Showing posts with label Neelima Sharma. Show all posts
Showing posts with label Neelima Sharma. Show all posts

Sunday, August 17, 2025

लेखक एवं पत्रकार मित्र आकाश माथुर सम्मानित

Received from Neelima Sharma on 17th August 2025 at 11:11 Regarding Writer Akash Mathur

“मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया

नई दिल्ली: 17 दिसंबर 2025: (नीलिमा शर्मा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखक एवं पत्रकार, मित्र आकाश माथुर जी को हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में उनके शानदार उपन्यास “मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया। 

साथ ही, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार-2025 के लिए निर्णायक मंडल ने उनके उपन्यास उमेदा-एक योद्धा नर्तकी को चुना है।

इस अवसर पर आकाश जी को ढेर सारी शुभकामनाएँ एवं बधाई। हम परम पिता परमेश्वर से आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। आमतौर पर जो सम्मान एक लेखक को बड़ी उम्र में मिलते हैं, वे आपको युवावस्था में ही मिल रहे हैं, जो दर्शाता है कि आप माँ सरस्वती के कितने चहेते पुत्र हैं। हमें विश्वास है कि आप इसी तरह उम्दा कहानियाँ और रोमांचक उपन्यास लिखते रहेंगे और अपने शहर व परिवार का नाम रोशन करते रहेंगे।

Monday, January 16, 2023

लगातार लोकप्रिय हो रहा है नीलिमा शर्मा का कहानी संग्रह कोई ख़ुशबू उदास करती

Monday: 16th January 2023 at 11:46 AM 

भोपाल में राधा अवधेश स्मृति कथासम्मान से सम्मानित भी किया गया


भोपाल
: 16 जनवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::

हिन्दी साहित्य से स्नेह रखने वाले सभी लोगों को यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता होगी कि जानीमानी लेखिका नीलिमा शर्मा का कहानी संकलन लगातार लोकप्रिय होता जा रहा है। कल भोपाल में विश्व मैत्री संघ में  कहानी संग्रह कोई ख़ुशबू उदास करती है पुस्तक के लिए नीलिमा शर्मा को राधा अवधेश स्मृति कथासम्मान से सम्मानित किया गया। आयोजन में बहुत से गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। 

यह कार्यक्रम भोपाल में श्यामला हिल्स पर राजीव सभागार मे आयोजित किया गया था। इस समारोह में  कई लोगो को उनके साहित्य समाज मे योगदान के लिए सम्मानित किया गया। वहां पर उनकी कहानी  "टुकड़ा टुकड़ा ज़िंदगी" का कहानी पाठ भी किया गया।

इस कहानी का शशि बंसल जी ने  प्रभावशाली तरीके  से  पाठ किया।  यह कहानी कोरोनाकाल  में लॉकडाउन के समय घर मे कैद  एक सहायिका की मनोस्तिथि  एवं जिजीविषा की कहानी  है। इस कहानी  को मौजूद श्रोताओं द्वारा बहुत सराहा गया। इस कहानी में कोरोनाकाल के उस नाज़ुक दौर में इसका सामना करने वाले लोगों की मानसिक स्थिति और अन्य कठिनाइयों का भी गहन विश्लेषण जैसा प्रस्तुतिकरण है।

इस समारोह में उनके अलावा हरि भटनागर जी एवं  हरीश पाठक जी ने भी अपनी कहानियों का पाठ किया। विश्व मैत्री संस्था की अध्यक्ष सन्तोष श्रीवास्तव जी  ने बहुत कुशलता एवं मनोयोग से इस कार्यक्रम को सम्पन्न कराया। इसके लिए वह बधाई की पात्र है। 

इस मौके पर भोपाल शहर के विभिन्न साहित्यकारों के अलावा अन्य शहरों से आये साहित्यकार भी मौजूद थे। 

नीलिमा शर्मा का यह पहला कहानी संग्रह है। इसमें स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित 11 कहानियों को संग्रहित किया गया है। 

स्त्रीमन के विभिन्न कोनों की पड़ताल करती यह कहानियाँ सचमुच बेहतरीन हैं। नीलिमा शर्मा ने  इसके पहले आठ कहानी संग्रहों का संपादन एवं सहलेखन किया है। उनकी  कहानियों का उर्दू, पंजाबी, इंग्लिश, बंगला और जापानी भाषा मे भी अनुवाद हो चुका है।  उनके कहानी संग्रह कोई ख़ुशबू उदास करती  है का पंजाबी वर्जन भी जल्द ही प्रकाशित होगा।

पुरस्कार में शाल श्रीफल पुष्प सम्मानपट्ट के साथ5100  की नकद राशि दी गयी है ।

Saturday, October 16, 2021

इस बार पुस्तक चर्चा "कोई ख़ुशबू उदास करती है''

हिंदी पुस्तक में पंजाबी का रंग इसे और भी  यादगारी  बना देता है


नई दिल्ली
: 16 अक्टूबर 2021: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

ज़िंदगी और किस्मत जब रंग बदलती हैं तो सचमुच इसका पता तक नहीं चलने देती। गिरगिट भी मात खा जाता है। बदलाहट के बाद ही अहसास होता है कि अब पहले जैसा वो सब नहीं रहा। इसके बावजूद सतर्क कलमकार और बुद्धिजीवी इस बदलाहट को उसी वक्त पहचान लेते हैं जब यह दस्तक दे रही होती है। नीलिमा शर्मा ने बदलाहट का पता देने वाली उस मूक दस्तक की भयभीत करने वाली ख़ामोशी भरी आवाज़ के सूक्ष्म क्षणों को सफलता से पकड़ा है। उस हत्यारे दौर की तबाही को कलात्मक ढंग से कलमबद्ध किया है नीलिमा शर्मा ने। उस ज़हर को नीलकंठ की तरह पीने का प्रयास भी किया, कुछ सफलता भी मिली लेकिन वह नीलिमा थी न जिसके पास इंसान की सीमित शक्तियां होती हैं। वह देव न बन सकी। नीलकंठ न बन सकी। लेकिन इस प्रयास ने उसे बहुत ऊंचाई प्रदान की है। यह पुस्तक उस दौर की गहन उदासी से निकली है जिसकी टीस अभी सदियों तक महसूस की जाएगी। यह पुस्तक-"कोई ख़ुशबू उदास करती है'' बहुत ही विशिष्ट पुस्तक है। इसकी अनुभूति भी नीलिमा शर्मा ही कर सकती थी और इसकी अभिव्यक्ति की कला और क्षमता भी महांदेव ने नीलिमा को ही प्रदान की। तबाही अभी जारी है। तबाही की खामोश सी दस्तक भी अभी जारी है। नीलिमा जी अभी भी सुन रही हैं। इस किताब को पढ़ कर शायद आप बच सकें इस तबाही की मार से जो हम सभी की नियति ही बन गई लगती है। इस किताब को पढ़ना तो फायदेमंद रहेगा ही लेकिन पहले पढ़ लीजिए थोड़ा सा साराँश कि कैसे बनी यह पुस्तक? कैसे रखा गया  इसका नाम? यह दास्तान आपको भी उदास कर देगी लेकिन ज़िंदगी के लिए यह उदासी भी बेहद आवश्यक है। एक आवश्यक औषधि की तरह। -रेक्टर कथूरिया  

नीलिमा जी बताती हैं-एकांत की क्या कहूँ,बरसों से भीड़ के साथ रहते हुए भी मन का एक कोना अकेला है लेकिन उदास कभी नही रहता था। खुल कर ठहाके लगाना मेरी आदतों में शुमार था शायद मेरे ठहाकों को मेरी ही नज़र लग गयी। उस दिन किसी ने कहा तुमने अपनी कहानी की किताब का नाम "कोई ख़ुशबू उदास करती है'' क्यों रखा। आजकल तुम उदास लिखती हो तुम उदास लगने लगी हो, ज्यादा उदास रहने से उदासी की आदत बन जायेगी बस तब से सोच में हूँ ...

उदास होना तो प्रकृति ने सबकी नियति में लिखा है। हर कोई किसी न किसी क्षण में उदास होता है, लेकिन अवसाद को हावी नही होने देता । मैंने  तो कई बार उदासियों के महासागर देखे है लेकिन मेरे मन की छोटी सी नाव उम्मीद की पतवार के सहारे वास्को डी गामा बनकर अपनी  बाकी बचीकुची जिंदगी की तलाश में है। मन की यात्राएँ मुझे बहुत पसंद है औऱ हर बार सामने वाले को उदास देखकर अपनी ज़िन्दगी की खुशियों के लिए ईश्वर का शुकराना भी अदा करती हूँ।

आजकल मूडी हो गयी हूँ ,यस (चाहे तो) आप बूढ़ी भी पढ़ सकते है। आजकल कार की पिछली सीट पर बैठे बैठे मोबाइल में सर घुसाए रहती हूँ। शहनाज ओर सिद्धार्थ  के वीडियो देखती रहती हूँ।  परिजनों से 'कोई कंपनी मेरे बिना लॉस में नही जायेगी' के ताने उलाहने सुनती रहती हूँ। बार बार सबके कहने पर फोन को कुछ देर के लिए चार्जिंग रूपी ऑक्सिजन का मास्क पहनाती हूँ तो नजरें बाहर घूमती है कि "ओह यह तो दिल्ली है मेरी जान"। मुझे पता ही नही चलता कि दिल्ली है देहरादून ,मुज़फ्फरनगर है या मेरठ।  हवाओ की ठंडक कभी कभार ही अहसास दिलाती है कि जिस शहर में आजकल तुम रहती हो न वहाँ का मौसम थोड़ा नम है, ख़ुश्क है या  सर्द क्योंकि मन का मौसम तो आजकल खोया खोया रहता है।

खैर बात हो रही थी कार के बाहर झाँकने की।  कल दिल्ली कैंट की एक सड़क पर रेड लाइट पर ट्रैफिक काफी ज्यादा था। कारें धीरे धीरे सरक रही थी।अचानक एक काली बाइक आगे आयी। हेलमेट पहने कोई मध्यम कद काठी का लड़का (या आदमी) ड्राइव कर रहा था। एक मोटी लड़की (मुझसे कम) बाइक पर उसके पीछे बैठी थी।  झटके से एकदम मेरी विंडो के साथ  बाइक रुकी थी तो नज़र जाना स्वाभाविक ही था।  पाकिस्तानी लॉन प्रिंट का पलाज़ो सूट पहने उस लड़कीं का हाथ उस लड़के की कमर पर था और आगे से उसकी शर्ट को मुठ्ठी में हल्का पकड़ा हुआ था।  लड़के ने बड़े प्यार से उस हाथ को थामा औऱ अपने होठों तक ले जाकर हौले से चूम लिया । हेलमेट की  वजह से  उसका चेहरा नजर नही आया लेकिन लम्बी सी नाक हेलमेट के आगे शीशा/प्लास्टिक न लगे होने से बाहर तक नजर आ रही थी।  

न जाने वो दोनो कौन थे लेकिन उनको देख कर  एक प्यारा सा अहसास हुआ।  हर रेडलाइट पर फेविकॉल के जोड़ की तर्ज पर चिपके लड़के लड़कियां नजर आ जाते है लेकिन यह तो .......मौसम सुहाना सा लगने लगा था। 

फिर तो नज़र उस बाइक के साथ साथ चलती रही। कभी कार के आगे कभी कहीं पीछे बाइक हमारे साथ साथ रही। वेगास मॉल के फ़ूड कोर्ट में उस प्रिंट सूट को फिर मैंने अपने से आगे वाली टेबल पर बैठे देखा। अकेली बैठी वो चुपचाप फोन में एक तस्वीर देख रही थी। एक लड़के के साथ तस्वीर, लेकिन तस्वीर वाला लड़का साथ आये लड़के से अलग था।  मेरे बच्चे भी मेरे लिए खाना लेने के लिए गए थे। हर कोई आता और हम खाली कुर्सी ले सकते है कहकर  झुकने लगता। हर बार मना करती मेरी नजर उस महिला के सामने रखी खाली कुर्सी पर थी। जिसपर ज़ारा का शॉपिंग बैग था। तभी अचानक किसी का कॉल उसके फ़ोन पर आया।  

मंद स्वर से फुसफुसाती सी वो बोली.... " आहो बीजी आज मैनू मॉल लेके आये ने, पिज़्जा लेण गए ने , मैं नही रहणा एथ्थे,  मैं काके नू मिस कर रहिया। उन्ने रोटी खादी आज?  नही प्रशांत चंगा हेगा लेकिन  देव वर्गा तां नही हो सकदा न। बीजी जे कोरोना न  होंदा ते आज देव मेरे नाल हौंदा।" उसकी ख़ामोश सिसकियां सिर्फ मुझे सुनाई दी । मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा औऱ वो भीगी आँखों से मुस्कुरा दी।

आप  नही समझे न माजरा ? 

नामुराद कोरोना ने कितने घरों के चिराग बुझा दिए। कितने तकिये अंदर तक आँसुओं की सीलन से भीगे हुए है। लेकिन कुछ ऊँची दीवारों के बीच मंद बुझती आँखों ने उम्मीद नहीं छोड़ी।  ज़िन्दगी की उम्मीद, आने वाले कल की उम्मीद, अमावस की रात में जुगनुओं की रोशनी की उम्मीद, सुबह के आने की उम्मीद। उन बुझती उम्मीदों ने अपने बड़े बेटे के जाने के बाद  छोटे  बेटे की शादी बड़े की पत्नी से कर दी। छोटे ने मेरी लाइफ मेरा रूल मेरे सपने न कहकर उस ज़िम्मेदारी को प्यार से सम्हाल लिया।  (है न हमारी परिवार संस्था  महान)

नया  उनका नया नया रिश्ता है। अचानक  जुलाई में ही उन दोनो के रिश्ते ने  नाम और रंग बदला है। उनके रिश्ते की ख़ुशबू बदल गयी है सो लड़कीं के 4 साल के बच्चे को दादी ने साथ रख लिया कि अब यह दोनों आपस मे एक दूसरे को समझें। फिर बाकी सब अबकि बार साथ रहेंगे। पंजाब के गांव में ज़मीन बेचने की तैयारी चल रही है। खेती करने वाला किसान बेटा अब नही रहा। बूढ़ा बाप कब तक माफियाओं से ज़मीन बचायेगा।  द्वारका में फ्लैट खरीदने की बात चल रही है। अब जितनी ज़िंदगी बची है सब साथ  साथ बिताएँगे। 

अब बताओ ऐसी खुशबुएँ उदास करेंगी न .... चाहे उम्मीद भरी ख़ुशबू है। 

बहुत सी खुशबुएँ मेरे कहानी संग्रह में भी समाहित है ।

कुछ दोस्त मेरी किताब 'कोई ख़ुशबू उदास करती है'  मंगवाना चाहते है  तो उनके लिए यह लिंक दे रही हूँ ।आप Shivna Prakashan से सीधे  भी पुस्तक मँगवा सकते है । 

Koi Khushbu Udas Karti Hai, Neelima Sharma 

http://www.amazon.in/dp/B08YN5D7YF


Tuesday, May 5, 2020

Online साहित्य चर्चा//लॉकडाउन पर नया डिजिटल सीरीज

 डिफरेंट मूड्स ऑफ़ लॉकडाउन पर विशेष चर्चा इस पोस्ट में ख़ास 
नई दिल्ली4 मई 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
लॉक डाउन ने सभी को घरों में बंद कर दिया लेकिन दिल और दिमाग में छुपी रचनात्मक ऊर्जा का क्या करे? यह ऊर्जा कहां बंद होती है? ये जज़्बात कहाँ रुकते हैं? यह भावनाएं कहां बंद होती हैं? इन्होने जो नया रास्ता निकाला उसकी चर्चा बहुत तेज़ी से हो रही है। लॉक डाउन के दिनों में कलम के इस ऐतिहासिक प्रयोग का श्री जाता है मातृ भारती को और इसकी लेखक मंडली को। विस्तृत विवरण पढिये नीचे दी गई पोस्ट में। आपको यह अनूठा प्रयोग कैसा लगा इस पर अपने विचार भी अवश्य भेजें। --कार्तिका सिंह
ये वक्त सबके लिए नया है। क्वारंटाइन...लॉक डाउन...कोविड 19... कोरोना वायरस जैसे नामों से पूरी दुनिया परिचित हो रही है। पहली बार हम सब घरों में कैद हैं। बाहर की दुनिया से डरे हुए हैं। इस वक्त का सही उपयोग करने और पॉजिटिव बने रहने के लिए हर कोई अपने स्तर पर बहुत कुछ कर रहा है। मातृभारती एप ने इस वक्त को रेखांकित करते हुए 21 लेखकों द्वारा लिखी एक सीरिज बनाई है डिफरेंट मूड्स ऑफ लॉकडाउन। इस सीरिज में हर दिन एक नया लेखक लॉक डाउन की कहानी लिखेगा।
इस सीरिज का संपादन कर रही हैं जयंती रंगनाथन और नीलिमा शर्मा। 
नीलिमा शर्मा इसके पहले भी हिंदी डिजिटल साहित्य के पहले उपन्यास  आईना सच नही बोलता का  संपादन  कर चुकी है जिसको मातृभारती पर हजारों पाठकों ने पढ़ा। 
मातृभारती एप के जनक महेंद्र शर्मा इस सीरिज के बारे में कहते हैं, ‘इस समय मातृभारती एप में दस लाख से ज़्यादा हिंदी के पाठक जुड़े हैँ। हम चाहते हैं अधिक से अधिक लेखकों को हिंदी भाषा से जोड़ना। जो लिखना चाहते हैं, उन्हें मोटिवेट करना, एक मंच देना हमारा उद्देश्य है। नामचीन और नए इक्कीस लेखकों द्वारा लिखा गया यह सीरीज नए पाठकों को भी जोड़ेगा। इसके अलावा एक ग्रुप में साथ रहने से एक धारा सा बनती है और क्षमतावानों को आगे बढ़ने का मौका मिलता है।’
लॉक डाउन के माहौल ने कुछ लोगों को बुरु तरह से निराश क्र दिया है, कुछ को आलसी बना दिया है-वे सारा सारा दिन सोते ही रहते हैं। ऐसे माहौल में बहुत कम लोग हैं जो कुछ न कुछ क्रिएटिव भी कर पाते हैं। इतने लेखकों कोएक साथ एक ही प्रोजेक्ट में जोड़ पाना आसान न रहा होगा। इसकी सफलता बताती है कि यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा। इसमें बहुत क्षमतावान कलमकार शामिल हैं। Mahendra SharmaJayanti RanganathanManisha Kulshreshtha,Rashmi Ravija,Shilpa SharmaPoonam JainPratishtha Singh,  Pratima PandeyUpasna SiagKshama SharmaNeelima SharrmaAmrita V ThakurPritpal KaurRinki VaishChandidutt Shukla SagarDivya VijayShuchita MitalAmrendra, Dhyandera,Jyoti इत्यादि सभी ने इसे एक मिशन समझते हुए सफल बनाया है। एक एक कहानी पढ़ने वाले के मन पर अपना असर छोडती है। बिना कोई राजनीतिक विचार या धार्मिक प्रवचन बने अपना प्रभाव किसी ऐसे इंजेक्शन की तरह छोड़ जाती है जिसे लगने का पता ही नहीं चलता। हम कोशिश करेंगे इस पर और चर्चा भी हो सके। 
इस तरह के प्रयोगों का सिलसिला शुरू करने वाले मंच मातृभारती के संचालक/संस्थापक जनाब  महेंद्र शर्मा बताते हैं कि उनके ज्यादातर पाठक मध्यप्रदेश और राजस्थान से हैं। इसके बाद उत्तरप्रदेश का नंबर आता है। कई पाठक बिहार और विदेशों से भी है। हिंदी को टीयर 2 और टीयर 3 सिटीज तक पहुंचाने के लिए कई ग्रुप ऑन लाइन और ऑफ लाइन काम कर रहे हैं। ताकि वहां हिंदी के इच्छुक लेखकों को मातृभारती एप से जोड़ सकें। भविष्य में उनका इरादा है एप में प्रकाशित कहानियों पर वेब सीरिज और फिल्म भी बने। इसके लिए कई प्रोडक्शन हाउस से उनकी बातचीत चल रही है। हिंदी के वो पाठक जो पढ़ने से ज्यादा सुनने में रुचि रखते हैं उनके लिए जल्द ही ऑडियो बुक ऐप लॉन्च होगा।
बहुत जल्द नया प्रोजेक्ट डिफरेंट शेड्स ऑफ लॉक डाउन का भी ऑडियो वर्जन लाने की तैयारी है।
                                                                                                                         --हिंदी स्क्रीन डेस्क


Wednesday, January 8, 2020

नीलिमा शर्मा की काव्य रचना सफेद कुरता सीधा दिल में उतरती है

इसके बाद कौंधती हैं दिमाग में यादों की बिजलियां 
अब तुम कही भी नही हो
कही भी नही
ना मेरी यादो में
न मेरी बातो में
अब मैं मसरूफ रहती हूँ
दाल के कंकड़ चुन'ने में
शर्ट के दाग धोने में
क्यारी में टमाटर बोने में
एक पल भी मेरा
कभी खाली नही होता
जो तुझे याद करूँ
या तुझे महसूस करू
मैंने छोड़ दिए
नावेल पढने
मैंने छोड़ दिए है
किस्से गढ़ने
अब मुझे याद रहता हैं बस
सुबह का अलार्म लगाना
मुंह अँधेरे उठ चाय बनाना
और सबके सो जाने पर
उनको चादर ओढ़ाना
आज तुमको यह कहने की
क्यों जरुरत आन पढ़ी हैं
सामने आज मेरी पुरानी
अलमारी खुली पड़ी हैं
किस्से दबे हुए हैं जिस में
कहानिया बिखरी सी
और उस पर मुह चिडाता
तेरा उतारा सफ़ेद कुरता भी
नही नही !! अब कही भी नही हो
न मेरी यादो में न मेरी बातो में
फिर भी अक्सर मुझको सपने में
यह कुरता क्यों दिखाई देता हैं...... --नीलिमा शर्मा 
नीलिमा शर्मा के ब्लॉग में उनकी यह काव्य रचना "सफेद कुरता" एक यादगारी प्रभाव छोडती है। सीधा दिल में उतरती है और फिर दिमाग में किसी बिजली की तरह कौंधने लगती है। उन अहसासों की अनुभूति कराती है जब हम बहुत कुछ भूलना चाहते हैं।  खुद को इधर उधर व्यस्त करते हैं लेकिन फिर भी खुद बेबस सा पाते हैं। जल्द ही यूं लगता है जैसे हार रहे हैं।  कभी कभी तो हारने का मन भी होता है।  लेकिन दिल की बातें न समाज सुनता है न ही दिमाग। उस उधेड़बुन के अहसास को महसूस करना, पकड़ पाना पाना या शब्दों में बांध पाना आसान कहां? इसके बावजूद  इसे बहुत ही सादगी और खूबसूरती से प्रस्तुत किया है नीलिमा शर्मा ने सफेद कुरता नाम की अपनी काव्य रचना में। 
कभी जानमाने शायर अहमद फ़राज़ साहिब ने कहा था न--
पहले पहले का इश्क अभी याद है फ़राज़!
दिल खुद यह चाहता था कि रुसवाईयां भी हों! इसके साथ ही उनका एक और शेयर याद आता है---
वो मुझ से बिछड़ कर खुश है तो उसे खुश रहने दो “फ़राज़ “
मुझ से मिल कर उस का उदास होना मुझे अच्छा नहीं लगता…
मोहब्बत में कैसे कैसे उतराव चढ़ाव आते हैं, कैसे कैसे ख्याल  हैं उनको पकड़ पाना या याद रख पाना आसान नहीं होता। ज़िंदगी के फ़र्ज़ों और ज़िम्मेदारियों का गहन अंधेरा और उस अंधेरे में कौंध जाना यादों की बिजलियों का।  जैसे बिजली का कौंध जाना बरसात के मौसम में किसी कठिन पहाड़ी रास्ते में पल भर में रास्ता दिखा जाता है बस उसी तरह यादों का अहसास ज़िंदगी में भी मार्गदर्शन करता है। उस अहसास को महसूस करना भी आसान नहीं होता जिसे पकड़ने में सफलता पाई है नीलिमा शर्मा जी ने। इस सफल रचना के लिए एक बार फिर से बधाई। --रेक्टर कथूरिया