Sunday, June 21, 2020

अपनत्व को गले लगाएं, अंकों को नहीं

थोड़ा सा अपनापन और तनाव छू-मंतर 

लुधियाना: 21 जून 2020: (*रुबिता अरोड़ा//हिंदी स्क्रीन)::

लेखिका रुबिता अरोड़ा 

आज रिया का बाहरवीं का नतीजा आने वाला है। मां-पापा की इच्छा है कि  रिया 90% से अधिक अंक लेकर इंजीनियरिंग करे। उधर रिया का दिल बैठा जा रहा है। परीक्षा पेपर मुश्किल थे तो ज्यादा अच्छा नहीं कर पाई थी। डर के मारे बुरा हाल था। खाना-पीना छोड दरवाजा बंद कर यही सोच रही हैं अब क्या होगा? पापा ने साफ शब्दों में कहा था किसी भी हालत मे 90% से कम अंक नहीं आने चाहिए। रिया की शुरू से ही पढाई में कम और नृत्य में ज्यादा रूचि थी पर पापा को पसंद नहीं था। साफ शब्दों में कहा-कुछ नहीं रखा नृत्य में और न ही अच्छे परिवार की लडकियों को शोभा देता है। इसे भूलकर पढाई में मन लगाओ और फिर रिया मन-मसोस कर रह गई। उसे याद आ रहा था इम्तिहान शुरू होने से कुछ रोज पहले चाचा परिवार सहित उनके घर आए। कितना मन था चचेरी बहनों साथ ढेरों बातें करने का पर मां ने कहा अपने कमरे में जाकर पढाई करो। चाची ने रोकना चाहा पर मां नही मानी। पिछले छह महीनों में उसे नहीं याद कभी घर से बाहर निकल कोई मस्ती की हो या फिर टैलीविजन में कोई मनपसंद कार्यक्रम देख पाई हो। हर वक्त बस एक ही बात सुनने को मिलती पढो पढो बस पढो। तंग आ चुकी थी पढाई से। सोचा जैसे-तैसे इम्तिहान हो गए तो शायद कुछ चैन मिले पर अगले दिन पापा ने कहा एंटरैंस की तैयारी शुरू कर दो। मतलब फिर से पढो और आज तो रिया को साफ पता था वह मां-पापा की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पायेगी। न जाने क्या क्या सुनना पडेगा। 

दोस्तों आज रिया जैसे न जाने कितने बच्चे तनावग्रस्त माहौल में जी रहे हैं।  कारण कोई और नही उनके अपने अभिभावक है, जो आज इतने स्वार्थी हो चुके है कि अपनी इच्छाएं बच्चों पर थोंप देते है, बिना सोचे समझे कि बच्चे क्या चाहते हैं।  नतीजा तनाव रूपी राक्षस हमारे समाज में सिर चढ नाच रहा है। हम क्यों भूल गए परिवार में या फिर हमउम्र दोस्तों के साथ रहकर बच्चे वे सब कुछ अपने-आप सीख सकते हैं जो किताबें नहीं सिखा सकती। जिस प्रकार बहता पानी अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है ठीक वैसे ही हमारे बच्चे भी अपना भविष्य खुद बना सकते हैं। आइये आज से ही इन नन्ही कलियों को पूरा खिलने की आजादी दे अपना प्यार, दोस्ती, अपनापन देकर। जहां तनाव हमारे अपनों को हमसे छीन रहा है वही थोडा सा अपनापन हमें उनके बहुत करीब ला देगा।

 *रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं

Friday, June 12, 2020

एक कटोरी सब्जी : रुबिता अरोड़ा

ज्यादा निकटता कहीं जी का जंजाल  न बन जाये !!!

लुधियाना: 12 जून, 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::
लेखिका : रुबिता अरोड़ा 
मेरा बचपन बेहद गरीबी मे बीता। पिता जी नहीं थे माँ मेहनत करके घर का खर्चा चलाती। घर मे आर्थिक तगी के चलते मेरीे स्कूल की फीस, कापी किताबों का खर्च उठाना माँ के लिए बहुत मुश्किल हो फिर भी माँ के चेहरे पर एक भी शिकन देखने को न मिलती। उनका बस एक ही सपना था मैं पढलिख कर अपने पैरों पर खडी हो जाऊ।खाने के नाम पर तो हम माँ बेटी रूखासूखा खाकर ही खुश हो लेती। तभी हमारे पडोस मे शर्मा आन्टी रहने को आई। पढी लिखी, समझदार, बाणी मे प्रेम सभी गुण तो थे उनमें। एक दिन जब वे हमारे घर आई तो हम माँ बेटी खाना खा रही थी। हमारी थाली मे पडे खाने को देखकर उन्हें बहुत बुरा लगा। वे झट से अपने घर से खाना ले आई। माँ ने मना करने की बहुत कोशिश की लेकिन उनके हठ के आगे एक न चली। उनके हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाकर मेरी तो आत्मा ही जैसे तृप्त हो गई औऱ फिर उस दिन से शुरू हो गया शर्मा आन्टी के घर से कटोरियो का आना जाना। वे जब भी कुछ अच्छा बनाती पहले हमारे घर देने जरूर आती। माँ ने कई बार सकोच दिखाया पर वे न मानी। अब तो अक्सर वे हमारे घर आती, बडे प्यार से मुझे पास बिठाकर खाना खिलाती,पढाई मे भी पूरी मदद करती। माँ की बिमारी हो या मेरी परिक्षा मुझे पूरा सहयोग मिलता। मेरे लिए तो वे मेरी दूसरी माँ जैसी थी। समय बीतता गया। मै उच्च शिक्षा के लिए शहर आ गई। उनके भी पति का तबादला कहीं औऱ हो गया। फिर हम कभी मिल तो न पाई लेकिन जो अपनापन मुझे उनसे मिला, शायद कोई अपना भी नहीं दे पाता। आज मै उच्च पद पर कार्यरत हूँ लेकिन यहाँ तक पँहुच कर जो कामयाबी मुझे मिली इसमें आँटी का बहुत बडा हाथ है।
अभी कुछ दिन पहले हम यहाँ नई कालोनी मे रहने आए। मैंने दफ्तर से दो दिन की छुट्टी ले ली ताकि अपना सामान सही से जमा लूँ। पति को दफ्तर व बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अभी अपना काम शुरू ही किया था कि डोरबैल बजी। पास मे रहने वाली मिसेज खन्ना हाथ मे सब्जी की कटोरी लिए मुझसे मिलने आई। उनका अभिवादन किया औऱ फिर शुरू हुआ उनकी बातों का सिलसिला या यूँ कहो पास मे रहने वाली मिसेन खुराना की बुराइयों का सिलसिला, जो खत्म होने का नाम ही नही ले रहा था। तकरीबन तीन घंटे बीतने के बाद मिसेज खन्ना यह कहते हुए अपने घर गई कि अभी आपको बहुत काम है, सो जल्दी जा रही है, फिर कभी बैठकर ढेरों बातें करेगी। दोपहर हो चुकी थी। बच्चे स्कूल से आते होगे यह सोचकर खाना बनाने मे जुट गई बाकी काम यूँ का त्यों पडा रहा। अगले दिन बडी उम्मीद से शुरू किया तभी हाथ मे कटोरी लिए इस बार मिसेज खुराना चली आई। फिर से बातों का सिलसिला चला। इस बार मिसेज खन्ना की बुराइयाँ मुख्य विषय रही। जैसे तैसे उन्हें उनके घर भेज कर मैंने चैन की साँस ली। ये दो सब्जी की कटोरियाँ मेरे लिए जी का जन्जाल बन चुकी थी। मैंने इन दो छुट्टियों मे जो काम करने थे वे सब धरे के धरे रह गए।मैं सोच रही थी समय बीतने के साथ इन सब्जी की कटोरियो के स्वरूप मे कितना परिवर्तन आ गया है। पहले जहां सब्जी की कटोरी मे अपनेपन,प्रेम, समर्पण की भावना होती थी वही आज नफरत, स्वार्थ, ईष्या का तडका लगाया जाता है। अगले दिन हम सुबह पार्क मे मार्निग वाक के लिए निकले तो साथ मे दोनों कटोरियाँ भी उठा ली। कुछ ही दूरी पर मिसेज खन्ना औऱ फिर मिसेज खुराना भी मिल गई। हमने उनको धन्यवाद देते हुए उनकी कटोरियाँ वापस की औऱ साथ ही विनम्रता से कहा हम तो नौकरी पेशा है सुबह दफ्तर के लिए निकलते है तो शाम तक ही घर लौटते है। माफ कीजिये लेकिन ये कटोरियो के लेनदेन का सिलसिला आगे नहीं बढा सकते। निरसदेह पडोसी एक दूसरे के सुख दुख के साथी होते है लेकिन एक दूसरे की चुगलियाँ करना या इधर उधर की हाँकने के लिए आज की सभ्य व शिक्षित पीढी के पास समय ही कहाँ है। --*रुबिता अरोड़ा   
*रुबिता अरोड़ा एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।  

Monday, June 1, 2020

भरोसा अपनी परवरिश पर

संतान का मार्गदर्शक बने, मार्गभक्षक नही

लुधियाना: 23 मई, 2020:: (*रुबिता अरोड़ा)::
लेखिका : रुबिता अरोड़ा 
मैं स्कूल से छुट्टी लेकर घर आई। सोचा कुछ देर आराम करूँगी तभी फोन की घंटी बजी। फोन मेरी पुरानी सहेली ज्योति का था। मुझसे मिलना चाहती थी। मैंने उसे शाम को घर आने को कहा। शाम ठीक पाँच बजे ज्योति अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ मेरे घर आई। दोनों बच्चे इतने प्यारे थे कि उनसे नजर ही नहीं हट रही थी। मैंने बच्चों से बात शुरू की। बड़ा बेटा रियान पाँचवी मे व छोटी बेटी सुनैना तीसरी मे पढती है। कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद ज्योति ने अपनी परेशानी मेरे साथ शेयर की। उसका मानना था कि उसके बच्चे पढाई मे बिलकुल रूचि नहीं ले रहे। बहुत कोशिश करने के बाद भी परिक्षा मे अच्छे अन्क नहीं लाते। शायद उनके दिमाग ही कमजोर है। उसने कहा कि वह उनके भविष्य को लेकर बहुत परेशान है। एक ही झटके मे ज्योति ने इतनी सारी बातें बोल तो दी लेकिन मैं यह सब सुनकर बहुत आहत हुई। वो दो छोटे छोटे बच्चे जिनके साथ बचपन भी अभी अठखेलियाँ करता नहीं थका उनके लिए इतना सब कुछ कह दिया ज्योति ने। क्या परिक्षा मे कम अंक आने से यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि बच्चों के पास दिमाग कम है या ये बच्चे भविष्य मे कुछ नहीं कर सकते।  क्या तीन घंटे की परीक्षा मे आने वाले अंक किसी बच्चे की प्रतिभा को देखने का मापदंड हो सकते है। अरे बालमन तो कच्ची गीली मिट्टी की तरह होता है जिसे थोड़ी सी मेहनत करके मनचाहा आकार दिया जा सकता है। एक पौधे को अगर सही पोषण मिलेगा तो वह समय के साथ साथ एक दिन मजबूत पेड़ बनेगा। लेकिन अगर किसी पौधे को पोषण देने की बजाय कमजोर मानकर अनदेखा किया जाए तो एक दिन जरूर मुरझा जाएगा। लगातार प्रयास करते रहने से तो एक दिन असंभव भी संभव हो जाता है, फिर क्या हम बच्चों पर लगातार मेहनत नहीं कर सकते। ये सच है कि जिस प्रकार हाथों की पाँचो उगलियाँ एक समान नहीं होतीं ठीक उसी प्रकार हर बच्चे के सीखने का ढंग, उसकी ऊर्जा शक्ति भी अलग अलग हो सकती है। जरूरत है बस अपने बच्चो को थोड़ा समझने की,उन्हे वक्त देने की,उनके अन्दर छुपी प्रतिभा को बाहर निकालने की,फिर यही बच्चे अपना भविष्य खुद बनाते है। इसके इलावा यह भी जरूरी नहीं कि हर बच्चा अच्छा पढ लिख कर ही अपना भविष्य बना सकता है।हमारे सामने ऐसे सैकड़ों उदाहरण है, जिन्होंने कम पढे लिखे होने के बावजूद अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। अतः ज्योति जैसे माँ बाप से मै यही कह सकती हूँ कि अपने बच्चों पर भरोसा रखिए, आपको उनका मार्गदर्शक बनना है, मार्गभक्षक नही। सबसे बडी बात हमारे बच्चे हमारा ही अक्स है, सो भरोसा रखिए अपने आप पर,अपनी परवरिश पर।--*रुबिता अरोड़ा 
*रुबिता अरोड़ा व्यवसायिक तौर पर शिक्षिका हैं। 

Saturday, May 23, 2020

दाम्पत्य जीवन का आधार

अपनी खुशी त्यागना ही शादी का असल अर्थ 

लुधियाना: 23 मई 2020: (*रुबिता अरोड़ा)::

लेखिका: रुबिता अरोड़ा
पति पत्नी सुख दुःख के साथी होते है। यह एक ऐसा रिश्ता होता है जिसमें प्यार, अपनापन, विश्वास, त्याग, समर्पण हो तो जिंदगी जन्नत लगती हैं। यही एक ऐसा रिश्ता है जो जन्म से नहीं जुडते पर अन्त तक साथ रहता है। कुछ ऐसे ही विचारों कें साथ मैंने दाम्पत्य जीवन की शुरुआत की  मीता के साथ। मीता कालेज के दिनों में मेरे साथ पढती था। उस समय मै उससे इतना आकर्षित था कि मैंने उसे अपनो जीवन संगिनी बनाने का विचार कर लिया। मीता एक अमीर परिवार की इकलौती बेटी थी जबकि मै एक मध्यवर्गीय परिवार से था। दोनों के रहन सहन में जमीन आसमान का अंतर था। यह बात माँ बाबूजी ने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उस वक्त यह सब समझने के लिए मै बिलकुल तैयार न था। शायद ख्वाबों की दुनिया में जी रहा था, परंतु जल्दी ही हकीकत से सामना हो गया। मीता अपने आप को हमारे घर के रहन सहन के अनुरूप न ढाल सकी नतीजा वहीं हुआ जो मै कभी नहीं चाहता था। बचपन से ही घर में माँ बाबूजी के छोटी छोटी बात को लेकर झगड़ा होते देखा था, लेकिन उसके पीछे छुपा उनके आपसी प्रेम को कभी समझ नहीं सका। आज मै मीता के साथ सब दोहराना नहीं चाहता था इसलिए खुद को ही उसके अनुरूप ढालना शुरू किया। माँ के साथ या बहन रश्मि के साथ मीता का कोई मनमुटाव हो जाता तो मैं अक्सर माँ को या रश्मि को ही एडजस्टमेंट करने को बोलता। लेकिन हालात फिर भी न सुधरे। मीता सब छोड़ कर अपने पिता के यहाँ रहने चली गई। न चाहते हुए भी मुझे मीता के साथ उसके पिता के यहाँ रहना पड़ा।  यह बात अच्छी तरह जानने के बावजूद कि मेरे परिवार ने मीता के साथ एडजस्टमेंट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आखिर अपने ही मन को समझाया कि रिश्तो को जोडे रखने के लिए कभी अंधा,कभी गूगा तो कभी बहरा भी होना पडता है लेकिन आखिर कब तक समझ नहीं पा रहा था। बहन रश्मि की शादी तय हुई। बाबूजी पर यकायक अनेकों जिम्मेदारियां आ खडी हुई शादी के इन्जामो को लेकर। इस वक्त मेरे परिवार को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी आखिर अपनापन, परवाह, थोड़ा समय यही तो वह दौलत है जो मेरे अपने मुझसे चाहते थे। सोचा था माँ बनने के बाद मीता भी इन परिवारिक मूल्यों को कुछ हद तक समझ जायेगी लेकिन नहीं। उसने शादी में जाने से साफ मना कर दिया लेकिन मेरे परिवार को आज मेरी जरूरत है, मै यह कैसे भूल सकता था। आज अपना अन्धापन, गूगापन,बहरापन  सब छोड़ कर अपने पिता के कंधे से कन्धा मिलाकर खडे होने का समय था। मैंने बेटे को साथ लिया और पॅहुच गया माँ बाबूजी के घर जहां मेरी आत्मा थी। सबने खुशी खुशी गले लगाया लेकिन मीता के न आने से थोड़ा उदास जरूर हुए। खैर खुशी खुशी शादी सम्पन्न हुई। इस बीच अनेकों बार मीता के फोन आए वापस आने केलिए लेकिन मुझपर उसकी अब किसी बात का कोई असर न हुआ।  मै जिन दाम्पत्य झगडों से दूर रहना चाहता था वे आज अपनी चरमसीमा पर थे। समझ में आ चुका था  कि पति पत्नी का रिश्ता तराजू के दो पंडो की तरह होता है।  जब एक अपने अंहकार को लेकर बहुत ऊपर चला जाता है, तो दूसरे पर जिम्मेदारियों, मूल्यों का बोझ बहुत हावी हो जाता है। अतः यह जरूरी है कि विश्वास, प्यार, दोस्ती, स्नेह से दोनों पलडो को बराबर रखे। अब मीता भी अपने बेटे की दूरी ज्यादा देर न सह सकी। कुछ ही दिनों में वापस आ गई तब मैंने उसे समझाया कि आज मात्र दो साल के बेटे की दूरी उससे सहन न हुई तो मेरे माँ बाबूजी के साथ तो मेरा बरसों पुराना नाता है। भला वे मुझसे दूर कैसे रह सकते हैं, वो भी बुढापे में जब वे बिलकुल अकेले हैं। आज मीता मेरी उन सब भावनाओं को समझ पाई जिन्हें मै शान्त रहकर कबसे समझाना चाहता था। आपसी सहमति से हमने इकट्ठे रहकर दोनों तरफ के माँ बाबूजी का ख्याल रखने का निश्चय किया और साथ ही एक बडी सीख भी मिली कि छोटे मोटे मनमुटाव तो खुशहाल दाम्पत्य जीवन का आधार है। दो अलग अलग सोच रखने वालों के विचार जब आपस में टकराते हैं तो थोड़ा बहुत मनमुटाव होना संभव है लेकिन अंहकार को अलग रखते हुए आपसी सहमति से हम उन्हें सुलझा सकते है हाँ उससे पहले दोनों को अपने मत रखने का समान अधिकार मिलना चाहिए। एक दूसरे केलिए अपनी खुशी कुरबान करना ही शादी के असल मायनों को दर्शाता है।--*रुबिता अरोड़ा
*रुबिता अरोड़ा एम्स टुटोरिअल्स और श्री जी एजुकेशन पॉइन्ट में कोर्डिनेटर के तौर पर कार्यरत हैं। 

Tuesday, May 5, 2020

Online साहित्य चर्चा//लॉकडाउन पर नया डिजिटल सीरीज

 डिफरेंट मूड्स ऑफ़ लॉकडाउन पर विशेष चर्चा इस पोस्ट में ख़ास 
नई दिल्ली4 मई 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
लॉक डाउन ने सभी को घरों में बंद कर दिया लेकिन दिल और दिमाग में छुपी रचनात्मक ऊर्जा का क्या करे? यह ऊर्जा कहां बंद होती है? ये जज़्बात कहाँ रुकते हैं? यह भावनाएं कहां बंद होती हैं? इन्होने जो नया रास्ता निकाला उसकी चर्चा बहुत तेज़ी से हो रही है। लॉक डाउन के दिनों में कलम के इस ऐतिहासिक प्रयोग का श्री जाता है मातृ भारती को और इसकी लेखक मंडली को। विस्तृत विवरण पढिये नीचे दी गई पोस्ट में। आपको यह अनूठा प्रयोग कैसा लगा इस पर अपने विचार भी अवश्य भेजें। --कार्तिका सिंह
ये वक्त सबके लिए नया है। क्वारंटाइन...लॉक डाउन...कोविड 19... कोरोना वायरस जैसे नामों से पूरी दुनिया परिचित हो रही है। पहली बार हम सब घरों में कैद हैं। बाहर की दुनिया से डरे हुए हैं। इस वक्त का सही उपयोग करने और पॉजिटिव बने रहने के लिए हर कोई अपने स्तर पर बहुत कुछ कर रहा है। मातृभारती एप ने इस वक्त को रेखांकित करते हुए 21 लेखकों द्वारा लिखी एक सीरिज बनाई है डिफरेंट मूड्स ऑफ लॉकडाउन। इस सीरिज में हर दिन एक नया लेखक लॉक डाउन की कहानी लिखेगा।
इस सीरिज का संपादन कर रही हैं जयंती रंगनाथन और नीलिमा शर्मा। 
नीलिमा शर्मा इसके पहले भी हिंदी डिजिटल साहित्य के पहले उपन्यास  आईना सच नही बोलता का  संपादन  कर चुकी है जिसको मातृभारती पर हजारों पाठकों ने पढ़ा। 
मातृभारती एप के जनक महेंद्र शर्मा इस सीरिज के बारे में कहते हैं, ‘इस समय मातृभारती एप में दस लाख से ज़्यादा हिंदी के पाठक जुड़े हैँ। हम चाहते हैं अधिक से अधिक लेखकों को हिंदी भाषा से जोड़ना। जो लिखना चाहते हैं, उन्हें मोटिवेट करना, एक मंच देना हमारा उद्देश्य है। नामचीन और नए इक्कीस लेखकों द्वारा लिखा गया यह सीरीज नए पाठकों को भी जोड़ेगा। इसके अलावा एक ग्रुप में साथ रहने से एक धारा सा बनती है और क्षमतावानों को आगे बढ़ने का मौका मिलता है।’
लॉक डाउन के माहौल ने कुछ लोगों को बुरु तरह से निराश क्र दिया है, कुछ को आलसी बना दिया है-वे सारा सारा दिन सोते ही रहते हैं। ऐसे माहौल में बहुत कम लोग हैं जो कुछ न कुछ क्रिएटिव भी कर पाते हैं। इतने लेखकों कोएक साथ एक ही प्रोजेक्ट में जोड़ पाना आसान न रहा होगा। इसकी सफलता बताती है कि यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा। इसमें बहुत क्षमतावान कलमकार शामिल हैं। Mahendra SharmaJayanti RanganathanManisha Kulshreshtha,Rashmi Ravija,Shilpa SharmaPoonam JainPratishtha Singh,  Pratima PandeyUpasna SiagKshama SharmaNeelima SharrmaAmrita V ThakurPritpal KaurRinki VaishChandidutt Shukla SagarDivya VijayShuchita MitalAmrendra, Dhyandera,Jyoti इत्यादि सभी ने इसे एक मिशन समझते हुए सफल बनाया है। एक एक कहानी पढ़ने वाले के मन पर अपना असर छोडती है। बिना कोई राजनीतिक विचार या धार्मिक प्रवचन बने अपना प्रभाव किसी ऐसे इंजेक्शन की तरह छोड़ जाती है जिसे लगने का पता ही नहीं चलता। हम कोशिश करेंगे इस पर और चर्चा भी हो सके। 
इस तरह के प्रयोगों का सिलसिला शुरू करने वाले मंच मातृभारती के संचालक/संस्थापक जनाब  महेंद्र शर्मा बताते हैं कि उनके ज्यादातर पाठक मध्यप्रदेश और राजस्थान से हैं। इसके बाद उत्तरप्रदेश का नंबर आता है। कई पाठक बिहार और विदेशों से भी है। हिंदी को टीयर 2 और टीयर 3 सिटीज तक पहुंचाने के लिए कई ग्रुप ऑन लाइन और ऑफ लाइन काम कर रहे हैं। ताकि वहां हिंदी के इच्छुक लेखकों को मातृभारती एप से जोड़ सकें। भविष्य में उनका इरादा है एप में प्रकाशित कहानियों पर वेब सीरिज और फिल्म भी बने। इसके लिए कई प्रोडक्शन हाउस से उनकी बातचीत चल रही है। हिंदी के वो पाठक जो पढ़ने से ज्यादा सुनने में रुचि रखते हैं उनके लिए जल्द ही ऑडियो बुक ऐप लॉन्च होगा।
बहुत जल्द नया प्रोजेक्ट डिफरेंट शेड्स ऑफ लॉक डाउन का भी ऑडियो वर्जन लाने की तैयारी है।
                                                                                                                         --हिंदी स्क्रीन डेस्क


Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Wednesday, April 8, 2020

क्रिएटिव राइटर्स ग्रुप ने लॉक डाउन के दौर में भी कराया मुशायरा

इस बार का विषय था पत्ते, जिन पर बहुत ही खूबसूरती से लिखा गया
लुधियाना: 7 अप्रैल 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
कोरोना का कहर टूटा तो इससे बचाव के लिए लॉक डाऊन सबसे आवश्यक था। लॉक डाउन के बिना कोई और चारा  भी नहीं था लेकिन इसके लागू होते ही ज़िंदगी थम सी गई। लोग अपने अपने घरों में कैद हो कर रह गए। कोरोना के कारण हुए इस लॉक डाउन में हालत नज़रबंदी जैसी हो कर रह गई। दुनिया की रफ्तार एक दम थम गई। इस थमे हुए माहौल में वे लोग फिर भी सक्रिय रहे जो थमने जानते ही नहीं। वे लोग जिन्हें तूफानों के सामने चिराग जलाने की हिम्मत नसीब में मिली है। जो वे लॉक डाउन की पालना करते हुए नहीं थमे। घरों में कैद हो कर भी वे  नहीं रुके। उनकी सोच चलती रही। उनके जज़्बात चलते रहे। उनकी कलम भी चलती रही। कोरोना ने उन्हें अपने अपने घरों में कैद तो करवा दिया लेकिन उनके ख्यालों की उड़ान जारी रही। युवा कलमकारों के दिलों की धड़कन जसप्रीत कौर फलक ने इस दिशा में बहुत ही शिद्दत से सोच विचार की। इस गहरी सोच विचार के बाद एक स्पेशल किस्म का आईडिया उनके दिमाग में उतरा। बात बहुत ज़बरदस्त थी लेकिन उसे प्रेक्टिस में लाना आसान भी नहीं था। इसे सोचना तो  मुश्किल था ही लेकिन इसे लागू करके दिखाना और भी मुश्किल था। फिर उन्होंने यह आईडिया वरिष्ठ कलमकार और विज्ञानी डाक्टर जगतार सिंह धीमान के साथ भी शेयर किया और इसकी सफलता के लिए उनका आशीर्वाद मांगा।  बात डाक्टर धीमान के भी दिल को लगी। उन्होंने भी इस पर गंभीरता से सोचा। उनके अंतरमन में बैठे कवि ने इसे अपने ढंग से सोचा, उम्र भर विज्ञान का अध्यन करने वाली सोच के सिस्टम ने अपने ढंग से सोचा और रजिस्ट्रार के पद पर बैठे प्रशासक ने अपने नज़रिये से अपना मशवरा दिया। फैसला हुआ कि अपने अपने घर में बैठ कर साहित्य की सरगर्मी चलाई जाये। एक ऑनलाइन मुशायरा शुरू किया जाये जिसमें नयी उम्र के कलमकारों को पहल दी जाये। बस यहीं से शुरू हुआ एक विशेष मुशायरा। इसमें कोरोना का दर्द भी था,कोरोना की बंदिशें भी और लॉक डाउन की ज़िंदगी के कड़वे मीठे अनुभव भी। यह आइडिया पत्रकारिता में उम्र गुजरने वाले अश्वनी जेतली को भी बेहद जचा और उन्होंने आखिर मूल तौर पर तो वह भी शायर ही ठहरे। शायरी ने युवा अवस्था में ही बहुत जनून में थी और बाद में पत्रकारिता ने भी अपना रंग उनकी शख्सियत में जोड़ दिया। वह भी इस काफिले में शामिल हो गए। उसके बाद शुरू लॉक डाऊन के नियमों की पालना करते हुए मुशायरा कराने का सिलसिला। अब यह सिलसिला हर रोज़ चलता है। हर रोज़ ही कोई नया विष भी सुझाया जाता है। नयी कलमों प्रोत्साहित करने के लिए उनका मार्गदर्शन भी होता है और आलोचना भी। देखिये इसका थोड़ा सा रंग यहाँ भी , इन रचनाओं को विस्तृत रूप से अलग से भी प्रकाशित किया जा रहा है। साहित्य स्क्रीन में भी। 
जब इस ग्रुप में पत्तों पर कुछ लिखने को कहा गया तो गुरवीर सियाण ने लिखा:
पत्तों जैसे बन सकते हो क्या..!
हवाओं से लड़ सकते हो क्या..!
है क्या तुझमें इतनी क़ुव्वत..!
खुशी-खुशी झड सकते हो क्या..!
पत्तों जैसे बन सकते हो क्या..!
इसी तरह सिद्धार्थ ने भी इसी विषय पर बहुत ही सफलता से अपना हाथ आज़माया। उन्होंने कहा:
 बात पेंड़ो की,शाखा की हर कोई करता है,
बिछड़े हुए पत्तों की कौन सुना करता है।।
ये जो नए हैं डाली पर शान से खड़े हैं,
कल गिर जो गए तो बेजान से पड़े हैं।।
कालेज की छात्रा नवयोवना शायरा सारा सैफी ने तो कमाल ही कर दिया। भावनायों को बहुत ही संगीतमय अंदाज़ में प्रस्तुत करते हुए आज के इंसान पर गहरी चोट भी की:
सूखा पत्ता तेज़ हवा से 
उड़कर मेरे घर आया
इक ठोकर से मैनें उसको
जब आगे को सरकाया

बोला यूँ ना ठुकरा मुझको
मुझ पर भी हरियाली थी
पँछी भी सब खुश थे मुझसे
खुश मुझसे हर डाली थी
मैं तपता था कड़ी धूप में
करता था तुम पर साया

आज भी आग में जलकर मैं
सेक तुम्हें दे सकता हूँ
अपने ऊपर आज भी तेरे
 दुःख सारे ले सकता हूँ
 वो तो एक इन्सान है जिसने
 काम लिया और ठुकराया
सरू जैन साहिबा ने भी कमाल के अंदाज़ में अपनी बात कही। ज़रा आप भी पढिये:
यह सच है टूटा पत्ता
वापिस नहीं आता शाख़ पर।                                                             
पर नयी कोंपले फूटी                                         
अक्सर पतझड़ के बाद ही।
यह पत्ता टूटकर भी वफ़ा ही करे।                 
कितनी सुंदर चाह लिए दिल में।                         
चाहे मैं बिछुड़ूँ भी पेड़ से;                                 
फिर भी यह तो हरा भरा रहे।
इसी तरह कार्तिका सिंह ने भी पत्तों पर लिखते हुए उम्र और इंसानी ज़िंदगी की व्यथा को ही लिखा:
 पत्ते बस पत्ते होते हैं!
उग आते हैं--झड़ जाते हैं!
हरे रंग से पीले रंग तक 
रोज़ कहानी कह जाते हैं!
बात पते की कह जाते हैं!