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Thursday, April 13, 2023

प्रेम में हारे हुए पुरुष//शिखा पांडेय

गहरे अहसास की गहरी रिपोर्ट जैसी है यह पोस्ट 


सोशल मीडिया
: 13 अप्रैल 2023: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सोशल मीडिया का ज़माना है। यह  बात अलग है कि आजकल केवल सियासत से जुडी बातों का ही गंभीरता से नोटिस लिया जाता है जबकि बहुत कुछ और भी होता है जिसे पढ़ते, सुनते जा देखते हुए मन में बहुत कुछ कौंधने लगता है। ऐसी ही एक रचना गत रात भी पढ़ी जिसे पोस्ट किया गया था 22 अप्रैल 2020 को। 

कोई ज़माना था जब केवल पुरुष  पर ही काव्य रचनाएं लिखी जाती रही। उनकी कथाएं और गाथाएं बनती रहीं। जल्द ही ट्रेंड बदला और प्रशंसा भरे इस साहित्य में महिलाओं की निंदा कम हो गई। फिर नारी की प्शारशंसा का रिवाज भी शुरू हुआ। बहुत सा साहित्य लिखा गया और बहुत सी फ़िल्में भी बनीं। शायद इसलिए कि धीरे धीरे  महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया था। समय के साथ साथ यह अनुपात बार बार बदलता ही चला गया। इस बदलते हुए अनुपात में नारी का दर्द तो सामने आता रहा और बहुत से कानून भी बनें लेकिन पुरुष का दर्द नज़रअंदाज़ होता रहा। इसी बीच नर-नारी की बराबरी की आवाज़ ने ज़ोर पकड़ा और इस पर भी लिखा जाने लगा कि मर्द को भी दर्द होता है। वह भी रोता है बेशक छुप कर ही सही। इसी विषय पर सोशल मीडिया में एक काव्य जैसी रचना फेसबुक पर भी नज़र आई। लेखिका का नाम शिखा पांडेय बताया गुया लेकिन उनसे सम्पर्क नहीं हो सका। फिलहाल आप यह पोस्ट पढिए जिसमें आपको काव्य रस का अहसास भी महसूस होगा। अंतर्मन में चलते द्वंद और पीड़ा का भी अहसास होगा।  आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। स्नेह के साथ आप का--रेक्टर कथूरिया 

यह है वो रचना 

प्रेम में हारे हुए पुरुष

कहीं दूर गाँव या शहर में

ढूँढते हैं एक शांत कोना

जहाँ होता है मध्यम अलसाया हुआ अँधेरा

उदास पुरवाई को लिये हुए

वो जूझते है अपने ही अंतर्मन में छुपे अपनी नाकामी के सवालों से, क्योंकि वो पुरुष है इसलिए कह नही सकते किसी से भी अपनी व्यथा....

गुम करने लगते है खुद को बेवज़ह मुस्कुराहटों की तहरीरों में....झोंक देते हैं स्वयं को रोज़गार की भट्टी में

और जब इनसे में शांत नही होता उनका चित्त तो आ जाते हैं किसी सोशल मीडिया के द्वार पर और ढूढने लगते हैं किसी द्वार पर झूठा प्रेम....जी हां सिर्फ झूठे प्रेम को ही ढूढते है क्योंकि नही जाना चाहते छोड़कर ये अपने पुराने अक्स को......और बन जाते है दुनिया की नज़र में बेग़ैरत और लानत भरे बेशर्म पुरुष, और फिर इसी झूठी दुनिया मे लिप्त होकर

वे खोजते हैं अपनी पवित्रता को।

और अंत में अब  वो रोज देखते हैं उस हाथ की  हथेलियों में गहरी रेखाओं को

जिन्हें देखकर किसी भविष्य वक्ता ने कहा कि

तुम भाग्यशाली हो...❤️

- शिखा पांडेय


Thursday, July 21, 2022

कठिन अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति है रीतू कलसी

नई काव्य रचना भी यही बताती है 


सोशल मीडिया: 21 जुलाई 2022: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

कितनी कठिन रही होगी ऐसी अनुभूति! 

कितनी कठिन रही होगी ऐसी कल्पना भी!

कितनी सहजता से कर दी अभिव्यक्ति!

कितनी शानदार है रीतू कलसी की यह काव्य रचना भी--!

आप ने सुना होगा वह लोकप्रिय गीत--

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे--जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे-संग संग तुम भी गुनगुनाओगे!

वो गीत भी सुना होगा--गर तुम भुला न दोगे

सपने ये सच ही होंगे

हम तुम जुदा न होगे

हम तुम जुदा न होगे 

ऐसे बहुत से गीत हैं--बहुत सी कहानियां हैं लेकिन कितने लोग याद रख पते हैं जब बिछड़ने वाला बिछड़ ही जाता है। हकीकत यही है कि जिसके बिना एक कदम तक चलना नामुमकिन लगता था हम उसके बिना भी फिर से जीना सीख ही लेते हैं। बेवफाई कहो या ज़िंदगी की मजबूरियां कि याद रखने में सहायता देने वाली सभी निशानियां मिल कर भी उन यादों को भूलने से रोक नहीं पातीं। हम सभी धीरे धीरे सभी को भूल जाते हैं। हमारे स्वार्थ हमें यही तो सिखाते हैं। ऐसे में रीतू ने कुछ ज़्यादाही सच्ची बात कह दी है। 

वैसे सत्य भी यही है--जीवन भी यही है--लेकिन स्वीकार करना आसान तो नहीं होता। हम भ्रम में जीने वाले लोग। अंधेरे में जीने वाले लोग। घर के अंदर और बाहर भी अपनी ज़रूरत के मुताबिक ही रौशनी का प्रबंध करते है। ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं सोचते के हमारे अंतर्मन में भी हकीकत की रौशनी आ जाए। स्वयं को भुलाने के लिए न जाने कितने पापड़ बेलते हैं। कभी दारो--कभी सिनेमा--कभी नावल--कभी कविता---फिर भी स्वयं को भूल नहीं पाते तो कई बार नींद की गोली का भी सहारा--! बहुत डरते हैं हम अंतर्मन में रुष नि होने से। बहुत डरते हैं हम स्वयं के साक्षताकार से। अंतर्मन के आईने में झाँकने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हम लोग। जब अंतर्मन में किसी न किसी तरह ऐसी रौशनी आ ही  जाती है तभी सम्भव हो पाता है ऐसी रचना लिख पाना। ऐसी सफल रचना के लिए रीतू को हार्दिक बधाई। आप भी इस रचना को पढ़ सकते हैं लेकिन खतरा है यह आप का साक्षताकार कहीं आप से ही न करवा दे..! हिम्मत जुटा सकते हैं तो य्रुर पढिए इस धंदर कविता को।   --रेक्टर कथूरिया 

अब जिस कविता की बात की ज़रा उसे भी पढ़ लीजिए  


जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

भूल जाना उसी वक्त

बिल्कुल भी समय बरबाद मत करना

अपने दिमाग को कष्ट मत देना

मत सोचना कितना समय गुजारा मेरे साथ

हो सकता है पल भर के लिए भर आए आंखें

फिर भी जानती हूं किसी और के साथ होने से

याद भी न आयेंगे साथ गुजारे लम्हें

यही जिंदगी है जीवन है किसी के साथ कोई नही जाता

तो इसीलिए तुम ऐसा ही करना

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

सब झूठ जला देना मिटा देना 

कभी एक साथ रहने के वादों से खुद ही छुटकारा मिल जाएगा 

वादा खिलाफी के झमेलों से बचा लेगी मौत की खबर तुम्हे 

बस फिर भी 

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे

तो चले जाना उसी समय बरसात में नहाने 

सब कुछ धुल जाएगा मन से तन से 

कहीं खुशबू बचाए न रखना अपने पास

जैसे ही तुम्हारे पास मेरे मरने की खबर पहुंचे 

मिटा देना नामोनिशान हर जगह से, हर जगह से

   ---रीतू कलसी

Saturday, October 10, 2020

नहीं रहे सोये हुए ज़हनों को झंझोड़ने वाले अज़ीम अमरोहवी साहिब

 कलम से ज़ुल्म  की कलाई मरोड़ना उन्हें बाखूबी आता था आता था  

कोरोना ने हमसे बहुत ख़ास ख़ास लोग छीन लिए। शायरी, सियासत, कला, फ़िल्में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जिसमें से कोई न कोई घर सूना न हुआ हो। इसी दुखद कड़ी में एक और नाम है जनाब अज़ीम का। बहुत  करते थे। किसी का नाम चाहे इशारों से भी लें तो भी लिहाज़ नहीं करते थे। उनके इशारे भी अक्सर आसानी से समझ आ जाते कि किस किस चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं। इस के बावजूद कभी भी तहज़ीब का साथ न छोड़ते। जैसे जैसे हालात नाज़ुक़ बनते गए वैसे वैसे अज़ीम साहिब की संवेदनशीलता भी  बारीकी से बढ़ती गई। न तो अंदाज़ बदला न ही तेवर बदले।  उनके जाने की दुखद जानकारी मिली है। 


आज के हालात में जब उनकी ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा थी तब वह रुखसत हो गए। आज के इस नाज़ुक दौर में जब सच कहना बेहद दुश्वार होता जा रहा है और बहुत से लोग खामोश रहने में ही भलाई समझने लगे हैं इसके बावजूद भी सोशल मीडिया पर अक्सर पूरी तरह बेबाकी से सरगर्म रहने वाली मोहतरमा तस्वीर नक़वी साहिबा से। वह बताती हैं:अलविदा अज़ीम अमरोहवी साहेब,बहुत कमी कर गए आप मेरे शहर अमरोहा में,पचास किताबों के लेखक ,बहुत अच्छे मर्सिय लिखते थे ,पढ़ते थे ,एक हरदिल अज़ीज़ शख्सियत,दो महीने बड़ी बहादुरी से कोविड से जंग लड़ी मगर हार गए,आप अमरोहा की तारीख में दर्ज हो गए हमेशा के लिए!! 

Wednesday, September 2, 2020

जनाब दुष्यंत कुमार के जन्मदिन पर डा. कुमार विश्वास

दुष्यंत के तेज़ाबी तेवरों में एक बार फिर असली कलम का रंग 
जनाब दुष्यंत कुमार साहिब की शायरी झलक 

सोशल मीडिया
: 2 सितंबर 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
विदेश से लेकर पंजाब की हर गली तक जन चेतना  लगी पत्रकार सोनिया के
साथ जानेमाने शायर डाक्टर कुमार विश्वास
 
आज के दौर में जो शायर लोकप्रियता के शिखर छू रहे हैं उनमें डाक्टर कुमार विश्वास भी विशेष तौर पर ख़ास शायरों में से गिने जाते हैं। पहली सितंबर के मौके पर उन्होंने कालजयी शायर दुष्यंत कुमार को बहुत ही श्रद्धा से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये। उन्होंने अपने फेसबुक प्रोफाईल पर कहा:
कविता के चाहने वाले अक्सर मुझसे पूछते हैं कि ये ‘कालजयी-कविता’ कैसी होती है ! आइए समझाने की कोशिश करता हूँ ! आपातकाल के दौरान जब हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गाँधी जी ने सत्ता के अहंकार और चमचों की जय-जयकार में मग्न होकर भारतीय-लोकतंत्र को व्यक्ति-निष्ठा के आगे नतमस्तक करने की कोशिश की थी तो उसी पार्टी की राज्य सरकार में कार्यरत कवि-ग़ज़लकार दुष्यन्त कुमार ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से बेख़ौफ़ उन्हें सच का आईना दिखाया था ! उस वक़्त की बंधक सरकारी-मशीनरी, घुटने टेकती मीडिया और इमरजेंसी को ‘अनुशासन-पर्व’ बताते भयभीत बौद्धिकों से उम्मीद हार चुकी आम जनता की ज़ुबान, दुष्यंत के तेज़ाबी तेवरों में मुखरित होने लगी ! याद रखिए ये आज से पैंतालीस साल पहले का इतिहास है😳! 
अब समझिए ‘कालजयी’😂! दुष्यंत कुमार के जन्मदिन पर आज जब हमने, आज से भी पाँच साल पहले बनाए ‘महाकवि सीरियल के ये पैंतालीस साल पहले लिखे अंश, कवि को श्रद्धांजलि स्वरूप, सोशल मीडिया पर लगाए तो ‘व्यक्ति-निष्ठा’ की उसी पुरानी बीमारी के युगीन शिकारों ने लगभग हर ग़ज़ल के नीचे ‘गाली-गुफ्तार’ करनी शुरू कर दी ! वे भड़क उठे कि मैं व्यवस्था का विरोध कर रहा हूँ बिना ये जाने की ये पैंतालीस साल पुरानी ग़ज़लें हैं और उस वक़्त की व्यवस्था के ख़िलाफ़ रची गई थीं😂! पढ़कर मैं तो बहुत हँसा कि चलो इनकी इस संकुचित सोच के कारण हमारा बड़ा कवि तो ‘कालजयी रचनाकार’ सिद्ध हो ही रहा है, सत्ता के अकारण अहंकार और व्यक्ति को व्यवस्था समझने वाले जय-जयकारी भक्त भी जय के तस, आजतक वैसे ही बराबर मौजूद है, यह भी सिद्ध हो ही रहा है ! अब आप समझे, यह होता है “कालजयी कवि” और यह होती है उसकी कालजयी कविता 😍😍🇮🇳👍!
ख़ैर आज उस खुद्दार कवि दुष्यंत कुमार के जन्मदिन के समापन से पहले, आइए देखिए ये एपिसोड और जानिए कि अंधभक्ति की अलोकतांत्रिक ख़ुराक पाकर कैसे धीरे-धीरे, हर दौर, हर सरकार, हर व्यवस्था में सच सुनने की शिद्दत ख़त्म होती जाती है लेकिन हर दौर में कवि बिना डरे उस अहंकार की आँखों में आँखें डालकर जनता के सवाल पूछता ही है ! न व्यवस्था का ग़ुरूर बदला न कवि का बेबाक़ सच कहने का सुरूर 😍🇮🇳 !
बक़ौल हमारे राजनैतिक विद्यालय के कवि-कुलपति अटलजी “सरकारें तो आएँगी जाएँगी, पार्टियाँ बनेंगी बिगड़ेगी, सत्ता का खेल तो चलेगा लेकिन ये देश रहना चाहिए, इसका लोकतंत्र रहना चाहिए !”
🇮🇳👍 देश और सच को कभी मत छोड़िए ! देश का मसला हो तो अपने “आप” के ख़िलाफ़ भी बोलिए और अपने बाप के ख़िलाफ़ भी बोलिए 😂😂! जयहिंद 


Tuesday, July 14, 2020

कलापीठ की ओर से फ़िरोज़पुर में दो हिंदी बाल पुस्तकों का विमोचन

Tuesday: 14th July 2020 at 17:58 Messenger  
शायर अनिल आदम ने सम्पादित की हैं दोनों हिंदी बाल पुस्तकें 
फ़िरोज़पुर: 14 जुलाई 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
जब पंजाब में गोली की भाषा बोली जा रही थी। हर तरफ सहम था। दहशत सी छै हुई थी। कलमकार भी बंट गए थे। कोई हिन्दू बन गया था तो कोई सिख। कोई सरकारी बन गया था तो कोई बागी। उस समय भी कलापीठ नामक संस्था इस बात पर ज़ोर देती रही कि कलमकार केवल कलमकार ही रहे। वह सच बोलने वाला ही रहे। वह सियासत, जाती-पाति, धर्मों और मज़हबों से ऊपर उठ कर केवल इंसान ही रहे। कलापीठ ने इसी तरह का संदेश देते आयोजन उन दिनों भी करवाए जब बोलना बेहद मुश्किल हो गए था। नफरत और अंधी हिंसा के उस दौर में भी कलापीठ ने शब्दों के ज़रिए लोगों के दिलों में प्रेम के दीप जलाये। अंधेरों के खिलाफ अपने शब्दों को रौशनी फैलाकर सत्य को बुलंद किया। एक नया इतिहास रचा उन दिनों कलापीठ ने। 
अब जबकि कोरोना का कहर बढ़ता ही जा रहा है तो इस नाज़ुक समय में भी कलापीठ सक्रिय है हमेशां की तरह। शब्द संस्कृति को फ़ैलाने और उत्साहित करने के लिए भी कलापीठ निरंतर काम कर  रही है। कोरोना के चलते सरकार की तरफ से जारी स्वास्थ्य सावधानी के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए कलापीठ के साहित्यिक आयोजन जारी हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का भी बाकायदा ध्यान रखा जाता है और अन्य ज़रूरी बातों का भी।  
बहुत ही सादगी से हुए ऐसे ही एक आयोजन में दो हिंदी पुस्तकों का विमोचन हुआ। "संगीतकार गधा" और "घमंड का सिर नीचा" नामक इन पुस्तकों को सम्पादित किया है जानेमाने शायर अनिल आदम ने। 
इस मौके पर कार्यक्रम के प्रधानगी मंडल में शामिल रहे प्रिंसिपल दिनेश, प्रोफेसर गुरतेज कोहारवाला, प्रोफेसर जसपाल घई, प्रोफेसर कुलदीप और अनिल आदम। 
प्रोफेसर जसपाल घई ने शायर अनिल आदम की शख्सियत और उसकी रचना पर जानकारी दी। उसके रचनात्मक अंदाज़ और साधना की भी चर्चा की। सुखजिंदर फ़िरोज़पुर ने बाल साहित्य के इतिहास प्रसंग को आज के संदर्भ में जोड़कर प्रस्तुत किया और इसे मौजूदा समय की एक प्रमुख आवश्यकता भी कहा। प्रोफेसर गुरतेज कोहारवाला ने बाल साहित्य के क्षेत्र में अनिल आदम के आने को बहुत ही शुभ बताया। प्रिंसिपल दिनेश ने ही अनिल आदम और कलापीठ के परसों की प्रशंसा की। 
मंच संचालक की ज़िम्मेदारी निभाते हुए हरमीत विद्धार्थी ने कालेज प्रबंधन, प्रिन्सिपलौर स्टाफ को धन्यवाद कहा। साथ ही अनिल आदम को अपनी इस नई उपलब्धि पर बधाई भी दी। इस अवसर पर प्रोफेसर कुलदीप, राजीव ख्याल, कपिल देव, डाक्टर अमनदीप सिंह, डाक्टर जीत पाल, यादविंदर सिंह, इक़बाल सिंह और अन्य लोग भी शामिल हुए। (डेस्क इनपुट:कार्तिका सिंह)

Friday, July 10, 2020

बेटी जैसा और कहां कौन!

 रिश्ते बड़े अनमोल होते हैं....बंधन अच्छे लगते हैं 
बेटियां जैसा कोई और कहां! इस अनमोल रिश्ते पर, इस दिव्य सम्बन्ध पर जितना भी लिखा जा सके कम है। आज के इस स्वार्थपूर्ण युग में बेटियों ने ही साबित किया है कि उन्हें बस मां बाप की कुशलता चाहिए और कुछ नहीं। बेटे तो हत्याएं भी कर रहे हैं और मां बाप को घरों से निकाल भी रहे हैं। ऐसी जघन्य स्थिति में बेटियां  किसी देवी की तरह ही लग रही हैं।  यहां दी जा रही सामग्री हमें किसी वाटसप ग्रुप पर मिली है। यदि आप के पास भी कोई इस तरह की सामग्री हो तो आप हमें अवश्य भेजें। -सम्पादकीय डेस्क
पिता और पुत्री की इस शानदार तस्वीर को क्लिक किया Katie E (Pexels) ने 
*बिटिया बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया*" ?
पिता ने कहा -"हाँ "
उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब" ?
पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं,
घुटनों पर सरकती थीं।
 मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं।
जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद।

मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था।

 तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं।
 मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था।
तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं,
मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं।
मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी तो हो सकता था।
 तभी तुम्हारा  भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया,

वो पहली और आखिरी बार था बेटा जब, तुमने मुझे रुलाया और बहुत रुलाया...

भगवान की दी हुई सबसे अनमोल धरोहर है बेटी...

क्या खूब लिखा है एक पिता ने...

हमें तो सुख मे साथी चाहिये दुख मे तो हमारी बेटी अकेली ही काफी है... रिश्ते बड़े अनमोल
होते हैं....बंधन अच्छे लगते हैं...अपनो से।

सुप्रभात जी। जय श्री कृष्ण।

आप भी बेटिओं के सम्मान में कोई कमी न आने दें। बेटियां अनमोल हैं। उन्हें इसी भावना से मिला करें। 

Wednesday, July 1, 2020

जानीमानी शायरा इरादीप त्रेहन से बात करने का सुनहरी अवसर

 पहली जुलाई को फेसबुक पर आमने सामने रात्रि 9 बजे 
फाईल फोटो
लुधियाना: 30 जून 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
जब हालात दमनपूर्ण हो। साम्प्रदायिकता हर तरफ छुपी नज़र आने लगे। विचारधारक  विरोध को हिंसा के सहारे दबाने की बात आम होने लगे तो सच कहना बहुत ही कठिन हो जाता है। कहना तो दूर की बात सच को सोचते वक़्त भी मन  कंपकंपी सी छिड़ने लगती है। ऐसे में भी बहुत ही सलीके से सच कह पाना कितना कठिन होता होगा इसका अनुमान आप सहज ही लगा सकते हैं। 
आज यहां यह ज़िक्र किया  रहा है जानीमानी शायरा और शिक्षाविद इरादीप त्रेहन की काव्य रचना को लेकर। एक राजकीय कालेज में इकोनॉमिक्स का अध्यापन और साथ में कविता रचना। कई बार बहुत ही हैरानी भी होती है। कितना कठिन होता होगा इकोनॉमिक्स और कविता के दरम्यान समंजस्य बैठाना।
तकरीबन हर आयोजन में मैंने इरादीप को पूरी तरह सहज देखा। मंच संचालन करते हुए भी,  सभी शायर लोगों को उत्साहित करते हुए भी और साथ ही साथ इशारो इशारों में चाय-पानी और समोसों के प्रबंध पर नज़र रखते हुए भी। कविता को वशिष्ठ सभाओं और गिनेचुने लोगों के आयोजनों से निकाल कर आम जन जन तक ले जाने में बहुत योगदान दिया है।  
युवा वर्ग के शायरों को नामी ग्रामी मंचों तक लेजाने में भी सक्रिय रहती हैं इरादीप त्रेहन। उनकी सुनंने और उनसे बात करने का एक यादगारी और सुनेहरा अवसर आ रहा है पहली जुलाई को। 
पहली जुलाई 2020 को रात्रि 9 बजे इरादीप त्रेहन साहिबा को राष्ट्रीय कवि संगम की पंजाब इकाई  लाईव कर रही है। इसमें लाईव होने के सम्पर्क कर सकते हैं मोबाईल फोन नंबर:98728 88174 और 80549 31143 पर। फेस टू फेस आमने सामने लोकप्रिय शायरा इरादीप त्रेहन से सवाल पूछने का सुअवसर हमेशां के लिए संजो लीजिये। 

Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Monday, March 30, 2020

ज़िंदगी से जितना इश्क वाम के लोग करते हैं शायद और कोई नहीं

लेकिन कामरेड समता तदबीरों को छोड़ कर लकीरों की तरफ क्यूं?
लुधियाना: 30 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
जब जब भी मुलाकात हुई मुझे हर बार जसप्रीत कौर समता वाम विचारधारा से प्रभावित लडकी लगी।  कभी कभी तो मुझे उस पर यह प्रभाव जनून की हद तक भी महसूस हुआ। फिर कई बार नज़दीक से भी उसकी बातें सुनी। बार बार लगा कि उसके दिल में कोई दर्द है जिसे उसने छुपा लिया है। जैसे पंजाबी के जानेमाने शायर प्रोफेसर मोहन सिंह कहते हैं न--
होली होली बन गया 
मित्रां दा गम 
लोकां दा  गम  
बस समता मुझे हर बार उसी प्रक्रिया से गुज़रती हुई लगी। अपने गम को जनता के गम में तब्दील करती हुई। वह गमा क्या था मैंने कभी नहीं पूछा। मुझे ऐसे सवाल कभी भी अच्छे नहीं लगते। कुछ भी ऐसा पूछने पर मुझे लगता जैसे मैं नियमों के विपरीत जा रहा हूँ। अंग्रेजी में एक शब्द आता है-एन्क्रोचमेंट। बस कुछ भी ऐसा पूछना मुझे एनक्रोच करना ही लगता। समय गुज़रता रहा।  इसके साथ ही एक दर्द समता के चेहरे पर हर वक़्त रहने वाली मुस्कान के पीछे छुपा सा झलकता रहा। फिर दबे सुर की कुछ बातें भी सुनीं जो इधर सुन कर उधर से निकल भी जाती रहीं। जब जब भी मुझे अपनी कवरेज में कोई मुश्किल महसूस होती तब तब समता मुझे सहायता देने को सामने होती। जब उसने पहली बार कैमरे के सामने माईक पकड़ा तो सबके लिए हैरानी थी। उस दिन पंजाबी भवन में जस्टिस कोलसे पाटिल एक विशेष आयोजन में आये हुए थे। माईक समता के हाथों में था और कैमरा मैंने खुद संभाल लिया। मैं जस्टिस कोलसे की यादगारी तस्वीरों को कैमरे में कैद क्र लेना चाहता था। जब मन में ऐसी भावना हो तो ध्यान पूरी तरह कैमरे में रखना पड़ता है। मैं भी ध्यान मग्न था लेकिन मन में चिंता थी कि अब उनसे ऐसे बौद्धिक सवाल कौन पूछेगा जो उनके स्तर के भी हों। ऐसे में समता ने कमाल कर दिए। उसने बहुत अच्छे सवाल पूछे। स्टोरी भी बहुत अच्छी बनी। इसके इसी ग्रुप में रहने वाला कामरेड अरुण उसे हर बार मज़ाक मज़ाक में एक दिन की पत्रकार बता कर बार बार हंसाता।  लेकिन वह पंजाब स्क्रीन टीम की एक ऐसी सदस्य बन गयी थी जिसे आड़े वक़्तों की साथी कहा जा सकता है। जब जब भी फेसबुक खोलता तो समता की कोई न कोई पोस्ट सामने होती। हर पोस्ट में लोगों के साथ हो रहे अन्याय की बात का ज़िक्र होता। मुझे हैरानी भी होती कि क्या इस लड़की को अपना कोई गम ही नहीं? समय अलग अलग रंग दिखाता रहा। आज फेसबुक पर समता की पोस्ट बिलकुल ही अलग रंग की थी। उसने काव्यपूर्ण शब्दों में कहा:
मुकम्मल हुआ हो इश्क़ जिसका
उसकी हथेली देखनी है,

कैसी होती है वो
 " लक़ीर "
जो मेरे हाथों में नहीं है...!!!
मेरे लिंए यह पोस्ट किसी हैरानी से कम नहीं थी। हर समय लोगों के दर्द की बात करने वाली लड़की आज अपने दिल के दर्द की बात कर रही थी। मैंने झट से एक कुमेंट करते हुए समता से कहा:
शायद किसी ने सही कहा है:

हाथों की चंद लकीरों का!
यह खेल है बस तकदीरों का!

पे इसी गीत में आगे चल कर इसका जवाब भी है:
तक़दीर है क्या, में क्या जानूँ,
में आशिक हूँ तदबीरों का...!

....और कामरेड तक़दीर पर नहीं तदबीर पर भरोसा करते हैं Jaspreet Kaur Samta जी...
इस बात को कभी भूलना नहीं।

वैसे प्रकृति के नियमों में मैंने कई बार इसे सच होते देखा कि जब प्रकृति किसी चीज़ को छीनती है तो वास्तव में जल्द ही उससे बेहतर हमें थमा भी देती है।

सो हिम्मत और हौंसला ज़रूरी है।

किसी शायर ने बहुत पहले कहा था:
हालात के कदमों पे कलन्दर नहीं गिरता।
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता।
गिरते हैं समंदर में आ आ के कई दरिया!
लेकिन किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता!
           देखना एक दिन आपको मेरी बातें याद आएंगी। हिम्मत रखना।
                                                 --रेक्टर कथूरिया 
               (समता पर और चर्चा फिर कभी सही फ़िलहाल इतना ही)

Sunday, April 1, 2018

तुमने लिखा चाँद मुझको,

Sunday:1 April 2018 at 7:51 AM : FB//IB
चाँदनी बन धरा पर आ गई!!
रात तुम कुछ लिखते रहे,
और मै गहरी नीद सो गई!
जब सुबह उठ कर मै,
तुम्हारी उस मेज़ तक गई!!रात......
कुछ कागज़ बिखरे पडे थे,
उन्हे पढ आँखे चुधिया गई!
कितना प्यार करते हो मुझे,
सोच कर ही मै शरमा गई !! रात........
मेरे रूप का अदभुत वर्णन,
पढ कर मै सच सकुचा गई!!
तुमने लिखा मुझे सुमन ,
मै उपवन मे गोते खा गई !! रात.....
तुमने लिखा चाँद मुझको,
चाँदनी बन धरा पर आ गई!!
तुम्हारा स्नेह और समर्पण,
तुमसे ज़्यादा मै पा गई!! रात.....
तुमने लिखा त्रप्ती मुझे ,
मै सप्त सागर मे नहा गई !!
तुमने कहा सजनी मुझे ,
मै गर्व से फूली समा गई !! रात.....

बोधिसत्व कस्तूरिया 202 नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा 282

Friday, August 30, 2013

पंखे की जगह भारत की घड़ी चल रही है...!

मेरठ कैंट के रहने वाले मित्र Ravinder Singh Sethi ने एक रचना फेसबुक पर पोस्ट की है जिसे अग्रिम धन्यवाद सहित यहाँ भी प्रकशित किया जा रहा है। यह रचना उनकी है या किसी और की अभी यह भी स्पष्ट नहीं है पर यह रचना देश की जिस दुखद और चिंतनीय हालत पर काव्यपूर्ण व्यंग्य शैली में बहुत प्रकाश डालती है वह देश और उसकी यह हालत हम सब की अवश्य है। इस हालत से उबरने और सुधरने की ज़िम्मेदारी भी हम सब की है। इस रचना पर आप क्या चाहते हैं आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। ---रेक्टर कथूरिया  
एक आदमी ने धरती से किया प्रस्थान... 
यमराज के कक्ष में
घड़ियां देखकर रह गया हैरान..
हर देश की अलग घड़ी थी...
कोई छोटी, कोई बड़ी थी...
कोई दौड़ रही, कोई बंद, कोई तेज, कोई मन्द...
उनकी अलग-अलग रफ्तार देखकर
आदमी चकराया...
कारण पूछा तो यमराज ने बताया...
हर घड़ी की उसी हिसाब से है रफ्तार..
जिस हिसाब से हो रहा है उस देश में
भ्रष्ट्रचार..

आदमी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई...
लेकिन भारत की घड़ी कहीं भी नजर
नहीं आई..

आदमी मुस्कुराया, यमराज के कान
में फुसफुसाया..
कांग्रेस वाले भ्रष्टाचार यहां भी ले
आए..
सच-सच बताओ, घड़ी न रखने के
कितने पैसे खाए..

यमराज बोले: तेरे शक की सुई तो
बिना बात उछल रही है..
मेरे बेड रूम में जाकर देख ..
..
पंखे की जगह भारत की घड़ी चल
रही है...

Sunday, November 25, 2012

हिंदुत्व शंखनाद सोशल साइट्स पर भी काफी सक्रिय है। राष्ट्र के लिए, राष्ट्र वादियों के साथ जुड़ना और जोड़ना हैं ये एक गैर राजनैतिक संगठन हैं !!अभी हाल ही में पोस्ट की गई एक रचना यहां भी प्रकाशित की जा रही है।गौरतलब है की मूल तौर पर यह रचना अरविन्द कुमार गुप्ता जी की है। महानता के  दावों को आईना  दिखाती यह रचना आपको कैसी लगी अवश्य लिखें।-रेक्टर कथूरिया
बात दुर्ग के रेलवे स्टेशन की है.., कल रात .,मैं ट्रेन के इंतज़ार में रेल्वे - प्लेटफार्म पर टहल रहा था .,
एक वृद्ध महिला , जिनकी उम्र लगभग 60 - 65 वर्ष के लगभग रही होगी ., वो मेरे पास आयी और मुझसे खाने के लिए पैसे माँगने लगी ....
उनके कपडे फटे ., पूरे तार - तार थे., उनकी दयनीय हालत देख कर ऐसा लग रहा था की पिछले कई दिनों से भोजन भी ना किया हो ..
मुझे उनकी दशा पर बहुत तरस आया तो मैंने अपना पर्स टटोला ., कुछ तीस रुपये के आसपास छुट्टे पैसे और एकहरा " गांधी " मेरे पर्स में था .,
मैंने वो पूरे छुट्टे उन्हें दे दिए...
मैंने पैसे उन्हें दिए ही थे ., कि इतने में एक महिला ., एक छोटे से रोते - बिलखते., दूधमुहे बच्चे के साथ टपक पड़ी ., और छोटे दूधमुहे बच्चे का वास्ता देकर वो भी मुझसेपैसे माँगने लगी ... मैं उस दूसरी महिला को कोई ज़वाब दे पाता की उन वृद्ध माताजी ने वो सारे पैसे उस दूसरी महिला को दे दिए ., जो मैंने उन्हें दिए थे .... पैसे लेकर वो महिला तो चलती बनी... लेकिन मैं सोचमें पड़ गया ... मैंने उनसे पूछा की-" आपने वो पैसे उस महिला को दे दिए ..??? "
उनका ज़वाब आया -" उस महिला के साथउसका छोटा सा दूधमुहा बच्चा भी तोथा ., मैं भूखे रह लूंगी लेकिन वो छोटा बच्चा बगैर दूध के कैसे रह पायेगा ... ??? भूख के मारे रो भी रहा था ..."

उनका ज़वाब सुनकर मैं स्तब्ध रह गया .... सच ... भूखे पेट भी कितनी बड़ी मानवता की बात उनके ज़ेहन में बसी थी ....
उनकी सोच से मैं प्रभावित हुआ ., तो उनसे यूं ही पूछ लिया की यूं दर -बदर की ठोकरे खाने के पीछे आखिर कारण क्या है ...???

उनका ज़वाब आया की उनके दोनों बेटो ने शादी के बाद उन्हें साथ रखने से इनकार कर दिया ., पति भी चल बसे .., आखिर में कोई चारा न बसा ...
बेटो ने तो दुत्कार दिया ., लेकिन वो भी हर बच्चे में अपने दोनों बेटो को ही देखती है ., इतना कहकर उनकी आँखों में आंसू आ गए ...

मैं भी भावुक हो गया .,मैंने पास की एक कैंटीन से उन्हें खाने का सामान ला दिया ... मैं भी वहा से फिर साईड हट गया ...
लेकिन बार-बार ज़ेहन में यही बात आ रही थी ., की आज की पीढी कैसी निर्लज्ज है ., जो अपनी जन्म देने वाली माँ तक को सहारा नहीं दे सकती ...??? लानत है ऐसी संतान पर .... और दूसरी तरफ वो " माँ " ., जिसे हर बच्चे में अपने " बेटे " दिखाई देते है ....
धन्य है " मातृत्व-प्रेम

Saturday, October 27, 2012

फेसबुक पर नई रचना

एक 'अमेरिकन" पर "पाकिस्तानियों" का हमला...! 
फेसबुक एक अलग और नई दुनिया बन के विकसित हो रही है. एक ऐसी दुनिया जो सोशल नेटवर्किंग से कहीं आगे बढ़कर आपके दिल पर दस्तक देती है, आत्मा को झंक्झौरती है और अपनी सोच का रुख बदलने पर भी विवश कर देती है. इस दुनिया में जिंदगी के हर अच्छे बुरे रंग की चर्चा होती है. फेसबुक पर पोस्ट होने वाली तस्वीरों के साथ साथ साहित्य भी अपनी जगह बना रहा है. एक नई एचना नजर आई है जिसे आगरा में रहने वाले बंटी ग्रोवर ने पोस्ट किया है. लीजीये आप भी पढिये यह रचना. आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य लिखें.--रेक्टर कथूरिया 
 अमेरिकन बनने के 4 घंटे बाद
एक पाकिस्तानी लड़के ने अमेरिकन स्कूल में
एडमिशन लिया।
टीचर- तुम्हारा नाम क्या है?
लड़का- अहमद।
टीचर- अब तुम अमेरिका में हो, इसलिए आज
से तुम्हारा नाम जॉन है।
लड़का घर पहुंचा...
...मां- पहला दिन कैसा रहा अहमद?
लड़का- मैं अब अमेरिकन हूं और आगे से मुझे
जॉन कहकर पुकारना।
मां और पापा ने यह सुनते ही उसकी जमकर
धुनाई कर दी।
शरीर पर चोट के निशान लिए अगले दिन वह
स्कूल पहुंचा।
टीचर- क्या हुआ जॉन?
लड़का- मेरे अमेरिकन बनने के 4 घंटे बाद
ही मुझपर 2 पाकिस्तानियों ने हमला कर
दिया !!