Showing posts with label Films. Show all posts
Showing posts with label Films. Show all posts

Saturday, July 19, 2025

लगातार डटे हुए हैं हरनाम सिंह डल्ला अपनी टीम के साथ

 19th July 2025 at 18:15 Via WhatsApp From H S Dalla Regarding Behrampur Bet

संदेश है:  तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा .......!


खरड़
/ /बहरामपुर बेट: 19 जुलाई 2025: (मीडिया लिंक रविंद्र/ /हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

पहली जनवरी 1959 को एक फिल्म रिलीज़ हुई थी "धूल का फूल"इस फिल्म की कहानी उसी समाजिक समस्या पर आधारित थी जिसे आजकल उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता। अवैध संतान कुछ दशक पूर्व एक बहुत बड़ी समस्या हुआ करती थी। इसी विषय पर निर्माता बी आर चोपड़ा ने एक गज़ब की फिल्म बनाई थी जिसे निर्देशित किया गठा उन्हीं के भाई यश चोपड़ा ने। इसका एक दोगाना बहुत हिट हुआ था . .तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ...! जानेमाने कलाकार राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा पर फिल्माए गए इस गीत की लोकेशन दिखाई गई है एक कालेज का वार्षिक आयोजन। इस दोगाने के सवाल-जवाब/ /अन्तरे बहुत अर्थपूर्ण थे जिन्हें बहुत पसंद किया गया। बाकी गीत भी बहुत पसंद किए गए लेकिन इस गीत का तो जवाब ही नहीं था। लगातार दते हुए हैं हरनाम सिंह डल्ला 

इन गीतों को आवाज़ दी थी सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और सुरों के जादूगर मोहम्मद रफ़ी साहिब ने। गीत लिखे थे साहिर लुधियानवी साहिब ने। उनके लिखे गीत समाज के लिए एक विशेष संदेश भी छोड़ा करते गठे। इस फिल्म के गीतों में भी उन्होंने अपना संकल्प निभाया। इसी फिल्म के गीतों में एक गीत था-तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है

तुझ को किसी मज़हब से कोई काम नहीं है

जिस इल्म ने इंसानों को तक़्सीम किया है

इस इल्म का तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं है

तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया

हम ने इसे हिन्दू या मुसलमान बनाया

क़ुदरत ने तो बख़्शी थी हमें एक ही धरती

हम ने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया

जो तोड़ दे हर बंद वो तूफ़ान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

नफ़रत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है

इंसाँ को जो रौंदे वो क़दम तेरा नहीं है

क़ुरआन न हो जिस में वो मंदिर नहीं तेरा

गीता न हो जिस में वो हरम तेरा नहीं है

तू अम्न का और सुल्ह का अरमान बनेगा

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा। 

इस गीत को सुन कर, इस गीत को पढ़ कर एक बारगी तो मज़हबी कटड़ता और धार्मिक उन्माद से नफरत होने लगती। बहुत से सवाल मन में उठने लगते। कुछ लोगों को यह गीत कम्युनिज़्म का संदेश फैलाता भी महसूस हुआ क्यूंकि साहिर लुधियानवी विचारों के तौर पर वामपंथी के तौर पर ही जाने जाते थे। उनकी नज़्म/गीत ताजमहल हो या फिर वो सुबह कभी तो आएगी - --उनका संदेश इसी विचारधारा का संदेश फैलाता ही लगता रहा। 

खैर दशकों गुज़र गए लेकिन आज भी इन गीतों का जादू कम नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि आज भी कभी शिक्षा नीति को लेकर विवाद होता हौर कभी धर्म को लेकर। इन विवादों के बावजूद उन संदेशों का फैलना जारी है जिनको फैलाने में साहिर लुधियानवी साहिब भी अग्रसर रहे। 

आज के लेखक और शायर भी अब बड़े लोगों को समझाने की बजाए छोटे बच्चों को समझने समझाने का अभियान चलाने में लगे हैं। पंजाबी लेखक और पत्रकार हरनाम सिंह डल्ला आजकल  बच्चों के स्कूलों में जा जा कर इन बच्चों को बड़े दिल दिमाग वाला सच्चा इंसान बनाने में जुटे हैं। उनकी टीम भी साथ होती है और बच्चों को नई नई पुस्तकें थमाते हुए वे उन्हें ताकीद भी करते हैं कि इन पुस्तकों को पढ़ना ज़रूर है और वह भी पूरे ध्यान से। कुछ हफ़्तों के बात बच्चों की परीक्षा के मकसद से कुछ सवाल भी पूछे जाते हैं। 

अब जबकि कुछ संगठन और सियासतदान बच्चों की सोच को संकीर्ण बनाने में लगे हैं उस दौर में हरनाम सिंह डल्ला और उनकी टीम बच्चों की मानसिकता को खुले दिमाग वाला बनाने में जुटी है। यदि आप को उनका प्रयास अच्छा लगा हो तो आप भी उनसे जुड़ सकते हैं। उनकी टीम में साहित्य सभा रजिस्टर्ड बहरामपुर बेट के प्रधान कुलविंदर सिंह और कुछ दुसरे लोग भी शामिल हैं। 

इस टीम के सक्रिय सदस्त हरनाम सिंह डल्ला का मोबाईल फोन नंबर है: +91 94177 73283


Tuesday, September 29, 2020

हिन्दी फिल्मों में राष्ट्रवाद का विकास

 24-अगस्त-2017 10:05 IST

 लेकिन आज के बॉलीवुड में वह बात कहां! 


हिंदी फिल्मों ने राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  इस मकसद को सामने रख कर बनी फिल्मों के गीत-संगीत और डायलॉग्स में एक जादू सा असर होता। गीत तो देखते ही देखते सबके  होंठो पर आ जाते। इस दौर की याद दिला रहे हैं-
*प्रियदर्शी दत्त

*प्रियदर्शी दत्त
पिछले 70 वर्षों में हिन्दी की अनेक यादगार फिल्मों ने लोगों में देशभक्ति भाव, शौर्य और देश के लिए बलिदान का भाव भरा है। फिल्मों के विषय स्वतंत्रता संघर्ष, आक्रमण और युद्ध, खेल, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास, विद्रोह आदि रहे हैं। लेकिन सबके मूल में भारतीय होना और देश के प्रति कर्तव्य का भाव रहा है। लेकिन आज के बॉलीवुड में कम संख्या में देशभक्ति की फिल्मे बन रही है। पुराने जमाने के बम्बई फिल्म उद्योग में देशभक्ति फिल्मों की संख्या अधिक हुआ करती थी।

भारत में फिल्म उद्योग स्वतंत्रता आंदोलन के समय उभरा। 19वीं शताब्दी के नाटक की तरह इस बात की प्रबल संभावना थी कि फिल्मों के माध्यम से देशभक्ति की भाव का संचार किया जा सकता है। 1876 में लॉर्ड नॉर्थब्रुक प्रशासन ने मंच से राजद्रोह दृश्य खत्म करने के लिए नाटक प्रदर्शन अधिनियम लागू किया था। इसी तरह ब्रिटिश शासन ने सेंसर कार्यालय और पुलिस के माध्यम से फिल्मों पर कड़ी नजर रखी। वर्ष 1943 में रामचन्द्र नारायण जी द्विवेदी  उर्फ कवि प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट निकला। यह वारंट बॉम्बे टॉकिज की फिल्म किस्मत में भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन में अप्रत्यक्ष रूप में शासन के विरुद्ध लिखे गाने को लेकर जारी किया गया था। यह गाना था आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है। इसी गाने में आगे लिखा गया है शुरू हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठो हिन्दुस्तानी, तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी। दूसरे विश्व युद्ध (1939-1945) में भारत मित्र राष्ट्रों की ओर था और वास्तविक रूप में जर्मनी और जापान का शत्रु था। 1942 में सिंगापुर और बर्मा के लड़खड़ाने के बाद भारत में जापानी आक्रमण की चिंता वास्तविक होने लगी। लेकिन अंग्रेज चलाक तरीके से समझते थे कि जंग (युद्ध) का मतलब स्वतंत्रता संघर्ष है और विदेशी का जिक्र गाने में अंग्रेजों के लिए किया गया है। गिरफ्तारी से बचने के लिए कवि प्रदीप भूमिगत हो गए।

15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा के साथ इस तरह की बाधाएं दूर हो गई। लेकिन राष्ट्रवाद के विषय पर हमने फिल्मों को बनते नहीं देखा। स्वतंत्रता के लंबे संघर्ष के बाद स्वतंत्र देश में देशभक्ति फिल्म का न बनना एक विषय रहा। ऐसा इसलिए कि तुलनात्मक दृष्टि से 1952 की मिस्र की क्रांति पर अनेक फिल्मे बनी और बांग्लादेश की मुक्ति पर भी फिल्में बनी। इस संबंध में कुछ अपवाद भी है। वजाहत मिर्जा ने शहीद फिल्म का लेखन किया और इसका निर्देशन रमेश सहगल ने किया। इस फिल्म ने 1948 में अच्छा व्यवसाय किया। इस फिल्म का गीत वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो कमर जलालाबादी ने लिखा था। 1950 में सबसे अधिक कामयाब फिल्म थी सामाधि। इसका निर्देशन भी रमेश सहगल ने किया था। कहा जाता है कि यह फिल्म नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज से जुड़ी सच्ची घटना पर आधारित थी। उसी वर्ष आजाद हिन्द फौज पर एक और फिल्म आई। यह फिल्म थी पहला आदमी और इसका निर्देशन महान निर्देशक विमल रॉय ने किया था।

1952 में बंकिमचन्द्र चटर्जी के उपन्यास पर बनी फिल्म आनंद मठ आई। इसका निर्देशन हेमेन गुप्ता ने किया था हेमेन गुप्ता स्वतंत्रता सेनानी थे और वह वर्षों जेल में रहे। हेमेन गुप्ता फांसी से बच गए थे। बाद में उन्होंने फिल्म निर्माण की ओर कदम बढ़ाया। आनंद मठ दस बड़ी फिल्मों में शुमार नहीं हुई। बड़ी फिल्मों में आन, बैजू बावरा, जाल तथा दाग थी जिनमें संगीत, रोमांस, सस्पेंस और सामाजिक ड्रामा था। 1940 और 1950 के दशक में सामाजिक, रोमांटिक, संगीतप्रधान, एक्शन, सस्पेंस, पौराणिक फिल्में बनी। देशभक्ति और राष्ट्रवादी फिल्में अपवाद थीं। 1953 में शोहराब मोदी ने झांसी की रानी फिल्म बनाई लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। 1953 में शीर्ष पर नंद लाल जसवंत लाल की फिल्म अनारकली रही। इसी तरह 1956 में बंकिमचन्द्र चटर्जी के ऐतिहासिक उपन्यास पर बनी दुर्गेश नंदिनी फिल्म भी असफल साबित हुई।

इसका अर्थ यह नहीं है कि दर्शक राष्ट्रवादी भावना से मुंह मोड़े हुए थे। इसका अर्थ सिर्फ यही था कि भारत के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता अकेली चुनौती नहीं थी। इससे पहले 1946 चेतन आनंद की फिल्म नीचा नगर में यह दिखाया गया था कि किस तरह धनवान लोग गांव में रहने वाले गरीबों का शोषण करते है। इस फिल्म को कांस फिल्म समारोह में प्रवेश मिला। 1953 में ख्वाजा अहमद अब्बास ने राही फिल्म का निर्देशन किया। इस फिल्म में असम के चाय बगानों में अंग्रेजी मालिकों द्वारा मजदूरों के शोषण को दिखाया गया था।

स्वतंत्रता के बाद फिल्मों को अपना जीवन मिला। 1940 और 1950 में लोगों की पसंद को देखा गया। नए गणराज्य की अपनी समस्याएं थी और लोगों का ध्यान उसी ओर था। 1950 के दशक की सबसे कामयाब फिल्म महबूब खान की मदर इंडिया (1957) रही। इस फिल्म में गांव की गरीब महिला राधा (नरगिस अभिनित) के दो बच्चों के पालने और धुर्त साहूकार के विरुद्ध संघर्ष को दिखाया गया था। 1955 की सबसे सफल फिल्म थी राज कपूर की श्री 420 । इस फिल्म में गरीबों का खून चूसने वाली पोंजी योजनाओं की विपत्ति को दिखाया गया था। 1959 में ऋषिकेश मुखर्जी ने अनाड़ी फिल्म बनाई। इस फिल्म के हीरो थे राज कपूर। इस फिल्म में शहरों में घातक जहरीली दवाइयों के भयावह परिणाम दिखाए गए थे। स्वतंत्र भारत की समस्याओँ को फिल्मों में जगह मिली।

1960 के दशक में यह जाहिर हुआ कि भारत को केवल आंतरिक चुनौतियों का ही सामना नहीं करना है। सैन्य दृष्टि से भी भारत को तैयार रहना है। देश ने 60 के दशक में 1960 में गोवा मुक्ति युद्ध, 1962 में चीनी आक्रमण और 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण को झेला था। फिर 1971 में भी भारत-पाक युद्ध हुआ। इन युद्धों से हम, शौर्य, देशभक्ति और बलिदान को लेकर सचेत हुए।

उसके बाद से अनेक देशभक्ति फिल्में आई। इनमें हकीकत (1964), हमसाया (1968), प्रेम पुजारी (1970), ललकार (1972), हिन्दुस्तान की कसम (1973), विजेता (1982) और आक्रमण (1975) शामिल हैं। अपने समय के मुताबिक प्रहार (1991), बॉर्डर (1997) और एलओसी करगिल (2003), टैंगो चार्ली (2005), शौर्य (2008), 1971 (2007), गाजी अटैक (2017) जैसी फिल्में बनी। इन फिल्मों से साधारण भारतीय लोगों के मन में सेना के प्रति सम्मान बढ़ा।

1960-70  के दशक में अभिनेता हरिकिशन गिरि गोस्‍वामी उर्फ मनोज कुमार ने फिल्‍मों में सकारात्‍मक और देशभक्ति के विचारों का जिम्‍मा संभाला। इसी लिए उन्‍हें ‘’भारत कुमार’’ का उपनाम भी मिला। उन्‍होंने फिल्‍म शहीद (1965) में क्रांतिकारी भगत सिंह की भूमिका अदा की। उनकी उपकार (1967) जैसी फिल्‍मों ने फौज की नौकरी छोड़ चुके व्‍यक्ति के काला बाजारी और नकली दवाओं के जाल में उलझने के खतरों को दर्शाया। पूरब और पश्चिम (1970) में उन्‍होंने पश्चिम में भारतीय संस्‍कृति की अलख जलाये रखी।

1970 के दशक तकभारत को पश्चिम में पिछड़ा और प्रतिगामी देश समझा जाता था। मनोज कुमार ने पूरब और पश्चिम में भारतीय संस्‍कृति की श्रेष्‍ठता को सामने रखा। उदारीकरण के पश्‍चात स्थिति में बदलाव आयाजिसमें सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रदर्शन ने भारत को वैश्विक स्‍तर पर उदीयमान दर्जा दिलाया। 1960 के दशक के मध्‍य के बाद सेअमरीका और ब्रिटेन जैसे पश्चिम के औद्योगिक देशों में जाने वाले भारतीय नागरिकों की संख्‍या में वृद्धि हुई है। इसने सुदूर राष्‍ट्रवाद की भावना के उदय का मार्ग प्रशस्‍त किया, जिसके द्वारा भारतीय अपनी पहचान पर गर्व करने लगे। ‘’आई लव माई इंडिया’’ (परदेस 1997) जैसे गीतों ने इस भावना को बरकरार रखा।

लगान (2001), चक दे इंडिया (2007)भाग मिल्‍खा भाग (2013)दंगल (2016) जैसी फिल्‍मों ने देशभक्ति की भावना जगाने के लिए खेलों का सहारा लिया। इस संबंध में 29 जून 1911 में कोलकाता में आईएफए शील्‍ड मैच में  मोहन बगान की ईस्‍ट यॉर्कशायर रेजिमेंट पर जीत की घटना पर आधारित अरूण रॉय की बंगाली फिल्‍म इगारो या द इमॉर्टल इलेवन (2011) का उल्‍लेख भी किया जाना चाहिए। यह किसी ब्रिटिश टीम पर किसी भारतीय फुटबॉल क्‍लब की पहली जीत थी। इस घटना के शताब्‍दी वर्ष के अवसर पर आई यह फिल्‍म उसके प्रति श्रद्धांजलि स्‍वरूप थी।

देशभक्ति के प्रति फिल्‍मकारों का आकर्षण बरकरार है और यह इस बात से साबित होता है कि वर्ष 2002 में भगत सिंह के बारे में तीन हिन्‍दी फिल्‍मों का निर्माण किया गया। ये फिल्‍मे थीं - राजकुमार संतोषी की द लिजेंड ऑफ भगत सिंहगुड्डू धनोवा के निर्देशन में बनी 23 मार्च : शहीद और सुकुमार नायर की शहीद-ए-आजम । 2004 में विख्‍यात निर्देशक श्‍याम बेनेगल की फिल्‍म नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस : द फॉर्गाटन हीरो आई। लेकिन बॉक्‍स ऑफिस पर कामयाबी के लिए देशभक्ति ही अकेला जादू नहीं हैजैसा कि चटगांव शस्‍त्रागार विद्रोह (1930-34) पर आधारित आशुतोष गोवारिकर की फिल्‍म खेले हम जी जान से (2010) की नाकामयाबी से साबित हुआ। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि राष्‍ट्रवाद सिनेमा के रूपहले पर्दे पर आने के नये रास्‍ते तलाशना जारी रखेगा। उसे दर्शकों को लुभाने के लिए लगातार खुद को नये सिरे से खोजना जारी रखना होगा।

*******

  • लेखक दिल्‍ली स्थित स्‍वतंत्र शोधकर्ता और स्‍तंभकार हैं।

लेख में व्‍यक्‍त किये गये विचार उनके निजी विचार हैं।


Thursday, December 27, 2012

बालीवुड में गौरव सग्गी

फ़िल्मी दुनिया में फिर लुधियाना की मौजूदगी का अहसास
पंजाबी फिल्मों की बात चले तो जो नाम और चेहरे एकदम जहन में आते है उनमें से एक चेहरा है सरदार भाग सिंह का। चंडीगढ़ के बस स्टैंड से बाहर निकलते ही सडक पार करके उनके घर में जाना किसी वक्त रोज़ की बात हुआ करती थी। वक्त की गर्दिश में फिर यह सिलसिला न चाहते हुए ही लगातार कम होता चला गया। यहाँ रोज़ी रोटी के फ़िक्र में ऐसे सिलसिले अक्सर कम हो जाते हैं। पर उनकी जो बातें अब तक जहन में हैं उनमें से एक है सोमवार। वह सोमवार को उपवास रखते थे। भगवान् शिव में उनकी गहरी आस्था थी। शिव का नटराज रूप उनके ड्राईंग रूम में भी सजा होता। कभी मूड होने पर वह भगवान् शिव और कला की विस्तृत चर्चा भी करते। 
Photo Courtesy:Sara Tariq
इसी तरह गायन और अभिनय के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाने वाली सुलक्षना पंडित भी बहुत अध्यात्मिक थी।सर्दी हो या ओले बरस रहे हों हर रोज़ सुबह पूरे केशों सहित स्नान करना और फिर पूजा पाठ में काफी समय गुज़ारना उनकी दिनचर्या में शामिल था। उनकी आवाज़ में भी जादू सा था और अभिनय में भी। बहुत सी लोकप्रिय फिल्मों में यादगारी भूमिका निभा पाना और फिर फिल्म फेयर एवार्ड भी हासिल कर लेना कोई आसान बात नहीं थी। हालाँकि उनके सामने चुनौती भी सख्त थी और प्रतियोगिता भी। 
दर्शकों के मन में हनुमान जी की छवि बनने के बाद दारा सिंह जी भी धर्म कर्म में बहुत रुचि लेने लगे। शायद यही कारण है कि दर्शक उनमें हनुमान जी को ही देखने लगे। पहले पहले मुझे लगता था की शायद इस तरह के सात्विक किस्म के लोग तामसिक प्रवृतियों से भरी फ़िल्मी दुनिया में सफल नहीं हो सकेंगे। पर इन सबकी सफलता देख कर दुनिया के साथ साथ मैं खुद भी हैरान रह गया। पंजाबी फ़िल्मी दुनिया के महारथी भाग सिंह ने किस तरह अपनी बेटी बरखा को पत्रकारिता की बारीकियों से अवगत करा कर एक कुआलिफाईड पत्रकार बनाया। अभिनय में नई जान डालने 
पठानकोट में गौरव सग्गी के भक्ति रस में झूमते भक्त 
वाली अपनी धर्मपत्नी कमला भाग सिंह के साथ किस तरह कदम दर कदम मिला कर कठिन से कठिन रास्तों पर चल कर सफलता की ऊंचाइयों को छुआ यह किसी करामत से कम नहीं। मुझे उनके परिवार के साथ इतय एक एक पल बिना किसी कोशिश के अब तक याद है। भाग सिंह जी का गोरा   रंग और मेहंदी रंगी भूरी दाड़ी कुल मिलकर उनकी शख्सियत बहुत ही आकर्षक लगती रिटायर्मेंट के बाद इस तरह की  सहेज पान तभी संभव होता है जब दिल और दिमाग के ख्याल भी बहुत खूबसूरत हों। ज़िन्दगी के सभी रंगों को उन्हों ने मुस्करा कर समझा। हर मुश्किल को उन्होंने हर बार सुस्वागतम कहा। एक आम इंसान की तरह ज़िंदगी जीते जीते वह अचानक ही अपनी सहजता के कारण खास हो जाते। मुझे याद है एक बार एक फ़िल्मी मेले के आयोजन को लेकर कुछ पत्रकार दोस्तों ने काफी कुछ विरोध में लिखा पर जब वे भाग सिंह जी के सम्पर्क में आये तो उनका नजरिया पूरी तरह बदल गया। वे समझ गए कि मामले को देखना अपनी अपनी सोच पर भी निर्भर करता है। जादू केवल जादूगर की छड़ी में नहीं शब्दों में भी होता है। बाद में यह विरोध दोस्ती में बदल गया। वे पत्रकार दोस्त दिल्ली से उन्हें मिलने विशेष तौर पर चंडीगढ़ आते।
लुधियाना का गौरव सग्गी 
इसी तरह दारा सिंह जी ने भी धमकियों और चुनौतियों को बहुत ही सहजता से सवीकार करके ज़िन्दगी जीने के नए अदाज़ सिखाये। चंडीगढ़ में दारा स्टूडियो की स्थापना का काम आसान नहीं था। मुझे पता चला कि उन्हें उतनी जगह नहीं मिली जितनी वह चाहते थे। किसी सनसनीखेज़ खबर की चाह में मैंने दारा जी से इसी मुद्दे पर सवाल कर दिया। दारा जी मुझे देखकर मुस्कराए और बहुत ही सहजता से बोले अगर सरकार यह जगह भी न देती तो हम क्या कर लेते? दारा जी जैसे महान लोगों ने जिंदगी को जो सलीके और सबक सिखाये उनकी अहमियत वक्त के साथ साथ लगातार बढती रहेगी। उनके पास बैठ कर, उनसे बातें करके एक नई ऊर्जा का अहसास होता था।
आज अचानक यह सब कुछ मुझे याद आ रहा है एक नए युवा चेहरे को देख कर। लुधियाना का गौरव सग्गी भी फ़िल्मी दुनिया को समर्पित है लेकिन पूरी तरह सात्विक रहते हुए। तकरीबन तकरीबन हर रोज़ उपवास, हर रोज़ पूजा पाठ, हर रात्रि मेडिटेशन। सोने में चाहे आधी रात हो जाये लेकिनउठना वही रात को दो बजे और ठंडे पानी से नहा कर रम जाना पूजा पाठ में। मेडिटेशन, रियाज़ या फिर शूटिंग, रिकार्डिंग या कोई और परफोर्मेंस बस यही है गौरव की दिनचर्या। मैंने कभी गौरव को आम लडकों की तरह इधर उधर आलतू फालतू बातों में नहीं देखा। लुधियाना से मुम्बई और मुम्बई से विदेश तक यही है उसका लाइफ स्टाइल।
कहते हैं धरती गोल भी है बहुत छोटी भी। बस इसी सिद्धांत पर एक बार हमारी मुलाकात पठानकोट में हुई। सुबह मूंह अँधेरे से लेकर देर शाम तक हम एक साथ रहे। यह सब किसी प्रोजेक्ट को लेकर था और इसके बारे में वहां शायद किसी को खबर भी नहीं थी लेकिन हमें वहां बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के जाना पड़ा एक ही आयोजन में। हम सब ने जलपान किया लेकिन गौरव का उपवास था। खाना तो दूर जल या चाये की एक बूँद भी नहीं। अचानक ही मेरे सामने किसी आयोजक ने मंच पर गौरव का नाम अनाऊंस करवा दिया और उसके बाद कमरे में आ कर कहा कि अब आप मंच पर आ जाइये अगली बारी आपकी है। सुन कर मुझे चिंता हुई। मुझे मालूम था कि गौरव ने सुबह से कुछ नहीं खाया। 
चाये या पानी का एक घूँट भी नहीं। मुझे लगा कि शायद यह लड़का कहीं मंच पर गिर न पड़े। इसके साथ ही न वहां गौरव की टीम थी न ह साज़ और संगीत का पर्याप्त प्रबंध। पर गौरव के चेहरे पर न चिंता, न डर, न ही घबराहट। आशंकित मन के साथ कुछ ही पलों के बाद मैं भी पीछे पीछे बाहर बने मंच पर चला गया।वहां मेरे देखते ही देखते गौरव ने भगवान् का नाम लेकर अपना गायन शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में वहां मौजूद सभी लोग पहले तो मस्त हुए फिर उठ कर गौरव के साथ साथ झूमने लगे।मुझे वह दिन अब भी याद आता है तो मुझे फिर फिर हैरानी होने लगती है। सुबह से लेकर रात तक मैंने गौरव पर से आँख नहीं हटाई तां कि वह छुप कर कहीं कुछ खा तो नहीं रहा पर सचमुच उसने सारा दिन कुछ नहीं खाया-पीया। मुझे लगता है कि इस के बावजूद इतनी अच्छी परफारमेंस किसी दैवी शक्ति से ही संभव हो सकी। गौरतलब है की मेडिटेशन करने वालों की कार्यक्षमता अक्सर बढ़ जाती है। मन की शक्ति एकाग्र हो जाने से उनकी योग्यता विकसित होती है।यही कारण है गौरव एक्टिंग में भी काम कर रहा है और गीत संगीत में भी। इसके साथ ही कैमरे की बारीकियों  को भी वह बहुत ही अच्छी तरह से समझता है। अपनी लोकप्रिय एल्बम "रब दा सहारा" में उसने गायन और अभिनय दोनों में अपना जादू दिखाया है। आखिर में एक बात और इस सबके लिए वह अपने पिता अश्विनी सग्गी और माता के आशीर्वाद को ही एक वरदान मानता है।-रेक्टर कथूरिया 


You may contact Gaurav at gauravsaggi@ymail.com
Mobile:(Punjab)  09914301145
Mobile: (Mumbai) 0996 734 049

तेज़ी से बुलंदियां छू रहा गौरव सग्गी 

Wednesday, November 21, 2012

विशेष भारतीय सिनेमा शताब्‍दी पुरस्‍कार

गोवा में 43वें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में भारतीय फीचर फिल्‍म के सौ साल पूरे होने के मद्देनज़र दस लाख रूपये के एक विशेष पुरस्‍कार की शुरूआत की गई है। भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्म समारोह के निदेशक श्री शंकर मोहन ने कहा कि विशेष भारतीय सिनेमा शताब्‍दी पुरस्‍कार के लिए फिल्‍म का चुनाव अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍पर्धा, सिनेमा ऑफ द वर्ल्‍ड और भारतीय पैनोरमा से नामांकित तीन फिल्‍मों में से होगा। बुद्धदेब दास गुप्‍ता, गौतम घोष और किशवार देसाई की विशेष जूरी इन नामांकनों पर निर्णय लेगी । विजेता फिल्‍म को दस लाख रूपये का नकद पुरस्‍कार, रजत मयूर और एक प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा। (PIB) 20-नवंबर-2012 13:08 IST
***
मीणा/विजयलक्ष्‍मी/मधुप्रभा-5403

सेंसरशिप वैश्विक समस्या- क्रिज्टॉफ जानुस्सी

कहा सेंसरशिप हमारी जिंदगी को प्रभावित करने वाली कठोर व्यवस्था
पोलैंड के प्रख्यात फिल्म निर्माता क्रिज्टॉफ जानुस्सी ने सेंसरशिप को वैश्विक समस्या माना है और इससे निपटने के लिए उपयुक्त मार्ग तलाशने पर बल दिया है। उन्होंने कहा सेंसरशिप हमारी जिंदगी को प्रभावित करने वाली कठोर व्यवस्था है और गैर-लोकतांत्रिक राष्ट्र इसे बेहद कडाई से लागू करते हैं जबकि लोकतांत्रिक देशों का रवैया अधिक लचीला होता है। 43वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में जीवनकालिक उपलब्धियों के लिए गोवा में आज शाम सम्मानित होने वाले जानुस्सी आज सवेरे मीडिया को संबोधित कर रहे थे । कम्फलेज, फैमिली लाइफ, द साइलेंट टच, द कॉन्ट्रैक्ट और रिविजिटेड जैसी सराहनीय फिल्मों का निर्माण करने वाले जानुस्सी ने विश्व को दिशा देने के लिए उच्च विचारों पर जोर दिया। भारत में सेंसरशिप के मुद्दे पर एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि इंटरनेट एक संपूर्ण नवीन समाज का निर्माण कर सकता है और यह हमें ध्वस्त भी कर सकता है इसलिए एक संतुलित मार्ग की पहचान करना बडी चुनौती है। समारोह में उनकी फिल्म “इल्युमिनेशन” को प्रदर्शित किया जाएगा। 

भारतीय सिनेमा के बारे में श्री क्रिज्टॉफ ज़ानुस्सी ने कहा कि स्‍वतंत्र सिनेमा और लोकप्रिय फिल्‍में एक दूसरे के पूरक हैं। उन्‍होंने कहा कि लोकप्रिय फिल्‍मों का सम्‍मान किया जाना चाहिए क्‍योंकि यह आम व्‍यक्ति की संस्‍कृति को दर्शाती हैं। अपने देश में सिनेमा के बारे में श्री जानुस्सी ने कहा कि वहां पर इस दिशा में अच्‍छा काम चल रहा है लेकिन जो पहचान, 1980 की शुरूआत में राजनीतिक उथलपुथल के दौरान थी वैसी नहीं है। उन्‍होंने कहा कि पोलैंड में कॉम्‍युनिस्‍ट युग की तुलना में अब स्थिति बेहतर है लेकिन युवा फिल्‍म निर्माताओं को नई समस्‍याओं और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ज़ानुस्सी ने भौतिकी विषय में शिक्षा ग्रहण की है। उन्‍होंने कहा कि भौतिकी को जब ग्ंभीरता के साथ पढ़ा जाए तो वो इंजीनियर पढ़ाई न लगकर तत्‍व विज्ञान जैसी लगती है। श्री ज़ानुस्सी ने 80 से अधिक फिल्‍में और वृत चित्रों का निर्माण किया है।(PIB)
(20-नवंबर-2012 14:21 IST
)

मीणा/प्रियंका/विजयलक्ष्‍मी/चन्द्रकला-5404