Friday, January 16, 2026

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2026 में फेस-टू-फेस और कहानी पठन

 संस्‍कृति मंत्रालय//Azadi Ka Amrit Mahotsav//प्रविष्टि तिथि: 16th January 2026 at 1:13PM by PIB Delhi Details:हिंदी स्क्रीन 

साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों ने किया साहित्य प्रेमियों को आकर्षित 


नई दिल्ली
: 16 जनवरी 2026: (पी आई बी//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

इस बार भी नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला  बहुत यादगारी बन रहा है।  बहुत से स्टाल लगे हैं। बहुत सी किताबें हैं। लाखों की संख्या में इन किताबों के चाहने वाले हैं। नया साहित्य एक बार फिर एक ही मंच पर बहुत निखार कर सामने आया है। साहित्य अकादमी ने 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 के दौरान हॉल नंबर 2, भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक फेस-टू-फेस कार्यक्रम और एक पैनल चर्चा का आयोजन किया। 

इस बहुत से आकर्षण रहे। इनमें एक है फेस टू फेस का आयोजन। फेस-टू-फेस कार्यक्रम में प्रख्यात मलयालम लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता श्री केपी रामानुन्नी ने भाग लिया और अपने साहित्यिक जीवन और कार्यों से जुड़े अनुभव साझा किए। 

उन्होंने बताया कि वे कोझिकोड शहर से हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा भारत का पहला और एकमात्र साहित्य नगर घोषित किया गया है[ सत्र के दौरान, उन्होंने अपनी मलयालम लघु कहानी 'एमटीपी' (गर्भाधान की चिकित्सा पद्धति) के कुछ अंश पढ़े, जिसका अंग्रेजी अनुवाद अबू बकर काबा ने किया है। 

नाटक के रूप में लिखी गई और सात भागों में विभाजित यह कहानी, लेखक के अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरित होकर, गर्भपात की चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़े गहन मानवीय नाटक का चित्रण करती है। अपने साहित्यिक सफर पर विचार करते हुए, श्री रामानुन्नी ने अपने प्रारंभिक वर्षों के बारे में बताया कि किशोरावस्था में वे एक साथ आध्यात्मिक और साम्यवादी साहित्य पढ़ रहे थे, जिससे उन्हें आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़ा और उन्होंने मनोचिकित्सक से परामर्श लिया[ हालांकि यह उपचार निरथर्क साबित हुआ, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें लेखन के माध्यम से सुकून और अभिव्यक्ति पाने के लिए प्रेरित किया। 

इस बार फेस-टू-फेस कार्यक्रम के बाद भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक पैनल चर्चा हुई, जिसमें प्रो. रवैल सिंह, प्रो. हरेकृष्ण सतपथी और प्रो. बसवराज कालगुडी ने भाग लिया[ श्री रवैल सिंह ने पंजाब की बौद्धिक विरासत पर चर्चा करते हुए तक्षशिला के प्राचीन शिक्षा केंद्र से लेकर नाथ योगी, सूफीवाद और सिख धर्म तक के इतिहास का वर्णन किया[ प्रो. हरेकृष्ण सतपथी ने प्राचीन और समकालीन शिक्षा प्रणालियों की तुलना करते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश को आदिगुरु बताया और वेदों का एक श्लोक सुनाया[ प्रो. बसवराज कालगुडी ने परिधीय ज्ञान प्रणालियों पर बात करते हुए, उन्हें मौखिक और लिखित परंपराओं में वर्गीकृत किया और प्राचीन भारत में जनजातीय और कृषि संबंधी ज्ञान परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला[

दोनों कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया, जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक और साहित्य प्रेमी शामिल थे, और इनमें सार्थक संवाद और चर्चा देखने को मिली[ साहित्य अकादमी की ओर से सहायक संपादक डॉ. संदीप कौर ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया। 

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Friday, November 28, 2025

मृत्युंजयी:भागवत झा ‘आज़ाद’ की महाकाव्य कृति का विमोचन

 प्रविष्टि तिथि: 28th November 2025 at 9:17 PM by PIB Delhi Regarding Book Release

"आज़ाद:एक सामाजिक चिंतक जो राजनीति से ऊपर उठे”–डॉ. सच्चिदानंद जोशी

भागवत झा की यात्रा:आंतरिक संघर्ष से संकल्प तक”–जनार्दन द्विवेदी


नई दिल्ली
: 28 नवंबर 2025: (PIB Delhi//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सुप्रसिद्ध लेखक और प्रखर राजनीतिक चिंतक भागवत झा ‘आज़ाद’ के सम्‍मान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित एक स्‍मरणीय अवसर पर उनके महाकाव्‍य ‘मृत्युंजयी’ का विमोचन किया गया और एक साहित्यिक चर्चा भी कार्यक्रम की अध्यक्षता राजनेता जनार्दन द्विवेदी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य–सचिव डॉ. सचिदानंद जोशी उपस्थित रहे। वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और आशुतोष ने भी अपने विचार साझा किए। स्वागत भाषण भागवत झा आज़ाद के ज्येष्ठ पुत्र राजवर्धन आज़ाद द्वारा दिया गया।

उस अवसर पर राजनीतिक नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि भागवत झा का जीवन आंतरिक संघर्ष से दृढ़ संकल्प तक की यात्रा था। उन्होंने आज़ाद के साथ बिताए कई व्यक्तिगत अनुभवों को भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि भागवत झा स्वतंत्रता सेनानियों की दूसरी पीढ़ी से थे, और वे उन्हें उसी पीढ़ी के एक प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। प्रारंभ से अंत तक वे एक ईमानदार और निष्कपट व्यक्ति बने रहे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यद्यपि उन्हें व्यक्तिगत रूप से भागवत झा आज़ाद से मिलने का अवसर कभी नहीं मिला, लेकिन धर्मयुग में उनके लेखन को पढ़ने का गहरा प्रभाव आज भी बना हुआ है। ऐसा हमेशा महसूस होता था कि राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी वे राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज की चिंताओं पर गहन मनन करते थे।

डॉ. जोशी ने आगे कहा कि उन्होंने लिखा है कि औपचारिक पदों और प्रचलित मार्गों से हटकर, जीवन के शांत और सरल पथों पर चलने का निर्णय स्वयं में एक गहन साधना है। विचारों की धारा भी आगे बढ़ती जाती है — उन नदियों की तरह जो एक-दूसरे में मिलकर विस्‍तृत होती जाती हैं, बिना सीमाओं के, बिना किसी अवरोध के। उनके लिए कविता केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि एक उपचार-प्रक्रिया थी जो भीतर की वेदना और संवेदनशीलता को शांत करती थी। यही कारण है कि यह कृति भी पाठक के मन पर वैसा ही शांत और पुनर्स्थापनकारी प्रभाव छोड़ती है।

आज़ाद जी के जीवन का सार मानो उनके ही शब्दों में सिमटा हुआ प्रतीत होता है — “मुझे सहारा मत दो, अवरोध दो; मैं अपना संसार स्वयं बना लूँगा। मैं भीख नहीं माँगता, मुझे स्वयं उठने दो।” ये पंक्तियाँ उनके संकल्प, आंतरिक शक्ति और अदम्य धैर्य की साक्षी हैं। यही कारण है कि इस कृति के दूसरे खंड में उनके जीवन के अनुभव, अपने क्षेत्र के प्रति वेदना, और उनकी आंतरिक दीप्ति अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रकट होते हैं।

पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि भागवत झा आज़ाद का व्यक्तित्व अत्यंत स्पष्टवादी, दृढ़-निश्‍चयी और अडिग था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतने ऊँचे कद के व्यक्तित्व के योगदानों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाना आवश्यक है। महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ के माध्यम से आज़ाद जी के बहुआयामी व्यक्तित्व को प्रभावशाली रूप से उजागर किया गया है। श्री मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि आज़ाद जी के भाषणों का संकलन एक अलग ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए, जिससे उनके विचार और विज़न सबके लिए सुलभ हो सकें।

इसके अतिरिक्त, मेहता ने आज़ाद जी की कुछ कविताएँ भी प्रस्तुत कीं, जिनमें पाखंड और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार किया गया है, साथ ही जातिवाद और साम्प्रदायिकता के विरुद्ध दृढ़ और अटूट संदेश भी निहित हैं। उन्होंने कहा कि इन पंक्तियों में केवल नैतिक साहस ही नहीं, बल्कि न्याय और सामाजिक सौहार्द के प्रति सतत् प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है — जो एक ऐसे दूरदर्शी विचारक की मूल भावना को अभिव्यक्त करती हैं, जिनकी रचनाएँ आज भी प्रेरणा देती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अशुतोष कुमार ने कहा कि भागवत झा आज़ाद को भारतीय दर्शन और बौद्ध धर्म का गहन ज्ञान था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यदि आज़ाद जी सक्रिय राजनीति में न होते, तो वे साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करते। यह पुस्तक बुद्ध की संपूर्ण दार्शनिक यात्रा और अष्टांगिक मार्ग का स्पष्ट और विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है। मानव मुक्ति के सिद्धांतों पर आज़ाद जी का गहन मनन रहा, और यही गंभीर चिंतन महाकाव्य मृत्युंजयी  में प्रारंभ से अंत तक पूरी तरह से प्रतिध्वनित होता है।

डॉ. सविता झा ने महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ से चयनित पंक्तियों का पाठ किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि भागवत झा आज़ाद सक्रिय राजनीति में थे, परंतु मूलतः वे एक साहित्यकार थे और अंत तक साहित्यकार बने रहे। साहित्य के माध्यम से उन्होंने राजनीति से संवाद किया और अपने लेखन द्वारा राजनीतिक विमर्श को निरंतर समृद्ध किया। समारोह में अतिथियों का स्वागत भागवत झा आज़ाद के तीनों पुत्रों — डॉ. राजवर्धन आज़ाद, आईपीएस (सेवानिवृत्त) यशोवर्धन, और क्रिकेटर एवं सांसद कीर्तिवर्धन आज़ाद — ने किया।

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Friday, September 26, 2025

28 सितंबर को प्रीत साहित्य सदन का एक और आयोजन

दो साहित्यिक पुस्तकों का होगा विमोचन 

लुधियाना: 26 सितंबर 2025: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::


हिंदी में साहित्य साधना लगातार जारी है।
हिंदी में लिखने वाले लगातार इस दिशा में सक्रिय हैं। एक और पुस्तक-परिचर्चा  एवं क्षकाव्य-संध्या  28 सितंबर को लुधियाना के समराला चौंक में हो रही है। लुधियाना के समरल चौंक क्षेत्र में एक पूरी टीम हिंदी और साहित्य के लिए सक्रिय रहती है। इस बार 28  सितंबर को भी प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना में एक पुस्तक का विमोचन कर रही है। इस सदन से जुड़े लोग अक्सर ही कुछ न कुछ करते रहते हैं जिसका साहित्य के क्षेत्र में बहुत अर्थ होता है। 

इस बार के आयोजन में भी पुस्तकों का विमोचन हो रहा है जिसका नाम है: मेरी-तेरी कहानी (लघुकथा-संग्रह)  इसकी रचनाकार हैं डॉ. विभा कुमरिया शर्मा। 

एक अन्य पुस्तक है: पिताजी का व्हाट्सएप  यह कविता-संग्रह। इस पुस्तक की रचनाकार हैं-सपना।  इस मौके पर  मुख्य-अतिथि डॉ. इरादीप होंगीं और कार्यक्रम की अध्यक्ष: डॉ. पूनम सपरा रहेंगी।  

तारीख और समय एक बार फिर बता दें 28 सितंबर 2025 को बाद दोपहर 03:00 से...शुरू। 

हिन्दी लेखक संघ पंजाब का सहयोग भी रहेगा और अन्य संगठन भी आएँगे। प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना आपके में आपकी इंतज़ार में रहेगा ही. वहां बहुत से और भी साहित्य सद्धक होंगें जिनसे आप मिल पाएंगे। 

Wednesday, September 17, 2025

पीजीजीसी, सेक्टर 11, चंडीगढ़ में ग्रैंड सेमिनार का सफल आयोजन

Got from Iqbalsinghchd79 on Wednesday 17th September at 21:08

नवाचार, उद्यमिता और करियर विकास पर हुई सार्थक चर्चा 


चंडीगढ़:17 सितंबर 2025: (हिंदी स्क्रीन//सोशल मीडिया डेस्क)::

पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज (को-शैक्षिक), सेक्टर 11, चंडीगढ़ के इंस्टीट्यूशनल इनोवेशन काउंसिल (आईआईसी) ने एनजीओ करियर इंडिया के सहयोग से नवाचार, उद्यमिता और करियर विकास पर एक ग्रैंड सेमिनार का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में 700 से अधिक छात्रों ने भाग लिया, जिसमें फैकल्टी और स्टाफ भी शामिल थे।

सेमिनार के मुख्य बिंदु:

- डॉ. सचिन गोयल ने स्टार्ट-अप कल्चर, विचार निर्माण, डिज़ाइन थिंकिंग, SWOT विश्लेषण और करियर पहचान पर अपने सत्र से छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

- डॉ. संगीता ने अपनी प्रेरणादायक कविताओं से छात्रों में सकारात्मकता और उत्साह भरा।

- प्रिंसिपल डॉ. जे. के. सहगल ने आईआईसी टीम की सराहना की और आज के शैक्षिक माहौल में नवाचार और रचनात्मकता के महत्व पर जोर दिया।

- बलबीर सर ने उद्यमिता और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट पर मूल्यवान सुझाव दिए और छात्रों को पारंपरिक करियर पथ से परे सोचने के लिए प्रोत्साहित किया।

सेमिनार का निष्कर्ष:

इस कार्यक्रम ने नवाचार, आत्मविश्वास और करियर उन्मुख विकास का एक मजबूत संदेश दिया, जो पीजीजीसी, सेक्टर 11, चंडीगढ़ की गतिशील नवाचार और उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने की दिशा में एक और मील का पत्थर है।

संदेश:

डॉ. जे. के. सहगल

प्रिंसिपल

पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज (को-शैक्षिक)

सेक्टर 11, चंडीगढ़

*Iqbal Singh-+91 79869 75846

Sunday, September 14, 2025

हिन्दी दिवस पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह का संदेश

 गृह मंत्रालय//Azadi Ka Amrit Mahotsav//प्रविष्टि तिथि: 14 SEP 2025 9:50 AM by PIB Delhi

मिलकर चलो, मिलकर सोचो, मिलकर बोलो........

*प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड चल रहा है

*हिंदी दिवस पर केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएं तकनीक, विज्ञान, न्याय, शिक्षा और प्रशासन की धुरी बनें

*मिलकर चलो, मिलकर सोचो, मिलकर बोलो, यही हमारी भाषाई सांस्कृतिक चेतना का मूल मंत्र रहा है

*डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस युग में मोदी सरकार भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सक्षम बना रही है

नई दिल्ली: 14 सितंबर 2025:(PIB Delhi//हिंदी स्क्रीन)::

प्रिय देशवासियों,

आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

अपना भारत मूलतः भाषा-प्रधान देश है। हमारी भाषाएँ सदियों से संस्कृति, इतिहास, परंपराओं, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने की सशक्त माध्यम रही हैं। हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर दक्षिण के विशाल समुद्र तटों तक, मरुभूमि से लेकर बीहड़ जंगलों और गाँव की चौपालों तक, भाषाओं ने हर परिस्थिति में मनुष्य को संवाद और अभिव्यक्ति के माध्यम से संगठित रहने और एकजुट होकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया है।

मिलकर चलो, मिलकर सोचो और मिलकर बोलो, यही हमारी भाषाई-सांस्कृतिक चेतना का मूल मंत्र रहा  है।

भारत की भाषाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने हर वर्ग और समुदाय को अभिव्यक्ति का अवसर दिया। पूर्वोत्तर में बीहू का गान, तमिलनाडु में ओवियालू की आवाज, पंजाब में लोहड़ी के गीत, बिहार में विद्यापति की पदावली, बंगाल में बाउल संत के भजन, कजरी गीत, भिखारी ठाकुर की ‘बिदेशिया’, इन सबने हमारी संस्कृति को जीवन्त और लोककल्याणकारी बनाया है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि भाषाएँ एक दूसरे की सहचर बनकर, एकता के सूत्र में बंधकर आगे बढ़ रही हैं। संत तिरुवल्लुवर को जितनी भावुकता से दक्षिण में गाया जाता है, उतनी ही रुचि से उत्तर में पढ़ा जाता है। कृष्णदेवराय जितने लोकप्रिय दक्षिण में हुए, उतने ही उत्तर में भी हुए। सुब्रमण्यम भारती की राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत रचनाएँ हर क्षेत्र के युवाओं में राष्ट्रप्रेम को प्रबल बनाती है। गोस्वामी तुलसीदास को हर एक देशवासी पूजता है, संत कबीर के दोहे तमिल, कन्नड़ और मलयालम अनुवादों में भी पाए जाते हैं। सूरदास की पदावली दक्षिण भारत के मंदिरों और संगीत परंपराओं में आज भी प्रचलित है। श्रीमंत शंकरदेव, महापुरुष माधवदेव को हर एक वैष्णव जानता है। और, भूपेन हजारिका को हरियाणा का युवा भी गुनगुनाता है।

गुलामी के कठिन दौर में भी भारतीय भाषाएँ प्रतिरोध की आवाज बनीं। आजादी के आंदोलन के राष्ट्रव्यापी बनने में हमारी भाषाओं की बड़ी भूमिका रही। हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने जनपदों की भाषाओं में, ग्राम-देहात की भाषाओं को आजादी के आंदोलन से जोड़ा। हिंदी के साथ ही सभी भारतीय भाषाओं के कवियों, साहित्यकारों और नाट्यकारों ने लोकभाषाओं में, लोककथाओं में, लोकगीतों और लोकनाटकों के माध्यम से हर आयु, वर्ग और समाज के भीतर स्वाधीनता के संकल्प को प्रबल बनाया। वन्दे मातरम् और जय हिंद जैसे नारे हमारी भाषाई चेतना से ही उपजे और स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान के प्रतीक बने।

जब देश आजाद हुआ, तब हमारे संविधान निर्माताओं ने भाषाओं की क्षमता और महत्ता को देखते हुए इस पर विस्तार से विचार-विमर्श किया और 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया। संविधान के अनुच्छेद 351 में यह दायित्व सौंपा गया है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार हो और वह भारत की सामासिक संस्कृति का प्रभावी माध्यम बने।

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम कालखंड आया है। चाहे संयुक्त राष्ट्रसंघ का मंच हो,

चाहे जी-20 का सम्मेलन हो, SCO में संबोधन हो, मोदी जी ने हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद कर भारतीय भाषाओं का स्वाभिमान बढाया है।

मोदी जी ने आजादी के अमृत काल में गुलामी के प्रतीकों से देश को मुक्त करने के लिए जो पंच प्रण लिए थे, उसमें भाषाओं की बड़ी भूमिका है। हमें अपनी संवाद और आपसी संपर्क भाषा के रूप में भारतीय भाषा को अपनाना चाहिए।

राजभाषा हिंदी ने 76 गौरवशाली वर्ष पूरे किए हैं। राजभाषा विभाग ने अपनी स्थापना के स्वर्णिम 50 वर्ष पूर्ण कर हिंदी को जनभाषा और जनचेतना की भाषा बनाने का अद्भुत कार्य किया है।

2014 के बाद से सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को निरंतर बढ़ावा दिया गया है। 2024 में हिंदी दिवस पर ‘भारतीय भाषा अनुभाग’ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के बीच सहज अनुवाद सुनिश्चित करना है। हमारा लक्ष्य यह है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम न रहकर तकनीक, विज्ञान, न्याय, शिक्षा और प्रशासन की धुरी बनें। डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के इस युग में हम भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सक्षम, प्रासंगिक और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत को अग्रणी बनाने वाली शक्ति के रूप में विकसित कर रहे हैं।

मित्रों, भाषा सावन की उस बूँद की तरह है, जो मन के दुःख और अवसाद को धोकर नई उर्जा और जीवन शक्ति देती है। बच्चों की कल्पना से गढ़ी गई अनोखी कहानियों से लेकर दादी-नानी की लोरियों और किस्सों तक, भारतीय भाषाओं ने हमेशा समाज को जिजीविषा और आत्मबल का मंत्र दिया है।

मिथिला के कवि विद्यापति जी ने ठीक ही कहा:

“देसिल बयना सब जन मिट्ठा।”

अर्थात् अपनी भाषा सबसे मधुर होती है।

आइए, हिंदी दिवस के इस अवसर पर हम हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करने और उन्हें साथ लेकर आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी तथा विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ें।

आप सभी को एक बार फिर से हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। वंदे मातरम्।

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आरके / वीवी / आरआर / पीआर//(रिलीज़ आईडी: 2166448)

Sunday, August 17, 2025

लेखक एवं पत्रकार मित्र आकाश माथुर सम्मानित

Received from Neelima Sharma on 17th August 2025 at 11:11 Regarding Writer Akash Mathur

“मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया

नई दिल्ली: 17 दिसंबर 2025: (नीलिमा शर्मा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखक एवं पत्रकार, मित्र आकाश माथुर जी को हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में उनके शानदार उपन्यास “मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया। 

साथ ही, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार-2025 के लिए निर्णायक मंडल ने उनके उपन्यास उमेदा-एक योद्धा नर्तकी को चुना है।

इस अवसर पर आकाश जी को ढेर सारी शुभकामनाएँ एवं बधाई। हम परम पिता परमेश्वर से आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। आमतौर पर जो सम्मान एक लेखक को बड़ी उम्र में मिलते हैं, वे आपको युवावस्था में ही मिल रहे हैं, जो दर्शाता है कि आप माँ सरस्वती के कितने चहेते पुत्र हैं। हमें विश्वास है कि आप इसी तरह उम्दा कहानियाँ और रोमांचक उपन्यास लिखते रहेंगे और अपने शहर व परिवार का नाम रोशन करते रहेंगे।

Friday, July 25, 2025

कमेंट काव्य के चलते एक नया प्रयोग

हिमांशु कुमार जी ने रमाशंकर विद्रोही जी की बहुत अच्छी रचना पोस्ट की है

यह है वो काव्य पोस्ट -जिसे लिखा है जनाब रमाशंकर विद्रोही साहिब ने और सोशल मीडिया पर शेयर किया हैं जानेमाने समाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार साहिब ने जो जनजागृति के मकसद से अक्सर कुछ न कुछ पोस्ट करते ही रहते हैं। उनके विचारों से अलगाव भी हो सकता है लेकिन फिर भी उनके विचार दिलचस्प तो होते ही हैं। जब उन्होंने विद्रोही साहिब की रचना पोस्ट की तो सोचा बहुत सी गहरी बातें कह रहे हैं। यूं लग रहा था जैसे भारत एक खोज को दुबारा पढ़ने का सौभाग्य मिला है। जब इस पर कमेंट करने का प्रयास किया तो बात कुछ ज़्यादा ही लंबी होती चली गई। इसके बावजूद इसे पोस्ट कर दिया। पोस्ट करते करते मन में आया इस टिप्पणो को इस रचना पर पोस्ट करने के साथ साथ ब्लॉग पर भी सहेज लिया जाए। सो यहाँ भी प्रस्तुत है। आपको यह टिप्पणी काव्य का यह प्रयोग कैसा लगा अवश्य बताएं।


इस कमाल की कविता को कविता मत कहो प्लीज़ - --!

यह तो एक नावल है शायद - --!

नहीं - -नहीं - -यह नावल भी नहीं है . ..!

यह तो एक सच्ची दास्तान है शायद- --!

नहीं --नहीं - -कोई एक सच्ची दास्ताँ भी नहीं यही तो कई दास्तानों का संकलन जैसा है . .!

नहीं यह ऐसा भी नहीं - --!

यह तो किसी ख़ास दस्तावेज़ी फिल्म जैसा है - --!

यह किसी अतीत को दर्शा रही है शायद - -----!

अरे नहीं - --!

यह अतीत को ही नहीं उससे पहले के दौर को भी दिखा रही है - ---!

उस दौर को भी जब कुछ भी नहीं था . ..!

मुझे इसमें भी भारत एक खोज की हलकी हलकी गूँज सुनाई दे रही है . ..!

मुझे महाभारत का समय भी महसूस हो रहा है . ...!

वह भी कह रहा है - .. ..!

हां. ..मैं समय हूँ . ...!

निरन्तर घूम रहा हूँ . ..!

मुझे अशोक चक्र कहो या कुछ और , ,,!

मैं वास्तव में समय का चक्र हूँ . ... !

घूम घूम कर भी---कहीं पहुँचता नहीं हूँ . ..!

शायद कोहलू के बैल का पहिया हूँ . ..!

हार हार कर भी हारता नहीं हूँ . ..!

अशोक तो जीत कर भी हार गया था . ..!

लेकिन मुझे मानने वाले हारते कहाँ हैं . ..!

मैं जीतूंगा भी किसी दिन - --!

मैं पहुंचूंगा भी कहीं पर . ..!

बहुत से विजयी लोगों के रहस्य मेरे पास हैं . ..!

बहुत से हारने वाले लोगों के आंसुओं की बाढ़ मेरे पास है . ..!

जितनी स्त्रियों के शव गुमनाम से पड़े हैं - -!

उन्हें भी ले कर आऊंगा ..!

उनकी अग्नि से बहुत से नए वीर उठेंगे....!

वे पितृसत्ता से भी अपने अपने वध का बदला लेंगें ..!

हर हत्यारे को देखा जाएगा ...!

न्याय होगा ही होगा...!

जितनी हड्डियां बिखरी पड़ी हैं . ...!

उनमें बहुत सी हड्डियां

बहुत सी अस्थियां महाऋषि दधीचि की भी हैं . ........!

दधीचि एक ही तो नहीं हुए . ...!

वैसे वह उनका बलिदान था या वध था या छल था--?

वह कई बार राजाओं के लिए वज्र बनाने के काम आया ...!

इस बार एक नहीं बहुत से वज्र बनेंगे ...!

लेकिन यह नए वज्र किसी राजा के लिए नहीं

प्रजा की सेना के लिए भी बनेंगे........!

देखना स्त्रियों के शव

कैसे संजीवनी बन कर उठेंगे..!

देखना!

इन स्त्रिओं के शव गंगा की लहरें बन कर उठेंगे..!

दुनिया के कोने कोने से आ रही हैं

बदलाहट की आवाज़ें ..!

मैंने देखा

बहुत से चेग्वेएरा नए जन्म की तैयारी कर चुके हैं . ..!

इन गुज़रे वक़्तों के

तथाकथित नायक और नायकाएँ भी

इनकी हकीकत जान चुकी हैं सब . ..!

अब कहानियां नए सिरे से लिखी जाएंगी ...!

पुराना तो अब

खुद ही अपनी बर्बादियीं की आंधी से मिट रहा है . ..!

यह है वो काव्य पोस्ट - -