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Wednesday, March 18, 2026

बलिदान मेरा पल पल जीवन.........प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

Pranendra Nath Misra on Friday 13th March 2026 at 22:35 Regarding Men Community

एक पुरुष हूं मैं........!


ना छंद किसी की कविता का

आनंद नहीं किसी गीत का मैं,

नहीं लचक किसी भी ग़ज़ल का हूं

नहीं सरगम हूं, संगीत का मैं।


पाषाण सदृश, मैं रूपहीन

मरुभूमि कणों सा शुष्क हूं मैं

पुरुषार्थ हूं मैं इस धरती का

वर्णना हीन, एक पुरुष हूं मैं।


स्वर और व्यंजन से सजे हुए

शब्दों में मेरा लालित्य नहीं

मैं प्रभा, रश्मि रचनाओं का

हूं जनक, मगर आदित्य नहीं।


जाने क्यों कवि, कवियत्री की

लेखनी नहीं चलती मुझ पर,

कल्पनातीत चिंता धारा

पुरुषों से विमुख, बहती निर्झर।


मैं पिता,  सृष्टि आधार हूं मैं

बलिदान मेरा पल पल जीवन

हर व्यथा, मृदुल मुख सह जाता

कितना भी करुण हो अंतर्मन!


है नहीं, मायका कोई मेरा 

न ही ऐसा कोई आँगन है 

जिस जगह मैं लौटूँ निःसंकोच 

न ही पीहर का कोई प्रांगण है। 


मन भारी हो तो, कहाँ जाऊँ 

नहीं गोद जहां मैं सिसक सकूँ 

दीवार नहीं ऐसी है कोई 

आँसू को बहाकर लिपट सकूँ 


माना कोई कोख नहीं मेरी 

संवेदना मेरी पर, कम तो नहीं 

पुरुषार्थ कवच से ढकी हुई 

मेरे मन की वेदना शम तो नहीं


मैं पुरुष हूँ रोना है निषिद्ध 

मैं अंतर्मन में रोता हूँ 

मेरे भी आँसू उष्ण, द्रवित 

मैं अंतर्मन को भिगोता हूँ   


संवेदना भरी आकंठ करुण

आंसू रुकते बन वाष्परुद्ध

पथरायी आंख देखती है

भीतर आवेशित हृदय क्षुब्ध।


अंतरज्वाला में धधक धधक

आंसू, वाष्पित कर देता हूँ ,

आवेग की सीमा बंधी हुई

"निष्ठुर" संज्ञा, सह लेता हूँ 


मन की अनुभूति न कह पाया

अपना ही कष्ट न रोया कभी

जब हृदय विदीर्ण हुआ खंडित

तब कई रात, नहीं सोया कभी।


मन का आवेग मचलता है

वेदना मेरी पर, निर्जन है

करता हूं समय का आलिंगन

मेरे मन में तन, तन में मन है।


कभी हृदयग्रंथ जब पढ़ता हूं

अध्याय विषम मिलते है कई

मैं पुरुष, सांत्वना मिलती फिर

आरंभ नया दिन, रात नई।

             ,,,,प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

Friday, January 16, 2026

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2026 में फेस-टू-फेस और कहानी पठन

 संस्‍कृति मंत्रालय//Azadi Ka Amrit Mahotsav//प्रविष्टि तिथि: 16th January 2026 at 1:13PM by PIB Delhi Details:हिंदी स्क्रीन 

साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों ने किया साहित्य प्रेमियों को आकर्षित 


नई दिल्ली
: 16 जनवरी 2026: (पी आई बी//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

इस बार भी नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला  बहुत यादगारी बन रहा है।  बहुत से स्टाल लगे हैं। बहुत सी किताबें हैं। लाखों की संख्या में इन किताबों के चाहने वाले हैं। नया साहित्य एक बार फिर एक ही मंच पर बहुत निखार कर सामने आया है। साहित्य अकादमी ने 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 के दौरान हॉल नंबर 2, भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक फेस-टू-फेस कार्यक्रम और एक पैनल चर्चा का आयोजन किया। 

इस बहुत से आकर्षण रहे। इनमें एक है फेस टू फेस का आयोजन। फेस-टू-फेस कार्यक्रम में प्रख्यात मलयालम लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता श्री केपी रामानुन्नी ने भाग लिया और अपने साहित्यिक जीवन और कार्यों से जुड़े अनुभव साझा किए। 

उन्होंने बताया कि वे कोझिकोड शहर से हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा भारत का पहला और एकमात्र साहित्य नगर घोषित किया गया है[ सत्र के दौरान, उन्होंने अपनी मलयालम लघु कहानी 'एमटीपी' (गर्भाधान की चिकित्सा पद्धति) के कुछ अंश पढ़े, जिसका अंग्रेजी अनुवाद अबू बकर काबा ने किया है। 

नाटक के रूप में लिखी गई और सात भागों में विभाजित यह कहानी, लेखक के अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरित होकर, गर्भपात की चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़े गहन मानवीय नाटक का चित्रण करती है। अपने साहित्यिक सफर पर विचार करते हुए, श्री रामानुन्नी ने अपने प्रारंभिक वर्षों के बारे में बताया कि किशोरावस्था में वे एक साथ आध्यात्मिक और साम्यवादी साहित्य पढ़ रहे थे, जिससे उन्हें आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़ा और उन्होंने मनोचिकित्सक से परामर्श लिया[ हालांकि यह उपचार निरथर्क साबित हुआ, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें लेखन के माध्यम से सुकून और अभिव्यक्ति पाने के लिए प्रेरित किया। 

इस बार फेस-टू-फेस कार्यक्रम के बाद भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक पैनल चर्चा हुई, जिसमें प्रो. रवैल सिंह, प्रो. हरेकृष्ण सतपथी और प्रो. बसवराज कालगुडी ने भाग लिया[ श्री रवैल सिंह ने पंजाब की बौद्धिक विरासत पर चर्चा करते हुए तक्षशिला के प्राचीन शिक्षा केंद्र से लेकर नाथ योगी, सूफीवाद और सिख धर्म तक के इतिहास का वर्णन किया[ प्रो. हरेकृष्ण सतपथी ने प्राचीन और समकालीन शिक्षा प्रणालियों की तुलना करते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश को आदिगुरु बताया और वेदों का एक श्लोक सुनाया[ प्रो. बसवराज कालगुडी ने परिधीय ज्ञान प्रणालियों पर बात करते हुए, उन्हें मौखिक और लिखित परंपराओं में वर्गीकृत किया और प्राचीन भारत में जनजातीय और कृषि संबंधी ज्ञान परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला[

दोनों कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया, जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक और साहित्य प्रेमी शामिल थे, और इनमें सार्थक संवाद और चर्चा देखने को मिली[ साहित्य अकादमी की ओर से सहायक संपादक डॉ. संदीप कौर ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया। 

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Friday, November 28, 2025

मृत्युंजयी:भागवत झा ‘आज़ाद’ की महाकाव्य कृति का विमोचन

 प्रविष्टि तिथि: 28th November 2025 at 9:17 PM by PIB Delhi Regarding Book Release

"आज़ाद:एक सामाजिक चिंतक जो राजनीति से ऊपर उठे”–डॉ. सच्चिदानंद जोशी

भागवत झा की यात्रा:आंतरिक संघर्ष से संकल्प तक”–जनार्दन द्विवेदी


नई दिल्ली
: 28 नवंबर 2025: (PIB Delhi//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सुप्रसिद्ध लेखक और प्रखर राजनीतिक चिंतक भागवत झा ‘आज़ाद’ के सम्‍मान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित एक स्‍मरणीय अवसर पर उनके महाकाव्‍य ‘मृत्युंजयी’ का विमोचन किया गया और एक साहित्यिक चर्चा भी कार्यक्रम की अध्यक्षता राजनेता जनार्दन द्विवेदी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य–सचिव डॉ. सचिदानंद जोशी उपस्थित रहे। वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और आशुतोष ने भी अपने विचार साझा किए। स्वागत भाषण भागवत झा आज़ाद के ज्येष्ठ पुत्र राजवर्धन आज़ाद द्वारा दिया गया।

उस अवसर पर राजनीतिक नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि भागवत झा का जीवन आंतरिक संघर्ष से दृढ़ संकल्प तक की यात्रा था। उन्होंने आज़ाद के साथ बिताए कई व्यक्तिगत अनुभवों को भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि भागवत झा स्वतंत्रता सेनानियों की दूसरी पीढ़ी से थे, और वे उन्हें उसी पीढ़ी के एक प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। प्रारंभ से अंत तक वे एक ईमानदार और निष्कपट व्यक्ति बने रहे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यद्यपि उन्हें व्यक्तिगत रूप से भागवत झा आज़ाद से मिलने का अवसर कभी नहीं मिला, लेकिन धर्मयुग में उनके लेखन को पढ़ने का गहरा प्रभाव आज भी बना हुआ है। ऐसा हमेशा महसूस होता था कि राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी वे राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज की चिंताओं पर गहन मनन करते थे।

डॉ. जोशी ने आगे कहा कि उन्होंने लिखा है कि औपचारिक पदों और प्रचलित मार्गों से हटकर, जीवन के शांत और सरल पथों पर चलने का निर्णय स्वयं में एक गहन साधना है। विचारों की धारा भी आगे बढ़ती जाती है — उन नदियों की तरह जो एक-दूसरे में मिलकर विस्‍तृत होती जाती हैं, बिना सीमाओं के, बिना किसी अवरोध के। उनके लिए कविता केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि एक उपचार-प्रक्रिया थी जो भीतर की वेदना और संवेदनशीलता को शांत करती थी। यही कारण है कि यह कृति भी पाठक के मन पर वैसा ही शांत और पुनर्स्थापनकारी प्रभाव छोड़ती है।

आज़ाद जी के जीवन का सार मानो उनके ही शब्दों में सिमटा हुआ प्रतीत होता है — “मुझे सहारा मत दो, अवरोध दो; मैं अपना संसार स्वयं बना लूँगा। मैं भीख नहीं माँगता, मुझे स्वयं उठने दो।” ये पंक्तियाँ उनके संकल्प, आंतरिक शक्ति और अदम्य धैर्य की साक्षी हैं। यही कारण है कि इस कृति के दूसरे खंड में उनके जीवन के अनुभव, अपने क्षेत्र के प्रति वेदना, और उनकी आंतरिक दीप्ति अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रकट होते हैं।

पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि भागवत झा आज़ाद का व्यक्तित्व अत्यंत स्पष्टवादी, दृढ़-निश्‍चयी और अडिग था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतने ऊँचे कद के व्यक्तित्व के योगदानों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाना आवश्यक है। महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ के माध्यम से आज़ाद जी के बहुआयामी व्यक्तित्व को प्रभावशाली रूप से उजागर किया गया है। श्री मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि आज़ाद जी के भाषणों का संकलन एक अलग ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए, जिससे उनके विचार और विज़न सबके लिए सुलभ हो सकें।

इसके अतिरिक्त, मेहता ने आज़ाद जी की कुछ कविताएँ भी प्रस्तुत कीं, जिनमें पाखंड और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार किया गया है, साथ ही जातिवाद और साम्प्रदायिकता के विरुद्ध दृढ़ और अटूट संदेश भी निहित हैं। उन्होंने कहा कि इन पंक्तियों में केवल नैतिक साहस ही नहीं, बल्कि न्याय और सामाजिक सौहार्द के प्रति सतत् प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है — जो एक ऐसे दूरदर्शी विचारक की मूल भावना को अभिव्यक्त करती हैं, जिनकी रचनाएँ आज भी प्रेरणा देती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अशुतोष कुमार ने कहा कि भागवत झा आज़ाद को भारतीय दर्शन और बौद्ध धर्म का गहन ज्ञान था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यदि आज़ाद जी सक्रिय राजनीति में न होते, तो वे साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करते। यह पुस्तक बुद्ध की संपूर्ण दार्शनिक यात्रा और अष्टांगिक मार्ग का स्पष्ट और विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है। मानव मुक्ति के सिद्धांतों पर आज़ाद जी का गहन मनन रहा, और यही गंभीर चिंतन महाकाव्य मृत्युंजयी  में प्रारंभ से अंत तक पूरी तरह से प्रतिध्वनित होता है।

डॉ. सविता झा ने महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ से चयनित पंक्तियों का पाठ किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि भागवत झा आज़ाद सक्रिय राजनीति में थे, परंतु मूलतः वे एक साहित्यकार थे और अंत तक साहित्यकार बने रहे। साहित्य के माध्यम से उन्होंने राजनीति से संवाद किया और अपने लेखन द्वारा राजनीतिक विमर्श को निरंतर समृद्ध किया। समारोह में अतिथियों का स्वागत भागवत झा आज़ाद के तीनों पुत्रों — डॉ. राजवर्धन आज़ाद, आईपीएस (सेवानिवृत्त) यशोवर्धन, और क्रिकेटर एवं सांसद कीर्तिवर्धन आज़ाद — ने किया।

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Friday, September 26, 2025

28 सितंबर को प्रीत साहित्य सदन का एक और आयोजन

दो साहित्यिक पुस्तकों का होगा विमोचन 

लुधियाना: 26 सितंबर 2025: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::


हिंदी में साहित्य साधना लगातार जारी है।
हिंदी में लिखने वाले लगातार इस दिशा में सक्रिय हैं। एक और पुस्तक-परिचर्चा  एवं क्षकाव्य-संध्या  28 सितंबर को लुधियाना के समराला चौंक में हो रही है। लुधियाना के समरल चौंक क्षेत्र में एक पूरी टीम हिंदी और साहित्य के लिए सक्रिय रहती है। इस बार 28  सितंबर को भी प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना में एक पुस्तक का विमोचन कर रही है। इस सदन से जुड़े लोग अक्सर ही कुछ न कुछ करते रहते हैं जिसका साहित्य के क्षेत्र में बहुत अर्थ होता है। 

इस बार के आयोजन में भी पुस्तकों का विमोचन हो रहा है जिसका नाम है: मेरी-तेरी कहानी (लघुकथा-संग्रह)  इसकी रचनाकार हैं डॉ. विभा कुमरिया शर्मा। 

एक अन्य पुस्तक है: पिताजी का व्हाट्सएप  यह कविता-संग्रह। इस पुस्तक की रचनाकार हैं-सपना।  इस मौके पर  मुख्य-अतिथि डॉ. इरादीप होंगीं और कार्यक्रम की अध्यक्ष: डॉ. पूनम सपरा रहेंगी।  

तारीख और समय एक बार फिर बता दें 28 सितंबर 2025 को बाद दोपहर 03:00 से...शुरू। 

हिन्दी लेखक संघ पंजाब का सहयोग भी रहेगा और अन्य संगठन भी आएँगे। प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना आपके में आपकी इंतज़ार में रहेगा ही. वहां बहुत से और भी साहित्य सद्धक होंगें जिनसे आप मिल पाएंगे। 

Sunday, August 17, 2025

लेखक एवं पत्रकार मित्र आकाश माथुर सम्मानित

Received from Neelima Sharma on 17th August 2025 at 11:11 Regarding Writer Akash Mathur

“मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया

नई दिल्ली: 17 दिसंबर 2025: (नीलिमा शर्मा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखक एवं पत्रकार, मित्र आकाश माथुर जी को हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिल्ली में आयोजित सम्मान समारोह में उनके शानदार उपन्यास “मुझे सूरज चाहिए" के लिए रामदरश मिश्र न्यास के रामदरश मिश्र शताब्दी सम्मान से  किया गया। 

साथ ही, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार-2025 के लिए निर्णायक मंडल ने उनके उपन्यास उमेदा-एक योद्धा नर्तकी को चुना है।

इस अवसर पर आकाश जी को ढेर सारी शुभकामनाएँ एवं बधाई। हम परम पिता परमेश्वर से आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। आमतौर पर जो सम्मान एक लेखक को बड़ी उम्र में मिलते हैं, वे आपको युवावस्था में ही मिल रहे हैं, जो दर्शाता है कि आप माँ सरस्वती के कितने चहेते पुत्र हैं। हमें विश्वास है कि आप इसी तरह उम्दा कहानियाँ और रोमांचक उपन्यास लिखते रहेंगे और अपने शहर व परिवार का नाम रोशन करते रहेंगे।

Saturday, July 19, 2025

लगातार डटे हुए हैं हरनाम सिंह डल्ला अपनी टीम के साथ

 19th July 2025 at 18:15 Via WhatsApp From H S Dalla Regarding Behrampur Bet

संदेश है:  तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा .......!


खरड़
/ /बहरामपुर बेट: 19 जुलाई 2025: (मीडिया लिंक रविंद्र/ /हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

पहली जनवरी 1959 को एक फिल्म रिलीज़ हुई थी "धूल का फूल"इस फिल्म की कहानी उसी समाजिक समस्या पर आधारित थी जिसे आजकल उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता। अवैध संतान कुछ दशक पूर्व एक बहुत बड़ी समस्या हुआ करती थी। इसी विषय पर निर्माता बी आर चोपड़ा ने एक गज़ब की फिल्म बनाई थी जिसे निर्देशित किया गठा उन्हीं के भाई यश चोपड़ा ने। इसका एक दोगाना बहुत हिट हुआ था . .तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ...! जानेमाने कलाकार राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा पर फिल्माए गए इस गीत की लोकेशन दिखाई गई है एक कालेज का वार्षिक आयोजन। इस दोगाने के सवाल-जवाब/ /अन्तरे बहुत अर्थपूर्ण थे जिन्हें बहुत पसंद किया गया। बाकी गीत भी बहुत पसंद किए गए लेकिन इस गीत का तो जवाब ही नहीं था। लगातार दते हुए हैं हरनाम सिंह डल्ला 

इन गीतों को आवाज़ दी थी सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और सुरों के जादूगर मोहम्मद रफ़ी साहिब ने। गीत लिखे थे साहिर लुधियानवी साहिब ने। उनके लिखे गीत समाज के लिए एक विशेष संदेश भी छोड़ा करते गठे। इस फिल्म के गीतों में भी उन्होंने अपना संकल्प निभाया। इसी फिल्म के गीतों में एक गीत था-तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है

तुझ को किसी मज़हब से कोई काम नहीं है

जिस इल्म ने इंसानों को तक़्सीम किया है

इस इल्म का तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं है

तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया

हम ने इसे हिन्दू या मुसलमान बनाया

क़ुदरत ने तो बख़्शी थी हमें एक ही धरती

हम ने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया

जो तोड़ दे हर बंद वो तूफ़ान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

नफ़रत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है

इंसाँ को जो रौंदे वो क़दम तेरा नहीं है

क़ुरआन न हो जिस में वो मंदिर नहीं तेरा

गीता न हो जिस में वो हरम तेरा नहीं है

तू अम्न का और सुल्ह का अरमान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। 

इस गीत को सुन कर, इस गीत को पढ़ कर एक बारगी तो मज़हबी कटड़ता और धार्मिक उन्माद से नफरत होने लगती। बहुत से सवाल मन में उठने लगते। कुछ लोगों को यह गीत कम्युनिज़्म का संदेश फैलाता भी महसूस हुआ क्यूंकि साहिर लुधियानवी विचारों के तौर पर वामपंथी के तौर पर ही जाने जाते थे। उनकी नज़्म/गीत ताजमहल हो या फिर वो सुबह कभी तो आएगी - --उनका संदेश इसी विचारधारा का संदेश फैलाता ही लगता रहा। 

खैर दशकों गुज़र गए लेकिन आज भी इन गीतों का जादू कम नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि आज भी कभी शिक्षा नीति को लेकर विवाद होता हौर कभी धर्म को लेकर। इन विवादों के बावजूद उन संदेशों का फैलना जारी है जिनको फैलाने में साहिर लुधियानवी साहिब भी अग्रसर रहे। 

आज के लेखक और शायर भी अब बड़े लोगों को समझाने की बजाए छोटे बच्चों को समझने समझाने का अभियान चलाने में लगे हैं। पंजाबी लेखक और पत्रकार हरनाम सिंह डल्ला आजकल  बच्चों के स्कूलों में जा जा कर इन बच्चों को बड़े दिल दिमाग वाला सच्चा इंसान बनाने में जुटे हैं। उनकी टीम भी साथ होती है और बच्चों को नई नई पुस्तकें थमाते हुए वे उन्हें ताकीद भी करते हैं कि इन पुस्तकों को पढ़ना ज़रूर है और वह भी पूरे ध्यान से। कुछ हफ़्तों के बात बच्चों की परीक्षा के मकसद से कुछ सवाल भी पूछे जाते हैं। 

अब जबकि कुछ संगठन और सियासतदान बच्चों की सोच को संकीर्ण बनाने में लगे हैं उस दौर में हरनाम सिंह डल्ला और उनकी टीम बच्चों की मानसिकता को खुले दिमाग वाला बनाने में जुटी है। यदि आप को उनका प्रयास अच्छा लगा हो तो आप भी उनसे जुड़ सकते हैं। उनकी टीम में साहित्य सभा रजिस्टर्ड बहरामपुर बेट के प्रधान कुलविंदर सिंह और कुछ दुसरे लोग भी शामिल हैं। 

इस टीम के सक्रिय सदस्त हरनाम सिंह डल्ला का मोबाईल फोन नंबर है: +91 94177 73283


Thursday, November 28, 2024

मुल्क सारा बज़ार जैसा है//ह्रदयेश मयंक की एक नई ग़ज़ल के कुछ शेर

 Hindi Poem Posted by Haridyesh Mayank on 26th November 2024 at 5:55 PM FB

दिल मेरा इश्तहार जैसा है.... !


आज ह्रदयेश मयंक की एक नई ग़ज़ल के कुछ शेर जो दिल से लेकर बाज़ार तक की बात करते हैं। निवास मुंबई में है। चिंतन दिशा की संपादक और प्रकाशक हैं। पत्रिका संचालन के चलते स्वनिर्भर भी हैं। वास्तव में नीतिगत और विचारधारक पत्रिकाएं समय भी मांगती हैं, मुश्किलों से जुटाया हुआ धन भी और इसके साथ ही, दिल, दिमाग की पूरी ऊर्जा भी। आसान नहीं होती साहित्य साधना, पत्रकारिता और लेखन। देखिए ह्रदयेश मयंक जी  शायरी का एक अंदाज़। --रेक्टर कथूरिया//संपादक: हिंदी स्क्रीन 


लम्हा- लम्हा उधार जैसा है 

मुल्क सारा बज़ार जैसा है 

सारी दुनिया ख़रीद ली मैंने 

फिर भी दिल बेक़रार जैसा है 

ज़िन्दगी रूठकर निभाती रही 

उसका गुस्सा भी प्यार जैसा है 

हर तरफ़ ,शोर है ,तमाशा है 

सारा मंज़र ग़ुबार  जैसा है 

हर्फ़-ब-हर्फ़ आईने की तरह 

दिल मेरा इश्तहार जैसा है।

    ----सोशल मीडिया से साभार ह्रदयेश मयंक

आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। नीचे कुमेंट बॉक्स में आपके विचारों की  इंतज़ार रहेगी ही। अपना नाम, स्टेशन का नाम और मोबाईल नंबर साथ लिखेंगे ऑटो हमें ज़्यादा अच्छा लगेगा। 

Tuesday, November 26, 2024

इस आख़री सफर को नाकाम तो मत कह

हिंदी में सियासत की बात करने वाली पत्रिकाओं में भी साहित्य के ज़रिए बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में बहुत कुछ कहा जा रहा है। इस बार देखिए हिंदी सामना में अनुराधा सिंह का अंदाज़:


इस तीरगी को आखिरी पयाम तो मत कह

इस इब्तिदा को अपना अंजाम तो मत कह

इंसानियत है अब भी बाकी जहान में

हैवानियत भरी है आवाम तो मत कह

तेरा ख़ुदा वही है जो मेरा ईश है

इतनी सी बात पर तू कत्लेआम तो मत कह

ये मृगमरिचिका है है भूलभुलैया

इसको ख़ुदा का पावन पैगाम तो मत कह

हम आए हैं वहीं से जाएंगे भी वहीं

इस आख़री सफर को नाकाम तो मत कह

                        ---@अनुराधा सिंह

हिंदी सामना से साभार 

Thursday, October 17, 2024

"गीत मेरी मातृभाषा का; है न चाकू जैसी !

कविता//मातृभाषा//सुखपाल 


सभी काम कर लेता है 

तीस साला डेविड 

'हैंडीमैन' हमारे अस्पताल का।

सफाई

टपकती छत की मुरम्मत 

बिजली वाले यंत्र ठीक करना 

टूटी हुई पाइपें जोड़ना 

फर्नीचर बनाना 

ड्राईवाल लगाना 

टायलेट फिट करना 

मशीनें ठीक करना....

दफ़्तर की चाबी घर भूल आया मैं 

डेविड को पूछा...

वह‌ बोला...

"चाबी तो है नहीं 

लेकिन दरवाजा खोल देता हूं तेरा !"

जेब से चाकू निकाल 

डेविड ने ताले के सुराख में झांका 

झट से दरवाजा खोल‌ मारा

और बोला -

चाबी की बजाय चाकू रखा करो जेब में 

"चाबी से एक दरवाजा खुलता है 

चाकू से बहुत सारे 

रोटी वाला भी..."

खुला का खुला रह गया मेरा मुंह 

" इतने काम कहां सीखें, डेविड ?"

वह मुस्कुराया -

" बहुत खराब था मेरा बचपन.."

चाकू हवा में उछाल 

धार की ओर से बोच कर

तीखे स्वर में गीत गुनगुनाते हुए 

वह चल पड़ा ‌दूसरी ओर...

मैंने पीछे से आवाज़ लगाई 

" किस भाषा का गीत है..?"

सिर घुमाकर बोला -

" मेरी मातृभाषा का

है न चाकू जैसी !

यह भी बहुत दरवाजे खोलती है 

मेरे लिए..."

👌🏽👤👌🏽

पंजाबी मूल : सुखपाल 

हिन्दी अनुवाद : गुरमान सैनी 

संपर्क : 9256346906

Thursday, July 25, 2024

हिंदी लेखक और पत्रकार मनोज धीमान के लिए नया सम्मान

25th July 2024 at 3:31 PM

GNDU ने धीमान को हिंदी विषय में बोर्ड ऑफ स्टडीज (पीजी) में शामिल किया

लुधियाना: 25 जुलाई 2024: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

लंबे समय तक पंजाब के सीमावर्ती लोगों के दर्द को लेकर रिपोर्टिंग करने वाले हिंदी लेखक और पत्रकार मनोज धीमान अब कई दश्कों से लुधियाना के साथ जुड़े हुए हैं। आंधी आए जा तूफ़ान मनोज धीमान अपनी लेखन और पत्रकारिता की ड्यूटी में मगन रहते हैं। उन्हें किसी ने भी किसी भी तरह की गट बंदी में रूचि लेते नहीं देखा। ुको ले कर अब ख़ुशी की नै खबर आई है।

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय (जीएनडीयू), अमृतसर ने हिंदी लेखक और पत्रकार मनोज धीमान को 01-07-2024 से 30-06-2026 तक की अवधि के लिए हिंदी विषय में बोर्ड ऑफ स्टडीज (पीजी) में शामिल किया है।

कलम के क्षेत्र में इस  लेकर ख़ुशी के लहर है कि धीमान को कल शाम विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार कार्यालय से इस नियुक्ति के संबंध में आधिकारिक सूचना प्राप्त हुई।

उन्होंने इस नियुक्ति के लिए जीएनडीयू के कुलपति को धन्यवाद दिया है। साथ ही, उन्होंने जीएनडीयू में डीन, भाषा संकाय और विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग प्रो (डॉ) सुनील का भी इस नियुक्ति के लिए आभार व्यक्त किया।  

Wednesday, July 10, 2024

ग़ज़ल//कृष्णा गोयल

Monday 8th July 2024 at 20:45 

जिसकी भावनाएं आप इसे पढ़ कर महसूस कर सकते हैं 


आग जो जल रही थी बुझाने के बाद;

शायरा कृष्ण गोयल 

आएगी फिर खुशी वह जमाने के बाद।


आज तुम ही डरा क्यों रहे हो हमें;

क्यों रुला भी रहे हो हंसाने के बाद। 


जब तुम्हें मान भाई लिया हमने फिर;

हुए दगाबाज भाई कहाने  के बाद। 


क्यों रहे मार डंक  यार आस्तीन में;

दूध भी प्यार से यूं पिलाने के बाद।  


हाथ तुम जो बढ़ाओ ज़रा प्यार का;

आज भाई बनें शिकवे मिटाने के बाद।

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 *चंडीगढ़ के निकट ही पंचकूला में रहने वाली शायरा कृष्णा गोयल पूर्व ज्वाइंट रजिस्ट्रार रहे हैं। ज़िन्दगी के उतराव चढ़ाव  हरे सफर में उन्होंने दुनिया को बहुत नज़दीक से देखा है। उनकी पैनी नज़र की यह काव्य पूर्ण अनुभूति बहुत गहरी रही है। इसकी अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में अक्सर झलकती भी है। आपको उनकी यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। 

Saturday, March 30, 2024

सनातन धर्म बनाम हिंदू धर्म//संजय पराते की टिप्पणी

Saturday: 30th March 2024 at 5:39 PM

हिंदी पुस्तक सनातन धर्म : इतना सरल नहीं पर विशेष टिप्पणी 

छत्तीसगढ़ से: 30 मार्च 2024: (संजय पराते//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
हाल ही में अरुण माहेश्वरी की 8 अध्यायों में विभाजित एक छोटी-सी पुस्तिका "सनातन धर्म : इतना सरल नहीं" आई है। यह पुस्तिका सनातन धर्म और हिंदू धर्म के बीच के संबंधों और विवादों का गहराई से तथ्यपरक विश्लेषण करती है। 

हाल ही में हिंदुत्व का झंडा उठाए संघ-भाजपा ने चुपचाप हिंदू धर्म को सनातन धर्म से प्रतिस्थापित करने की कोशिश की है और सनातन धर्म को हिंदू धर्म का  समानार्थी बता रही है। संघ भाजपा के इस चमत्कार पर पानी डालने का काम अरुण माहेश्वरी ने किया है। इस मायने में सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओं के लिए यह पुस्तिका बहुत उपयोगी है। 

स्वामी करपात्री महाराज हिंदू धर्म के कट्टर नेता और शास्त्रज्ञ थे, जिन्होंने वेद, दर्शन, धर्म और राजनीति से जुड़े विषयों पर विपुल लेखन किया है। कट्टर हिंदू थे, सनातनी धर्म के अनुयायी थे, तो निश्चित रूप से मार्क्सवाद विरोधी भी थे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी "मार्क्सवाद और रामराज्य।" इसके जवाब में राहुल सांकृत्यायन ने एक छोटी-सी पुस्तिका लिखी थी "रामराज्य और मार्क्सवाद", जिसमें उन्होंने करपात्रीजी के दार्शनिक और राजनैतिक तर्कों की धज्जियां उड़ा दी थी। लेकिन इससे करपात्रीजी की विद्वत्ता पर कोई आंच नहीं आती।

वर्ष 1940 में उन्होंने एक 'धर्म संघ' की स्थापना की थी -- जिसका उद्देश्य था सनातन धर्म की स्थापना ; जबकि वर्ष 1925 में ही आरएसएस की स्थापना हो चुकी थी, जो हिंदू धर्म और नाजीवाद के आधार पर देश को चलाना चाहता था। साफ है कि आरएसएस के हिंदू धर्म से करपात्री महाराज के सनातनी धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। वर्ष 1948 में उन्होंने 'रामराज्य परिषद्' का गठन किया, जबकि इसके बाद आरएसएस ने 1951 में जनसंघ का गठन किया था। आरएसएस का यह कदम भी बताता है कि उस समय उसके हिंदू धर्म का सनातन से कोई संबंध नहीं था। 1966 से गोरक्षा आंदोलन की शुरुआत भी करपात्रीजी ने ही की थी, जबकि यह मुद्दा आरएसएस के एजेंडे में भी नहीं था। करपात्रीजी के आरएसएस विरोध का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि उन्होंने 'राष्ट्रीय सेवक संघ और हिंदू धर्म' नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने संघ के परम पूज्य गुरु गोलवलकर की 'विचार नवनीत' और 'हम या हमारा राष्ट्रीयत्व' में उल्लेखित हिंदू धर्म संबंधी धारणाओं का दार्शनिक दृष्टि से खंडन किया है और आरएसएस को हिंदू धर्म विरोधी संगठन घोषित किया है। उनकी दृष्टि में संघ का पूरा आचरण कपट और मिथ्याचार से भरा था और ऐसे में उनसे हिंदू धर्म की रक्षा की आशा नहीं की जा सकती थी। यही कारण है कि अपने शुरुआती जीवन के कुछ वर्षों बाद उन्होंने संघ से सहयोग का रास्ता छोड़ दिया था।

अपनी पुस्तिका में अरुण माहेश्वरी ने गोलवलकर की विचार-सरणी के बरक्स करपात्री महाराज को रखा है। आज जब "भगवाधारी आए हैं" का नारा संघ-भाजपा का प्रिय नारा बन गया है, माहेश्वरी बताते हैं कि किस प्रकार    करपात्रीजी ने भगवा ध्वज की श्रेष्ठता और इसके राष्ट्रीयता का प्रतीक होने की संघ की धारणा को दार्शनिक चुनौती दी थी। वे करपात्री जी को उद्धृत करते हैं -- (महा) "भारत संग्राम में भीष्म, द्रोण, कर्ण, भीम, अर्जुन के रथ के ध्वज पृथक-पृथक थे। अर्जुन तो कपि ध्वज के रूप में प्रसिद्ध ही है। अतः सभी हमारे पूर्वज भगवा ध्वज को ही मानते थे, यह तो नहीं ही कहा जा सकता। ... (इसलिए) आपके भगवा ध्वज को अपना लेने से वह सार्वभौम, सर्वमान्य नहीं कहा जा सकता।" यह उल्लेखनीय है कि भगवा ध्वज की श्रेष्ठता का प्रचार करते हुए छत्तीसगढ़ में ध्वज विवाद के नाम पर कई जगहों पर संघ-भाजपा ने सांप्रदायिक तनाव और दंगे भड़काए हैं। इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर तो ऐसा माहौल बनाया गया था कि राष्ट्रीय झंडा 'तिरंगा' की जगह भगवा ने ही ले लिया है। 

करपात्रीजी शास्त्रों के सहारे यह भी सिद्ध करते है कि सनातनी हिंदू अनिवार्य तौर पर वर्णाश्रमी होगा और सांप्रदायिक होना कोई दुर्गुण नहीं, बल्कि हिन्दू होने का प्रमुख गुण है। संघ-भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति इन दोनों आरोपों से बचना चाहती है। इसी क्रम में उन्होंने 'राष्ट्रीयता' के संबंध में आरएसएस की इस अवधारणा का भी शास्त्रीय खंडन किया है कि केवल समान धर्म, समान भाषा, समान संस्कृति, समान जाति और समान इतिहास वाले लोग ही 'एक राष्ट्र' कहे जा सकते हैं और मुस्लिम, ईसाई आदि यदि हिंदू धर्म में सम्मिलित हो जाएं, तो वे भी 'राष्ट्रीय' हो सकते हैं। करपात्री जी के सनातनी विचारों के अनुसार संघ की यह सोच मुस्लिम विरोध और हिटलर के उग्र राष्ट्रवाद की अनुगामिता से उपजी है। उनका मानना है कि सनातन की अवधारणा मूलतः वेदों की अनादिता और अपौरुषेयता पर टिकी हुई है, जिसे गोलवरकर नहीं मानते। इस प्रकार, अपने शास्त्र-आधारित तर्कों से करपात्री महाराज आरएसएस को न केवल हिंदू धर्म विरोधी, बल्कि सनातन धर्म विरोधी भी साबित करते हैं। 

गोलवलकर और किसी भी अन्य संघी सिद्धांतकार ने आज तक करपात्री जी के आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया है, क्योंकि उनके पास करपात्री के धर्म आधारित विचारों का खण्डन करने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है, जैसी दृष्टि राहुल सांकृत्यायन के पास थी। अरुण माहेश्वरी की टिप्पणी है -- "आज तो इस मोदी युग में आरएसएस ने खुद ही सनातन धर्म का झंडा उठाकर प्रकारांतर से करपात्री के तब के सारे अभियोगों को नतमस्तक होकर पूरी तरह स्वीकार कर लिया है।" जिन लोगों पर सनातन धर्म नष्ट करने का आरोप लगा था, यह इतिहास की उलटबांसी है कि उनके ही वंशज आज सनातन धर्म का झंडा उठाए विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' पर आरोप लगा रहे हैं कि वे भारत से सनातन को नष्ट करना चाहते हैं। यह ठीक वैसा ही है, जैसा अंग्रेजों का तलुवे चाटने वाला संघ आज अपने को राष्ट्र भक्त और विपक्ष को राष्ट्र विरोधी बताने में लगा हुआ है। हिंदू धर्म को सनातन धर्म कहना वैसा ही है, जैसा वर्ष 2014 के चुनावी वादे बाद में पूरे संघी गिरोह के लिए 'जुमलों' में बदल गए थे और आज फिर उसे 'मोदी गारंटी' के रूप में पेश किया जा रहा है। साफ है कि संघ-भाजपा को न तो हिंदू धर्म से कोई मतलब है, न सनातन धर्म से कोई लेना-देना है। सत्ता के लिए धर्म को जब राजनीति का हथियार बनाया जाता है, तो ऐसी कलाबाजी भी करनी ही पड़ेगी। 

विचारशील 'भक्तों' के लिए भी यह पुस्तिका उनकी आंखें खोलने वाली साबित होगी, ऐसी आशा की जा सकती है।

 _*(टिप्पणीकार वामपंथी कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष है। संपर्क : 94242-31650)*

पुस्तक : सनातन धर्म : इतना सरल नहीं
लेखक : अरुण माहेश्वरी (मो. 98310-97219)
प्रकाशन : सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
मूल्य : 200 रूपये

Wednesday, February 14, 2024

तहज़ीब द्वारा 16 वां राष्ट्रीय मुशायरा 18 फरवरी को

Wednesday:14th February 2024 at 13:02 

इस मुशायरे में शिरकत कर के  सकेंगे बहुत सी अनमोल यादें 


लुधियाना
: 14 फरवरी 2024: (छाया शर्मा//हिंदी स्क्रीन डेस्क):: 

बाग़ में धीमी-धीमी चलती हवा पौधों को झूमने लगा देती है और फूलों से ख़ुशबू लेकर दूर-दूर तक फैला देती है। यही हवा सोये हुओं को जगाने का काम भी करती है। लुधियाना के 16वें कुल हिंद मुशायरे में शायरी की कुछ ऐसी ही हवा चलने वाली है। 

ख़ास और ख़ूबसूरत बात ये है कि इस मुशायरे में शिरकत कर रहे सभी शायर इसी मंद-मंद चलने वाली पुरवाई के नुमाईंदा शायर हैं। आपकी शाइरी, सुनने वालों के ज़ह्न से होते हुए सीधा दिल में जगह बना लेती है। तहज़ीब द कल्चर ऑफ लव सोसाइटी को ये शरफ़ हासिल हुआ है कि लुधियाना शहर के सुख़न फ़हम लोगों को ऐसे बेहतरीन शायरों से रू-ब-रू किया जाए।

तो आइये 18 फ़रवरी, इतवार को शाम 4:30 बजे नेहरू सिद्धांत केंद्र, फ़िरोज़ गाँधी मार्केट लुधियाना में इस शानदार मुशायरे का लुत्फ़ उठाने के लिये। मुशायरा की तैयारी संबंधी एक एग्जीक्यूटिव मीटिंग विवेकानंद मेडिटेशन पिरामिड में रखी गई जिसमें अनिल भारती, मुकेश आलम,प्रोफेसर सुरेंद्र खन्ना, अशोक धीर, राकेश खरबंदा, छाया शर्मा, मनीष कक्कड़ व राजेंद्र शर्मा उपस्थित थे।

इस बार भी यह मुशायरा ऐतिहासिक साबित होगा और हर बार की तरह इस बार भी अपनी बहुत सी यादें छोड़ जाएगा। इसमें आप बहुत से जानेमाने शायरों को बहुत नज़दीक से देख सुन सकेंगे और उनके अंदाज़ कॉमन में बसा सकेंगे। 

गौरतलब है कि यह मुशायरा कुछ बहुत ही गहरी यादों के सिलसिले को आगे बढ़ाता है। दिल से जुडी यादें। दोस्ती से जुडी यादें। करीब 17  बरस पहले जनाब मुकेश आलम साहिब के एक मित्र हुआ करते थे सुखबीर टोनी साहिब। बहुत ही मिलनसार और संवेदनशील इंसान। उनका होना बहुत से लोगों की ज़िन्दगी के लिए बेहद ज़रूरी भी था।शायरी के लिए भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती। 

16 फरवरी 2019 के मुशायरे की एक यादगारी तस्वीर 

लेकिन अचानक एक वज्रपात हुआ और होनी हो के ही रही। उनका साथ हम सभी के साथ टूट गया। मौत ने उन्हें हमसे छीन लिया। उनकी याद में मुकेश आलम सहिब और अन्य दोस्तों ने इस मुशायरे की शुरुआत की। तब से मुशायरे का यह सिलसिला लगातार जारी है।

आखिर में जनाब राकेश खरबंदा जी के शब्दों में भी कुछ शब्द/कुछ पंक्तियां:

जिस पत्थर पर बैठ के मैंने याद किया था तुमको

आ कर देखो लोग उसे अब मंदिर बोल रहे हैं

प्यारे दोस्त सुखबीर टोनी की पाकीज़ा और लाफ़ानी याद में Tehzeeb - The Culture of Love की जानिब से लुधियाना का शानदार कुल-हिन्द मुशायरा 

👉इतवार, 18 फ़रवरी 2024 को शाम 4:30 बजे होने जा रहा है👈

आइए 'सुखबीर टोनी' की रूहानी शख़्सियत से मुलाक़ात करते हैं ❤️❤️

स्थान- नेहरू सिद्धांत केन्द्र, फ़िरोज़ गाँधी मार्केट, पक्खोवाल रोड, लुधियाना

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Thursday, February 8, 2024

स्व. कृष्णबिहारी नूर पर एक विशेष पोस्ट और श्रद्धासुमन

 Tuesday 30th January 2024 at 04:46 AM 

स्व. कृष्णबिहारी नूर पर एक विशेष पोस्ट और श्रद्धासुमन

*डा. कृष्णकुमार 'नाज़' साहब की कलम से.... 

उनकी दोस्ती हर धर्म और हर वर्ग के लोगों से थी 


शायरी और शायरों की दुनिया
: 8 फरवरी 2024: (*
डा. कृष्णकुमार 'नाज़'//हिंदी स्क्रीन डेस्क):: 

गेहुँआँ रंग, उभरा हुआ माथा, काले रँगे हुए बाल, क्लीनशेव चेहरा, होंठों पर निरन्तर तैरती मुस्कान, हर समय कुछ न कुछ खोजती रहने वाली चमकदार आँखें; ये सब बातें यदि किसी अच्छे चित्रकार को बता दी जाएँ तो वह अपनी तूलिका से जो चित्र तैयार करेगा, वह निस्सन्देह श्री कृष्णबिहारी ‘नूर’ का होगा। चूड़ीदार पाजामा, ढीला कुर्ता और उस पर जैकेट पहने नूरसाहब जब मुशायरों और कवि-सम्मेलनों के मंचों पर जाते, तो पहली नज़र में ही ऐसा लगने लगता था कि जैसे लखनवी नज़ाकत और नफ़ासत सिमटकर उनकी आग़ोश में आ गयी हो। कपड़ों पर यदि तनिक भी दाग़-धब्बा लग गया, तो तुरन्त ही पोशाक बदलते थे। रहन-सहन, खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने के मामले में उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उनके व्यक्तित्व, बोलचाल और रहन-सहन में लखनऊ की वह तहज़ीब बसती थी, जो आज उँगलियों पर गिने जाने वाले लोगों को ही मयस्सर है। नूर साहब के व्यक्तित्व और सबको साथ लेकर चलने वाली उनकी जीवनशैली से प्रभावित लोगों का एक बड़ा समूह है। हालाँकि आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसका कोई विरोधी न हो, लेकिन मैं यह देखता था कि उनके विरोधी उनके सामने आते ही इस प्रकार हो जाते थे, जैसे मैगज़ीन के पन्ने ट्रेन की खिड़की से आती हवा में फड़फड़ाकर अपनी खीझ प्रकट करते हैं।

उनकी दोस्ती हर धर्म और हर वर्ग के लोगों से थी और वह इस बात का ख़याल भी रखते थे कि बातचीत के दौरान कहीं किसी को भावनात्मक ठेस न पहुँचे। एक घटना मुझे याद आ रही है। मैं नूरसाहब के साथ ही उनके ड्राइंगरूम में बैठा हुआ था। तभी उनके एक परिचित आये और अपनी कम्पनी का नववर्ष का कलेण्डर ड्राइंगरूम में टाँग दिया। नूरसाहब ने जब देखा कि कलेण्डर पर देवी-देवताओं के चित्र हैं, तो उनसे बोले-‘‘भई देखो हमारे ड्राइंगरूम में हर मज़हब के लोग आते हैं। इस कलेण्डर को देखकर हो सकता है किसी को ठेस पहुँचे, इसलिए इसे घर के भीतर टाँग दो और ड्राइंगरूम के लिए कोई ख़ूबसूरत सीनरी ले आओ।’’ यह था नूरसाहब का व्यक्तित्व और उनकी भावना।

नूर साहब समय का बहुत ख़याल रखते थे। अगर मिलने के लिए किसी को समय दिया है, तो निश्चित समय पर उस व्यक्ति की प्रतीक्षा करते थे। यदि अकारण ही वह व्यक्ति विलम्ब से आये तो उसे नूरसाहब की नाराज़गी सहनी पड़ती थी। 

नूर साहब वायदे की क़ीमत भी जानते थे और अहमियत भी। यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता ही थी कि बाज़ार में जो चीज़ उन्हें पसन्द आ गयी, उसे ख़रीदते समय कभी उसका मूल्य नहीं पूछा, कभी मोल-भाव नहीं किया। दुकानदार ने क़ीमत बताई और नूरसाहब ने चुकता करदी। नूरसाहब के ही एक मित्र बताते हैं कि वह और नूरसाहब लखनऊ में मीना बाज़ार में घूम रहे थे। तभी एक दुकान पर उन्हें शोकेस में रखा कपड़ा पसन्द आ गया। नूरसाहब दुकान पर गये, कपड़ा लिया और दुकानदार द्वारा बतायी गयी क़ीमत चुका कर चल दिये। थोड़ी दूर जाकर उनके मित्र ने कहा- ‘‘नूरसाहब, अगर आप कुछ मिनट ठहरें तो यही कपड़ा उसी दुकान से मैं कम क़ीमत पर ला सकता हूँ।’’ यह सुनकर नूरसाहब हँसे और बोले- ‘‘यह काम तो हम भी कर सकते थे, लेकिन पसन्द आयी चीज़ का मोलभाव करना पसन्द की तौहीन है।’’ यह थी नूरसाहब की विशेषता और मूल्यों का रखरखाव। क्रोध के क्षणों में भी उनके होंठों पर कभी अमर्यादित शब्द नहीं आये।

नूर साहब बहुत विनम्र और सरल स्वभाव के सादगीपसन्द व्यक्ति थे। असल में यही सादगी और विनम्रता उनकी शायरी का केन्द्र है। नूरसाहब ने निरन्तर सफलता की ऊँचाइयों को छुआ, लेकिन अपनी ज़मीन को, अपने आधार को कभी पाँवों से नहीं खि़सकने दिया। जहाँ उन्होंने बड़ों को सम्मान दिया, वहीं छोटों को बेपनाह मुहब्बतें दीं, प्यार लुटाया। यह उनके व्यक्तित्त्व का बड़प्पन था। शायद इन्हीं सब बातों ने उन्हें साधारण इंसान से सन्त की श्रेणी में ला खड़ा किया। 

नूर साहब के व्यक्तित्त्व के सम्बन्ध में प्रसिद्ध इतिहासकार डा. योगेश प्रवीन कहते हैं- "20वीं सदी के अज़ीम शायर कृष्णबिहारी ‘नूर’ साहब एक बड़े शायर ही नहीं, एक आला दरजे की इंसानियत का मर्तबा रखने वाले इंसान थे। उनके पास अच्छी निगाह थी, रेशमी अहसास थे और सुनहरी क़लम थी, जिससे उन्होंने जो कुछ भी लिखा वो अमर हो गया। उन्होंने फूल की पंखुड़ियों पर भी लिखा है, चाँदनी की सतह पर भी लिखा है और सबसे बड़ी बात है कि हमारे आपके दिल के वरक़ पर भी लिखा है।’’

झाँसी से प्रकाशित ‘मार्गदर्शक’ साप्ताहिक की लेखमाला में श्री ओमशंकर ‘असर’ लिखते हैं- "नूरसाहब ज़िन्दगी में बहुत आम आदमी हैं, मगर शायरी में वे असाधारण ही हैं। साधारण और असाधारण दोनों गुण एक साथ अगर देखने हों, तो नूरसाहब का व्यक्तित्व और फिर उनकी शायरी का मज़ा लें। आम-फ़हम होने के नाते वे बहुत सादा ज़ुबान अपने शेरों में पिरोते हैं और असाधारण होने के नाते उनके विचार बहुत गहरे भी हैं और ऊँचे भी।’’

यक़ीनन नूरसाहब जितने बड़े शायर थे, उतने ही बड़े इंसान भी। उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व में अन्तर तलाश पाना असम्भव है। मैंने स्वयं कविसम्मेलन और मुशायरों के मंचों पर देखा है कि नये से नये शायर ने अगर अच्छी कविता लिखी है, तो उसे भरपूर प्रोत्साहित किया करते थे, जबकि बड़े से बड़े शायर की नीरस और अर्थहीन कविता पर वे ख़ामोशी ओढ़ लिया करते थे। अपने से बड़ों को भरपूर सम्मान देना तथा छोटों से बड़े प्यार के साथ मिलना उनके व्यक्तित्त्व का विशेष गुण था।

नूर साहब का लेखन चूँकि अध्यात्म और भारतीय दर्शन पर आधारित है, इसलिए उनकी कविता के चाहने वालों में बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों की संख्या अधिक है। इस बात को नूरसाहब बख़ूबी जानते थे और इसकी पुष्टि एक छोटे से संस्मरण से भी हो जाती है-

बात सन् 1990 की है। मैं मुरादाबाद के ही महाराजा हरिश्चन्द्र डिग्री कालेज से उर्दू में एम.ए. कर रहा था। यूँ कहिये कि एम.ए. के द्वितीय वर्ष की परीक्षा देने के बाद मैं ‘वायवा’ के लिए कालेज गया था। जैसे ही मेरा नम्बर आया और मैं कमरे में दाखि़ल हुआ तो वहाँ उर्दू विभागाध्यक्ष साबिर हसन साहब ने परीक्षक महोदय से मेरा परिचय कराया- सर, ये मिस्टर कृष्णकुमार हैं और हमारे कालेज के अकेले नाॅन मुस्लिम कैंडिडेट हैं।

परीक्षक महोदय ने बड़े प्यार के साथ कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा- तशरीफ़ रखिये। मैं कुर्सी पर बैठ गया, लेकिन दिल धड़क रहा था कि कहीं वह कोई ऐसा सवाल न पूछ बैठें जो मुझे नहीं आता हो। तभी उन्होंने कहा-‘आप किसी शायर के दो शेर सुनाइये।’ मैंने उनसे निवेदन किया- सर, अगर आप इजाज़त दें, तो मैं अपने ही दो शेर पेश कर दूँ। उन्होंने ख़ुश होते हुए पूछा- क्या आप भी शेर कहते हैं? मैंने कहा- जी सर, थोड़ी-बहुत जोड़-तोड़ कर लेता हूँ। वह बोले- सुनाइये। मैंने धड़कते दिल से दो शेर सुना दिये। सुनकर बोले- वाह-वाह, दो शेर और सुनाइये। मैंने दो शेर और सुना दिये। उन्होंने फिर दाद दी और पूछा- आप इसलाह किनसे लेते हैं? मैंने कहा- जनाब कृष्णबिहारी ‘नूर’ से।

यक़ीन जानिये, नूरसाहब का नाम सुनते ही वे दोनों हत्थे पकड़कर कुर्सी से खड़े हो गये और बोले-"अरे भई! वाह-वाह, आपने उस्ताद के रूप में ऐसे शायर का इन्तख़ाब किया है, जो अपने तरीक़े का हिन्दुस्तान का अकेला शायर है। शुक्रिया, आपका वायवा हो गया।" मेरी सारी मुश्किल आसान हो गयी। 

शायर मेराज फ़ैज़ाबादी नूर साहब को चचा कहते थे और उनका बड़ा सम्मान करते थे। नूरसाहब भी उन्हें बहुत प्यार करते थे। मेराज साहब का नूरसाहब के व्यक्तित्त्व के प्रति अद्भुत दृष्टिकोण है। वह कहते हैं- ‘‘होठों पर मुस्तकि़ल खेलती हुई हँसी, ज़िन्दगी से भरपूर मुस्कराहट, चेहरे पर ऋषियों जैसा सुकून और पवित्रता, आँखों में लमहाभर चमककर बुझ जाने वाले दुखों के साये, कृष्णबिहारी ‘नूर’ तारीकियों के इस युग में बीती हुई पुरनूर सदियों का सफ़ीर (राजदूत), एक फ़नकार, एक इंसान, एक फ़क़ीर और मुशायरे के माइक पर एक फि़क्रोफ़न का दरिया।’’

प्रसिद्ध कवि एवं पत्रकार कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं- ‘‘लखनऊ ऑल इंडिया रेडियो ने एक कवि-सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें हिन्दी-उर्दू दोनों की नुमाइंदगी की गयी। बाईपास सर्जरी के बाद पहला मुशायरा पढ़ने आये थे इसमें नूरसाहब। दिल्ली से मैं भी शरीके-महफि़ल था, सो चश्मदीद वाक़या बयान कर रहा हूँ कि जब नूरसाहब को पढ़ने की दावत दी गई तो रेडियो ने उन्हें सहूलियत से काम-अंजाम देने के लिए जहाँ बैठे थे, वहीं से पढ़ने की सुविधा देनी चाही। नूरसाहब ने अपना बाईपास रखा किनारे और हाज़रीन से मुख़ातिब होते हुए बोले- ‘आप माफ़ी दें, डाक्टरों ने दिल चीर के रख दिया, लेकिन उन्हें क्या पता कि मेरा दिल मेरे पास है ही नहीं, वह तो मेरे चाहने वाले आप जैसे लोगों के पास है, सो शेर मुलाहज़ा हो ...’ और फिर तो साहब नूरसाहब ने ऐसे पढ़ा जैसे पिंजरे से निकल के परिन्दे ने बेख़ौफ़ उड़ानें भरी हों। ग़ज़ल भी वो पढ़ी जो उनकी ग़ज़लों में मेरी सबसे पसन्दीदा ग़ज़ल है। बल्कि उसका एक शेर तो मेरे जीवन के दर्शन का हिस्सा बन चुका है-

मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है

हुआ करे जो समन्दर, मेरी तलाश में है"

प्रख्यात संगीतकार एवं गीतकार श्री रवीन्द्र जैन कुछ यूं फ़रमाते हैं- "नूरसाहब यूँ तो तहत में पढ़ते थे, लेकिन पढ़ने के अंदाज़ से तरन्नुम में पढ़ने वाले मात खा जाते थे। मुशायरा मुंबई में हो या मुंबई के आसपास, नूरसाहब का क़याम अक्सर और पेशतर मेरे छोटे से आशियाने में हुआ करता था। घर में क़याम तो जिस्मानी तौर पर था, नूरसाहब तो रूह की गहराइयों में उतर चुके थे। न सिर्फ़ अपने, बल्कि हम दोनों अपने पसंदीदा शायरों के शेर एक-दूसरे से बाँटते थे, जब कभी मेरा लखनऊ प्रवास होता, नूरसाहब मेरी सिदारत में अपने दौलतख़ाने पर मेरे एज़ाज़ में नशिस्त रखते। वो शायरी जिसका हम मुंबई में तसव्वुर भी नहीं कर सकते, लखनऊ के शोअरा से सुनने को मिलती, भाभीजान के हाथ के बने मूँगफली के क़बाब मैं आज भी नहीं भूला हूँ। मुंबई-लखनऊ में मिलने का सिलसिला अब भी बरक़रार रहता, अगर दयाहीन मृत्यु उन्हें यूँ अचानक न ले जाती।

अपने होने का सुबूत और निशाँ छोड़ती है

रास्ता कोई नदी यूँ ही कहाँ छोड़ती है

नश्शे में डूबे कोई, कोई जिये, कोई मरे

तीर क्या-क्या तेरी आँखों की कमाँ छोड़ती है

बंद आँखों को नज़र आती है, जाग उठती हैं

रोशनी ऐसी हर आवाज़े-अज़ाँ छोड़ती है

ख़ुद भी खो जाती है, मिट जाती है, मर जाती है

जब कोई क़ौम कभी अपनी ज़बाँ छोड़ती है

आत्मा नाम ही रखती है न मज़हब कोई

वो तो मरती भी नहीं, सिर्फ़ मकाँ छोड़ती है

एक दिन सबको चुकाना है अनासिर का हिसाब

ज़िंदगी छोड़ भी दे, मौत कहाँ छोड़ती है

मरने वालों को भी मिलते नहीं मरने वाले

मौत ले जाके ख़ुदा जाने कहाँ छोड़ती है

ज़ब्ते-ग़म खेल नहीं है अभी कैसे समझाऊँ,

देखना मेरी चिता कितना धुआँ छोड़ती है

और अंत में श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं…

वो जिसने ज़िंदगी भर छांव बांटी 

मैं पत्ता हूं उसी बूढ़े शजर का

*डा. कृष्णकुमार ' नाज़' साहिब की  यह प्रस्तुति हमें माननीय साहित्य प्रेमी और शायरी   ग्रुप इत्यादि के सक्रिय संचालक राजीव कुमार जी से हुई। 

जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहिब पर एक पोस्ट यहां क्लिक करके भी देखें प्लीज़ 


Tuesday, October 10, 2023

ग़ज़ल//*शुचि 'भवि'

हिंदी में गज़ल के रंग को गहरा करने में जुटी शायरा  


लुधियाना: 10 अक्टूबर 2023: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन):: 

कम से कम 10 पुस्तकों की रचेता जिनमें 5 दोहा संग्रह, 1 कविता संग्रह, 1 ग़ज़ल संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह,1 उपन्यास, 1छंद संग्रह इत्यादि शामिल हैं। इन दस पुस्तकों में उनकी रचनात्मक क्षमता का विशेष रंग देखने को मिलता है। भिलाई छत्तीसगढ़ में रहते हुए भी पंजाब और पंजाबी से भी शुचि भवि का पूरा लगाव है। पंजाब के साहित्य प्रेमी जब भी याद करें तो शुचि भवि इतनी दूरी तय करके पंजाब में भी आ जाती हैं। उनकी शायरी में जहां ख्यालों  की उड़ान कमाल की होती है वहीं गज़ल की व्याकरण और तोल का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। 

इस मुहारत का सारा क्रेडिट वह अपने उस्ताद शायर जनाब सागर सियालकोटी साहिब को देती हैं और बताती हैं कि उनकी गज़ल साधना में सागर साहिब हर कदम पर मार्गदर्शन देते रहे हैं। अब भी उनका आशीर्वाद हमेशा साथ रहता है। 

इस बार वह नवरंग लिटरेरी सोसाइटी की तरफ से विशेष तौर पर आयोजित एक कार्यक्रम में लुधियाना आ रही हैं 21 अक्टूबर 2023 को। इसका विवरण अलग पोस्ट में है। मंच पर भी शुचि भवि का अंदाज़ बेहद यादगारी होता है। 

उन्हें पहली बार सुना देखा था कई बरस पहले लुधियाना के बहुत ही पुराने स्कूल वायली मेमोरियल स्कूल में। अंधेरा होने को था लेकिन श्रोता बार बार उनसे एक और*एक और रचना की गुजारिश किए जा रहे थे।फ़िलहाल आप यहां पढिए सुश्री शुचि भवि की एक नई गज़ल। जो उन्होंने हमें हाल ही में प्रकाशनार्थ भेजी है।  हम आपके सामने उनकी और रचनाएं भी जल्द लाएंगे।   --रेक्टर कथूरिया 

शायरा शुचि भवि 

कहाँ बदरी  कि  मनमानी  टिकेगी  चाँद  आते ही

चली   है  चाँदनी  इठला  के  चंदा  के  बुलाते  ही


नज़र उसने झुका ली क्यों  ग़ज़ल ये  गुनगुनाते ही

चमक रुख़सार पर आयी ये किसका नाम आते ही


ज़माने  भर  के  झूठों  ने जलायीं  थी  मशालें  जो

बुझीं सारी, हमारे सच की इक शम्अ के जलाते ही


मुझे अफ़सोस है इस बात का लेकिन  है मजबूरी

कई  चेहरे   उतर   जाएंगे   मेरे   मुस्कुराते   ही


वफ़ाएँ जो नहीं समझा,नहीं समझा जो अश्कों को

उसे   क्यूँ  ढूँढता  है   दिल   ज़रा  सा दूर जाते ही


था बेशक तंग थोड़ा जो, हुआ अब क़ीमती बेहद

वो तहख़ाना मेरे दिल का, मकीं उसको बनाते ही


तेरी तस्वीर का भी आसरा अब है नहीं 'भवि' को

झलक  जाऊँगी  मैं  तुझमें, तेरा  चेहरा बनाते ही

---*शुचि 'भवि' 

   भिलाई, छत्तीसगढ़


नवरंग लिटरेरी सोसाइटी की तरफ से विशेष आयोजन का विवरण अलग पोस्ट में यहाँ क्लिक कीजिए

Saturday, September 16, 2023

"हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में हिन्दी शिक्षक संघ का विशेष आयोजन 17 सितम्बर को

मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन में होगा कार्यक्रम 

लुधियाना: 15 सितम्बर 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब के पंजाबी परिवारों और सिख परिवारों में से
बहुत से कलमकार ऐसे हैं जिन्होंने उन दिनों भी हिंदी से अपना गहरा प्रेम बनाए रखा जब हिंदी के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे था। भाषा और साहित्य को भी कुछ लोग अपनी अपनी सियासत के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। हिंदी का साहित्य भी पंजाब के पर्यावरण की गहरी बातें करता है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी साहिब की कालजयी कहानी को पढ़े बरसों हो गए लेकिन वह आज भी ज़हन में है उसे पढ़ते हुए जहां पंजाब का रूमानी पर्यावरण सजीव हो उठता है वहीं युद्ध की भयानक वि विभिप्षा भी आने लगती है--अब भी जवानों के शहीद होने की खबरें उसी माहौल की याद दिलाने लगती हैं जिस का रूमानी सा लेकिन क़ुरबानी भरा रंग इस प्रसिद्ध कहानी-उसने कहा था में उभरता है--एक दिव्य प्रेम और एक युद्ध की कहानी का रंग---आज भी वह दिव्य प्रेम  और भावनाएं हमारे दिलों में है लेकिन युद्ध की कलि छाया निरंतर फैलती चली जा रही है-प्रेम और क़ुरबानी के उस रंग को गहरा करता है हर वह कार्यक्रम जो हिंदी दिवस के नाम पर मनाया जाता है-- "उसने कहा था" पर बहुत बाद में प्रसार भारती ने दूरदर्शन पर एक विशेष फिल्म भी बनाई थी। 

हिन्दी शिक्षक संघ (रजि.) पंजाब द्वारा "हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में 17 सितम्बर, 2023  दिन रविवार को मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना में कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें सरकारी स्कूलों के 8वीं,10वीं,12 वीं कक्षा बोर्ड परीक्षा में 95% अंक प्राप्त करने वाले छात्र एवं उनके अध्यापक सम्मानित किये जायेंगे।

इसमें प्रमुख वक्ता डॉ. बलवेन्द्र सिंह (सहायक आचार्य) स्नातकोत्तर हिन्दी-विभाग डी.ए.वी. कॉलेज जालन्धर और डॉ. राजेन्द्र साहिल, एसोसिएट प्रोफेसर गुरु हरगोबिन्द खालसा कॉलेज, गुरुसर सुधार, लुधियाना होंगे।  इस अवसर पर श्रीमती डिम्पल मदान, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, स. बलदेव सिंह, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, श्रीमती मंजू भारद्वाज, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शिक्षा, ए.शि) फतेहगढ़ साहिब , आशीष कुमार, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) शहीद भगत सिंह नगर, स. जसविंदर सिंह विर्क, उप जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, मनोज कुमार, उप जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, नीलम गुप्ता, प्रांत संरक्षक, भारत विकास परिषद पंजाब, श्री रूपेंद्र शर्मा, हिंदी अधिकारी पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय बठिंडा, डॉ. मुकेश अरोड़ा सीनेटर, पंजाब विश्व विद्यालय पंजाब, श्री मनोज प्रीत, प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना।

श्री अशोक थापर राष्ट्रीय अध्यक्ष, शहीद सुखदेव थापर मैमोरियल ट्रस्ट, त्रिलोक चन्द भगत समाज सेवी विशेष महमान के रूप में पधारेंगे। 

 डॉ. नीरोत्तमा शर्मा, एसोसिएट प्रोफ़ेसर  मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना कार्यक्रम प्रबंधक होंगे। यह जानकरी मनोज कुमार हिन्दी शिक्षक संघ (रजि. ) पंजाब ने दी। यकीन रखिए इस बार भी यह प्रोग्राम याद गारी होगा। 

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Wednesday, June 7, 2023

आम जनता के जीवन को भी नज़दीक से देखा है लेखिका सुमिता ने

आंच में हैं गहन संवेदना का अहसास करवाती कविताएं 

मोहाली: 7 जून 2023: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सुमिता कुमारी उन कलमकारों में से हैं जो सत्ता में या सत्ता के नज़दीक रहते हुए भी अपने अंतर्मन में छुपे हुए  लेखक को जागरूक रखते हैं। आसपास के क्षेत्र में सब कुछ बारीकी से देखते भी हैं और फिर उसे बहुत ही सलीके से व्यक्त भी करते हैं। जब अनुभूति की अभिव्यक्ति का ढंग शायरी हो तो ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। इस ज़िम्मेदारी का अहसास आपको सुमिता जी की रचना में नज़र भी आएगा। गहनता से महसूस भी होगा। 

डयूटी के साथ साथ कलम की साधना आसान नहीं होती। बहुत से अनुशासन और बहुत से नियम--सब याद रखना पड़ता है। इस सब के बाद सम्भव हो पति है साहित्य की साधना। सुमिता कुमारी का जन्म 12 जून, 1983 को रामपुर नगवाँ, पालीगंज, पटना (बिहार) में हुआ। वह इतिहास एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर हैं। उनकी कविताएँ एवं कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘मौसम बदलने की आहट’ नामक कविता-संग्रह में कुछ कविताएँ शामिल हैं। ‘आँच’ उनका पहला कविता-संग्रह है। शायरी बहुत ही कोमल संवेदना भरी साधना होती है और इसके ज़रिए निष्ठुर समाज की बात करना बेहद मुश्किल भी होता है लेकिन सुमिता जी ने यह सब आसानी से किया। उनका काव्य संग्रह आंच बताता है कि उनकी काव्य साधना को अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान कितना तपना पड़ा होगा। कैसे कैसे हालात सामने आए हो सकते हैं।   

कलम और जीवन दोनों के दरम्यान संतुलन भी सहज नहीं होता। वर्तमान में वह बिहार के नालंदा में  प्रखंड विकास पदाधिकारी हैं। इसलिए समाज के बहुत से वर्गों के साथ उनका आमना सामना होता ही है। समाज के इन विभिन्न वर्गों के विभिन्न जीवन ढंग, दोगले चेहरे और गिरगिट की तरह बदलते रंग उन्होंने सब बहुत नज़दीक से देखा होगा।

उनमें कलम की क्षमता अद्भुत है। सुमिता कुमारी प्रतिभावान कवि और गद्यकार हैं। उन्होंने अपने आस-पास के जीवन को भी कविता में ढाला है और इस तरह कुछ मर्मस्पर्शी कविताओं की भी रचना की है। इन कविताओं की विशेषता यह है कि यह पहली बार पढ़ने या सुनने पर ही दिल में उतरती चली जाती हैं।  एक महिला होने के नाते उन्होंने महिला जीवन की विषमताओं और कठिनाइयों को भी नज़दीक से देखा। 

महिला जीवन को जब कोई महिला देखती है तो उसकी नज़र वो सब भी देख पाती है जिसे देखना या समझना सब के बस में होता ही नहीं। अगर इस पीड़ा को देखने समझने वाली महिला लेखिका भी हो तो बात ही कुछ और हो जाती है। उनको पढ़ने वाले प्रबुद्ध पाठक बताते हैं कि यहाँ स्त्रियों के पारिवारिक जीवन और श्रमिक स्त्रियों के संघर्ष तथा जीवट के नए चित्र मिलते हैं। ‘आँच’ शीर्षक कविता जीवन-संग्राम और प्रतिरोध की विशिष्ट कविता है। धान रोपती स्त्रियों और वृद्धाओं के जीवन के विश्वसनीय रेखांकन द्रवीभूत करते हैं। इन कविताओं की तेज आँच हमें तप्त कर देती है। अधिकांशतः ये कविताएँ गद्यबद्ध हैं। कहीं-कहीं लय का भी मिश्रण है। भाषा सरल, सहज और मुहावरेदार है। मगही के अनेक शब्दों का निपुण व्यवहार कवि की सृजन-क्षमता को दर्शाता है और उनकी रचनाओं को अद्वितीय बनाता है। कुछ नए बिम्ब और अलंकरण भी कवि ने सिरजे हैं। मगही भाषा की समृद्धि का समुचित उपयोग हिन्दी कविता में कम ही हो पाया है। इस तरह इस पुस्तक में संकलित रचनाओं ने इस पुस्तक को उन पुस्तकों के वर्ग में भी ला दिया है जो भाषा को अमीर बनाने में अपना योगदान देती हैं। 

उनको नज़दीक से जानने वाले साहित्यकार और कलाकार बताते हैं कि पेशे से प्रशासनिक पदाधिकारी होते हुए भी सुमिता जी ने निरन्तर काव्य-साधना की है और जीवन को बहुत ध्यान से देखा है। बहुत बारीकी से जीवन के उतराव चढ़ाव का जहां अध्यन किया है। लोगों के जीवन और उनके दुःख सुख बहुत ही नज़दीक हो कर देखे हैं। वास्तव में बाहरी दुनिया के साथ-साथ आन्तरिक दुनिया का भी वह अनवरत अवलोकन करती रहती हैं और इसके साथ साथ अत्यन्त व्यस्त दिनचर्या के बावजूद भी काव्य-रचना के लिए किंचित अवकाश निकाल ही लेती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए पाठक इसीलिए खो से जाते हैं क्यूंकि इन कविताओं में आवेग और त्वरा है जो सुमिता जी को बाक़ी सभी समकालीनों से पृथक एक विशिष्ट स्थान पर स्थापित करती है। इसलिए देश और दुनिया के साहित्य से भी उनका सम्पर्क निरंतर बना रहता है। वह पाठकों के पत्रों का जवाब भी देती हैं और उनके व्हाटसएप्प संदेशों का भी। समय मिलने पर आयोजनों में शामिल होने का भी प्रयास करती हैं। 

जल्द ही हमें उनकी काव्य रचनाओं और अन्य रचनाओं का नया संकलन भी मिले ऐसी आशा भी है और आकांक्षा भी। हम जल्दी ही देख पाएंगे उनकी नई पुस्तक इसकी उम्मीद हम भी को है। उनकी काव्य रचनाओं को पंजाबी और अन्य भाषाओं में अनुदित करने की संभावनाओं पर भी बात जल्दी ही हम सभी के पास खुशखबरी बन कर आएगी।  

देखिए उनकी एक रचना का रंग भी:

प्रेम//सुमिता

आसान नहीं था 

उसे जिंदगी में वापस खींच लाना

सब कुछ देकर ही तो उसने यह जिंदगी चुनी थी

वह हंसता-गाता और रोता भी था

लेकिन खुद को समभाव ही दिखाया सबको

मानवीय भावनाएं उसे साबित कर सकती थी सांसारिक

उसने कभी वादा किया था 

कि उसे सौंप देगा अपने जीवन का बसन्त

और पतझड़ में बिखरते हुए भी

उसने किसी सावन में भीगना नहीं चुना

उसे जिंदगी से मोह बस इतना था 

कि जिंदगी किसी की अमानत है

और देह से अपनापन इतना ही 

कि देह ने बसा रखी है किसी और की आत्मा

जिसका त्याग उसकी हत्या के बराबर है

उसे देखकर महसूस होता 

कि विरक्त-सा यह आदमी

लड़ रहा है युद्ध 

स्वयं के विरुद्ध

अपनी काया में जी रहा है अनागत अस्तित्व

जो कभी उसके जीवन का हिस्सा न बन सका


वह आंखें कितनी अनमोल होंगी 

उसकी बातें कितनी मर्मस्पर्शी

जिसमें डूबकर 

कोई सारी उम्र पार नहीं उतरना चाहता

भूल जाना चाहता है दुनियां

लेकिन उसे नहीं भूलना चाहता

उसके जाते

दुनियां में प्रेम करने लायक कुछ नहीं रहा


यह किसका भाग्य है किसका दुर्भाग्य

कितना उचित है कितना अनुचित

बहस का मुद्दा हो सकता है

मगर आधुनिकता के दौर में 

ऐसी आत्माओं ने ही बचा रखी है

प्रेम की आत्मा...

सुमिता (27-01-23)

आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। 

                                                                                 प्रस्तुति:कार्तिका कल्याणी सिंह (हिंदी स्क्रीन डेस्क)

Monday, February 13, 2023

ताज़ा ग़ज़ल//विजय तिवारी ‘विजय’

Sunday 12th February 2023 at 01:16 PM

जिसमें मिलेगी अतीत और आज की झलक 


लुधियाना12 फरवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां शिक्षा और साहित्य से जुड़े बहुत से लोग रहते हैं। बुलंद आवाज़ लेकिन बहुत ही सलीके से सच कहने वाले इन लोगों से मिल कर, इनका कलाम पढ़ कर लगता है जैसे भोपाल के जलवायु में ही कोई ऐसा जादू है जो कलम में इंकलाब ले आता है। वहां भोपाल जा कर इन लोगों के जनजीवन को नज़दीक से देखने का मन भी अक्सर होता है और कुछ समय इनके पास रहने का भी। बहुत ही गहरी बातें बहुत ही सादगी से कह जाते हैं ये लोग। कलम और कलाम की दुनिया में इनका कद बहुत ऊंचा ही बना रहता है इसके बावजूद मिलने वालों को इनकी विनम्रता और स्नेह हमेशां के लिए  अपना भी बना लेते हैं ये लोग। विजय तिवारी विजय  लम्बे समय से बहुत ही सादगी से बहुत ही गहरी बातों की शायरी  करते आ रहे हैं। उनकी शायरी सियासत की साज़िशों की बात भी करती है और जी टी रोड पर जीने को तरसती ज़िंदगी की बात भी। देखिए उनकी एक ग़ज़ल की झलक। आज के महाभारत में घिरे अभिमन्यु की चर्चा भी आपको इसी शायरी में मिलेगी और इसके साथ ही हिंदी की मधुरता और उर्दू की मिठास को एक दुसरे के नज़दीक लाने का ज़ोरदार प्रयास भी। मुशायरा कहीं भी हो उनकी हाज़री उसमें चार चाँद लगा देती है। उनकी कोशिश भी होती है कि निमंत्रण मिलने पर शामिल भी ज़रूर हुआ जाए। इसके बावजूद कभी कभी कोई मजबूरी आन ही पड़ती है तो उनके चाहने वाले उदास हो जाते हैं। आपको उनकी शायरी कैस लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही।  --रेक्टर कथूरिया 

कितनी मुश्किल से कटा दिन होश के मारों के बीच। 

शाम ए ग़म का शुक्रिया ले आई मयख़ारों के बीच ...


क्या कभी देखा है वो ग़ुब्बारा ग़ुब्बारों के बीच। 

पेट की ख़ातिर भटकता दौड़ता कारों के बीच...


रिंद ओ साक़ी जाम ओ पैमाना तलबगारों के बीच। 

आ गये सब ग़म के मारे अपने ग़मख़्वारों के बीच... 


चीख़ता ही रह गया मैं अम्न हूँ मैं अम्न हूँ। 

दब गई आवाज़ मेरी मज़हबी नारों के बीच...


बार ए ग़म से लड़खड़ाकर क्या गिरा मस्जिद में आज । 

यूँ घिरा जैसे शराबी कोई दींदारों के बीच...


मौसम ए तन्हाई में बहते हैं आँसू इस क़दर। 

दस्त में बहता हो जैसे झरना कुहसारों के बीच...


बज़्म ए जानाँ में मुझे देखा गया कुछ इस तरह। 

जैसे कोई ग़म का नग़मा कहकहाज़ारों के बीच...


या ख़ुदा अहल ए अदब में यूँ रहे मेरा वुजूद। 

एक जुगनू आसमाँ पर चाँद और तारों के बीच...


एक अभिमन्यु घिरा फिर धर्म संसद में ‘विजय’

रिश्तेदारों चाटुकारों और सियहकारों के बीच

                           ----विजय तिवारी ‘विजय’

चलते चलते विजय साहिब का ही एक और शेयर:

किसी के इश्क में दुनिया लुटा कर

सुखनवर हो गए हैं कुल मिलाकर! 

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