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Thursday, November 28, 2024

मुल्क सारा बज़ार जैसा है//ह्रदयेश मयंक की एक नई ग़ज़ल के कुछ शेर

 Hindi Poem Posted by Haridyesh Mayank on 26th November 2024 at 5:55 PM FB

दिल मेरा इश्तहार जैसा है.... !


आज ह्रदयेश मयंक की एक नई ग़ज़ल के कुछ शेर जो दिल से लेकर बाज़ार तक की बात करते हैं। निवास मुंबई में है। चिंतन दिशा की संपादक और प्रकाशक हैं। पत्रिका संचालन के चलते स्वनिर्भर भी हैं। वास्तव में नीतिगत और विचारधारक पत्रिकाएं समय भी मांगती हैं, मुश्किलों से जुटाया हुआ धन भी और इसके साथ ही, दिल, दिमाग की पूरी ऊर्जा भी। आसान नहीं होती साहित्य साधना, पत्रकारिता और लेखन। देखिए ह्रदयेश मयंक जी  शायरी का एक अंदाज़। --रेक्टर कथूरिया//संपादक: हिंदी स्क्रीन 


लम्हा- लम्हा उधार जैसा है 

मुल्क सारा बज़ार जैसा है 

सारी दुनिया ख़रीद ली मैंने 

फिर भी दिल बेक़रार जैसा है 

ज़िन्दगी रूठकर निभाती रही 

उसका गुस्सा भी प्यार जैसा है 

हर तरफ़ ,शोर है ,तमाशा है 

सारा मंज़र ग़ुबार  जैसा है 

हर्फ़-ब-हर्फ़ आईने की तरह 

दिल मेरा इश्तहार जैसा है।

    ----सोशल मीडिया से साभार ह्रदयेश मयंक

आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। नीचे कुमेंट बॉक्स में आपके विचारों की  इंतज़ार रहेगी ही। अपना नाम, स्टेशन का नाम और मोबाईल नंबर साथ लिखेंगे ऑटो हमें ज़्यादा अच्छा लगेगा। 

Thursday, April 13, 2023

प्रेम में हारे हुए पुरुष//शिखा पांडेय

गहरे अहसास की गहरी रिपोर्ट जैसी है यह पोस्ट 


सोशल मीडिया
: 13 अप्रैल 2023: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सोशल मीडिया का ज़माना है। यह  बात अलग है कि आजकल केवल सियासत से जुडी बातों का ही गंभीरता से नोटिस लिया जाता है जबकि बहुत कुछ और भी होता है जिसे पढ़ते, सुनते जा देखते हुए मन में बहुत कुछ कौंधने लगता है। ऐसी ही एक रचना गत रात भी पढ़ी जिसे पोस्ट किया गया था 22 अप्रैल 2020 को। 

कोई ज़माना था जब केवल पुरुष  पर ही काव्य रचनाएं लिखी जाती रही। उनकी कथाएं और गाथाएं बनती रहीं। जल्द ही ट्रेंड बदला और प्रशंसा भरे इस साहित्य में महिलाओं की निंदा कम हो गई। फिर नारी की प्शारशंसा का रिवाज भी शुरू हुआ। बहुत सा साहित्य लिखा गया और बहुत सी फ़िल्में भी बनीं। शायद इसलिए कि धीरे धीरे  महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया था। समय के साथ साथ यह अनुपात बार बार बदलता ही चला गया। इस बदलते हुए अनुपात में नारी का दर्द तो सामने आता रहा और बहुत से कानून भी बनें लेकिन पुरुष का दर्द नज़रअंदाज़ होता रहा। इसी बीच नर-नारी की बराबरी की आवाज़ ने ज़ोर पकड़ा और इस पर भी लिखा जाने लगा कि मर्द को भी दर्द होता है। वह भी रोता है बेशक छुप कर ही सही। इसी विषय पर सोशल मीडिया में एक काव्य जैसी रचना फेसबुक पर भी नज़र आई। लेखिका का नाम शिखा पांडेय बताया गुया लेकिन उनसे सम्पर्क नहीं हो सका। फिलहाल आप यह पोस्ट पढिए जिसमें आपको काव्य रस का अहसास भी महसूस होगा। अंतर्मन में चलते द्वंद और पीड़ा का भी अहसास होगा।  आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। स्नेह के साथ आप का--रेक्टर कथूरिया 

यह है वो रचना 

प्रेम में हारे हुए पुरुष

कहीं दूर गाँव या शहर में

ढूँढते हैं एक शांत कोना

जहाँ होता है मध्यम अलसाया हुआ अँधेरा

उदास पुरवाई को लिये हुए

वो जूझते है अपने ही अंतर्मन में छुपे अपनी नाकामी के सवालों से, क्योंकि वो पुरुष है इसलिए कह नही सकते किसी से भी अपनी व्यथा....

गुम करने लगते है खुद को बेवज़ह मुस्कुराहटों की तहरीरों में....झोंक देते हैं स्वयं को रोज़गार की भट्टी में

और जब इनसे में शांत नही होता उनका चित्त तो आ जाते हैं किसी सोशल मीडिया के द्वार पर और ढूढने लगते हैं किसी द्वार पर झूठा प्रेम....जी हां सिर्फ झूठे प्रेम को ही ढूढते है क्योंकि नही जाना चाहते छोड़कर ये अपने पुराने अक्स को......और बन जाते है दुनिया की नज़र में बेग़ैरत और लानत भरे बेशर्म पुरुष, और फिर इसी झूठी दुनिया मे लिप्त होकर

वे खोजते हैं अपनी पवित्रता को।

और अंत में अब  वो रोज देखते हैं उस हाथ की  हथेलियों में गहरी रेखाओं को

जिन्हें देखकर किसी भविष्य वक्ता ने कहा कि

तुम भाग्यशाली हो...❤️

- शिखा पांडेय


Thursday, July 21, 2022

कठिन अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति है रीतू कलसी

नई काव्य रचना भी यही बताती है 


सोशल मीडिया: 21 जुलाई 2022: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

कितनी कठिन रही होगी ऐसी अनुभूति! 

कितनी कठिन रही होगी ऐसी कल्पना भी!

कितनी सहजता से कर दी अभिव्यक्ति!

कितनी शानदार है रीतू कलसी की यह काव्य रचना भी--!

आप ने सुना होगा वह लोकप्रिय गीत--

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे--जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे-संग संग तुम भी गुनगुनाओगे!

वो गीत भी सुना होगा--गर तुम भुला न दोगे

सपने ये सच ही होंगे

हम तुम जुदा न होगे

हम तुम जुदा न होगे 

ऐसे बहुत से गीत हैं--बहुत सी कहानियां हैं लेकिन कितने लोग याद रख पते हैं जब बिछड़ने वाला बिछड़ ही जाता है। हकीकत यही है कि जिसके बिना एक कदम तक चलना नामुमकिन लगता था हम उसके बिना भी फिर से जीना सीख ही लेते हैं। बेवफाई कहो या ज़िंदगी की मजबूरियां कि याद रखने में सहायता देने वाली सभी निशानियां मिल कर भी उन यादों को भूलने से रोक नहीं पातीं। हम सभी धीरे धीरे सभी को भूल जाते हैं। हमारे स्वार्थ हमें यही तो सिखाते हैं। ऐसे में रीतू ने कुछ ज़्यादाही सच्ची बात कह दी है। 

वैसे सत्य भी यही है--जीवन भी यही है--लेकिन स्वीकार करना आसान तो नहीं होता। हम भ्रम में जीने वाले लोग। अंधेरे में जीने वाले लोग। घर के अंदर और बाहर भी अपनी ज़रूरत के मुताबिक ही रौशनी का प्रबंध करते है। ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं सोचते के हमारे अंतर्मन में भी हकीकत की रौशनी आ जाए। स्वयं को भुलाने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलते हैं। कभी दारो--कभी सिनेमा--कभी नावल--कभी कविता---फिर भी स्वयं को भूल नहीं पाते तो कई बार नींद की गोली का भी सहारा--! बहुत डरते हैं हम अंतर्मन में रुष नि होने से। बहुत डरते हैं हम स्वयं के साक्षताकार से। अंतर्मन के आईने में झाँकने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हम लोग। जब अंतर्मन में किसी न किसी तरह ऐसी रौशनी आ ही  जाती है तभी सम्भव हो पाता है ऐसी रचना लिख पाना। ऐसी सफल रचना के लिए रीतू को हार्दिक बधाई। आप भी इस रचना को पढ़ सकते हैं लेकिन खतरा है यह आप का साक्षताकार कहीं आप से ही न करवा दे..! हिम्मत जुटा सकते हैं तो य्रुर पढिए इस धंदर कविता को।   --रेक्टर कथूरिया 

अब जिस कविता की बात की ज़रा उसे भी पढ़ लीजिए  


जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

भूल जाना उसी वक्त

बिल्कुल भी समय बरबाद मत करना

अपने दिमाग को कष्ट मत देना

मत सोचना कितना समय गुजारा मेरे साथ

हो सकता है पल भर के लिए भर आए आंखें

फिर भी जानती हूं किसी और के साथ होने से

याद भी न आयेंगे साथ गुजारे लम्हें

यही जिंदगी है जीवन है किसी के साथ कोई नही जाता

तो इसीलिए तुम ऐसा ही करना

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

सब झूठ जला देना मिटा देना 

कभी एक साथ रहने के वादों से खुद ही छुटकारा मिल जाएगा 

वादा खिलाफी के झमेलों से बचा लेगी मौत की खबर तुम्हे 

बस फिर भी 

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

तो चले जाना उसी समय बरसात में नहाने 

सब कुछ धुल जाएगा मन से तन से 

कहीं खुशबू बचाए न रखना अपने पास

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे 

मिटा देना नामोनिशान हर जगह से, हर जगह से

   ---रीतू कलसी

Saturday, October 10, 2020

नहीं रहे सोये हुए ज़हनों को झंझोड़ने वाले अज़ीम अमरोहवी साहिब

 कलम से ज़ुल्म  की कलाई मरोड़ना उन्हें बाखूबी आता था आता था  

कोरोना ने हमसे बहुत ख़ास ख़ास लोग छीन लिए। शायरी, सियासत, कला, फ़िल्में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जिसमें से कोई न कोई घर सूना न हुआ हो। इसी दुखद कड़ी में एक और नाम है जनाब अज़ीम का। बहुत  करते थे। किसी का नाम चाहे इशारों से भी लें तो भी लिहाज़ नहीं करते थे। उनके इशारे भी अक्सर आसानी से समझ आ जाते कि किस किस चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं। इस के बावजूद कभी भी तहज़ीब का साथ न छोड़ते। जैसे जैसे हालात नाज़ुक़ बनते गए वैसे वैसे अज़ीम साहिब की संवेदनशीलता भी  बारीकी से बढ़ती गई। न तो अंदाज़ बदला न ही तेवर बदले।  उनके जाने की दुखद जानकारी मिली है। 


आज के हालात में जब उनकी ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा थी तब वह रुखसत हो गए। आज के इस नाज़ुक दौर में जब सच कहना बेहद दुश्वार होता जा रहा है और बहुत से लोग खामोश रहने में ही भलाई समझने लगे हैं इसके बावजूद भी सोशल मीडिया पर अक्सर पूरी तरह बेबाकी से सरगर्म रहने वाली मोहतरमा तस्वीर नक़वी साहिबा से। वह बताती हैं:अलविदा अज़ीम अमरोहवी साहेब,बहुत कमी कर गए आप मेरे शहर अमरोहा में,पचास किताबों के लेखक ,बहुत अच्छे मर्सिय लिखते थे ,पढ़ते थे ,एक हरदिल अज़ीज़ शख्सियत,दो महीने बड़ी बहादुरी से कोविड से जंग लड़ी मगर हार गए,आप अमरोहा की तारीख में दर्ज हो गए हमेशा के लिए!! 

Wednesday, September 2, 2020

जनाब दुष्यंत कुमार के जन्मदिन पर डा. कुमार विश्वास

दुष्यंत के तेज़ाबी तेवरों में एक बार फिर असली कलम का रंग 
जनाब दुष्यंत कुमार साहिब की शायरी झलक 

सोशल मीडिया
: 2 सितंबर 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
विदेश से लेकर पंजाब की हर गली तक जन चेतना  लगी पत्रकार सोनिया के
साथ जानेमाने शायर डाक्टर कुमार विश्वास
 
आज के दौर में जो शायर लोकप्रियता के शिखर छू रहे हैं उनमें डाक्टर कुमार विश्वास भी विशेष तौर पर ख़ास शायरों में से गिने जाते हैं। पहली सितंबर के मौके पर उन्होंने कालजयी शायर दुष्यंत कुमार को बहुत ही श्रद्धा से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये। उन्होंने अपने फेसबुक प्रोफाईल पर कहा:
कविता के चाहने वाले अक्सर मुझसे पूछते हैं कि ये ‘कालजयी-कविता’ कैसी होती है ! आइए समझाने की कोशिश करता हूँ ! आपातकाल के दौरान जब हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गाँधी जी ने सत्ता के अहंकार और चमचों की जय-जयकार में मग्न होकर भारतीय-लोकतंत्र को व्यक्ति-निष्ठा के आगे नतमस्तक करने की कोशिश की थी तो उसी पार्टी की राज्य सरकार में कार्यरत कवि-ग़ज़लकार दुष्यन्त कुमार ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से बेख़ौफ़ उन्हें सच का आईना दिखाया था ! उस वक़्त की बंधक सरकारी-मशीनरी, घुटने टेकती मीडिया और इमरजेंसी को ‘अनुशासन-पर्व’ बताते भयभीत बौद्धिकों से उम्मीद हार चुकी आम जनता की ज़ुबान, दुष्यंत के तेज़ाबी तेवरों में मुखरित होने लगी ! याद रखिए ये आज से पैंतालीस साल पहले का इतिहास है😳! 
अब समझिए ‘कालजयी’😂! दुष्यंत कुमार के जन्मदिन पर आज जब हमने, आज से भी पाँच साल पहले बनाए ‘महाकवि सीरियल के ये पैंतालीस साल पहले लिखे अंश, कवि को श्रद्धांजलि स्वरूप, सोशल मीडिया पर लगाए तो ‘व्यक्ति-निष्ठा’ की उसी पुरानी बीमारी के युगीन शिकारों ने लगभग हर ग़ज़ल के नीचे ‘गाली-गुफ्तार’ करनी शुरू कर दी ! वे भड़क उठे कि मैं व्यवस्था का विरोध कर रहा हूँ बिना ये जाने की ये पैंतालीस साल पुरानी ग़ज़लें हैं और उस वक़्त की व्यवस्था के ख़िलाफ़ रची गई थीं😂! पढ़कर मैं तो बहुत हँसा कि चलो इनकी इस संकुचित सोच के कारण हमारा बड़ा कवि तो ‘कालजयी रचनाकार’ सिद्ध हो ही रहा है, सत्ता के अकारण अहंकार और व्यक्ति को व्यवस्था समझने वाले जय-जयकारी भक्त भी जय के तस, आजतक वैसे ही बराबर मौजूद है, यह भी सिद्ध हो ही रहा है ! अब आप समझे, यह होता है “कालजयी कवि” और यह होती है उसकी कालजयी कविता 😍😍🇮🇳👍!
ख़ैर आज उस खुद्दार कवि दुष्यंत कुमार के जन्मदिन के समापन से पहले, आइए देखिए ये एपिसोड और जानिए कि अंधभक्ति की अलोकतांत्रिक ख़ुराक पाकर कैसे धीरे-धीरे, हर दौर, हर सरकार, हर व्यवस्था में सच सुनने की शिद्दत ख़त्म होती जाती है लेकिन हर दौर में कवि बिना डरे उस अहंकार की आँखों में आँखें डालकर जनता के सवाल पूछता ही है ! न व्यवस्था का ग़ुरूर बदला न कवि का बेबाक़ सच कहने का सुरूर 😍🇮🇳 !
बक़ौल हमारे राजनैतिक विद्यालय के कवि-कुलपति अटलजी “सरकारें तो आएँगी जाएँगी, पार्टियाँ बनेंगी बिगड़ेगी, सत्ता का खेल तो चलेगा लेकिन ये देश रहना चाहिए, इसका लोकतंत्र रहना चाहिए !”
🇮🇳👍 देश और सच को कभी मत छोड़िए ! देश का मसला हो तो अपने “आप” के ख़िलाफ़ भी बोलिए और अपने बाप के ख़िलाफ़ भी बोलिए 😂😂! जयहिंद 


Friday, July 10, 2020

बेटी जैसा और कहां कौन!

 रिश्ते बड़े अनमोल होते हैं....बंधन अच्छे लगते हैं 
बेटियां जैसा कोई और कहां! इस अनमोल रिश्ते पर, इस दिव्य सम्बन्ध पर जितना भी लिखा जा सके कम है। आज के इस स्वार्थपूर्ण युग में बेटियों ने ही साबित किया है कि उन्हें बस मां बाप की कुशलता चाहिए और कुछ नहीं। बेटे तो हत्याएं भी कर रहे हैं और मां बाप को घरों से निकाल भी रहे हैं। ऐसी जघन्य स्थिति में बेटियां  किसी देवी की तरह ही लग रही हैं।  यहां दी जा रही सामग्री हमें किसी वाटसप ग्रुप पर मिली है। यदि आप के पास भी कोई इस तरह की सामग्री हो तो आप हमें अवश्य भेजें। -सम्पादकीय डेस्क
पिता और पुत्री की इस शानदार तस्वीर को क्लिक किया Katie E (Pexels) ने 
*बिटिया बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया*" ?
पिता ने कहा -"हाँ "
उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब" ?
पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं,
घुटनों पर सरकती थीं।
 मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं।
जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद।

मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था।

 तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं।
 मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था।
तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं,
मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं।
मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी तो हो सकता था।
 तभी तुम्हारा  भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया,

वो पहली और आखिरी बार था बेटा जब, तुमने मुझे रुलाया और बहुत रुलाया...

भगवान की दी हुई सबसे अनमोल धरोहर है बेटी...

क्या खूब लिखा है एक पिता ने...

हमें तो सुख मे साथी चाहिये दुख मे तो हमारी बेटी अकेली ही काफी है... रिश्ते बड़े अनमोल
होते हैं....बंधन अच्छे लगते हैं...अपनो से।

सुप्रभात जी। जय श्री कृष्ण।

आप भी बेटिओं के सम्मान में कोई कमी न आने दें। बेटियां अनमोल हैं। उन्हें इसी भावना से मिला करें। 

Sunday, June 21, 2020

अपनत्व को गले लगाएं, अंकों को नहीं

थोड़ा सा अपनापन और तनाव छू-मंतर 

लुधियाना: 21 जून 2020: (*रुबिता अरोड़ा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखिका रुबिता अरोड़ा 

आज रिया का बाहरवीं का नतीजा आने वाला है। मां-पापा की इच्छा है कि  रिया 90% से अधिक अंक लेकर इंजीनियरिंग करे। उधर रिया का दिल बैठा जा रहा है। परीक्षा पेपर मुश्किल थे तो ज्यादा अच्छा नहीं कर पाई थी। डर के मारे बुरा हाल था। खाना-पीना छोड दरवाजा बंद कर यही सोच रही हैं अब क्या होगा? पापा ने साफ शब्दों में कहा था किसी भी हालत मे 90% से कम अंक नहीं आने चाहिए। रिया की शुरू से ही पढाई में कम और नृत्य में ज्यादा रूचि थी पर पापा को पसंद नहीं था। साफ शब्दों में कहा-कुछ नहीं रखा नृत्य में और न ही अच्छे परिवार की लडकियों को शोभा देता है। इसे भूलकर पढाई में मन लगाओ और फिर रिया मन-मसोस कर रह गई। उसे याद आ रहा था इम्तिहान शुरू होने से कुछ रोज पहले चाचा परिवार सहित उनके घर आए। कितना मन था चचेरी बहनों साथ ढेरों बातें करने का पर मां ने कहा अपने कमरे में जाकर पढाई करो। चाची ने रोकना चाहा पर मां नही मानी। पिछले छह महीनों में उसे नहीं याद कभी घर से बाहर निकल कोई मस्ती की हो या फिर टैलीविजन में कोई मनपसंद कार्यक्रम देख पाई हो। हर वक्त बस एक ही बात सुनने को मिलती पढो पढो बस पढो। तंग आ चुकी थी पढाई से। सोचा जैसे-तैसे इम्तिहान हो गए तो शायद कुछ चैन मिले पर अगले दिन पापा ने कहा एंटरैंस की तैयारी शुरू कर दो। मतलब फिर से पढो और आज तो रिया को साफ पता था वह मां-पापा की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पायेगी। न जाने क्या क्या सुनना पडेगा। 

दोस्तों आज रिया जैसे न जाने कितने बच्चे तनावग्रस्त माहौल में जी रहे हैं।  कारण कोई और नही उनके अपने अभिभावक है, जो आज इतने स्वार्थी हो चुके है कि अपनी इच्छाएं बच्चों पर थोंप देते है, बिना सोचे समझे कि बच्चे क्या चाहते हैं।  नतीजा तनाव रूपी राक्षस हमारे समाज में सिर चढ नाच रहा है। हम क्यों भूल गए परिवार में या फिर हमउम्र दोस्तों के साथ रहकर बच्चे वे सब कुछ अपने-आप सीख सकते हैं जो किताबें नहीं सिखा सकती। जिस प्रकार बहता पानी अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है ठीक वैसे ही हमारे बच्चे भी अपना भविष्य खुद बना सकते हैं। आइये आज से ही इन नन्ही कलियों को पूरा खिलने की आजादी दे अपना प्यार, दोस्ती, अपनापन देकर। जहां तनाव हमारे अपनों को हमसे छीन रहा है वही थोडा सा अपनापन हमें उनके बहुत करीब ला देगा।

 *रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं

Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Monday, March 30, 2020

ज़िंदगी से जितना इश्क वाम के लोग करते हैं शायद और कोई नहीं

लेकिन कामरेड समता तदबीरों को छोड़ कर लकीरों की तरफ क्यूं?
लुधियाना: 30 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
जब जब भी मुलाकात हुई मुझे हर बार जसप्रीत कौर समता वाम विचारधारा से प्रभावित लडकी लगी।  कभी कभी तो मुझे उस पर यह प्रभाव जनून की हद तक भी महसूस हुआ। फिर कई बार नज़दीक से भी उसकी बातें सुनी। बार बार लगा कि उसके दिल में कोई दर्द है जिसे उसने छुपा लिया है। जैसे पंजाबी के जानेमाने शायर प्रोफेसर मोहन सिंह कहते हैं न--
होली होली बन गया 
मित्रां दा गम 
लोकां दा  गम  
बस समता मुझे हर बार उसी प्रक्रिया से गुज़रती हुई लगी। अपने गम को जनता के गम में तब्दील करती हुई। वह गमा क्या था मैंने कभी नहीं पूछा। मुझे ऐसे सवाल कभी भी अच्छे नहीं लगते। कुछ भी ऐसा पूछने पर मुझे लगता जैसे मैं नियमों के विपरीत जा रहा हूँ। अंग्रेजी में एक शब्द आता है-एन्क्रोचमेंट। बस कुछ भी ऐसा पूछना मुझे एनक्रोच करना ही लगता। समय गुज़रता रहा।  इसके साथ ही एक दर्द समता के चेहरे पर हर वक़्त रहने वाली मुस्कान के पीछे छुपा सा झलकता रहा। फिर दबे सुर की कुछ बातें भी सुनीं जो इधर सुन कर उधर से निकल भी जाती रहीं। जब जब भी मुझे अपनी कवरेज में कोई मुश्किल महसूस होती तब तब समता मुझे सहायता देने को सामने होती। जब उसने पहली बार कैमरे के सामने माईक पकड़ा तो सबके लिए हैरानी थी। उस दिन पंजाबी भवन में जस्टिस कोलसे पाटिल एक विशेष आयोजन में आये हुए थे। माईक समता के हाथों में था और कैमरा मैंने खुद संभाल लिया। मैं जस्टिस कोलसे की यादगारी तस्वीरों को कैमरे में कैद क्र लेना चाहता था। जब मन में ऐसी भावना हो तो ध्यान पूरी तरह कैमरे में रखना पड़ता है। मैं भी ध्यान मग्न था लेकिन मन में चिंता थी कि अब उनसे ऐसे बौद्धिक सवाल कौन पूछेगा जो उनके स्तर के भी हों। ऐसे में समता ने कमाल कर दिए। उसने बहुत अच्छे सवाल पूछे। स्टोरी भी बहुत अच्छी बनी। इसके इसी ग्रुप में रहने वाला कामरेड अरुण उसे हर बार मज़ाक मज़ाक में एक दिन की पत्रकार बता कर बार बार हंसाता।  लेकिन वह पंजाब स्क्रीन टीम की एक ऐसी सदस्य बन गयी थी जिसे आड़े वक़्तों की साथी कहा जा सकता है। जब जब भी फेसबुक खोलता तो समता की कोई न कोई पोस्ट सामने होती। हर पोस्ट में लोगों के साथ हो रहे अन्याय की बात का ज़िक्र होता। मुझे हैरानी भी होती कि क्या इस लड़की को अपना कोई गम ही नहीं? समय अलग अलग रंग दिखाता रहा। आज फेसबुक पर समता की पोस्ट बिलकुल ही अलग रंग की थी। उसने काव्यपूर्ण शब्दों में कहा:
मुकम्मल हुआ हो इश्क़ जिसका
उसकी हथेली देखनी है,

कैसी होती है वो
 " लक़ीर "
जो मेरे हाथों में नहीं है...!!!
मेरे लिंए यह पोस्ट किसी हैरानी से कम नहीं थी। हर समय लोगों के दर्द की बात करने वाली लड़की आज अपने दिल के दर्द की बात कर रही थी। मैंने झट से एक कुमेंट करते हुए समता से कहा:
शायद किसी ने सही कहा है:

हाथों की चंद लकीरों का!
यह खेल है बस तकदीरों का!

पे इसी गीत में आगे चल कर इसका जवाब भी है:
तक़दीर है क्या, में क्या जानूँ,
में आशिक हूँ तदबीरों का...!

....और कामरेड तक़दीर पर नहीं तदबीर पर भरोसा करते हैं Jaspreet Kaur Samta जी...
इस बात को कभी भूलना नहीं।

वैसे प्रकृति के नियमों में मैंने कई बार इसे सच होते देखा कि जब प्रकृति किसी चीज़ को छीनती है तो वास्तव में जल्द ही उससे बेहतर हमें थमा भी देती है।

सो हिम्मत और हौंसला ज़रूरी है।

किसी शायर ने बहुत पहले कहा था:
हालात के कदमों पे कलन्दर नहीं गिरता।
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता।
गिरते हैं समंदर में आ आ के कई दरिया!
लेकिन किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता!
           देखना एक दिन आपको मेरी बातें याद आएंगी। हिम्मत रखना।
                                                 --रेक्टर कथूरिया 
               (समता पर और चर्चा फिर कभी सही फ़िलहाल इतना ही)

Saturday, September 15, 2018

लुधियाना में हिंदी भवन की मांग तो उठनी ही थी

कल को हो सकती है उर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषा भवनों की भी मांग 
लुधियाना: 14 सितंबर 2018: (हिंदी स्क्रीन टीम)::
हम लोगों की एक खासियत है कि हम सारा साल बेशक कुछ न करें लेकिन कोई विशेष दिवस आते ही एक दुसरे दे बढ़ कर सक्रिय हो जाते हैं। यही कुछ हिंदी दिवस पर भी होता नज़र आया। शहर के शिक्षण संस्थानों और साहित्यिक संगठनों की तरफ में शुक्रवार को हिंदी दिवस अपने अपने अंदाज़ में मनाया गया। कुछ नए संकल्प लिए गए कुछ नई मांगें उठीं। अलग अलग स्थानों पर इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। सभी ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की। लेकिन अंग्रेजी-फ्रेंच और जर्मन सीख कर विदेश जाने की इच्छा रखने वालों को तो याद भी नहीं था कि आज हिंदी दिवस है। उनकी सोच अपनी जगह सही है। हिंदी सीखने से अच्छा रोज़गार और जीवन की सुविधाएँ थोड़े मिलती हैं। उनका मानना है की फायदे में तो अंग्रेजी सीखने वाले ही रहते हैं। 
हिंदी भवन की मांग ने फिर पकड़ा ज़ोर 
लुधियाना में साहित्यिक आयोजनों के लिए गुरुनानक भवन और पंजाबी भवन पहले से ही मौजूद है। लेकिन पंजाबी साहित्य अकादमी के तत्वविधान में चलने वाले इस पंजाबी भवन में अक्सर पंजाबी को वरीयता दी जाती है। हालांकि यहाँ हिंदी पुस्तकें भी रिलीज़ होती रही हैं लेकिन फिर भी यहाँ पंजाबी का बोलबाला ही समझा जाता है। यहाँ का किराया-खर्चा और अन्य शर्तें भी कई बार लोगों को सख्त लगती हैं। ऐसे में हिंदी भवन की मांग उतनी जायज़ ही थी। पंजाब हिंदी परिषद की ओर से सतीश चंद्र धवन (एससीडी) गवर्नमेंट कॉलेज और राज भाषा कार्यान्वयन समिति आयकर विभाग लुधियाना के संयुक्त तत्वावधान में राज्य स्तरीय हिंदी दिवस समारोह मनाया गया। इस दौरान कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. धर्म सिंह संधू, सुरेंद्र भटुआ, ओम प्रकाश, यशपाल बांगिया, यश पाल छाबड़ा, मदन बस्सी मौजूद रहे। यशपाल बांगिया ने हिंदी की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए इसे राष्ट्र भाषा का गौरव प्रदान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि पंजाब में एक हिंदी भवन जरूर होना चाहिए, ताकि हिंदी के प्रचार-प्रसार को सुदृढ़ दिशा प्रदान की जा सके। हिंदी प्रेमियों की यह मांग यथाशीघ्र पूरी हो ऐसी इच्छा भी है और आकांक्षा भी लेकिन क्या बनेगा उर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से जुड़े लोगों का।  आखिर वे भी तो कर सकते हैं अपने अलग भवन की मांग।  
इस अवसर पर सुरेंद्र भाटूआ ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से राष्ट्रीय भावना प्रबल होती है। कॉलेज के हिंदी विभाग के छात्र-छात्राओं ने समूह गान, एकल गीत व नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में 51 मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। इस मौके पर ज्योति शर्मा और भरपूर कौर को ग्यारह-ग्यारह सौ रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया। इस मौके पर डॉ. मुकेश अरोड़ा, डॉ. सौरभ कुमार, प्रो. सोनदीप, प्रो. इंद्रजीत पासवान मौजूद रहा। एसडीपी कॉलेज में आज हिंदी का रंग छाया रहा। 
इसी तरह एसडीपी कॉलेज फार वूमेन में हिंदी विभाग की ओर से हिंदी दिवस कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कार्यकारिणी प्रिंसिपल मंजू भाषिणी ने की। हिंदी में मेधावी रहने वाली छात्राओं को पुरस्कृत किया गया। कुल मिला कर आयोजन यादगारी रहा। गौरतलब है की यह कालेज हर बार इस दिन पर विशेष आयोजन करता है। 
हिंदी दिवस का आयोजन मालवा सेंट्रल कॉलेज में भी 
मालवा सेंट्रल कॉलेज ऑफ एजूकेशन में भी हिंदी दिवस के मौके पर कविता, भाषण व स्किट प्रतियोगिताएं कराई गई। हिंदी विभाग के प्रमुख डॉ. नरोत्तम शर्मा ने हिंदी भाषा के इतिहास और हिंदी की वर्तमान स्थिति के बारे में अवगत कराया। उल्लेखनीय है की यह संस्थान भी लुधियाना के पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से है। 
देवकी देवी जैन कॉलेज भी विशेष आयोजन 
लुधियाना के किदवई नगर में स्थित देवकी देवी जैन कॉलेज में हिंदी साहित्य परिषद के अंतर्गत हिंदी दिवस मनाया गया। हिंदी विभाग की ओर से भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें 11 छात्राओं ने हिंदी भाषा के इतिहास और विकास पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रिंसिपल डॉ. सरिता बहल ने हिंदी भाषा को सभी भाषाओं की जननी बताया। गौरतलब है की इस कालेज में भी हिंदी और अन्य सबंधित विषयों पर अक्सर सेमिनार कराये जाते रहते हैं। 
आर्य कॉलेज में हुआ सम्मान 
आर्य कॉलेज ग‌र्ल्स सेक्शन में हिंदी के मौके पर हिंदी विषय में 90 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाली छात्राओं को सम्मानित किया गया। बीए द्वितीय वर्ष की अंजू गुप्ता को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। कॉज छात्राओं ने हिंदी दिवस के मौके पर कविताएं भी पेश की। प्राचार्य डॉ. सविता उप्पल और प्रभारी सूक्ष्म आहलूवालिया ने हिंदी भाषा के प्रचार एवं प्रसार के लिए छात्राओं को प्रोत्साहित किया।
मध्यप्रदेश से ऊषा व्यास ने इस विशेष दिन पर लिखा है:
आज हम हिन्दुस्तानी हिन्दी भाषा को जो राजभाषा भीहै विशेष याद कर रहे हैं और हिंदी -दिवस मना रहे ।वास्तव में यह हमारे लिए गर्व की बात है क्योंकि हिन्दी ही वह भाषा है जो हमें भारतीय होने का एहसास कराती है और एकता की भावना को जागृत कराती है। अब हम जानते हैं कि हिंदी भारत और विश्व में बोली जाने वाली सर्वाधिक भाषाओं में से एक है।इसकी जड़ें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा मेंतलाशी जा सकती है। परंतुहिन्दी साहित्य की जड़ें ज
मध्ययुगीनभारत की ब्रज, अवधी, मारवाड़ीऔर मैथिली जैसी भाषाओं के साहित्य में पाई जाती है। हिंदी में गद्य का विकास बहुत बाद में हुआ पहले इसनेअपनी शुरूआत कविता के माध्यम से जो ज्यादातर लोकभाषा के रूप में प्रयोग कर , विकसित किया है। हिन्दी का आरंभिक साहित्य अपभ्रंश में मिलता है हिन्दी में तीन प्रकार का साहित्य मिलता है गद्य ,पद्य,चम्पू । अब हम इसके इतिहास पर भी प्रकाश डालें तो वास्तव में हिंदी साहित्य का विकास आठवीं शताब्दी से माना जाता है और यह वह काल है जब सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु हो गई थी और भारत में अनेक छोटे छोटे-छोटे शासन केन्द्र स्थापित होंगे लगे थे, जो परस्पर संघर्ष रत थे। हिंदी साहित्य के इतिहास को आलोचक सुविधा के लिए पांच ऐतिहासिक चरणों में देखते हैं।जो इस तरह _एक_आदिकाल जो १४००ई से पहले,,दूसरा भक्ति काल,१३७५-१७००ई.,तीसरा-रीतिकाल-१६००-१९००, चौथाआधुनिकाल -१८५०ई के पश्चात,और फिर-नव्योत्तरकाल-१९८०ई के पश्चात।और जैसे कि हम और आप जानते हैं कि संविधान में इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया है। भारत में तीन चौथाई से ज्यादा लोग हिंदी भाषा बोलते और समझते हैं। भाषा का प्रयोग केवल संप्रेषण के लिए नहीं वल्कि तर्क, कल्पना, विचार और सृजन के लिए भी होता है। और मानव का भाषाई विकास जन्म से ही हो जाता है,और जीवन पर्यन्त तक रहता है। शब्द,वाक्य, ध्वनियां और छन्द , अलंकार यह ही किसी भाषा को सजाते हैं व्यवस्थित रूप देते हैं। फिर हमारी "हिंदी" तो व्याकरण, कविता ,और साहित्य , इत्यादि रूप में बहुत विशाल और विविधताओं कोभरे हुए हैं। इसलिए हिन्दी ही हमारी पहचान है। जय हिन्दी जय हिन्द। जय भारत 🙏
इसी तरह अन्य कई संगठनों ने भी हिंदी दिवस पर विशेष आयोजन किये। इनका विवरण अलग से दिया जा रहा है।  इस दिवस पर प्राप्त हुए विचारों को भी अलग पोस्ट में प्रकाशित किया जा रहा है। 
आवाज़ के जादू की जानीमानी आर जे और शायरा छिंदर कौर सिरसा ने अपने भाव कुछ इस अंदाज़ में व्यक्त किये   

Friday, September 14, 2018

" हिंदी " दिवस पर पी के तिवारी जी की काव्य रचना

Sep 13, 2018, 11:36 PM
संस्कृत से आया ये हिंदी

हिंदी है शान , हिंदी है मान,
हिंदी है देश की शान |
हिन्दू हैं हम, हिंदी हो तुम,
हिंदी हैं, हम सब लोग |
हिंदी है हमारी सबसे प्यारी,
सूरज और गगन से भारी |
भारत में हैं अनेक भाषाएँ,
हिंदी को है उसमें से लाएं |
संस्कृत से आया ये हिंदी,
लगाना मत भूलना तुम बिंदी |
कोई बोले अंग्रेजी दिन भर,
तो कोई है हिंदी पर निर्भर |
हिंदी है हमारी मन की भावनाएँ,
हिंदी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ |

भाषा को सियासत का हथियार बनने से बचाना होगा

तभी कायम हो सकेगा हिंदी और अन्य भाषाओं का आपसी सौहार्द 
लुधियाना: 14  सितंबर 2018:( हिंदी स्क्रीन टीम)::
करीब तीन-चार वर्ष पूर्व जब किसी एक सप्ताह लम्बे आयोजन में भाग लेने के लिए मैं कोयम्बतूर (तमिलनाडू) गया तो भाषा के मामले में मेरे अनुभव काफी नए थे। मुझे लगता था की दश्कों के बाद हिंदी से नफरत केवल कम ही नहीं होगी बल्कि शायद प्रेम में भी तब्दील हो गयी होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। मैंने किसी रेहड़ीवाले से हिंदी में बात करने की कोशिश की तो वो मेरे साथ झगड़ने की सुर में बोला... नो हिंदी नो हिंदी। ओनली तमिल ऑर इंग्लिश। उसके परिवार की एक महिला--शायद उसकी पत्नी ने हिंदी बोल कर मेरी सहायता करनी चाही तो उसने उसे भी डांट दिया। वह भी चुप हो गयी। फिर मैंने वहां पहुंची किसी लाल झंडे वाली वाम महिला से सहायता चाही वह उत्तर भारत से वहां गयी लगती थी; शायद हिमाचल प्रदेश से। 
इसके बाद मेरी बात करने की मुश्किल आसान हुई। लेकिन इसके साथ ही मन में पैदा हुए कई सवाल। भाषा तो जोडती है फिर इसके नाम पर विवाद क्यूँ? सोच के सागर में डुबकी कुछ और गहरी हुई तो याद आया कैसे पंजाब के  टुकड़े भाषा के नाम पर ही किये गए थे। भाषा, साहित्य, संस्कृति, धर्म और कला जैसे गैर सियासी क्षेत्रों में सियासत की दखलंदाजी कुछ कुछ समझ में आने लगी। सत्ता लोलुप लोग क्या क्या कर सकते हैं यह भी दिखने लगा। अब 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के अवसर ऐसा बहुत कुछ याद आने लगा है। जब पंजाब के पंजाबी भाषी लोगों ने सियासी आदेशों के चलते अपनी भाषा पंजाबी की बजाये हिंदी लिखवाई थी। इसी गलतबयानी से शुरू हुई थी पंजाब की समस्या जो बाद  में विकराल बनी। 
साथ ही यह भी याद आया कि तमिलनाडू में हिंदी का विरोध 1937 से चला आ रहा है। वर्ष 1960 के दशक में जब यह आंदोलन और भड़का तो 65-66 में 25 जनवरी के दिन काले झंडे लहराए गए। मदुरई में आंदोलन हिंसक हो उठा। स्थानीय कांग्रेस कार्यालय के बाहर आठ लोगों को जिंदा जला दिया गया। यह हिंसक विरोध कम से कम दो सप्ताह तक चला।  अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक 70 लोगों की जान गयी। अनुमान लगा कर देखें भाषा के नाम पर खूनखराबा किस ने किया कराया होगा? काम से काम भाषा प्रेमी तो नहीं करेंगे हाँ सियासतदान ऐसा माहौल बना सकते हैं। 
हालात बेहद नाज़ुक थे। यहां तक कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय भी हिंदी थोपे जाने के सख्त ख़िलाफ़ थे। यह थोपे जाने की आशंका और भावना ही बवाल का कारण बनी होगी। दक्षिण भारत के सभी राज्य भी इसके विरोध में खुल कर खड़े थे। केवल इतना ही नहीं विरोध करने वालों में दक्षिण के कांग्रेस शासित राज्य भी थे। नेहरू और शास्त्री का ज़माना था। कहीं जनसंघ का होता तो शायद बात ही और बनी होती। 
हालात निरतंर बिगड़ते रहे। विरोध प्रदर्शनों के परिणाम स्वरूप उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को आश्वासन देना पड़ा। उन आश्वासनों को तत्कालीन सूचना और प्रसारणमंत्री इंदिरा गांधी ने राजभाषा अधिनियम में संशोधन के जरिए अंग्रेज़ी को सहायक राज भाषा का दर्जा देकर अमल में लाया। इससे कुछ शांति बहाल हुई। लेकिन कड़ुवाहट अभी तक काम नहीं हुई। 
इन हालातों पर टिप्पणी करते हुए मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंटल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक वीके नटराज ने कभी कहा था कि विरोध प्रदर्शनों के बिना हिंदी को संरक्षण देने वाले लोग मज़बूत हो जाते।  गौरतलब है की तमिल अपनी भाषाई पहचान को अन्य लोगों की तुलना में अधिक गंभीरता से लेते हैं। उनको इस बात का अहसास है कि भाषा को खत्म करके पूरी संस्कृति को ही समाप्त किया जा सकता है। ऐसा कई जगहों पर हो भी चुका है शायद। अब उन जगहों के लोगों का मूल स्वरूप ही बदल गया है। 
इसी तरह एरा सेज़ियान कहते हैं  कि हालात अन्य जगहों पर भी ठीक नहीं हैं। अब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी अंग्रेज़ी सीखने को प्रोत्साहन दे रहे हैं। अब हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। राज्य पहले से अधिक मजबूत हुए हैं और केंद्र अब पहले की तरह ताकतवर नहीं रहा। ऐसे में अंग्रेजी भाषा और कल्चर सभी क्षेत्रों में निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। 
कुछ ही समय पूर्व पंजाब में भी हिंदी को पंजाबी पर हमला समझा गया था। पंजाबी को दूसरे दर्जे की भाषा समझे/बनाये जाने के जवाब में सड़कों पर लिखे साईन बोर्डों से हिंदी पर कालिख पोत दी गयी थी। अगर हिंदी को हमलावर माना जाता रहा या बनाया जाता रहा तो भाषा का सौहार्द खतरे में है। पंजाब के जिन लेखकों ने हिंदी-पंजाबी दोनों में साहित्य रचा है उनका शुद्ध स्नेह खतरे में है। भाषा को सियासत का हथियार बनने से बचाना होगा। 

Wednesday, June 3, 2015

खुदा ने औरत को क्यों ख़ास बनाया

ईश्वर की बेहतरीन रचना को कभी भी दुख ना पहुंचाये
साहित्य की दुनिया के सक्रिय हस्ताक्षर गुरचरण नारंग सोशल मीडिया पर भी अक्सर सरगर्म रहते हैं। हाल ही में उन्होंने महिलाओं पर एक संक्षिप्त लेकिन दिल को छूने वाली रचना पोस्ट की है हिंदी स्क्रीन के वाटसअप ग्रुप पर। आपको कैसी लगी अवश्य बताएं:--रेक्टर कथूरिया 
गुरुचरण नारंग 
एक बच्चे ने अपनी माँ को रोते देखा तो पापा से पुछा माँ क्यो रोती है.??

पापा ने जवाब दिया सारी औरते बिना बात के रोती है..
बच्चा कुछ समझ ना पाया और वो बड़ा हो गया। 


एक दिन उसने भगवान से पूछा कि औरते क्यो रोती है बिना बात के.?
भगवान ने जवाब दिया: जब मै औरत को बना रहा था, तो मैने फैसला किया कि उसे कुछ खास बनाना हैं। मैने उसके कँधे मजबूत बनाये, ताकि वह दुनियादारी का बोझ उठा सके। 
उसके बाहो को कोमल बनाया, ताकि बच्चो को आराम महसूस हो सके।
मैने उसे इतनी आत्मशक्ति दी, ताकि वह नये जीव को धरती पर ला सके ।
मैने उसे साहसी बनाया, ताकि मुशकिल वक्त मे वह चट्टान की तरह
खड़ी रहे और अपने परिजनो का ख्याल रख सके।
मैने उसे संवेदनशील और विवेकी बनाया, ताकि वह सबकी मदद कर सके और माफ कर सके।
और वह समझदार इतनी कि उसने आंखों के आसुओं से अपने दुख को कम करने का काम भी स्वयं ही कर लिया, बेहतर है, ईश्वर की बेहतरीन रचना को कभी भी दुख ना पहुंचाये,

Womem ,  The Best Creation of Almighty Creator...…