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Friday, November 28, 2025

मृत्युंजयी:भागवत झा ‘आज़ाद’ की महाकाव्य कृति का विमोचन

 प्रविष्टि तिथि: 28th November 2025 at 9:17 PM by PIB Delhi Regarding Book Release

"आज़ाद:एक सामाजिक चिंतक जो राजनीति से ऊपर उठे”–डॉ. सच्चिदानंद जोशी

भागवत झा की यात्रा:आंतरिक संघर्ष से संकल्प तक”–जनार्दन द्विवेदी


नई दिल्ली
: 28 नवंबर 2025: (PIB Delhi//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सुप्रसिद्ध लेखक और प्रखर राजनीतिक चिंतक भागवत झा ‘आज़ाद’ के सम्‍मान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित एक स्‍मरणीय अवसर पर उनके महाकाव्‍य ‘मृत्युंजयी’ का विमोचन किया गया और एक साहित्यिक चर्चा भी कार्यक्रम की अध्यक्षता राजनेता जनार्दन द्विवेदी ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य–सचिव डॉ. सचिदानंद जोशी उपस्थित रहे। वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता और आशुतोष ने भी अपने विचार साझा किए। स्वागत भाषण भागवत झा आज़ाद के ज्येष्ठ पुत्र राजवर्धन आज़ाद द्वारा दिया गया।

उस अवसर पर राजनीतिक नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि भागवत झा का जीवन आंतरिक संघर्ष से दृढ़ संकल्प तक की यात्रा था। उन्होंने आज़ाद के साथ बिताए कई व्यक्तिगत अनुभवों को भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि भागवत झा स्वतंत्रता सेनानियों की दूसरी पीढ़ी से थे, और वे उन्हें उसी पीढ़ी के एक प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। प्रारंभ से अंत तक वे एक ईमानदार और निष्कपट व्यक्ति बने रहे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यद्यपि उन्हें व्यक्तिगत रूप से भागवत झा आज़ाद से मिलने का अवसर कभी नहीं मिला, लेकिन धर्मयुग में उनके लेखन को पढ़ने का गहरा प्रभाव आज भी बना हुआ है। ऐसा हमेशा महसूस होता था कि राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी वे राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज की चिंताओं पर गहन मनन करते थे।

डॉ. जोशी ने आगे कहा कि उन्होंने लिखा है कि औपचारिक पदों और प्रचलित मार्गों से हटकर, जीवन के शांत और सरल पथों पर चलने का निर्णय स्वयं में एक गहन साधना है। विचारों की धारा भी आगे बढ़ती जाती है — उन नदियों की तरह जो एक-दूसरे में मिलकर विस्‍तृत होती जाती हैं, बिना सीमाओं के, बिना किसी अवरोध के। उनके लिए कविता केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि एक उपचार-प्रक्रिया थी जो भीतर की वेदना और संवेदनशीलता को शांत करती थी। यही कारण है कि यह कृति भी पाठक के मन पर वैसा ही शांत और पुनर्स्थापनकारी प्रभाव छोड़ती है।

आज़ाद जी के जीवन का सार मानो उनके ही शब्दों में सिमटा हुआ प्रतीत होता है — “मुझे सहारा मत दो, अवरोध दो; मैं अपना संसार स्वयं बना लूँगा। मैं भीख नहीं माँगता, मुझे स्वयं उठने दो।” ये पंक्तियाँ उनके संकल्प, आंतरिक शक्ति और अदम्य धैर्य की साक्षी हैं। यही कारण है कि इस कृति के दूसरे खंड में उनके जीवन के अनुभव, अपने क्षेत्र के प्रति वेदना, और उनकी आंतरिक दीप्ति अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रकट होते हैं।

पत्रकार आलोक मेहता ने कहा कि भागवत झा आज़ाद का व्यक्तित्व अत्यंत स्पष्टवादी, दृढ़-निश्‍चयी और अडिग था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतने ऊँचे कद के व्यक्तित्व के योगदानों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाना आवश्यक है। महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ के माध्यम से आज़ाद जी के बहुआयामी व्यक्तित्व को प्रभावशाली रूप से उजागर किया गया है। श्री मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि आज़ाद जी के भाषणों का संकलन एक अलग ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए, जिससे उनके विचार और विज़न सबके लिए सुलभ हो सकें।

इसके अतिरिक्त, मेहता ने आज़ाद जी की कुछ कविताएँ भी प्रस्तुत कीं, जिनमें पाखंड और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार किया गया है, साथ ही जातिवाद और साम्प्रदायिकता के विरुद्ध दृढ़ और अटूट संदेश भी निहित हैं। उन्होंने कहा कि इन पंक्तियों में केवल नैतिक साहस ही नहीं, बल्कि न्याय और सामाजिक सौहार्द के प्रति सतत् प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है — जो एक ऐसे दूरदर्शी विचारक की मूल भावना को अभिव्यक्त करती हैं, जिनकी रचनाएँ आज भी प्रेरणा देती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अशुतोष कुमार ने कहा कि भागवत झा आज़ाद को भारतीय दर्शन और बौद्ध धर्म का गहन ज्ञान था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यदि आज़ाद जी सक्रिय राजनीति में न होते, तो वे साहित्य के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करते। यह पुस्तक बुद्ध की संपूर्ण दार्शनिक यात्रा और अष्टांगिक मार्ग का स्पष्ट और विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है। मानव मुक्ति के सिद्धांतों पर आज़ाद जी का गहन मनन रहा, और यही गंभीर चिंतन महाकाव्य मृत्युंजयी  में प्रारंभ से अंत तक पूरी तरह से प्रतिध्वनित होता है।

डॉ. सविता झा ने महाकाव्य ‘मृत्युंजयी’ से चयनित पंक्तियों का पाठ किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि भागवत झा आज़ाद सक्रिय राजनीति में थे, परंतु मूलतः वे एक साहित्यकार थे और अंत तक साहित्यकार बने रहे। साहित्य के माध्यम से उन्होंने राजनीति से संवाद किया और अपने लेखन द्वारा राजनीतिक विमर्श को निरंतर समृद्ध किया। समारोह में अतिथियों का स्वागत भागवत झा आज़ाद के तीनों पुत्रों — डॉ. राजवर्धन आज़ाद, आईपीएस (सेवानिवृत्त) यशोवर्धन, और क्रिकेटर एवं सांसद कीर्तिवर्धन आज़ाद — ने किया।

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Saturday, September 16, 2023

"हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में हिन्दी शिक्षक संघ का विशेष आयोजन 17 सितम्बर को

मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन में होगा कार्यक्रम 

लुधियाना: 15 सितम्बर 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

पंजाब के पंजाबी परिवारों और सिख परिवारों में से
बहुत से कलमकार ऐसे हैं जिन्होंने उन दिनों भी हिंदी से अपना गहरा प्रेम बनाए रखा जब हिंदी के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे था। भाषा और साहित्य को भी कुछ लोग अपनी अपनी सियासत के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। हिंदी का साहित्य भी पंजाब के पर्यावरण की गहरी बातें करता है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी साहिब की कालजयी कहानी को पढ़े बरसों हो गए लेकिन वह आज भी ज़हन में है उसे पढ़ते हुए जहां पंजाब का रूमानी पर्यावरण सजीव हो उठता है वहीं युद्ध की भयानक वि विभिप्षा भी आने लगती है--अब भी जवानों के शहीद होने की खबरें उसी माहौल की याद दिलाने लगती हैं जिस का रूमानी सा लेकिन क़ुरबानी भरा रंग इस प्रसिद्ध कहानी-उसने कहा था में उभरता है--एक दिव्य प्रेम और एक युद्ध की कहानी का रंग---आज भी वह दिव्य प्रेम  और भावनाएं हमारे दिलों में है लेकिन युद्ध की कलि छाया निरंतर फैलती चली जा रही है-प्रेम और क़ुरबानी के उस रंग को गहरा करता है हर वह कार्यक्रम जो हिंदी दिवस के नाम पर मनाया जाता है-- "उसने कहा था" पर बहुत बाद में प्रसार भारती ने दूरदर्शन पर एक विशेष फिल्म भी बनाई थी। 

हिन्दी शिक्षक संघ (रजि.) पंजाब द्वारा "हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में 17 सितम्बर, 2023  दिन रविवार को मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना में कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें सरकारी स्कूलों के 8वीं,10वीं,12 वीं कक्षा बोर्ड परीक्षा में 95% अंक प्राप्त करने वाले छात्र एवं उनके अध्यापक सम्मानित किये जायेंगे।

इसमें प्रमुख वक्ता डॉ. बलवेन्द्र सिंह (सहायक आचार्य) स्नातकोत्तर हिन्दी-विभाग डी.ए.वी. कॉलेज जालन्धर और डॉ. राजेन्द्र साहिल, एसोसिएट प्रोफेसर गुरु हरगोबिन्द खालसा कॉलेज, गुरुसर सुधार, लुधियाना होंगे।  इस अवसर पर श्रीमती डिम्पल मदान, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, स. बलदेव सिंह, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, श्रीमती मंजू भारद्वाज, जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शिक्षा, ए.शि) फतेहगढ़ साहिब , आशीष कुमार, जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) शहीद भगत सिंह नगर, स. जसविंदर सिंह विर्क, उप जिला शिक्षा अधिकारी (सै.शि) लुधियाना, मनोज कुमार, उप जिला शिक्षा अधिकारी (ए.शि) लुधियाना, नीलम गुप्ता, प्रांत संरक्षक, भारत विकास परिषद पंजाब, श्री रूपेंद्र शर्मा, हिंदी अधिकारी पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय बठिंडा, डॉ. मुकेश अरोड़ा सीनेटर, पंजाब विश्व विद्यालय पंजाब, श्री मनोज प्रीत, प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना।

श्री अशोक थापर राष्ट्रीय अध्यक्ष, शहीद सुखदेव थापर मैमोरियल ट्रस्ट, त्रिलोक चन्द भगत समाज सेवी विशेष महमान के रूप में पधारेंगे। 

 डॉ. नीरोत्तमा शर्मा, एसोसिएट प्रोफ़ेसर  मालवा सैन्ट्रल कॉलेज ऑफ ऐजुकेशन फ़ॉर वूमन लुधियाना कार्यक्रम प्रबंधक होंगे। यह जानकरी मनोज कुमार हिन्दी शिक्षक संघ (रजि. ) पंजाब ने दी। यकीन रखिए इस बार भी यह प्रोग्राम याद गारी होगा। 

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Tuesday, May 3, 2022

ज़िंदगी का असली संदेश देती हुई रजनी शर्मा की एक नई रचना

 अक्षय तृतीया , ईद एवं परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 

रजनी शर्मा अध्यापन के क्षेत्र में है और प्राकृतिक सौंदर्य के नज़दीक रहने का सौभाग्य भी। उनकी रचना भी बहुत ही सलीके और  कोई न कोई सीख देती है। इसका अहसास आपकी उनकी यहां दी जा रही रचना पढ़ कर भी होगा। बहुत ही बेबाकी से बहुत ही पते की बात। --रेक्टर कथूरिया 

Pexels Photo by Alena Darmel

दिल में इतना ज़हर न घोलो।

 ईद मुबारक सबको बोलो ।


नर्क सरीखी कर दी दुनिया,

नफ़रत से क्यों भर दी दुनिया,

 विष अमृत में अब ना घोलो।

ईद मुबारक सबको बोलो ।।


पूजा और अजान करें हम,

गीता और कुरान पड़ें हम,

प्यार ख़ज़ाने अब तो खोलो।

ईद मुबारक सबको बोलो।।


अपनों से ना डर लगता हो,

 अपना घर अपना लगता हो,

 फिर नानक सा तेरह तोलो,

ईद मुबारक सबको बोलो।।


सच हो अब ज़ुबान पे सब के,

पत्थर उछले न मकान पे सब के,

आपस की नफ़रत को छोड़ो।

ईद मुबारक सबको बोलो।।

!!रजनी शर्मा!!  

Friday, June 12, 2020

एक कटोरी सब्जी : रुबिता अरोड़ा

ज्यादा निकटता कहीं जी का जंजाल  न बन जाये !!!

लुधियाना: 12 जून, 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::
लेखिका : रुबिता अरोड़ा 
मेरा बचपन बेहद गरीबी मे बीता। पिता जी नहीं थे माँ मेहनत करके घर का खर्चा चलाती। घर मे आर्थिक तगी के चलते मेरीे स्कूल की फीस, कापी किताबों का खर्च उठाना माँ के लिए बहुत मुश्किल हो फिर भी माँ के चेहरे पर एक भी शिकन देखने को न मिलती। उनका बस एक ही सपना था मैं पढलिख कर अपने पैरों पर खडी हो जाऊ।खाने के नाम पर तो हम माँ बेटी रूखासूखा खाकर ही खुश हो लेती। तभी हमारे पडोस मे शर्मा आन्टी रहने को आई। पढी लिखी, समझदार, बाणी मे प्रेम सभी गुण तो थे उनमें। एक दिन जब वे हमारे घर आई तो हम माँ बेटी खाना खा रही थी। हमारी थाली मे पडे खाने को देखकर उन्हें बहुत बुरा लगा। वे झट से अपने घर से खाना ले आई। माँ ने मना करने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके हठ के आगे एक न चली। उनके हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाकर मेरी तो आत्मा ही जैसे तृप्त हो गई औऱ फिर उस दिन से शुरू हो गया शर्मा आन्टी के घर से कटोरियो का आना जाना। वे जब भी कुछ अच्छा बनाती पहले हमारे घर देने जरूर आती। माँ ने कई बार सकोच दिखाया पर वे न मानी। अब तो अक्सर वे हमारे घर आती, बडे प्यार से मुझे पास बिठाकर खाना खिलाती,पढाई मे भी पूरी मदद करती। माँ की बिमारी हो या मेरी परिक्षा मुझे पूरा सहयोग मिलता। मेरे लिए तो वे मेरी दूसरी माँ जैसी थी। समय बीतता गया। मै उच्च शिक्षा के लिए शहर आ गई। उनके भी पति का तबादला कहीं औऱ हो गया। फिर हम कभी मिल तो न पाई लेकिन जो अपनापन मुझे उनसे मिला, शायद कोई अपना भी नहीं दे पाता। आज मै उच्च पद पर कार्यरत हूँ लेकिन यहाँ तक पँहुच कर जो कामयाबी मुझे मिली इसमें आँटी का बहुत बडा हाथ है।
अभी कुछ दिन पहले हम यहाँ नई कालोनी मे रहने आए। मैंने दफ्तर से दो दिन की छुट्टी ले ली ताकि अपना सामान सही से जमा लूँ। पति को दफ्तर व बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अभी अपना काम शुरू ही किया था कि डोरबैल बजी। पास मे रहने वाली मिसेज खन्ना हाथ मे सब्जी की कटोरी लिए मुझसे मिलने आई। उनका अभिवादन किया औऱ फिर शुरू हुआ उनकी बातों का सिलसिला या यूँ कहो पास मे रहने वाली मिसेन खुराना की बुराइयों का सिलसिला, जो खत्म होने का नाम ही नही ले रहा था। तकरीबन तीन घंटे बीतने के बाद मिसेज खन्ना यह कहते हुए अपने घर गई कि अभी आपको बहुत काम है, सो जल्दी जा रही है, फिर कभी बैठकर ढेरों बातें करेगी। दोपहर हो चुकी थी। बच्चे स्कूल से आते होगे यह सोचकर खाना बनाने मे जुट गई बाकी काम यूँ का त्यों पडा रहा। अगले दिन बडी उम्मीद से शुरू किया तभी हाथ मे कटोरी लिए इस बार मिसेज खुराना चली आई। फिर से बातों का सिलसिला चला। इस बार मिसेज खन्ना की बुराइयाँ मुख्य विषय रही। जैसे तैसे उन्हें उनके घर भेज कर मैंने चैन की साँस ली। ये दो सब्जी की कटोरियाँ मेरे लिए जी का जन्जाल बन चुकी थी। मैंने इन दो छुट्टियों मे जो काम करने थे वे सब धरे के धरे रह गए।मैं सोच रही थी समय बीतने के साथ इन सब्जी की कटोरियो के स्वरूप मे कितना परिवर्तन आ गया है। पहले जहां सब्जी की कटोरी मे अपनेपन,प्रेम, समर्पण की भावना होती थी वही आज नफरत, स्वार्थ, ईष्या का तडका लगाया जाता है। अगले दिन हम सुबह पार्क मे मार्निग वाक के लिए निकले तो साथ मे दोनों कटोरियाँ भी उठा ली। कुछ ही दूरी पर मिसेज खन्ना औऱ फिर मिसेज खुराना भी मिल गई। हमने उनको धन्यवाद देते हुए उनकी कटोरियाँ वापस की औऱ साथ ही विनम्रता से कहा हम तो नौकरी पेशा है सुबह दफ्तर के लिए निकलते है तो शाम तक ही घर लौटते है। माफ कीजिये लेकिन ये कटोरियो के लेनदेन का सिलसिला आगे नहीं बढा सकते। निरसदेह पडोसी एक दूसरे के सुख दुख के साथी होते है लेकिन एक दूसरे की चुगलियाँ करना या इधर उधर की हाँकने के लिए आज की सभ्य व शिक्षित पीढी के पास समय ही कहाँ है। --*रुबिता अरोड़ा   
*रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।  

Wednesday, January 8, 2020

नीलिमा शर्मा की काव्य रचना सफेद कुरता सीधा दिल में उतरती है

इसके बाद कौंधती हैं दिमाग में यादों की बिजलियां 
अब तुम कही भी नही हो
कही भी नही
ना मेरी यादो में
न मेरी बातो में
अब मैं मसरूफ रहती हूँ
दाल के कंकड़ चुन'ने में
शर्ट के दाग धोने में
क्यारी में टमाटर बोने में
एक पल भी मेरा
कभी खाली नही होता
जो तुझे याद करूँ
या तुझे महसूस करू
मैंने छोड़ दिए
नावेल पढने
मैंने छोड़ दिए है
किस्से गढ़ने
अब मुझे याद रहता हैं बस
सुबह का अलार्म लगाना
मुंह अँधेरे उठ चाय बनाना
और सबके सो जाने पर
उनको चादर ओढ़ाना
आज तुमको यह कहने की
क्यों जरुरत आन पढ़ी हैं
सामने आज मेरी पुरानी
अलमारी खुली पड़ी हैं
किस्से दबे हुए हैं जिस में
कहानिया बिखरी सी
और उस पर मुह चिडाता
तेरा उतारा सफ़ेद कुरता भी
नही नही !! अब कही भी नही हो
न मेरी यादो में न मेरी बातो में
फिर भी अक्सर मुझको सपने में
यह कुरता क्यों दिखाई देता हैं...... --नीलिमा शर्मा 
नीलिमा शर्मा के ब्लॉग में उनकी यह काव्य रचना "सफेद कुरता" एक यादगारी प्रभाव छोडती है। सीधा दिल में उतरती है और फिर दिमाग में किसी बिजली की तरह कौंधने लगती है। उन अहसासों की अनुभूति कराती है जब हम बहुत कुछ भूलना चाहते हैं।  खुद को इधर उधर व्यस्त करते हैं लेकिन फिर भी खुद बेबस सा पाते हैं। जल्द ही यूं लगता है जैसे हार रहे हैं।  कभी कभी तो हारने का मन भी होता है।  लेकिन दिल की बातें न समाज सुनता है न ही दिमाग। उस उधेड़बुन के अहसास को महसूस करना, पकड़ पाना पाना या शब्दों में बांध पाना आसान कहां? इसके बावजूद  इसे बहुत ही सादगी और खूबसूरती से प्रस्तुत किया है नीलिमा शर्मा ने सफेद कुरता नाम की अपनी काव्य रचना में। 
कभी जानमाने शायर अहमद फ़राज़ साहिब ने कहा था न--
पहले पहले का इश्क अभी याद है फ़राज़!
दिल खुद यह चाहता था कि रुसवाईयां भी हों! इसके साथ ही उनका एक और शेयर याद आता है---
वो मुझ से बिछड़ कर खुश है तो उसे खुश रहने दो “फ़राज़ “
मुझ से मिल कर उस का उदास होना मुझे अच्छा नहीं लगता…
मोहब्बत में कैसे कैसे उतराव चढ़ाव आते हैं, कैसे कैसे ख्याल  हैं उनको पकड़ पाना या याद रख पाना आसान नहीं होता। ज़िंदगी के फ़र्ज़ों और ज़िम्मेदारियों का गहन अंधेरा और उस अंधेरे में कौंध जाना यादों की बिजलियों का।  जैसे बिजली का कौंध जाना बरसात के मौसम में किसी कठिन पहाड़ी रास्ते में पल भर में रास्ता दिखा जाता है बस उसी तरह यादों का अहसास ज़िंदगी में भी मार्गदर्शन करता है। उस अहसास को महसूस करना भी आसान नहीं होता जिसे पकड़ने में सफलता पाई है नीलिमा शर्मा जी ने। इस सफल रचना के लिए एक बार फिर से बधाई। --रेक्टर कथूरिया