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Wednesday, March 18, 2026

बलिदान मेरा पल पल जीवन.........प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

Pranendra Nath Misra on Friday 13th March 2026 at 22:35 Regarding Men Community

एक पुरुष हूं मैं........!


ना छंद किसी की कविता का

आनंद नहीं किसी गीत का मैं,

नहीं लचक किसी भी ग़ज़ल का हूं

नहीं सरगम हूं, संगीत का मैं।


पाषाण सदृश, मैं रूपहीन

मरुभूमि कणों सा शुष्क हूं मैं

पुरुषार्थ हूं मैं इस धरती का

वर्णना हीन, एक पुरुष हूं मैं।


स्वर और व्यंजन से सजे हुए

शब्दों में मेरा लालित्य नहीं

मैं प्रभा, रश्मि रचनाओं का

हूं जनक, मगर आदित्य नहीं।


जाने क्यों कवि, कवियत्री की

लेखनी नहीं चलती मुझ पर,

कल्पनातीत चिंता धारा

पुरुषों से विमुख, बहती निर्झर।


मैं पिता,  सृष्टि आधार हूं मैं

बलिदान मेरा पल पल जीवन

हर व्यथा, मृदुल मुख सह जाता

कितना भी करुण हो अंतर्मन!


है नहीं, मायका कोई मेरा 

न ही ऐसा कोई आँगन है 

जिस जगह मैं लौटूँ निःसंकोच 

न ही पीहर का कोई प्रांगण है। 


मन भारी हो तो, कहाँ जाऊँ 

नहीं गोद जहां मैं सिसक सकूँ 

दीवार नहीं ऐसी है कोई 

आँसू को बहाकर लिपट सकूँ 


माना कोई कोख नहीं मेरी 

संवेदना मेरी पर, कम तो नहीं 

पुरुषार्थ कवच से ढकी हुई 

मेरे मन की वेदना शम तो नहीं


मैं पुरुष हूँ रोना है निषिद्ध 

मैं अंतर्मन में रोता हूँ 

मेरे भी आँसू उष्ण, द्रवित 

मैं अंतर्मन को भिगोता हूँ   


संवेदना भरी आकंठ करुण

आंसू रुकते बन वाष्परुद्ध

पथरायी आंख देखती है

भीतर आवेशित हृदय क्षुब्ध।


अंतरज्वाला में धधक धधक

आंसू, वाष्पित कर देता हूँ ,

आवेग की सीमा बंधी हुई

"निष्ठुर" संज्ञा, सह लेता हूँ 


मन की अनुभूति न कह पाया

अपना ही कष्ट न रोया कभी

जब हृदय विदीर्ण हुआ खंडित

तब कई रात, नहीं सोया कभी।


मन का आवेग मचलता है

वेदना मेरी पर, निर्जन है

करता हूं समय का आलिंगन

मेरे मन में तन, तन में मन है।


कभी हृदयग्रंथ जब पढ़ता हूं

अध्याय विषम मिलते है कई

मैं पुरुष, सांत्वना मिलती फिर

आरंभ नया दिन, रात नई।

             ,,,,प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

पुण्यतिथि पर पंडित वेद दीवाना

Rajiv Kumar on Wednesday 18th March 2026 at 07:51 Regarding Anniversary of Pt. Ved Dewana

यह पंक्तियां राजीव कुमार ने पंडित वेद दीवाना जी की स्मृति में भेजी 


ख़ुश्क आँखें हो गईं ग़म भी पुराने हो गए

आ तुझे देखे हुए कितने ज़माने हो गए


ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तारी का ये आलम रहा

सुबह के ग़म शाम होते ही पुराने हो गए


तुमने जिसको क़त्ल करके छीन ली थी जायदाद

ज़ालिमों उस शख्स के बच्चे सयाने हो गए


ख़त्म होते ही बसेरा बाग़ से शहबाज़ का

पेड़ की शाख़ों पे कितने आशिआने हो गए


चाँद निकला फूल महके चल पड़ी ठंडी हवा

तेरी याद आई तो सब मंज़र सुहाने हो गए


कया करूँ इस दिल का तो सोचा बहुत कुछ था मगर

वो जब आया ख़त्म सब हीले बहाने हो गए


आज "दीवाना "मेरे हाथों में पत्थर देख कर

शहर के सारे मकां आईनाखाने हो गए

                        वेद दीवाना

 चलते चलते उन्हीं की दो और पंक्तियां:

दिल के सिवा कोई भी शरीके सफ़र न था

गुज़री है सारी उम्र इसी अजनबी के साथ

Thursday, November 28, 2024

मुल्क सारा बज़ार जैसा है//ह्रदयेश मयंक की एक नई ग़ज़ल के कुछ शेर

 Hindi Poem Posted by Haridyesh Mayank on 26th November 2024 at 5:55 PM FB

दिल मेरा इश्तहार जैसा है.... !


आज ह्रदयेश मयंक की एक नई ग़ज़ल के कुछ शेर जो दिल से लेकर बाज़ार तक की बात करते हैं। निवास मुंबई में है। चिंतन दिशा की संपादक और प्रकाशक हैं। पत्रिका संचालन के चलते स्वनिर्भर भी हैं। वास्तव में नीतिगत और विचारधारक पत्रिकाएं समय भी मांगती हैं, मुश्किलों से जुटाया हुआ धन भी और इसके साथ ही, दिल, दिमाग की पूरी ऊर्जा भी। आसान नहीं होती साहित्य साधना, पत्रकारिता और लेखन। देखिए ह्रदयेश मयंक जी  शायरी का एक अंदाज़। --रेक्टर कथूरिया//संपादक: हिंदी स्क्रीन 


लम्हा- लम्हा उधार जैसा है 

मुल्क सारा बज़ार जैसा है 

सारी दुनिया ख़रीद ली मैंने 

फिर भी दिल बेक़रार जैसा है 

ज़िन्दगी रूठकर निभाती रही 

उसका गुस्सा भी प्यार जैसा है 

हर तरफ़ ,शोर है ,तमाशा है 

सारा मंज़र ग़ुबार  जैसा है 

हर्फ़-ब-हर्फ़ आईने की तरह 

दिल मेरा इश्तहार जैसा है।

    ----सोशल मीडिया से साभार ह्रदयेश मयंक

आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। नीचे कुमेंट बॉक्स में आपके विचारों की  इंतज़ार रहेगी ही। अपना नाम, स्टेशन का नाम और मोबाईल नंबर साथ लिखेंगे ऑटो हमें ज़्यादा अच्छा लगेगा। 

Thursday, October 17, 2024

PEC:14 से 16 अक्टूबर तक तीन दिवसीय कविता कार्यशाला का सफल आयोजन

Thursday 17th October 2024 at 5:29 PM Email K K Singh PEC 

डा.शम्स तबरेज़ी और डा.अनीश गर्ग, ने सिखाई काव्य की बारीकियां 


चंडीगढ़: 17 अक्टूबर, 2024: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

जब इंजीनिरिंग और कविता की उड़ान मिलते हैं तो बहुत से नए करिश्मे सामने आने लगते हैं। PEC के छात्रों के लिए इस तरह के करिश्मों को सामने लाने वाली  काव्य वर्कशाप आयोजन कुछ ऐसा ही तजुर्बा था।  बारीकियां सामने लाने लाने  हुए थे दो जानेमाने शायर डा. शम्स तबरेज़ी और डा. अनीश गर्ग। 


पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (PEC) के हिंदी संपादक मंडल (HEB) ने
14 से 16 अक्टूबर तक तीन दिवसीय कविता कार्यशाला का सफल आयोजन किया, जो उनके ओआई लोकेश सर के निर्देशन में संपन्न हुआ। इस कार्यशाला में 40 से अधिक छात्रों ने भाग लिया। इसमें दो प्रख्यात कवियों, डॉ. शम्स तबरेज़ी और डॉ. अनीश गर्ग, ने छात्रों को कविता लेखन और पठन की बारीकियों से परिचित कराया।

डॉ. शम्स तबरेज़ी, जो अपनी गहन और भावपूर्ण कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं, ने आत्म-अभिव्यक्ति के महत्व और शब्दों की शक्ति पर चर्चा करते हुए कार्यशाला की शुरुआत की। उन्होंने छात्रों को अपनी आंतरिक सोच और भावनाओं को कविता के माध्यम से व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया, ताकि यह कला उनके व्यक्तिगत अनुभवों का प्रतिबिंब बने। डा. शम्स तबरेज़ी की शायरी भी बहुत  है। उनकी शायरी की एक झलक आप देख सकते हैं बस यहां क्लिक कर के। 

डॉ. अनीश गर्ग, जो काव्य तकनीकों में अपनी मुहारत के लिए जाने जाते हैं, ने छात्रों को कविता के तकनीकी पहलुओं जैसे ताल, छंद और चित्रण से परिचित कराया। उन्होंने इंटरैक्टिव सत्र भी आयोजित किए, जहां प्रतिभागियों ने विभिन्न कविताओं में गहरे अर्थों की परतों की पहचान और सराहना करना सीखा। इस सेशन में सवाल जवाब का सिलसिला काफी दिलचस्प रहा। 

शायरी पर इस कार्यशाला ने सैद्धांतिक ज्ञान और व्यावहारिक अभ्यास का संतुलित मिश्रण प्रदान किया, जिससे छात्रों को विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में अपनी कविताएं लिखने का अवसर मिला। इस मार्गदर्शन का इन छात्रों को आगे चल कर फायदा भी बहुत होगा। PEC में आयोजित इस कार्यशाला के अंत तक, प्रतिभागियों ने अपनी लेखन क्षमता में पहले से बहुत अधिक आत्मविश्वास महसूस किया और इस अवसर के लिए प्रशंसा व्यक्त की कि उन्हें इतने कुशल कवियों से सीखने का अवसर मिला।
 
कुल मिला कर यह आयोजन अत्यंत सफल रहा, जिसने छात्रों को प्रेरित और उत्साहित किया, और उनकी काव्य यात्रा को जारी रखने की नई ऊर्जा प्रदान की।

"गीत मेरी मातृभाषा का; है न चाकू जैसी !

कविता//मातृभाषा//सुखपाल 


सभी काम कर लेता है 

तीस साला डेविड 

'हैंडीमैन' हमारे अस्पताल का।

सफाई

टपकती छत की मुरम्मत 

बिजली वाले यंत्र ठीक करना 

टूटी हुई पाइपें जोड़ना 

फर्नीचर बनाना 

ड्राईवाल लगाना 

टायलेट फिट करना 

मशीनें ठीक करना....

दफ़्तर की चाबी घर भूल आया मैं 

डेविड को पूछा...

वह‌ बोला...

"चाबी तो है नहीं 

लेकिन दरवाजा खोल देता हूं तेरा !"

जेब से चाकू निकाल 

डेविड ने ताले के सुराख में झांका 

झट से दरवाजा खोल‌ मारा

और बोला -

चाबी की बजाय चाकू रखा करो जेब में 

"चाबी से एक दरवाजा खुलता है 

चाकू से बहुत सारे 

रोटी वाला भी..."

खुला का खुला रह गया मेरा मुंह 

" इतने काम कहां सीखें, डेविड ?"

वह मुस्कुराया -

" बहुत खराब था मेरा बचपन.."

चाकू हवा में उछाल 

धार की ओर से बोच कर

तीखे स्वर में गीत गुनगुनाते हुए 

वह चल पड़ा ‌दूसरी ओर...

मैंने पीछे से आवाज़ लगाई 

" किस भाषा का गीत है..?"

सिर घुमाकर बोला -

" मेरी मातृभाषा का

है न चाकू जैसी !

यह भी बहुत दरवाजे खोलती है 

मेरे लिए..."

👌🏽👤👌🏽

पंजाबी मूल : सुखपाल 

हिन्दी अनुवाद : गुरमान सैनी 

संपर्क : 9256346906

Wednesday, July 10, 2024

ग़ज़ल//कृष्णा गोयल

Monday 8th July 2024 at 20:45 

जिसकी भावनाएं आप इसे पढ़ कर महसूस कर सकते हैं 


आग जो जल रही थी बुझाने के बाद;

शायरा कृष्ण गोयल 

आएगी फिर खुशी वह जमाने के बाद।


आज तुम ही डरा क्यों रहे हो हमें;

क्यों रुला भी रहे हो हंसाने के बाद। 


जब तुम्हें मान भाई लिया हमने फिर;

हुए दगाबाज भाई कहाने  के बाद। 


क्यों रहे मार डंक  यार आस्तीन में;

दूध भी प्यार से यूं पिलाने के बाद।  


हाथ तुम जो बढ़ाओ ज़रा प्यार का;

आज भाई बनें शिकवे मिटाने के बाद।

***

 *चंडीगढ़ के निकट ही पंचकूला में रहने वाली शायरा कृष्णा गोयल पूर्व ज्वाइंट रजिस्ट्रार रहे हैं। ज़िन्दगी के उतराव चढ़ाव  हरे सफर में उन्होंने दुनिया को बहुत नज़दीक से देखा है। उनकी पैनी नज़र की यह काव्य पूर्ण अनुभूति बहुत गहरी रही है। इसकी अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में अक्सर झलकती भी है। आपको उनकी यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। 

Sunday, March 17, 2024

नवरंग लिटरेरी सोसायटी फिर सजाई लुधियाना में अदबी महफिल

Sunday 17th March 2023 at 20:09 

शायरों ने फिर दिया समाज और दुनिया को ढाई आखर प्रेम का ज्ञान


लुधियाना
: 17 मार्च 2024:(कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

लुधियाना यूं तो कारोबारी शहर है। बिलकुल महानगर जैसा लेकिन फिर भी यहाँ शायरी लगातार फलफूल रही है। दशकों पहले साहिर लुधियानवी साहिब ने शायरी के जो बोल और सुर इस शहर की फ़िज़ायों में घोले थे उनका अहसास आज भी होता है। साहिर साहिब के बाद जनाब कृष्ण अदीब और अजायब चित्रकार जैसे समर्पित कलमकारों ने शायरी  के इस माहौल को अमीर बनाया। 

इसी परम्परा को ज़िंदा रखने वालों में नवरंग लिटरेरी सोसायटी भी है। जनाब सागर सियालकोटी साहिब सरदार पंछी और कई दुसरे शायर अपने अपने कलाम में लुधियाना के शायरी पसंद लोगों को उन्ही  के दिल की गहरी और सच्ची बातें  सुनाते रहते हैं। 

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज की इस अदबी महफ़िल का स्थान श्री यशपाल गोसाईं जी का दफ्तर रखा गया था। चंडीगढ़ रोड पर फोर्टिज हस्पताल के नज़दीक सत्संग घर गेट नंबर 7 के सामने बने इस कार्यालय में हुआ  इस छोटी सी अदबी महफ़िल  का आयोजन। 

इस मौके पर सागर सिसलकोटी, विजय वाजिद, ए पी मौर्य, पाल संसारपुरी, गगन, केवल दीवाना, अशोक सन्यासी व रविन्द्र अग्रवाल ने अपने कलाम से महफ़िल में चार चाँद लगाए। नवरंग के अध्यक्ष सागर स्यालकोटी जी ने कहा ऐसी अदब की महफिलें सजती रहनी चाहिए इससे आपस में प्यार बढ़ता है और साहित्यकार अपनी रचनाओं से समाज की समस्याओं को उजागर करते हैं। नवरंग की कोशिश रहेगी कि हर माह में काव्य गोश्ठी का आयोजन करती रहेगी।

गौरतलब है कि उस्ताद शायर सागर सियालकोटी साहिब उर्दू ज़ुबान और शायरी की गहरी समझ रखते हैं। शायरी का मर्म समझने के लिए कई बार बहुत से साहित्य प्रेमी और खुद शायर भी सागर साहिब के साथ फोन पर मशवरा करते हैं। आज की महफ़िल भी बेहद ख़ास रही। 

Wednesday, February 14, 2024

तहज़ीब द्वारा 16 वां राष्ट्रीय मुशायरा 18 फरवरी को

Wednesday:14th February 2024 at 13:02 

इस मुशायरे में शिरकत कर के  सकेंगे बहुत सी अनमोल यादें 


लुधियाना
: 14 फरवरी 2024: (छाया शर्मा//हिंदी स्क्रीन डेस्क):: 

बाग़ में धीमी-धीमी चलती हवा पौधों को झूमने लगा देती है और फूलों से ख़ुशबू लेकर दूर-दूर तक फैला देती है। यही हवा सोये हुओं को जगाने का काम भी करती है। लुधियाना के 16वें कुल हिंद मुशायरे में शायरी की कुछ ऐसी ही हवा चलने वाली है। 

ख़ास और ख़ूबसूरत बात ये है कि इस मुशायरे में शिरकत कर रहे सभी शायर इसी मंद-मंद चलने वाली पुरवाई के नुमाईंदा शायर हैं। आपकी शाइरी, सुनने वालों के ज़ह्न से होते हुए सीधा दिल में जगह बना लेती है। तहज़ीब द कल्चर ऑफ लव सोसाइटी को ये शरफ़ हासिल हुआ है कि लुधियाना शहर के सुख़न फ़हम लोगों को ऐसे बेहतरीन शायरों से रू-ब-रू किया जाए।

तो आइये 18 फ़रवरी, इतवार को शाम 4:30 बजे नेहरू सिद्धांत केंद्र, फ़िरोज़ गाँधी मार्केट लुधियाना में इस शानदार मुशायरे का लुत्फ़ उठाने के लिये। मुशायरा की तैयारी संबंधी एक एग्जीक्यूटिव मीटिंग विवेकानंद मेडिटेशन पिरामिड में रखी गई जिसमें अनिल भारती, मुकेश आलम,प्रोफेसर सुरेंद्र खन्ना, अशोक धीर, राकेश खरबंदा, छाया शर्मा, मनीष कक्कड़ व राजेंद्र शर्मा उपस्थित थे।

इस बार भी यह मुशायरा ऐतिहासिक साबित होगा और हर बार की तरह इस बार भी अपनी बहुत सी यादें छोड़ जाएगा। इसमें आप बहुत से जानेमाने शायरों को बहुत नज़दीक से देख सुन सकेंगे और उनके अंदाज़ कॉमन में बसा सकेंगे। 

गौरतलब है कि यह मुशायरा कुछ बहुत ही गहरी यादों के सिलसिले को आगे बढ़ाता है। दिल से जुडी यादें। दोस्ती से जुडी यादें। करीब 17  बरस पहले जनाब मुकेश आलम साहिब के एक मित्र हुआ करते थे सुखबीर टोनी साहिब। बहुत ही मिलनसार और संवेदनशील इंसान। उनका होना बहुत से लोगों की ज़िन्दगी के लिए बेहद ज़रूरी भी था।शायरी के लिए भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती। 

16 फरवरी 2019 के मुशायरे की एक यादगारी तस्वीर 

लेकिन अचानक एक वज्रपात हुआ और होनी हो के ही रही। उनका साथ हम सभी के साथ टूट गया। मौत ने उन्हें हमसे छीन लिया। उनकी याद में मुकेश आलम सहिब और अन्य दोस्तों ने इस मुशायरे की शुरुआत की। तब से मुशायरे का यह सिलसिला लगातार जारी है।

आखिर में जनाब राकेश खरबंदा जी के शब्दों में भी कुछ शब्द/कुछ पंक्तियां:

जिस पत्थर पर बैठ के मैंने याद किया था तुमको

आ कर देखो लोग उसे अब मंदिर बोल रहे हैं

प्यारे दोस्त सुखबीर टोनी की पाकीज़ा और लाफ़ानी याद में Tehzeeb - The Culture of Love की जानिब से लुधियाना का शानदार कुल-हिन्द मुशायरा 

👉इतवार, 18 फ़रवरी 2024 को शाम 4:30 बजे होने जा रहा है👈

आइए 'सुखबीर टोनी' की रूहानी शख़्सियत से मुलाक़ात करते हैं ❤️❤️

स्थान- नेहरू सिद्धांत केन्द्र, फ़िरोज़ गाँधी मार्केट, पक्खोवाल रोड, लुधियाना

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Thursday, February 8, 2024

स्व. कृष्णबिहारी नूर पर एक विशेष पोस्ट और श्रद्धासुमन

 Tuesday 30th January 2024 at 04:46 AM 

स्व. कृष्णबिहारी नूर पर एक विशेष पोस्ट और श्रद्धासुमन

*डा. कृष्णकुमार 'नाज़' साहब की कलम से.... 

उनकी दोस्ती हर धर्म और हर वर्ग के लोगों से थी 


शायरी और शायरों की दुनिया
: 8 फरवरी 2024: (*
डा. कृष्णकुमार 'नाज़'//हिंदी स्क्रीन डेस्क):: 

गेहुँआँ रंग, उभरा हुआ माथा, काले रँगे हुए बाल, क्लीनशेव चेहरा, होंठों पर निरन्तर तैरती मुस्कान, हर समय कुछ न कुछ खोजती रहने वाली चमकदार आँखें; ये सब बातें यदि किसी अच्छे चित्रकार को बता दी जाएँ तो वह अपनी तूलिका से जो चित्र तैयार करेगा, वह निस्सन्देह श्री कृष्णबिहारी ‘नूर’ का होगा। चूड़ीदार पाजामा, ढीला कुर्ता और उस पर जैकेट पहने नूरसाहब जब मुशायरों और कवि-सम्मेलनों के मंचों पर जाते, तो पहली नज़र में ही ऐसा लगने लगता था कि जैसे लखनवी नज़ाकत और नफ़ासत सिमटकर उनकी आग़ोश में आ गयी हो। कपड़ों पर यदि तनिक भी दाग़-धब्बा लग गया, तो तुरन्त ही पोशाक बदलते थे। रहन-सहन, खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने के मामले में उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उनके व्यक्तित्व, बोलचाल और रहन-सहन में लखनऊ की वह तहज़ीब बसती थी, जो आज उँगलियों पर गिने जाने वाले लोगों को ही मयस्सर है। नूर साहब के व्यक्तित्व और सबको साथ लेकर चलने वाली उनकी जीवनशैली से प्रभावित लोगों का एक बड़ा समूह है। हालाँकि आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसका कोई विरोधी न हो, लेकिन मैं यह देखता था कि उनके विरोधी उनके सामने आते ही इस प्रकार हो जाते थे, जैसे मैगज़ीन के पन्ने ट्रेन की खिड़की से आती हवा में फड़फड़ाकर अपनी खीझ प्रकट करते हैं।

उनकी दोस्ती हर धर्म और हर वर्ग के लोगों से थी और वह इस बात का ख़याल भी रखते थे कि बातचीत के दौरान कहीं किसी को भावनात्मक ठेस न पहुँचे। एक घटना मुझे याद आ रही है। मैं नूरसाहब के साथ ही उनके ड्राइंगरूम में बैठा हुआ था। तभी उनके एक परिचित आये और अपनी कम्पनी का नववर्ष का कलेण्डर ड्राइंगरूम में टाँग दिया। नूरसाहब ने जब देखा कि कलेण्डर पर देवी-देवताओं के चित्र हैं, तो उनसे बोले-‘‘भई देखो हमारे ड्राइंगरूम में हर मज़हब के लोग आते हैं। इस कलेण्डर को देखकर हो सकता है किसी को ठेस पहुँचे, इसलिए इसे घर के भीतर टाँग दो और ड्राइंगरूम के लिए कोई ख़ूबसूरत सीनरी ले आओ।’’ यह था नूरसाहब का व्यक्तित्व और उनकी भावना।

नूर साहब समय का बहुत ख़याल रखते थे। अगर मिलने के लिए किसी को समय दिया है, तो निश्चित समय पर उस व्यक्ति की प्रतीक्षा करते थे। यदि अकारण ही वह व्यक्ति विलम्ब से आये तो उसे नूरसाहब की नाराज़गी सहनी पड़ती थी। 

नूर साहब वायदे की क़ीमत भी जानते थे और अहमियत भी। यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता ही थी कि बाज़ार में जो चीज़ उन्हें पसन्द आ गयी, उसे ख़रीदते समय कभी उसका मूल्य नहीं पूछा, कभी मोल-भाव नहीं किया। दुकानदार ने क़ीमत बताई और नूरसाहब ने चुकता करदी। नूरसाहब के ही एक मित्र बताते हैं कि वह और नूरसाहब लखनऊ में मीना बाज़ार में घूम रहे थे। तभी एक दुकान पर उन्हें शोकेस में रखा कपड़ा पसन्द आ गया। नूरसाहब दुकान पर गये, कपड़ा लिया और दुकानदार द्वारा बतायी गयी क़ीमत चुका कर चल दिये। थोड़ी दूर जाकर उनके मित्र ने कहा- ‘‘नूरसाहब, अगर आप कुछ मिनट ठहरें तो यही कपड़ा उसी दुकान से मैं कम क़ीमत पर ला सकता हूँ।’’ यह सुनकर नूरसाहब हँसे और बोले- ‘‘यह काम तो हम भी कर सकते थे, लेकिन पसन्द आयी चीज़ का मोलभाव करना पसन्द की तौहीन है।’’ यह थी नूरसाहब की विशेषता और मूल्यों का रखरखाव। क्रोध के क्षणों में भी उनके होंठों पर कभी अमर्यादित शब्द नहीं आये।

नूर साहब बहुत विनम्र और सरल स्वभाव के सादगीपसन्द व्यक्ति थे। असल में यही सादगी और विनम्रता उनकी शायरी का केन्द्र है। नूरसाहब ने निरन्तर सफलता की ऊँचाइयों को छुआ, लेकिन अपनी ज़मीन को, अपने आधार को कभी पाँवों से नहीं खि़सकने दिया। जहाँ उन्होंने बड़ों को सम्मान दिया, वहीं छोटों को बेपनाह मुहब्बतें दीं, प्यार लुटाया। यह उनके व्यक्तित्त्व का बड़प्पन था। शायद इन्हीं सब बातों ने उन्हें साधारण इंसान से सन्त की श्रेणी में ला खड़ा किया। 

नूर साहब के व्यक्तित्त्व के सम्बन्ध में प्रसिद्ध इतिहासकार डा. योगेश प्रवीन कहते हैं- "20वीं सदी के अज़ीम शायर कृष्णबिहारी ‘नूर’ साहब एक बड़े शायर ही नहीं, एक आला दरजे की इंसानियत का मर्तबा रखने वाले इंसान थे। उनके पास अच्छी निगाह थी, रेशमी अहसास थे और सुनहरी क़लम थी, जिससे उन्होंने जो कुछ भी लिखा वो अमर हो गया। उन्होंने फूल की पंखुड़ियों पर भी लिखा है, चाँदनी की सतह पर भी लिखा है और सबसे बड़ी बात है कि हमारे आपके दिल के वरक़ पर भी लिखा है।’’

झाँसी से प्रकाशित ‘मार्गदर्शक’ साप्ताहिक की लेखमाला में श्री ओमशंकर ‘असर’ लिखते हैं- "नूरसाहब ज़िन्दगी में बहुत आम आदमी हैं, मगर शायरी में वे असाधारण ही हैं। साधारण और असाधारण दोनों गुण एक साथ अगर देखने हों, तो नूरसाहब का व्यक्तित्व और फिर उनकी शायरी का मज़ा लें। आम-फ़हम होने के नाते वे बहुत सादा ज़ुबान अपने शेरों में पिरोते हैं और असाधारण होने के नाते उनके विचार बहुत गहरे भी हैं और ऊँचे भी।’’

यक़ीनन नूरसाहब जितने बड़े शायर थे, उतने ही बड़े इंसान भी। उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व में अन्तर तलाश पाना असम्भव है। मैंने स्वयं कविसम्मेलन और मुशायरों के मंचों पर देखा है कि नये से नये शायर ने अगर अच्छी कविता लिखी है, तो उसे भरपूर प्रोत्साहित किया करते थे, जबकि बड़े से बड़े शायर की नीरस और अर्थहीन कविता पर वे ख़ामोशी ओढ़ लिया करते थे। अपने से बड़ों को भरपूर सम्मान देना तथा छोटों से बड़े प्यार के साथ मिलना उनके व्यक्तित्त्व का विशेष गुण था।

नूर साहब का लेखन चूँकि अध्यात्म और भारतीय दर्शन पर आधारित है, इसलिए उनकी कविता के चाहने वालों में बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों की संख्या अधिक है। इस बात को नूरसाहब बख़ूबी जानते थे और इसकी पुष्टि एक छोटे से संस्मरण से भी हो जाती है-

बात सन् 1990 की है। मैं मुरादाबाद के ही महाराजा हरिश्चन्द्र डिग्री कालेज से उर्दू में एम.ए. कर रहा था। यूँ कहिये कि एम.ए. के द्वितीय वर्ष की परीक्षा देने के बाद मैं ‘वायवा’ के लिए कालेज गया था। जैसे ही मेरा नम्बर आया और मैं कमरे में दाखि़ल हुआ तो वहाँ उर्दू विभागाध्यक्ष साबिर हसन साहब ने परीक्षक महोदय से मेरा परिचय कराया- सर, ये मिस्टर कृष्णकुमार हैं और हमारे कालेज के अकेले नाॅन मुस्लिम कैंडिडेट हैं।

परीक्षक महोदय ने बड़े प्यार के साथ कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा- तशरीफ़ रखिये। मैं कुर्सी पर बैठ गया, लेकिन दिल धड़क रहा था कि कहीं वह कोई ऐसा सवाल न पूछ बैठें जो मुझे नहीं आता हो। तभी उन्होंने कहा-‘आप किसी शायर के दो शेर सुनाइये।’ मैंने उनसे निवेदन किया- सर, अगर आप इजाज़त दें, तो मैं अपने ही दो शेर पेश कर दूँ। उन्होंने ख़ुश होते हुए पूछा- क्या आप भी शेर कहते हैं? मैंने कहा- जी सर, थोड़ी-बहुत जोड़-तोड़ कर लेता हूँ। वह बोले- सुनाइये। मैंने धड़कते दिल से दो शेर सुना दिये। सुनकर बोले- वाह-वाह, दो शेर और सुनाइये। मैंने दो शेर और सुना दिये। उन्होंने फिर दाद दी और पूछा- आप इसलाह किनसे लेते हैं? मैंने कहा- जनाब कृष्णबिहारी ‘नूर’ से।

यक़ीन जानिये, नूरसाहब का नाम सुनते ही वे दोनों हत्थे पकड़कर कुर्सी से खड़े हो गये और बोले-"अरे भई! वाह-वाह, आपने उस्ताद के रूप में ऐसे शायर का इन्तख़ाब किया है, जो अपने तरीक़े का हिन्दुस्तान का अकेला शायर है। शुक्रिया, आपका वायवा हो गया।" मेरी सारी मुश्किल आसान हो गयी। 

शायर मेराज फ़ैज़ाबादी नूर साहब को चचा कहते थे और उनका बड़ा सम्मान करते थे। नूरसाहब भी उन्हें बहुत प्यार करते थे। मेराज साहब का नूरसाहब के व्यक्तित्त्व के प्रति अद्भुत दृष्टिकोण है। वह कहते हैं- ‘‘होठों पर मुस्तकि़ल खेलती हुई हँसी, ज़िन्दगी से भरपूर मुस्कराहट, चेहरे पर ऋषियों जैसा सुकून और पवित्रता, आँखों में लमहाभर चमककर बुझ जाने वाले दुखों के साये, कृष्णबिहारी ‘नूर’ तारीकियों के इस युग में बीती हुई पुरनूर सदियों का सफ़ीर (राजदूत), एक फ़नकार, एक इंसान, एक फ़क़ीर और मुशायरे के माइक पर एक फि़क्रोफ़न का दरिया।’’

प्रसिद्ध कवि एवं पत्रकार कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं- ‘‘लखनऊ ऑल इंडिया रेडियो ने एक कवि-सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें हिन्दी-उर्दू दोनों की नुमाइंदगी की गयी। बाईपास सर्जरी के बाद पहला मुशायरा पढ़ने आये थे इसमें नूरसाहब। दिल्ली से मैं भी शरीके-महफि़ल था, सो चश्मदीद वाक़या बयान कर रहा हूँ कि जब नूरसाहब को पढ़ने की दावत दी गई तो रेडियो ने उन्हें सहूलियत से काम-अंजाम देने के लिए जहाँ बैठे थे, वहीं से पढ़ने की सुविधा देनी चाही। नूरसाहब ने अपना बाईपास रखा किनारे और हाज़रीन से मुख़ातिब होते हुए बोले- ‘आप माफ़ी दें, डाक्टरों ने दिल चीर के रख दिया, लेकिन उन्हें क्या पता कि मेरा दिल मेरे पास है ही नहीं, वह तो मेरे चाहने वाले आप जैसे लोगों के पास है, सो शेर मुलाहज़ा हो ...’ और फिर तो साहब नूरसाहब ने ऐसे पढ़ा जैसे पिंजरे से निकल के परिन्दे ने बेख़ौफ़ उड़ानें भरी हों। ग़ज़ल भी वो पढ़ी जो उनकी ग़ज़लों में मेरी सबसे पसन्दीदा ग़ज़ल है। बल्कि उसका एक शेर तो मेरे जीवन के दर्शन का हिस्सा बन चुका है-

मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है

हुआ करे जो समन्दर, मेरी तलाश में है"

प्रख्यात संगीतकार एवं गीतकार श्री रवीन्द्र जैन कुछ यूं फ़रमाते हैं- "नूरसाहब यूँ तो तहत में पढ़ते थे, लेकिन पढ़ने के अंदाज़ से तरन्नुम में पढ़ने वाले मात खा जाते थे। मुशायरा मुंबई में हो या मुंबई के आसपास, नूरसाहब का क़याम अक्सर और पेशतर मेरे छोटे से आशियाने में हुआ करता था। घर में क़याम तो जिस्मानी तौर पर था, नूरसाहब तो रूह की गहराइयों में उतर चुके थे। न सिर्फ़ अपने, बल्कि हम दोनों अपने पसंदीदा शायरों के शेर एक-दूसरे से बाँटते थे, जब कभी मेरा लखनऊ प्रवास होता, नूरसाहब मेरी सिदारत में अपने दौलतख़ाने पर मेरे एज़ाज़ में नशिस्त रखते। वो शायरी जिसका हम मुंबई में तसव्वुर भी नहीं कर सकते, लखनऊ के शोअरा से सुनने को मिलती, भाभीजान के हाथ के बने मूँगफली के क़बाब मैं आज भी नहीं भूला हूँ। मुंबई-लखनऊ में मिलने का सिलसिला अब भी बरक़रार रहता, अगर दयाहीन मृत्यु उन्हें यूँ अचानक न ले जाती।

अपने होने का सुबूत और निशाँ छोड़ती है

रास्ता कोई नदी यूँ ही कहाँ छोड़ती है

नश्शे में डूबे कोई, कोई जिये, कोई मरे

तीर क्या-क्या तेरी आँखों की कमाँ छोड़ती है

बंद आँखों को नज़र आती है, जाग उठती हैं

रोशनी ऐसी हर आवाज़े-अज़ाँ छोड़ती है

ख़ुद भी खो जाती है, मिट जाती है, मर जाती है

जब कोई क़ौम कभी अपनी ज़बाँ छोड़ती है

आत्मा नाम ही रखती है न मज़हब कोई

वो तो मरती भी नहीं, सिर्फ़ मकाँ छोड़ती है

एक दिन सबको चुकाना है अनासिर का हिसाब

ज़िंदगी छोड़ भी दे, मौत कहाँ छोड़ती है

मरने वालों को भी मिलते नहीं मरने वाले

मौत ले जाके ख़ुदा जाने कहाँ छोड़ती है

ज़ब्ते-ग़म खेल नहीं है अभी कैसे समझाऊँ,

देखना मेरी चिता कितना धुआँ छोड़ती है

और अंत में श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं…

वो जिसने ज़िंदगी भर छांव बांटी 

मैं पत्ता हूं उसी बूढ़े शजर का

*डा. कृष्णकुमार ' नाज़' साहिब की  यह प्रस्तुति हमें माननीय साहित्य प्रेमी और शायरी   ग्रुप इत्यादि के सक्रिय संचालक राजीव कुमार जी से हुई। 

जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहिब पर एक पोस्ट यहां क्लिक करके भी देखें प्लीज़ 


Tuesday, October 10, 2023

ग़ज़ल//*शुचि 'भवि'

हिंदी में गज़ल के रंग को गहरा करने में जुटी शायरा  


लुधियाना: 10 अक्टूबर 2023: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन):: 

कम से कम 10 पुस्तकों की रचेता जिनमें 5 दोहा संग्रह, 1 कविता संग्रह, 1 ग़ज़ल संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह,1 उपन्यास, 1छंद संग्रह इत्यादि शामिल हैं। इन दस पुस्तकों में उनकी रचनात्मक क्षमता का विशेष रंग देखने को मिलता है। भिलाई छत्तीसगढ़ में रहते हुए भी पंजाब और पंजाबी से भी शुचि भवि का पूरा लगाव है। पंजाब के साहित्य प्रेमी जब भी याद करें तो शुचि भवि इतनी दूरी तय करके पंजाब में भी आ जाती हैं। उनकी शायरी में जहां ख्यालों  की उड़ान कमाल की होती है वहीं गज़ल की व्याकरण और तोल का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। 

इस मुहारत का सारा क्रेडिट वह अपने उस्ताद शायर जनाब सागर सियालकोटी साहिब को देती हैं और बताती हैं कि उनकी गज़ल साधना में सागर साहिब हर कदम पर मार्गदर्शन देते रहे हैं। अब भी उनका आशीर्वाद हमेशा साथ रहता है। 

इस बार वह नवरंग लिटरेरी सोसाइटी की तरफ से विशेष तौर पर आयोजित एक कार्यक्रम में लुधियाना आ रही हैं 21 अक्टूबर 2023 को। इसका विवरण अलग पोस्ट में है। मंच पर भी शुचि भवि का अंदाज़ बेहद यादगारी होता है। 

उन्हें पहली बार सुना देखा था कई बरस पहले लुधियाना के बहुत ही पुराने स्कूल वायली मेमोरियल स्कूल में। अंधेरा होने को था लेकिन श्रोता बार बार उनसे एक और*एक और रचना की गुजारिश किए जा रहे थे।फ़िलहाल आप यहां पढिए सुश्री शुचि भवि की एक नई गज़ल। जो उन्होंने हमें हाल ही में प्रकाशनार्थ भेजी है।  हम आपके सामने उनकी और रचनाएं भी जल्द लाएंगे।   --रेक्टर कथूरिया 

शायरा शुचि भवि 

कहाँ बदरी  कि  मनमानी  टिकेगी  चाँद  आते ही

चली   है  चाँदनी  इठला  के  चंदा  के  बुलाते  ही


नज़र उसने झुका ली क्यों  ग़ज़ल ये  गुनगुनाते ही

चमक रुख़सार पर आयी ये किसका नाम आते ही


ज़माने  भर  के  झूठों  ने जलायीं  थी  मशालें  जो

बुझीं सारी, हमारे सच की इक शम्अ के जलाते ही


मुझे अफ़सोस है इस बात का लेकिन  है मजबूरी

कई  चेहरे   उतर   जाएंगे   मेरे   मुस्कुराते   ही


वफ़ाएँ जो नहीं समझा,नहीं समझा जो अश्कों को

उसे   क्यूँ  ढूँढता  है   दिल   ज़रा  सा दूर जाते ही


था बेशक तंग थोड़ा जो, हुआ अब क़ीमती बेहद

वो तहख़ाना मेरे दिल का, मकीं उसको बनाते ही


तेरी तस्वीर का भी आसरा अब है नहीं 'भवि' को

झलक  जाऊँगी  मैं  तुझमें, तेरा  चेहरा बनाते ही

---*शुचि 'भवि' 

   भिलाई, छत्तीसगढ़


नवरंग लिटरेरी सोसाइटी की तरफ से विशेष आयोजन का विवरण अलग पोस्ट में यहाँ क्लिक कीजिए

Wednesday, June 7, 2023

आम जनता के जीवन को भी नज़दीक से देखा है लेखिका सुमिता ने

आंच में हैं गहन संवेदना का अहसास करवाती कविताएं 

मोहाली: 7 जून 2023: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सुमिता कुमारी उन कलमकारों में से हैं जो सत्ता में या सत्ता के नज़दीक रहते हुए भी अपने अंतर्मन में छुपे हुए  लेखक को जागरूक रखते हैं। आसपास के क्षेत्र में सब कुछ बारीकी से देखते भी हैं और फिर उसे बहुत ही सलीके से व्यक्त भी करते हैं। जब अनुभूति की अभिव्यक्ति का ढंग शायरी हो तो ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। इस ज़िम्मेदारी का अहसास आपको सुमिता जी की रचना में नज़र भी आएगा। गहनता से महसूस भी होगा। 

डयूटी के साथ साथ कलम की साधना आसान नहीं होती। बहुत से अनुशासन और बहुत से नियम--सब याद रखना पड़ता है। इस सब के बाद सम्भव हो पति है साहित्य की साधना। सुमिता कुमारी का जन्म 12 जून, 1983 को रामपुर नगवाँ, पालीगंज, पटना (बिहार) में हुआ। वह इतिहास एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर हैं। उनकी कविताएँ एवं कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘मौसम बदलने की आहट’ नामक कविता-संग्रह में कुछ कविताएँ शामिल हैं। ‘आँच’ उनका पहला कविता-संग्रह है। शायरी बहुत ही कोमल संवेदना भरी साधना होती है और इसके ज़रिए निष्ठुर समाज की बात करना बेहद मुश्किल भी होता है लेकिन सुमिता जी ने यह सब आसानी से किया। उनका काव्य संग्रह आंच बताता है कि उनकी काव्य साधना को अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान कितना तपना पड़ा होगा। कैसे कैसे हालात सामने आए हो सकते हैं।   

कलम और जीवन दोनों के दरम्यान संतुलन भी सहज नहीं होता। वर्तमान में वह बिहार के नालंदा में  प्रखंड विकास पदाधिकारी हैं। इसलिए समाज के बहुत से वर्गों के साथ उनका आमना सामना होता ही है। समाज के इन विभिन्न वर्गों के विभिन्न जीवन ढंग, दोगले चेहरे और गिरगिट की तरह बदलते रंग उन्होंने सब बहुत नज़दीक से देखा होगा।

उनमें कलम की क्षमता अद्भुत है। सुमिता कुमारी प्रतिभावान कवि और गद्यकार हैं। उन्होंने अपने आस-पास के जीवन को भी कविता में ढाला है और इस तरह कुछ मर्मस्पर्शी कविताओं की भी रचना की है। इन कविताओं की विशेषता यह है कि यह पहली बार पढ़ने या सुनने पर ही दिल में उतरती चली जाती हैं।  एक महिला होने के नाते उन्होंने महिला जीवन की विषमताओं और कठिनाइयों को भी नज़दीक से देखा। 

महिला जीवन को जब कोई महिला देखती है तो उसकी नज़र वो सब भी देख पाती है जिसे देखना या समझना सब के बस में होता ही नहीं। अगर इस पीड़ा को देखने समझने वाली महिला लेखिका भी हो तो बात ही कुछ और हो जाती है। उनको पढ़ने वाले प्रबुद्ध पाठक बताते हैं कि यहाँ स्त्रियों के पारिवारिक जीवन और श्रमिक स्त्रियों के संघर्ष तथा जीवट के नए चित्र मिलते हैं। ‘आँच’ शीर्षक कविता जीवन-संग्राम और प्रतिरोध की विशिष्ट कविता है। धान रोपती स्त्रियों और वृद्धाओं के जीवन के विश्वसनीय रेखांकन द्रवीभूत करते हैं। इन कविताओं की तेज आँच हमें तप्त कर देती है। अधिकांशतः ये कविताएँ गद्यबद्ध हैं। कहीं-कहीं लय का भी मिश्रण है। भाषा सरल, सहज और मुहावरेदार है। मगही के अनेक शब्दों का निपुण व्यवहार कवि की सृजन-क्षमता को दर्शाता है और उनकी रचनाओं को अद्वितीय बनाता है। कुछ नए बिम्ब और अलंकरण भी कवि ने सिरजे हैं। मगही भाषा की समृद्धि का समुचित उपयोग हिन्दी कविता में कम ही हो पाया है। इस तरह इस पुस्तक में संकलित रचनाओं ने इस पुस्तक को उन पुस्तकों के वर्ग में भी ला दिया है जो भाषा को अमीर बनाने में अपना योगदान देती हैं। 

उनको नज़दीक से जानने वाले साहित्यकार और कलाकार बताते हैं कि पेशे से प्रशासनिक पदाधिकारी होते हुए भी सुमिता जी ने निरन्तर काव्य-साधना की है और जीवन को बहुत ध्यान से देखा है। बहुत बारीकी से जीवन के उतराव चढ़ाव का जहां अध्यन किया है। लोगों के जीवन और उनके दुःख सुख बहुत ही नज़दीक हो कर देखे हैं। वास्तव में बाहरी दुनिया के साथ-साथ आन्तरिक दुनिया का भी वह अनवरत अवलोकन करती रहती हैं और इसके साथ साथ अत्यन्त व्यस्त दिनचर्या के बावजूद भी काव्य-रचना के लिए किंचित अवकाश निकाल ही लेती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए पाठक इसीलिए खो से जाते हैं क्यूंकि इन कविताओं में आवेग और त्वरा है जो सुमिता जी को बाक़ी सभी समकालीनों से पृथक एक विशिष्ट स्थान पर स्थापित करती है। इसलिए देश और दुनिया के साहित्य से भी उनका सम्पर्क निरंतर बना रहता है। वह पाठकों के पत्रों का जवाब भी देती हैं और उनके व्हाटसएप्प संदेशों का भी। समय मिलने पर आयोजनों में शामिल होने का भी प्रयास करती हैं। 

जल्द ही हमें उनकी काव्य रचनाओं और अन्य रचनाओं का नया संकलन भी मिले ऐसी आशा भी है और आकांक्षा भी। हम जल्दी ही देख पाएंगे उनकी नई पुस्तक इसकी उम्मीद हम भी को है। उनकी काव्य रचनाओं को पंजाबी और अन्य भाषाओं में अनुदित करने की संभावनाओं पर भी बात जल्दी ही हम सभी के पास खुशखबरी बन कर आएगी।  

देखिए उनकी एक रचना का रंग भी:

प्रेम//सुमिता

आसान नहीं था 

उसे जिंदगी में वापस खींच लाना

सब कुछ देकर ही तो उसने यह जिंदगी चुनी थी

वह हंसता-गाता और रोता भी था

लेकिन खुद को समभाव ही दिखाया सबको

मानवीय भावनाएं उसे साबित कर सकती थी सांसारिक

उसने कभी वादा किया था 

कि उसे सौंप देगा अपने जीवन का बसन्त

और पतझड़ में बिखरते हुए भी

उसने किसी सावन में भीगना नहीं चुना

उसे जिंदगी से मोह बस इतना था 

कि जिंदगी किसी की अमानत है

और देह से अपनापन इतना ही 

कि देह ने बसा रखी है किसी और की आत्मा

जिसका त्याग उसकी हत्या के बराबर है

उसे देखकर महसूस होता 

कि विरक्त-सा यह आदमी

लड़ रहा है युद्ध 

स्वयं के विरुद्ध

अपनी काया में जी रहा है अनागत अस्तित्व

जो कभी उसके जीवन का हिस्सा न बन सका


वह आंखें कितनी अनमोल होंगी 

उसकी बातें कितनी मर्मस्पर्शी

जिसमें डूबकर 

कोई सारी उम्र पार नहीं उतरना चाहता

भूल जाना चाहता है दुनियां

लेकिन उसे नहीं भूलना चाहता

उसके जाते

दुनियां में प्रेम करने लायक कुछ नहीं रहा


यह किसका भाग्य है किसका दुर्भाग्य

कितना उचित है कितना अनुचित

बहस का मुद्दा हो सकता है

मगर आधुनिकता के दौर में 

ऐसी आत्माओं ने ही बचा रखी है

प्रेम की आत्मा...

सुमिता (27-01-23)

आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। 

                                                                                 प्रस्तुति:कार्तिका कल्याणी सिंह (हिंदी स्क्रीन डेस्क)

Thursday, April 13, 2023

प्रेम में हारे हुए पुरुष//शिखा पांडेय

गहरे अहसास की गहरी रिपोर्ट जैसी है यह पोस्ट 


सोशल मीडिया
: 13 अप्रैल 2023: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सोशल मीडिया का ज़माना है। यह  बात अलग है कि आजकल केवल सियासत से जुडी बातों का ही गंभीरता से नोटिस लिया जाता है जबकि बहुत कुछ और भी होता है जिसे पढ़ते, सुनते जा देखते हुए मन में बहुत कुछ कौंधने लगता है। ऐसी ही एक रचना गत रात भी पढ़ी जिसे पोस्ट किया गया था 22 अप्रैल 2020 को। 

कोई ज़माना था जब केवल पुरुष  पर ही काव्य रचनाएं लिखी जाती रही। उनकी कथाएं और गाथाएं बनती रहीं। जल्द ही ट्रेंड बदला और प्रशंसा भरे इस साहित्य में महिलाओं की निंदा कम हो गई। फिर नारी की प्शारशंसा का रिवाज भी शुरू हुआ। बहुत सा साहित्य लिखा गया और बहुत सी फ़िल्में भी बनीं। शायद इसलिए कि धीरे धीरे  महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया था। समय के साथ साथ यह अनुपात बार बार बदलता ही चला गया। इस बदलते हुए अनुपात में नारी का दर्द तो सामने आता रहा और बहुत से कानून भी बनें लेकिन पुरुष का दर्द नज़रअंदाज़ होता रहा। इसी बीच नर-नारी की बराबरी की आवाज़ ने ज़ोर पकड़ा और इस पर भी लिखा जाने लगा कि मर्द को भी दर्द होता है। वह भी रोता है बेशक छुप कर ही सही। इसी विषय पर सोशल मीडिया में एक काव्य जैसी रचना फेसबुक पर भी नज़र आई। लेखिका का नाम शिखा पांडेय बताया गुया लेकिन उनसे सम्पर्क नहीं हो सका। फिलहाल आप यह पोस्ट पढिए जिसमें आपको काव्य रस का अहसास भी महसूस होगा। अंतर्मन में चलते द्वंद और पीड़ा का भी अहसास होगा।  आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। स्नेह के साथ आप का--रेक्टर कथूरिया 

यह है वो रचना 

प्रेम में हारे हुए पुरुष

कहीं दूर गाँव या शहर में

ढूँढते हैं एक शांत कोना

जहाँ होता है मध्यम अलसाया हुआ अँधेरा

उदास पुरवाई को लिये हुए

वो जूझते है अपने ही अंतर्मन में छुपे अपनी नाकामी के सवालों से, क्योंकि वो पुरुष है इसलिए कह नही सकते किसी से भी अपनी व्यथा....

गुम करने लगते है खुद को बेवज़ह मुस्कुराहटों की तहरीरों में....झोंक देते हैं स्वयं को रोज़गार की भट्टी में

और जब इनसे में शांत नही होता उनका चित्त तो आ जाते हैं किसी सोशल मीडिया के द्वार पर और ढूढने लगते हैं किसी द्वार पर झूठा प्रेम....जी हां सिर्फ झूठे प्रेम को ही ढूढते है क्योंकि नही जाना चाहते छोड़कर ये अपने पुराने अक्स को......और बन जाते है दुनिया की नज़र में बेग़ैरत और लानत भरे बेशर्म पुरुष, और फिर इसी झूठी दुनिया मे लिप्त होकर

वे खोजते हैं अपनी पवित्रता को।

और अंत में अब  वो रोज देखते हैं उस हाथ की  हथेलियों में गहरी रेखाओं को

जिन्हें देखकर किसी भविष्य वक्ता ने कहा कि

तुम भाग्यशाली हो...❤️

- शिखा पांडेय


Thursday, March 16, 2023

महिला काव्य मंच लुधियाना इकाई की मार्च माह की काव्य गोष्ठी

Thursday 16th March 2023 at 06:07 PM

सीमा भाटिया की अध्यक्षता में हुआ विशेष आयोजन 


लुधियाना: 16 मार्च 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

करीब ढाई तीन बरस पूर्व लुधियाना में हिंदी स्क्रीन की टीम को महिला काव्य मंच की एक बैठक में जाने का सुअवसर मिला। बहुत ही सादगी भरे आयोजन में अनुशासन और समय सीमा का विशेष ध्यान रखा जा रहा था। इस मौके पर करीब हर उम्र की लेखिकाएं थीं। हिंदी का रंग भी था, पंजाबी का भी और उर्दू का भी। इस शायरी में दर्द महिलाओं से भी जुड़ा हुआ था और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से भी। देश विदेश में फैली हिंसा ने भी महिला काव्य मन को आहत किया था और लगातार बढ़ती हुई महंगाई ने भी। ज़िंदगी के इन सभी रंगों की झलका महसूस हुई महिला काव्य मंच के मुशायरे में। इस बार भी शायरी का रंग यादगारी रहा। 

महिला काव्य मंच लुधियाना इकाई की मार्च माह की काव्य गोष्ठी श्री नरेश नाज़ के सानिध्य में लुधियाना इकाई की अध्यक्ष सीमा भाटिया की अध्यक्षता में आयोजित की गयी। इस काव्य गोष्ठी में मंच संचालन का उत्तरदायित्व शैली रूबानी ने मां सरस्वती को नमन कर बडी कुशलता से निभाया। मुख्य अतिथि के रूप में पंजाब इकाई की मुख्य अतिथि इरा दीप जी और विशिष्ट अतिथि महासचिव बेनू सतीश कांत शामिल हुईं।कार्यक्रम में सभी कवयित्रियों ने उत्साह से भाग लिया और सभी ने बेहद उम्दा प्रस्तुति की। भाग लेने वाली कवयित्रियों में मोनिका कटारिया, ज्योति बजाज,शांति जैन,पूनम सपरा,संगीता भंडारी,मनीषा शर्मा,श्रद्धा शुक्ला और अर्चना खापरान रहीं।अंत में अध्यक्ष सीमा भाटिया नें सभी का धन्यावाद किया और एक अत्यंत सफल गोष्ठी के लिये संगीता भंडारी ने सभी को बधाई दी।

Monday, February 13, 2023

ताज़ा ग़ज़ल//विजय तिवारी ‘विजय’

Sunday 12th February 2023 at 01:16 PM

जिसमें मिलेगी अतीत और आज की झलक 


लुधियाना12 फरवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां शिक्षा और साहित्य से जुड़े बहुत से लोग रहते हैं। बुलंद आवाज़ लेकिन बहुत ही सलीके से सच कहने वाले इन लोगों से मिल कर, इनका कलाम पढ़ कर लगता है जैसे भोपाल के जलवायु में ही कोई ऐसा जादू है जो कलम में इंकलाब ले आता है। वहां भोपाल जा कर इन लोगों के जनजीवन को नज़दीक से देखने का मन भी अक्सर होता है और कुछ समय इनके पास रहने का भी। बहुत ही गहरी बातें बहुत ही सादगी से कह जाते हैं ये लोग। कलम और कलाम की दुनिया में इनका कद बहुत ऊंचा ही बना रहता है इसके बावजूद मिलने वालों को इनकी विनम्रता और स्नेह हमेशां के लिए  अपना भी बना लेते हैं ये लोग। विजय तिवारी विजय  लम्बे समय से बहुत ही सादगी से बहुत ही गहरी बातों की शायरी  करते आ रहे हैं। उनकी शायरी सियासत की साज़िशों की बात भी करती है और जी टी रोड पर जीने को तरसती ज़िंदगी की बात भी। देखिए उनकी एक ग़ज़ल की झलक। आज के महाभारत में घिरे अभिमन्यु की चर्चा भी आपको इसी शायरी में मिलेगी और इसके साथ ही हिंदी की मधुरता और उर्दू की मिठास को एक दुसरे के नज़दीक लाने का ज़ोरदार प्रयास भी। मुशायरा कहीं भी हो उनकी हाज़री उसमें चार चाँद लगा देती है। उनकी कोशिश भी होती है कि निमंत्रण मिलने पर शामिल भी ज़रूर हुआ जाए। इसके बावजूद कभी कभी कोई मजबूरी आन ही पड़ती है तो उनके चाहने वाले उदास हो जाते हैं। आपको उनकी शायरी कैस लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही।  --रेक्टर कथूरिया 

कितनी मुश्किल से कटा दिन होश के मारों के बीच। 

शाम ए ग़म का शुक्रिया ले आई मयख़ारों के बीच ...


क्या कभी देखा है वो ग़ुब्बारा ग़ुब्बारों के बीच। 

पेट की ख़ातिर भटकता दौड़ता कारों के बीच...


रिंद ओ साक़ी जाम ओ पैमाना तलबगारों के बीच। 

आ गये सब ग़म के मारे अपने ग़मख़्वारों के बीच... 


चीख़ता ही रह गया मैं अम्न हूँ मैं अम्न हूँ। 

दब गई आवाज़ मेरी मज़हबी नारों के बीच...


बार ए ग़म से लड़खड़ाकर क्या गिरा मस्जिद में आज । 

यूँ घिरा जैसे शराबी कोई दींदारों के बीच...


मौसम ए तन्हाई में बहते हैं आँसू इस क़दर। 

दस्त में बहता हो जैसे झरना कुहसारों के बीच...


बज़्म ए जानाँ में मुझे देखा गया कुछ इस तरह। 

जैसे कोई ग़म का नग़मा कहकहाज़ारों के बीच...


या ख़ुदा अहल ए अदब में यूँ रहे मेरा वुजूद। 

एक जुगनू आसमाँ पर चाँद और तारों के बीच...


एक अभिमन्यु घिरा फिर धर्म संसद में ‘विजय’

रिश्तेदारों चाटुकारों और सियहकारों के बीच

                           ----विजय तिवारी ‘विजय’

चलते चलते विजय साहिब का ही एक और शेयर:

किसी के इश्क में दुनिया लुटा कर

सुखनवर हो गए हैं कुल मिलाकर! 

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Sunday, July 31, 2022

अहमद फ़रहाद साहिब की वह ग़ज़ल जिसने लोकप्रियता के रेकार्ड तोड़ दिए

 मैं फूल बाँटता हूँ मुझे–मार दीजिए 


खरड़//मोहाली: 30 जुलाई 2022: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

वैसे तो अहमद फरहाद की यह ग़ज़ल भी लोकप्रियता की बुलंदियों को छूती हुई जन जन के दिल में उत्तर गई लेकिन हमें इसे पढ़ने की खुशनसीबी मिली खरड़//मोहाली के एक वटसप ग्रुप वेद दीवाना फैन क्लब में। बहुत ही मय्यारी रचनाओं को पाठकों के सामने रखने वाला यह ग्रुप तेज़ी से अपनी जगह बनाता चला जा रहा है। इसी ग्रुप में से हम दे रहे हैं अहमद फरहाद साहिब की यह ग़ज़ल जिसे ग्रुप में सभी के सामने रखा है इंद्र सैनी साहिब ने। 

काफ़िर हूँ सरफ़िरा हूँ मुझे– मार दीजिए

मैं सोचने लगा हूँ मुझे– मार दीजिए

                      मै पूछने लगा हूँ सबब अपने क़त्ल का

                     मैं हद से बढ़ गया हूँ मुझे– मार दीजिए

शायर अहमद फरहाद साहिब 

ख़ुशबू से मेरा रब्त है जुगनूँ से मेरा काम

कितना भटक गया हूँ मुझे–मार दीजिए

                    मालूम है मुझे कि–बड़ा जुर्म है ये काम

                    मैं ख़्वाब देखता हूँ मुझे– मार दीजिए

ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहता हूँ साफ़ ज़ुल्म

क्या ज़ुल्म कर रहा हूँ मुझे–मार दीजिए

                           ज़िंदा रहा तो करता रहूंगा हमेशा प्यार

                          मैंसाफ़ कह रहा हूँ मुझे– मार दीजिए

जो ज़ख़्म बाँटते हैं उन्हें–ज़ीस्त पे है हक़

मैं फूल बाँटता हूँ मुझे–मार दीजिए

                       बारूद का नहीं– मेरा मसला दुरूद है

                      मैं ख़ैर माँगता हूँ मुझे–मार दीजिए

                             --अहमद फ़रहाद 

Friday, July 22, 2022

कविता कथा कारवां की ओर से 'सावन कवि दरबार' का आयोजन

18th July 2022 at 09:14 PM

 जानेमाने शायर सरदार पंछी मुख्य अतिथि के रूप में पधारे 


लुधियाना: 18 जुलाई 2022: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

शायरी तभी सम्भव होती है जब इन्दगी दर्द भी देती है, संवेदना भी देती है, दर्द भी देती है। इस जहां अनुभूति के बाद कोई कोई ही होता है जो इस सरे अनुभव की अभिव्यक्ति कर सकता है। जैसे जैसे यह अनुभूतियां गहरी होती आती है वैसे वैसे अभिव्यक्ति का रंग भी गहराता जाता है। लोग कहने लगते हैं आपकी कविता बहुत सुंदर हो गई है। बस ऐसे अनुभवों का अहसास करते करते ही जसप्रीत कौर फलक ने श्री अटल बिहारी वाजपेयी साहिब  की कविता पर पीएचडी कर ली। यानि जीवन में भी कविता, शोध में भी कविता और इन्दगी के आयोजनों में भी कविता। कुल मिला कर जसप्रीत कौर फलक का पूरा जीवन ही कवितामय बन गया है। इसकी चमक अब तो चेहरे पर भी स्पष्ट नज़र आने लगी है। 

कविता कथा कारवाँ (रजि.) की ओर से 'सावन कवि दरबार' का आयोजन माया नगर में किया गया।  वरिष्ठतम शायर सरदार पंछी  इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। इस अवसर पर संस्था की अध्यक्षा डॉ जसप्रीत कौर फ़लक ने आमंत्रित कवियों एवं उपस्थित गणमान्य काव्य प्रेमियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रसिद्ध भजन गायिका सरोज वर्मा के सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना गायन से हुआ। 

इसके बाद कविगणों एवं शायरों ने सावन ऋतु को केंद्र में रखकर अपनी-अपनी बेहतरीन कविताएं और ग़ज़लें प्रस्तुत कीं। रचनाकारों ने अपनी खूबसूरत ग़ज़लों, गीतों और कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। साहित्य के साथ साथ संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था। 

कवि दरबार में  डॉ जसप्रीत कौर फ़लक, डॉ जगतार धीमान, दानिश भारती, डॉ राजेंद्र साहिल, अमृतपाल गोगिया, हरदीप बिरदी, रश्मि अस्थाना, गुरचरण नारंग, नवप्रीत हैरी और डॉ रविंदर सिंह चंदी ने अपनी उच्च स्तरीय रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया। मशहूर शायर दानिश भारती ने प्रभावशाली ढंग से मंच का संचालन किया। 

अंत में सुश्री रश्मि अस्थाना, सचिव, कविता कथा कारवाँ (पंजीकृत) ने धन्यवाद प्रस्ताव रखा। कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण रहे मालपुए और खीर। सभी साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों ने स्वादिष्ट मालपुए-खीर का आनंद लिया और श्रावण मास का शगुन भी पूरा किया।


चलते चलते कुछ पंक्तियां 

कोई किस्से नहीं होते कोई बातें नहीं होतीं

महकते दिन नहीं होते मधुर रातें नहीं होतीं

कहीं पर दूर रहकर भी कोई दूरी नही होती

कहीं पर पास रहकर भी मुलाकातें नहीं होतीं

-डॉ कविता'किरण"

Thursday, July 21, 2022

कठिन अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति है रीतू कलसी

नई काव्य रचना भी यही बताती है 


सोशल मीडिया: 21 जुलाई 2022: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

कितनी कठिन रही होगी ऐसी अनुभूति! 

कितनी कठिन रही होगी ऐसी कल्पना भी!

कितनी सहजता से कर दी अभिव्यक्ति!

कितनी शानदार है रीतू कलसी की यह काव्य रचना भी--!

आप ने सुना होगा वह लोकप्रिय गीत--

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे--जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे-संग संग तुम भी गुनगुनाओगे!

वो गीत भी सुना होगा--गर तुम भुला न दोगे

सपने ये सच ही होंगे

हम तुम जुदा न होगे

हम तुम जुदा न होगे 

ऐसे बहुत से गीत हैं--बहुत सी कहानियां हैं लेकिन कितने लोग याद रख पते हैं जब बिछड़ने वाला बिछड़ ही जाता है। हकीकत यही है कि जिसके बिना एक कदम तक चलना नामुमकिन लगता था हम उसके बिना भी फिर से जीना सीख ही लेते हैं। बेवफाई कहो या ज़िंदगी की मजबूरियां कि याद रखने में सहायता देने वाली सभी निशानियां मिल कर भी उन यादों को भूलने से रोक नहीं पातीं। हम सभी धीरे धीरे सभी को भूल जाते हैं। हमारे स्वार्थ हमें यही तो सिखाते हैं। ऐसे में रीतू ने कुछ ज़्यादाही सच्ची बात कह दी है। 

वैसे सत्य भी यही है--जीवन भी यही है--लेकिन स्वीकार करना आसान तो नहीं होता। हम भ्रम में जीने वाले लोग। अंधेरे में जीने वाले लोग। घर के अंदर और बाहर भी अपनी ज़रूरत के मुताबिक ही रौशनी का प्रबंध करते है। ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं सोचते के हमारे अंतर्मन में भी हकीकत की रौशनी आ जाए। स्वयं को भुलाने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलते हैं। कभी दारो--कभी सिनेमा--कभी नावल--कभी कविता---फिर भी स्वयं को भूल नहीं पाते तो कई बार नींद की गोली का भी सहारा--! बहुत डरते हैं हम अंतर्मन में रुष नि होने से। बहुत डरते हैं हम स्वयं के साक्षताकार से। अंतर्मन के आईने में झाँकने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हम लोग। जब अंतर्मन में किसी न किसी तरह ऐसी रौशनी आ ही  जाती है तभी सम्भव हो पाता है ऐसी रचना लिख पाना। ऐसी सफल रचना के लिए रीतू को हार्दिक बधाई। आप भी इस रचना को पढ़ सकते हैं लेकिन खतरा है यह आप का साक्षताकार कहीं आप से ही न करवा दे..! हिम्मत जुटा सकते हैं तो य्रुर पढिए इस धंदर कविता को।   --रेक्टर कथूरिया 

अब जिस कविता की बात की ज़रा उसे भी पढ़ लीजिए  


जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

भूल जाना उसी वक्त

बिल्कुल भी समय बरबाद मत करना

अपने दिमाग को कष्ट मत देना

मत सोचना कितना समय गुजारा मेरे साथ

हो सकता है पल भर के लिए भर आए आंखें

फिर भी जानती हूं किसी और के साथ होने से

याद भी न आयेंगे साथ गुजारे लम्हें

यही जिंदगी है जीवन है किसी के साथ कोई नही जाता

तो इसीलिए तुम ऐसा ही करना

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

सब झूठ जला देना मिटा देना 

कभी एक साथ रहने के वादों से खुद ही छुटकारा मिल जाएगा 

वादा खिलाफी के झमेलों से बचा लेगी मौत की खबर तुम्हे 

बस फिर भी 

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

तो चले जाना उसी समय बरसात में नहाने 

सब कुछ धुल जाएगा मन से तन से 

कहीं खुशबू बचाए न रखना अपने पास

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे 

मिटा देना नामोनिशान हर जगह से, हर जगह से

   ---रीतू कलसी

Tuesday, May 10, 2022

अपने बच्चों से माँ कभी हो न जुदा से.......

 9th May 2022 at 09:57 PM

 कवियों ने मातृ दिवस पर समा बांधा


जयपुर
: 9 मई 2022: (साधना गुप्ता//हिंदी स्क्रीन)::

इंद्रप्रस्थ लिटरेचर फेस्टिवल की पंजाब इकाई की अध्यक्षा साधना गुप्ता ने 8 मई को मातृ दिवस के उपलक्ष्य में ऑनलाइन कवि सम्मेलन करवाया।जिसमें  इकाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. चन्द्रमणि ब्रह्मदत्त ने भी शिरकत की।इकाई के सलाहकार विजय वाज़िद तथा उपाध्यक्ष प्रकृति झा भी शामिल हुए।अफ़रोज़ अज़ीज़ ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।डॉ. रश्मि झा मुख्य अतिथि तथाअनुराग सुरुर विशिष्ट अतिथि रहे।देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये कवियों ने मातृ दिवस पर एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दी। साधन गुप्ता की कविता अपने बच्चों से माँ कभी हो न जुदा ने सबकी आँखे नम कर दी ।पूनम कुमावत की रचना जो देखा माँ की आँखों ने मार्मिक थी।आरती झा की कविता'माँ दिल में बसी पूज्य है सम्माननीय ने समा बांध दिया। प्रवीना त्रिवेदी की पंक्तियां मेरे सपनों में रोज आती हो तुम ने भाव विभोर कर दिया।रामकुमार प्रजापति की कविता मातृ सृष्टि आधार है सकुल गुणों की खान ने तालियां बटोरीं।प्रकृति झा की पंक्तियां मेरी माँ ने मुझको जन्म दिया ने सभी  को भावुक कर दिया।डॉ. रश्मि झा की कविता माँ को भी नज़रें लगती है ने माहौल को खुशनुमा कर दिया। गीतेश्वर जी के गीतों ने धूम मचा दी।अनुराग सुरुर की ग़ज़ल डर रहा था मैं जिनको खोने से तथा विजय वाज़िद जी की ग़ज़ल वो टूटे फूटे और कच्चे घर नही बदले ने वाहवाही बटोरी।डॉ. चन्द्रमणि ब्रह्मदत्त ने कार्यक्रम की सराहना की। कार्यक्रम के अंत में साधना गुप्ता ने सभी का आभार प्रकट कर कार्यक्रम का समापन किया।