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Friday, September 26, 2025

28 सितंबर को प्रीत साहित्य सदन का एक और आयोजन

दो साहित्यिक पुस्तकों का होगा विमोचन 

लुधियाना: 26 सितंबर 2025: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::


हिंदी में साहित्य साधना लगातार जारी है।
हिंदी में लिखने वाले लगातार इस दिशा में सक्रिय हैं। एक और पुस्तक-परिचर्चा  एवं क्षकाव्य-संध्या  28 सितंबर को लुधियाना के समराला चौंक में हो रही है। लुधियाना के समरल चौंक क्षेत्र में एक पूरी टीम हिंदी और साहित्य के लिए सक्रिय रहती है। इस बार 28  सितंबर को भी प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना में एक पुस्तक का विमोचन कर रही है। इस सदन से जुड़े लोग अक्सर ही कुछ न कुछ करते रहते हैं जिसका साहित्य के क्षेत्र में बहुत अर्थ होता है। 

इस बार के आयोजन में भी पुस्तकों का विमोचन हो रहा है जिसका नाम है: मेरी-तेरी कहानी (लघुकथा-संग्रह)  इसकी रचनाकार हैं डॉ. विभा कुमरिया शर्मा। 

एक अन्य पुस्तक है: पिताजी का व्हाट्सएप  यह कविता-संग्रह। इस पुस्तक की रचनाकार हैं-सपना।  इस मौके पर  मुख्य-अतिथि डॉ. इरादीप होंगीं और कार्यक्रम की अध्यक्ष: डॉ. पूनम सपरा रहेंगी।  

तारीख और समय एक बार फिर बता दें 28 सितंबर 2025 को बाद दोपहर 03:00 से...शुरू। 

हिन्दी लेखक संघ पंजाब का सहयोग भी रहेगा और अन्य संगठन भी आएँगे। प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना आपके में आपकी इंतज़ार में रहेगा ही. वहां बहुत से और भी साहित्य सद्धक होंगें जिनसे आप मिल पाएंगे। 

Sunday, August 17, 2025

लेखक एवं पत्रकार मित्र आकाश माथुर सम्मानित

Received from Neelima Sharma on 17th August 2025 at 11:11 Regarding Writer Akash Mathur

“मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया

नई दिल्ली: 17 दिसंबर 2025: (नीलिमा शर्मा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखक एवं पत्रकार, मित्र आकाश माथुर जी को हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में उनके शानदार उपन्यास “मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया। 

साथ ही, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार-2025 के लिए निर्णायक मंडल ने उनके उपन्यास उमेदा-एक योद्धा नर्तकी को चुना है।

इस अवसर पर आकाश जी को ढेर सारी शुभकामनाएँ एवं बधाई। हम परम पिता परमेश्वर से आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। आमतौर पर जो सम्मान एक लेखक को बड़ी उम्र में मिलते हैं, वे आपको युवावस्था में ही मिल रहे हैं, जो दर्शाता है कि आप माँ सरस्वती के कितने चहेते पुत्र हैं। हमें विश्वास है कि आप इसी तरह उम्दा कहानियाँ और रोमांचक उपन्यास लिखते रहेंगे और अपने शहर व परिवार का नाम रोशन करते रहेंगे।

Friday, January 24, 2025

पुस्तक मेले में भेंट हो सकेगी वाणी प्रकाशन से भी

Vani Prakashan 23rd January 2025 at 5:46 PM World Book Fair Input and Edited by Kartika Kalyani Singh

करीब 85 नयी पुस्तकों के साथ 12,000+ उत्कृष्ट कृतियाँ मिल सकेंगी


मोहाली: 24 जनवरी 2025: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

शब्दों में शक्ति होती है। शब्दों से चमत्कार जैसे अनुभव संभव हैं। जब तन मिट जाता है तो उस समय सब कुछ रख होने के बाद भी शब्द ही हमें ज़ाद दिलाते हैं की फलां फलां कलमकार कैसा था और उसने दुनिया बदलने के लिए कितना सोचा और आम लोगों के सामने नई तब्दीलियों का ब्लू प्रिंट रख दिया। ज़ेह रोड मैप की तरह सदियों तक समाज को रह दिखता है। ऐसी शक्तियों वाले शब्दों को सहेजने के लिए लेखक, प्रकाशक और पुस्तक मेले बहुत ही अमूल्य योगदान दे रहे हैं। ऐसा ही एक पुस्तक मेला दिल्ली में भी लग रहा है पहली फरवरी को। 

पिछले कुछ दशकों में पुस्तकों की लोकप्रियता को बरकरार रखने में पुस्तक मेलों का विशेष योगदान रहा है। विभिन्न पुस्तक मेलों ने पुस्तक कल्चर को प्रशंसनीय बढ़ावा दिया है। पुस्तकों को घर घर पहुँचाने में एक क्रान्ति घरेलू लाइब्रेरी योजना भी लेकर आई थी। आजकल के दौर में जब पुस्तकों के अस्तित्व को खतरा सा महसूस  उस समय पुस्तक मेले इस अस्तित्व को मज़बूत करने में जुटे हुए हैं। वाणी प्रकाशन  इस संबंध में बहुत अच्छी खबरें लाए हैं। 

खुशखबरी यह है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी वाणी प्रकाशन ग्रुप विश्व पुस्तक मेला 2025 में नयी किताबों के साथ आपका स्वागत करने के लिए तत्पर है। हम, वाणी प्रकाशन (हॉल नम्बर 2-3, स्टॉल नम्बर N-03), यात्रा बुक्स और भारतीय ज्ञानपीठ की पुस्तकों के स्टॉल (हॉल नम्बर 2-3, स्टॉल नम्बर P-05) पर आपसे 1-9 फ़रवरी 2025 तक, सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे तक मिलेंगे। आपका साहित्य घर आपकी प्रतीक्षा करेगा। और आप जानते ही हैं कि साहित्य से सबंधित प्रतीक्षा किस्मत वालों के हिस्से में न ही आते है। 

आधुनिक तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाते हुए आज के डिजिटल युग में किताबों के हर रूप — मुद्रित, ई-पुस्तक या ऑडियो बुक—हम हर माध्यम से अपने पाठकों के समीप पहुँचने के लिए उत्सुक हैं।


आगामी पुस्तक मेले में लगभग 85 नयी पुस्तकों के साथ 12,000+ कालजयी साहित्य, जिसमें कविता, कहानी, उपन्यास, शायरी, कथा साहित्य, बाल साहित्य व अनुवाद की उत्कृष्ट कृतियाँ आपकी प्रतीक्षा में रहेंगी।


वाणी प्रकाशन, भारतीय ज्ञानपीठ और यात्रा बुक्स की गौरवमयी परम्परा के अंतर्गत प्रकाशन, साहित्य व लेखकों को समर्पित है। 


इस मेले में साहित्य की नज़दीकियों का आनंद लेने के इच्छुक कलमकारों और  साहित्य स्नेहियों से निवेदन है कि अपनी सम्भावित आगमन तिथि के बारे में वाणी प्रकाशन को अग्रिम तौर पर अवश्य सूचित करें, ताकि इस संबंध में नेशनल बुक ट्रस्ट को सूचना दी जा सके और आपका हार्दिक स्वागत भी प्रेम के साथ किया जा सके। 


यदि आप इस संबंध में अग्रिम सूचना दे सकें साहित्यिक पत्रकारिता से जुड़े लोगों को भी आपसे संपर्क में आसानी रहेगी। 

Saturday, March 30, 2024

सनातन धर्म बनाम हिंदू धर्म//संजय पराते की टिप्पणी

Saturday: 30th March 2024 at 5:39 PM

हिंदी पुस्तक सनातन धर्म : इतना सरल नहीं पर विशेष टिप्पणी 

छत्तीसगढ़ से: 30 मार्च 2024: (संजय पराते//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
हाल ही में अरुण माहेश्वरी की 8 अध्यायों में विभाजित एक छोटी-सी पुस्तिका "सनातन धर्म : इतना सरल नहीं" आई है। यह पुस्तिका सनातन धर्म और हिंदू धर्म के बीच के संबंधों और विवादों का गहराई से तथ्यपरक विश्लेषण करती है। 

हाल ही में हिंदुत्व का झंडा उठाए संघ-भाजपा ने चुपचाप हिंदू धर्म को सनातन धर्म से प्रतिस्थापित करने की कोशिश की है और सनातन धर्म को हिंदू धर्म का  समानार्थी बता रही है। संघ भाजपा के इस चमत्कार पर पानी डालने का काम अरुण माहेश्वरी ने किया है। इस मायने में सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए यह पुस्तिका बहुत उपयोगी है। 

स्वामी करपात्री महाराज हिंदू धर्म के कट्टर नेता और शास्त्रज्ञ थे, जिन्होंने वेद, दर्शन, धर्म और राजनीति से जुड़े विषयों पर विपुल लेखन किया है। कट्टर हिंदू थे, सनातनी धर्म के अनुयायी थे, तो निश्चित रूप से मार्क्सवाद विरोधी भी थे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी "मार्क्सवाद और रामराज्य।" इसके जवाब में राहुल सांकृत्यायन ने एक छोटी-सी पुस्तिका लिखी थी "रामराज्य और मार्क्सवाद", जिसमें उन्होंने करपात्रीजी के दार्शनिक और राजनैतिक तर्कों की धज्जियां उड़ा दी थी। लेकिन इससे करपात्रीजी की विद्वत्ता पर कोई आंच नहीं आती।

वर्ष 1940 में उन्होंने एक 'धर्म संघ' की स्थापना की थी -- जिसका उद्देश्य था सनातन धर्म की स्थापना ; जबकि वर्ष 1925 में ही आरएसएस की स्थापना हो चुकी थी, जो हिंदू धर्म और नाजीवाद के आधार पर देश को चलाना चाहता था। साफ है कि आरएसएस के हिंदू धर्म से करपात्री महाराज के सनातनी धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। वर्ष 1948 में उन्होंने 'रामराज्य परिषद्' का गठन किया, जबकि इसके बाद आरएसएस ने 1951 में जनसंघ का गठन किया था। आरएसएस का यह कदम भी बताता है कि उस समय उसके हिंदू धर्म का सनातन से कोई संबंध नहीं था। 1966 से गोरक्षा आंदोलन की शुरुआत भी करपात्रीजी ने ही की थी, जबकि यह मुद्दा आरएसएस के एजेंडे में भी नहीं था। करपात्रीजी के आरएसएस विरोध का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि उन्होंने 'राष्ट्रीय सेवक संघ और हिंदू धर्म' नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने संघ के परम पूज्य गुरु गोलवलकर की 'विचार नवनीत' और 'हम या हमारा राष्ट्रीयत्व' में उल्लेखित हिंदू धर्म संबंधी धारणाओं का दार्शनिक दृष्टि से खंडन किया है और आरएसएस को हिंदू धर्म विरोधी संगठन घोषित किया है। उनकी दृष्टि में संघ का पूरा आचरण कपट और मिथ्याचार से भरा था और ऐसे में उनसे हिंदू धर्म की रक्षा की आशा नहीं की जा सकती थी। यही कारण है कि अपने शुरुआती जीवन के कुछ वर्षों बाद उन्होंने संघ से सहयोग का रास्ता छोड़ दिया था।

अपनी पुस्तिका में अरुण माहेश्वरी ने गोलवलकर की विचार-सरणी के बरक्स करपात्री महाराज को रखा है। आज जब "भगवाधारी आए हैं" का नारा संघ-भाजपा का प्रिय नारा बन गया है, माहेश्वरी बताते हैं कि किस प्रकार    करपात्रीजी ने भगवा ध्वज की श्रेष्ठता और इसके राष्ट्रीयता का प्रतीक होने की संघ की धारणा को दार्शनिक चुनौती दी थी। वे करपात्री जी को उद्धृत करते हैं -- (महा) "भारत संग्राम में भीष्म, द्रोण, कर्ण, भीम, अर्जुन के रथ के ध्वज पृथक-पृथक थे। अर्जुन तो कपि ध्वज के रूप में प्रसिद्ध ही है। अतः सभी हमारे पूर्वज भगवा ध्वज को ही मानते थे, यह तो नहीं ही कहा जा सकता। ... (इसलिए) आपके भगवा ध्वज को अपना लेने से वह सार्वभौम, सर्वमान्य नहीं कहा जा सकता।" यह उल्लेखनीय है कि भगवा ध्वज की श्रेष्ठता का प्रचार करते हुए छत्तीसगढ़ में ध्वज विवाद के नाम पर कई जगहों पर संघ-भाजपा ने सांप्रदायिक तनाव और दंगे भड़काए हैं। इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर तो ऐसा माहौल बनाया गया था कि राष्ट्रीय झंडा 'तिरंगा' की जगह भगवा ने ही ले लिया है। 

करपात्रीजी शास्त्रों के सहारे यह भी सिद्ध करते है कि सनातनी हिंदू अनिवार्य तौर पर वर्णाश्रमी होगा और सांप्रदायिक होना कोई दुर्गुण नहीं, बल्कि हिन्दू होने का प्रमुख गुण है। संघ-भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति इन दोनों आरोपों से बचना चाहती है। इसी क्रम में उन्होंने 'राष्ट्रीयता' के संबंध में आरएसएस की इस अवधारणा का भी शास्त्रीय खंडन किया है कि केवल समान धर्म, समान भाषा, समान संस्कृति, समान जाति और समान इतिहास वाले लोग ही 'एक राष्ट्र' कहे जा सकते हैं और मुस्लिम, ईसाई आदि यदि हिंदू धर्म में सम्मिलित हो जाएं, तो वे भी 'राष्ट्रीय' हो सकते हैं। करपात्री जी के सनातनी विचारों के अनुसार संघ की यह सोच मुस्लिम विरोध और हिटलर के उग्र राष्ट्रवाद की अनुगामिता से उपजी है। उनका मानना है कि सनातन की अवधारणा मूलतः वेदों की अनादिता और अपौरुषेयता पर टिकी हुई है, जिसे गोलवरकर नहीं मानते। इस प्रकार, अपने शास्त्र-आधारित तर्कों से करपात्री महाराज आरएसएस को न केवल हिंदू धर्म विरोधी, बल्कि सनातन धर्म विरोधी भी साबित करते हैं। 

गोलवलकर और किसी भी अन्य संघी सिद्धांतकार ने आज तक करपात्री जी के आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया है, क्योंकि उनके पास करपात्री के धर्म आधारित विचारों का खण्डन करने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है, जैसी दृष्टि राहुल सांकृत्यायन के पास थी। अरुण माहेश्वरी की टिप्पणी है -- "आज तो इस मोदी युग में आरएसएस ने खुद ही सनातन धर्म का झंडा उठाकर प्रकारांतर से करपात्री के तब के सारे अभियोगों को नतमस्तक होकर पूरी तरह स्वीकार कर लिया है।" जिन लोगों पर सनातन धर्म नष्ट करने का आरोप लगा था, यह इतिहास की उलटबांसी है कि उनके ही वंशज आज सनातन धर्म का झंडा उठाए विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' पर आरोप लगा रहे हैं कि वे भारत से सनातन को नष्ट करना चाहते हैं। यह ठीक वैसा ही है, जैसा अंग्रेजों का तलुवे चाटने वाला संघ आज अपने को राष्ट्र भक्त और विपक्ष को राष्ट्र विरोधी बताने में लगा हुआ है। हिंदू धर्म को सनातन धर्म कहना वैसा ही है, जैसा वर्ष 2014 के चुनावी वादे बाद में पूरे संघी गिरोह के लिए 'जुमलों' में बदल गए थे और आज फिर उसे 'मोदी गारंटी' के रूप में पेश किया जा रहा है। साफ है कि संघ-भाजपा को न तो हिंदू धर्म से कोई मतलब है, न सनातन धर्म से कोई लेना-देना है। सत्ता के लिए धर्म को जब राजनीति का हथियार बनाया जाता है, तो ऐसी कलाबाजी भी करनी ही पड़ेगी। 

विचारशील 'भक्तों' के लिए भी यह पुस्तिका उनकी आंखें खोलने वाली साबित होगी, ऐसी आशा की जा सकती है।

 _*(टिप्पणीकार वामपंथी कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष है। संपर्क : 94242-31650)*

पुस्तक : सनातन धर्म : इतना सरल नहीं
लेखक : अरुण माहेश्वरी (मो. 98310-97219)
प्रकाशन : सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
मूल्य : 200 रूपये

Wednesday, September 23, 2020

टेली-लॉ कार्यक्रम पर सफलता की कहानियों की पहली पुस्तिका

23-सितम्बर-2020 10:15 IST

'रीचिंग द अनरिच्‍ड-वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' जारी


 नई दिल्ली: 23 सितंबर 2020: (पीआईबी//हिंदी स्क्रीन)::

न्याय विभाग ने टेली-लॉ कार्यक्रम पर सफलता की कहानियों की पहली पुस्तिका का ई-संस्करण 'रीचिंग द अनरिच्‍ड - वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' शीर्षक के तहत जारी किया। 

टेली-लॉ कार्यक्रम ने 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के 115 आकांक्षी जिलों सहित 260 जिलों के दूरदराज के क्षेत्रों में 3 लाख से अधिक लाभार्थियों को कानूनी सलाह प्रदान की समय पर एवं बहुमूल्य कानूनी सलाह प्रदान करने के लिए इस पहल के तहत गरीब, दलित, कमजोर और दूरदराज के समूहों एवं समुदायों को पैनल के वकीलों से जोड़ने के लिए स्मार्ट तकनीकों का उपयोग किया गया। 

केंद्रीय न्‍याय विभाग ने अपने टेली-लॉ कार्यक्रम की यात्रा को मनाने के लिए 'टेली-लॉ - रीचिंग द अनरिच्ड, वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' शीर्षक के तहत अपनी पहली पुस्तिका जारी की है। यह लाभार्थियों की वास्तविक जीवन की कहानियों और टेली-लॉ कार्यक्रम के तहत उन्‍हें विवादों को सुलझाने के लिए दी गई कानूनी सहायता का एक मनोरम पठनीय संग्रह है। इस प्रकार के विवाद दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। वर्तमान में इस कार्यक्रम के तहत 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के 260 जिलों (115 आकांक्षी जिलों सहित) और 29,860 सीएससी के जरिये भौगोलिक रूप से दुर्गम एवं दूरदराज के क्षेत्रों में 3 लाख से अधिक लाभार्थियों को कानूनी सलाह दी गई है।

यह पठनीय पुस्तिका कानूनी सहायता के एक अनिवार्य घटक के तौर पर कानूनी सलाह लेने के लिए ग्रामीणों को शिक्षित करने और उन्‍हें प्रोत्साहित करने में पैरालीगल स्वयंसेवकों और ग्रामीण स्तर के उद्यमियों की भूमिका को उजागर करती है। यह वैकल्पिक विवाद तंत्र के माध्यम से अपने विवादों को निपटाने में आम आदमी के डर और मिथकों को सफलतापूर्वक तोड़ती है। बहुत ही सरल कहानियों में यह 6 श्रेणियों को उजागर करता है जिनमें अन्याय के खिलाफ लड़ाई, संपत्ति विवादों का निपटान, कोविड पीडि़तों को राहत देना, सूचना के साथ सशक्तिकरण, प्रक्रियागत बाधाओं से निपटना और घरेलू शोषण के खिलाफ कार्रवाई शामिल हैं।

भारत सरकार के 'डिजिटल इंडिया विजन' के अुनरूप न्याय विभाग इस कार्यक्रम को गति देने और न्‍याय तक सभी की पहुंच को वास्‍तविक बनाने के लिए 'उभरते' और 'स्‍वदेशी' डिजिटल प्लेटफॉर्मों का उपयोग कर रहा है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वर्ष 2017 में टेली-लॉ कार्यक्रम को लॉन्‍च किया गया था ताकि मुकदमेबाजी से पहले के चरण में ही विवादों को निपटाया जा सके। इस कार्यक्रम के तहत पंचायत स्तर पर कॉमन सर्विस सेंटर के व्‍यापक नेटवर्क के तहत वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए स्‍मार्ट तकनीक, टेलीफोन/ इंस्टेंट कॉलिंग आदि सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। इन सुविधाओं का उपयोग गरीब, दलित, कमजोर, दूरदराज के समूहों एवं समुदायों को पैनल के वकीलों से जोड़ने के लिए जाता है ताकि उन्‍हें समय पर एवं बहुमूल्य कानूनी सलाह दी जा सके।

कानूनी विवादों का शुरू में ही पता लगाने, उनमें हस्तक्षेप करने और उनकी रोकथाम की सुविधा उपलब्‍ध के लिए विशेष तौर पर डिजाइन की गई टेली-लॉ सेवा सीएससी- ई जीओवी और एनएएलएसए द्वारा उपलब्‍ध कराए गए अग्रणी स्वयंसेवकों के एक कैडर जरिये समूहों और समुदायों तक पहुंचती है। ये जमीनी स्‍तर के योद्धा अपने क्षेत्र में गतिविधियों के दौरान आवेदकों के पंजीकरण और अपॉइंटमेंट के लिए एक मोबाइल एप्लिकेशन से लैस होते हैं। लाभार्थियों को निरंतर कानूनी सलाह एवं परामर्श प्रदान करने के लिए समर्पित वकीलों के एक समूह को तैनात किया गया है। समृद्ध आईईसी को उसके सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड किया गया है जिसे https://www.tele-law.in पर एक्सेस किया जा सकता है। वास्तविक समय में डेटा हासिल करने और प्रदान की गई सलाह की प्रकृति को देखने के लिए एक अलग डैशबोर्ड तैयार किया गया है। निकट भविष्य में जिला स्तर पर विस्‍तृत विवरण सुनिश्चित करने के लिए डेटा को पीएमओ प्रेयर्स पोर्टल पर भी डाला जा रहा है। 

देश के सभी जिलों को कवर करने की आकांक्षा और कानूनी सहायता श्रृंखला के तहत टेली-लॉ को एक अद्भुत स्तंभ के रूप में स्थापित करने के लिए न्याय विभाग तिमाही आधार पर इस प्रकार की परिवर्तनकारी एवं सशक्तिकरण वाली कहानियों का प्रकाशन जारी रखेगा।

'टेली-लॉ - रीचिंग द अनरिच्ड, वॉइसेज ऑफ द बेनिफिसिएरीज' पुस्तिका देखने के लिए यहां क्लिक करें

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