दिल्ली: 30 सितंबर 2021: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

MRP 250/- (Paperback)
अच्छे दिनों का वायदा, फिर उस वायदे को चुनावी जुमला बताया जाना, साथ ही नोट बंदी, जीएसटी, कोविड का आतंक, लॉक डाऊन का प्रहार और बेरोज़गारी व भूख के मारे मज़दूरों का पलायन। देश की जनता ने निकट अतीत में ही बहुत से ह्रदय विदारक दृश्य देखे हैं।  

अर्थव्यवस्था पर आर्थिक हमला बेहद नाज़ुक स्थिति में हुआ। कोविड महामारी ने तो भारतीय अर्थव्यवस्था को ऐसे समय तहस-नहस कर दिया जब यह पहले से ही गहरे ढाँचागत मन्दी से जूझ रही थी। करोड़ों लोगों के रोजगार गँवा देने और उनके सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव लौटने के बीच शेयर बाजार न केवल तेजी से पटरी पर लौटा बल्कि जल्दी ही ऊँचाइयों पर पहुँच गया। इस तरह कोविड युग की यादें लम्बे समय तक भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग पर छाई रहेंगी। गौरतलब है कि 2020 के भारत में चरम आर्थिक असमानता जिस तरह प्रमुखता से दिखाई दे रही है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई। इस चरम आर्थिक असमानता ने बहुत सी आशंकाओं को भी जन्म दिया जिसे लेकर मज़दूरों के गंभीर आंदोलन भी खड़े हुए। 

इस स्थिति पर बहुत कुछ लिखा गया। बहुत कुछ लिखा जा रहा है। बहुत कुछ अभी लिखा जाना है। बेहद सख्त लॉकडाउन थोपे जाने का सिलसिला शुरू होने के एक साल बाद, ‘उलटी गिनती’ इस आपदा के आर्थिक परिणामों/प्रभावों की समझ बनाने की कोशिश करती है और इसकी पड़ताल करती है कि क्या भारत सुधार-प्रक्रिया की कुछेक अहम उपलब्धियों यानी प्रतियोगिता और गरीबी में तेज़ गिरावट को, उलटने के करीब है। बहुत ही महत्वपूर्ण और नाज़ुक सा विश्लेषण भी है यह। इस किताब को दस्तावेज़ भी कहा जा सकता है। 

इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है कि भारत के लिए समय तेजी से निकलता जा रहा है। यहां तक कि बढ़त के सर्वोत्तम सालों के दौरान, भारत पर्याप्त रोज़गार पैदा करने या मानव विकास की दिशा में ठोस प्रगति करने में विफल रहा। अब जनसांख्यिकी लाभांश के दौर के अन्तिम दशक में, भारत की अर्थव्यवस्था को दोबारा गति देने के लिए एक साहसिक नजरिए की जरूरत है। आखिर कौन जुटाएगा यह साहस? कौन दे सकेगा इस जरजराती महसूस हो रही अर्थव्यवस्था को गति? महंगाई जिस चरम पर है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

यह पुस्तक ‘उलटी गिनती’ सतत सुधार के लिए एक खाका भी पेश करती है जो भारत को तेज़ बढ़त की पटरी पर वापस ला सकता है और न्यूनतम सम्भव समय में उसकी युवा आबादी के लिए करोड़ों रोजगार पैदा कर सकता है। क्या यह सम्भव हो सकेगा? क्या आम जनता की निराशा को विराम देना सम्भव रह गया है? क्या महंगाई पर अंकुश की कोई संभावना बाकी बची है? इस महंगाई ने सबसे ज़्यादा मार रसोई पर मारी है। 

ऐसा बहुत कुछ है जिसे पढ़ते हुए या जिसकी बात करते हे नए नए सवाल पैदा होंगें। महामारी और लॉकडाउन के दौरान हुई गंभीर आर्थिक क्षति की पहली व्यापक समीक्षा पेश करती किताब। इस किताब ने इन सवालों का जवाब देने की भी कोशिश की है। जमीनी स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के गहरे जख्मों की पड़ताल करती यह किताब। इसका यही अंदाज़ इसे ख़ास भी बनाता है। 

सारे प्रस्तुतिकरण को देख कर कहा जा सकता है कि ‘उलटी गिनती’ पुस्तक व्यापक समृद्धि की ओर बढ़ने और पर्याप्त रोजगार सृजन के साथ फिर से ऊँची बढ़त हासिल करने के लिए सुधार का एक टिकाऊ एजेंडा मुहैया कराती है। यह एजेंडा हौंसला भी देता है और उत्साह भी बढ़ाता है। 

इसके साथ ही एक सौगात भी है जो पुस्तक खरीदने वालों को एकदम निशुल्क मिलेगी। आप भविष्य में अपनी बचत के कौन-से सुरक्षित रास्ते अपनाएँ, इस बारे में विश्वसनीय सुझाव और तथ्य पेश करती 16 पृष्ठों की एक पुस्तिका ‘उलटी गिनती’ किताब के साथ निःशुल्क। यह लघु पुस्तिका बहुत ही काम की होगी। आप इसे संभाल कर रखना चाहेंगे। 

Thursday, September 23, 2021

सोनिया पाहवा की दूसरी पुस्तक "कीमती जज़्बात" हुई रिलीज़

Thursday 23rd September 2021 at 08:22 PM Whatsapp

GCG लुधियाना में सहायक प्रोफेसर हैं मिस सोनिया पाहवा


लुधियाना: 23 सितंबर 2021: (अमृतपाल सिंह//कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

लुधियाना के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में से एक है लड़कियों का राजकीय कालेज अर्थात जीसीजी। इस शिक्षण संस्थान में जहां सिलेबस की पढ़ाई होती है हुए उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है वहीं साहित्य और कला के क्षेत्र में ऊँची उड़ान का मौका सभी को दिया जाता है। इसका अहसास हुआ एक नई पुस्तक के विमोचन को देख कर। 

अपनी पहली पुस्तक "ट्यून इनटू द वर्ल्ड ऑफ रेडियो" की शानदार सफलता के बाद गवर्नमेंट कॉलेज गर्ल्स, लुधियाना में सहायक प्रोफेसर का तौर पर कार्यरत्त सोनिया पाहवा ने आज अपनी दूसरी पुस्तक, कीमती जज़्बात का विमोचन किया।  

पुस्तक का विमोचन करते हुए सहायक प्रोफेसर सोनिया पाहवा ने कहा कि वह लंबे समय से अपनी भावनाओं को पाठकों तक पहुंचाना चाहती थीं।  इस पुस्तक में लिखी गई शायरी के माध्यम से उन्होंने अपनी अनमोल भावनाओं को लोगों के सामने पेश किया है और उम्मीद है कि पहली किताब की तरह इस किताब को भी लोगों का प्यार मिलेगा| यह किताब Amazon, Flipkart आदि पर मिल सकती है।

इस पुस्तके के विमोचन की औपचारिक रस्म अदा करते हुए गवर्नमेंट कॉलेज गर्ल्स, लुधियाना की प्रिंसिपल डॉ सुखविंदर कौर ने कहा कि यह उनके कॉलेज के लिए बहुत ही गर्व की बात है।  मैडम सोनिया पाहवा की इस किताब में शायरी को बेहद खूबसूरत अंदाज में पेश किया गया है और वे ना केवल अध्यापन के क्षेत्र में नाम कमा रही हैं बल्कि लेखन के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना रही हैं। 

इस तरह यह कॉलेज व समस्त स्टाफ के लिए फखर की बात है।  पुस्तक के विमोचन के अवसर पर श्रीमती कृपाल कौर (उप प्रधानाचार्य), श्रीमती गुरजिन्दर बराड़ (अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष) तथा अन्य स्टाफ सदस्य उपस्थित थे। अन्य साहित्य प्रेमियों ने भी ीा आयोजन में भाग लिया। 

Tuesday, September 14, 2021

हर पल सुनहरा:हिंदी के साथ--पूनम बाला

 14th September 2021 at 12:20 PM

प्रताप कालेज आफ ऐजुकेशन ने भी मनाया हिंदी दिवस 


लुधियाना
: 14 सितंबर 2021: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

शायद कोविड नियमों की मजबूरियां इस बार भी आड़े आ रही हों वरना प्रताप कालेज आफ ऐजुकेशन, लुधियाना आयोजनों को भव्य अंदाज़ में किया करता है। इस मामले में यह कालेज हमेशां ही बहुत अच्छी कारगुज़ारी दिखाता रहा है। इस बार कालज द्वारा "हिंदी दिवस" के उपलक्ष्य में बहुत ही सादगी से हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। इस बार भी जिन संस्थानों से बड़े पैमाने पर हिंदी दिवस मनाए जाने की अपेक्षा थी उनमें प्रताप कालेज ऑफ़ एजुकेशन भी एक था। मौजूदा हालात में इतना भी बहुत है। 

इस बार भी हिंदी दिवस आया तो कालेज का वही जाना पहचाना चेहरा आगे आया-प्रोफेसर पूनम बाला का। कालेज में ही कार्यरत्त हिंदी की सहायक शिक्षिका श्रीमती पूनम बाला ने संयोजिका के रूप में समूह स्टाफ सदस्यों व विद्यार्थियों को हिंदी दिवस की बधाई देते हुए समारोह की शुरुआत की। सरस्वती वंदना के पश्चात अपने सम्बोधन में उन्होंने हिंदी दिवस मनाये जाने का औचित्य बताया।उन्होंने अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से सभी को हिंदी भाषा अपनाने के लिए प्रेरित किया। भारत की नई शिक्षा नीति के अनुसार हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात महाविद्यालय के भावी शिक्षकों द्वारा हिंदी को समर्पित कविताओं का काव्य पाठ किया गया।इस अवसर पर उपस्थित समूह स्टाफ सदस्यों ने भावी अध्यापकों द्वारा उच्चरित कविताओं की सराहना की। उल्लेखनीय है कि पूनम बाला बहुत ही अच्छी शायरी करती हैं। दिल को छू लेने वाली शायरी। साथ ही मंच संचालन में भी किसी प्रोफेशनल एंकर से काम नहीं हैं उनकी कला। 

कालेज डायरेक्टर डा.बलवंत सिंह तथा प्रिंसिपल डा.मनप्रीत कौर ने एक संदेश द्वारा सभी को हिंदी दिवस की बधाई दी।अंत में समारोह की संयोजिका श्रीमती पूनम बाला ने सभी का धन्यवाद  किया। गौरतलब है कि हिंदी और साहित्य के मामले में कालेज की प्रिंसिपल डा. मनप्रीत कर बहुत ही गहरा ज्ञान रखती हैं। 

Saturday, September 11, 2021

मनोज धीमान ने लिखी एक और हिंदी फिक्शन किताब

'ये मकान बिकाऊ है' (लघुकथा संग्रह) बाजार में भी चर्चा में भी  

पुस्तक समाज के कई पहलुओं, व्यवस्था और शासकों की कार्यशैली को करती है उजागर

लुधियाना: 11 सितंबर 2021: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::

आज के युग की पत्रकारिता आसान नहीं होती। लगातार इसका अभ्यास करते करते निष्ठुरता सी आने लगती है। घटनाओं की खबर बनाते वक़्त स्पेस और टाईम को देखते हुए उसकी बेरहमी से कांटछांट करनी पड़ती है। सामूहिक हत्याकांड की खबर आ जाए तो आंसू बहाने से पहले खबर कवर करनी होती है। इसके बावजूद हमारे पुराने मित्र मनोज धीमान ने अपनी संवेदना बचाए रखी। उसे मरने नहीं दिया। अपनी मासूमियत भी बचाए रखी जिसका बचना आज के युग में असम्भव सा ही हो गया है। मनोज की जीवन शैली से ही निकली है मनोज की चौथी पुस्तक। फ़िलहाल पढ़िए पुस्तक के आने की खबर बाकी बात फिर कभी करते हैं मनोज धीमान पर भी और मनोज जी की साहित्यिक रचना पर भी।  --रेक्टर कथूरिया 


पंजाब में पिछले तीन दशकों से अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार मनोज धीमान ने
एक और हिंदी फिक्शन किताब 'ये मकान बिकाऊ है' (लघुकथा संग्रह) लिखी है, जिसका औपचारिक रूप अभी विमोचन नहीं हुआ है। लेकिन, यह किताब बाजार में आ गई है और पाठकों के हाथ में पहुंचते ही यह चर्चा का विषय बन गई है।

इस लघुकथा संग्रह में धीमान ने लगभग सभी विषयों जैसे राजनीति, धर्म, आर्थिक समस्या, सामाजिक विषमता, प्रेम, खराब संबंध और मीडिया पर अपनी कलम चलाई है। उन्होंने मानव मन में उत्पन्न हुई निराशा, दहशत, भय, त्रासदी को मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया है। लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार पांडे ने कहा, "जिस तरह ये सभी विषय एक-दूसरे से संबंधित हैं, उसी तरह लघुकथाएं एक के बाद एक समस्याओं को व्यक्त करती रहती हैं।" 

लघु कथाओं के बारे में बोलते हुए डॉ पांडे ने कहा कि प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण है। उन्होंने कहा कि लघु कथाएँ समाज के कई पहलुओं, व्यवस्था और शासकों की कार्यशैली को उजागर करती हैं। उन्होंने कहा कि लाखों प्रयासों के बावजूद भ्रष्टाचार सामाजिक नीति का हिस्सा बना हुआ है। जिन पर भ्रष्टाचार को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे इसे फलने-फूलने का धंधा कर रहे हैं। लघुकथा 'सोने की मुर्गी' में लेखक ने एक व्यापारी की कहानी के बहाने पुलिस व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। कैसे एक पुलिस केस में व्यापारी को फंसाया जाता है और उसका फायदा उठाया जाता है। इसी तरह लेखक ने लघुकथा 'नया धंधा' में पथराव की घटनाओं का जिक्र किया है। यह लघुकथा एक बेरोजगार युवक के भाग्य के बारे में बताती है। लघुकथा 'राजा और प्रजा' में राजा स्वयं भगवान बन जाता है। यदि राजा कोई नेक कार्य करे तो प्रजा उसे भूल जाती है। अब क्योंकि हर राजा चाहता है कि जनता उसके 'दरबार' में उसकी प्रशंसा करने के इरादे से उपस्थित हो, तो भारतीय राजनेताओं में उनके द्वारा किए गए नेक कामों को गलत कामों में बदलने की कला है। बाढ़ से बचाव के लिए बनाए गए मजबूत बांध को कमजोर करने के लिए राजा ने ऐसा किया।

डॉ पांडे ने कहा, "इस तरह, हर छोटी कहानी सच्चाई और आज की वास्तविकता के बहुत करीब है", "लेखक अपने समय की कहानियों को खुली आंखों से व्यक्त करता है।"

लघुकथा संग्रह 'ये मकान बिकाऊ है' के लेखन की शुरुआत कैसे हुई? इस सवाल का जवाब देते हुए धीमान ने कहा कि साल 2020 में कोरोना काल में वह व्हाट्सएप पर प्रसिद्ध हिंदी लेखकों के समूह "पाठक मंच" से जुड़े। "पाठक मंच" में कुछ लघु कथाएँ पोस्ट करने पर पाठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली, जिससे लेखन की निरंतरता बनी रही। इस तरह इन लघुकथाओं ने आखिरकार एक किताब का रूप ले लिया।

धीमान ने इस पुस्तक को प्रसिद्ध कवि, नाटककार और आलोचक डॉ. नरेंद्र मोहन को समर्पित किया है। उन्होंने  कहा कि डॉ. नरेंद्र मोहन ने न केवल उन्हें लघु कथाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें अपने प्रकाशक - अकादमिक प्रकाशन, दिल्ली से बात करने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने कहा, "मुझे जीवन भर पछताना पड़ेगा कि डॉ. नरेंद्र मोहन ने किताब प्रकाशित होने से पहले ही इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। नहीं तो आज अगर वह जिंदा होते तो किताब प्रकाशित होने के पश्चात जश्न का माहौल कुछ और होता।"

हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष व विख्यात लेखक कमलेश भारतीय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, "लघुकथाएं रोजमर्रा की घटनाओं या जीवन की स्थितियों से निकलती हैं। रचनाएं जमीन से जुड़ी हुई हैं। समाचार पत्रों की सुर्खियां, राजनीति में कोई भी मोड़ या हमारे चारों ओर का जीवन लेखक की लघु कथाओं की दुनिया है।"

पंजाब के जाने-माने हिंदी उपन्यासकार व पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि हिंदी साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अजय शर्मा ने कहा, "लघु कथाएँ एक पूरी कहानी कहती हैं। ऐसी तकनीक बहुत कम लघु कथाकारों में देखी जाती है।"  अंजू खरबंदा, संचालिका, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल (दिल्ली शाखा) ने कहा, "लघुकथा पढ़ते समय पाठक भी उन लघु कथाओं के साथ चलने लगता है। लघु कथाएँ जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हैं, जो सीधे लोगों के दिलों तक पहुँचती हैं।" दोआबा साहित्य एवं कला अकादमी, फगवाड़ा (पंजाब) के अध्यक्ष डॉ. जवाहर धीर ने कहा, "लघुकथाएं बहुत कम शब्दों में एक बड़ा संदेश देने में सक्षम हैं।"

एकैडमिक पब्लिकेशन, दिल्ली के राजेश कुमार ने कहा कि पुस्तक में आज के जीवन और घटनाओं से ओत-प्रोत लघु कथाएँ हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक निश्चित रूप से हिन्दी साहित्य में एक विशेष स्थान बनाएगी। उन्होंने कहा कि किताब जल्द ही अमेज़न पर उपलब्ध होगी।

लघुकथा संग्रह 'ये मकान बिकाऊ है' में कुल 164 पृष्ठ हैं और इसमें 120 लघु कथाएँ हैं।

यहां बताया जाता है कि मनोज धीमान ने इससे पहले तीन हिंदी पुस्तकें लिखी हैं। ये पुस्तकें थीं: 'लेट नाइट पार्टी' (कहानी संग्रह), 'बारिश की बूंदे' (कविता संग्रह) और 'शुन्य की ओर' (उपन्यास)। 'लेट नाइट पार्टी' पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित हो चुका है। अंग्रेजी अनुवाद प्रोफेसर शाहीना खान द्वारा किया गया था।