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Thursday, March 23, 2023

पत्रकारिता बचाओ दिवस के मौके पर एकजुट हुआ मीडिया

Thursday 23rd March 2023 at 07:55 PM

पत्रकारिता को दरपेश चुनौतियों और खतरों की हुई चर्चा 

चण्डीगढ: 23 मार्च 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क):: 

आज मीडिया कर्मी देश के तकरीबन सभी कोनों में एकत्र हुए और अपनी एकजुटता का इज़हार भी किया।चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में  स्थित प्लाज़ा मार्किट में आज मीडिया की चहल पहल रही। मौका था शहीदी दिवस का और आव्हान था पत्रकारिता बचाओ दिवस मनाने का।  बहुत से पत्रकारों ने आज इस आश्य के संकल्प भी लिए। चंडीगढ़ एंड हरियाणा जर्नलिस्ट यूनियन (रजि.) द्वारा इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन के आह्वान पर देश के महान शहीदों के बलिदान दिवस पर आज पत्रकारिता बचाओ (सेव जर्नलिज्म) दिवस मनाया। इस मौके पर और चंडीगढ़ के सेक्टर 17 स्थितप्लाज़ा मार्कीट ग्राउंड में ही में पत्रकारों की मांगों को लेकर धरना दिया गया और प्रदर्शन भी  किया गया। इस अवसर पर पंजाब व चंडीगढ़ जर्नलिस्ट यूनियन के सदस्य व पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। सीएचजेयू ने पत्रकारिता पर निरंतर बढ़ रहे संकट पर चिंता जताते हुए सरकार से पत्रकारों की मांगों को तुरंत पूरा करने की मांग भी की। आज गोदी मीडिया का भी खुल कर विरोध हुआ। आज के आयोजन में सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकार लोग भी शामिल हुए। जनहित से जुड़े विभिन्न चैनल अपनी मौजूदगी का अहसास करने पहुंचे हुए थे। इन लोगों ने कवरेज भी बहुत गंभीरता और बारीकी से की। 

पत्रकारिता सचमुच गंभीर संकट और खतरों में है इसलिए आज की इस बैठक में चंडीगढ़ एंड हरियाणा जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष राम सिंह बराड़, प्रदेश महासचिव सुरेंद्र गोयल, ललित धीमान, सतीश शर्मा,
अख्तर फारूखी, रंजना शुक्ला, प्रवीण कुमार, कमलजीत सिंह, अजीत सिंह व इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव बलविंदर जम्मू, पीसीजेयू के प्रदेशाध्यक्ष बलबीर सिंह जंडू, ङ्क्षबदू सिंह, जय सिंह छिब्बर, तरलोचन सिंह सहित अनेक वरिष्ठ पत्रकार उपस्थित रहे। यूनियन के नेताओं ने शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को श्रद्धांजलि देते हुुए कहा कि शहीदे आजम भगत सिंह खूद एक पत्रकार थे और उनका जीवन हमेशा पत्रकारों को प्रेरणा देता रहेगा। इस बैठक के अवसर पर शहीदे आज़म भगत सिंह को एक पत्रकार के तौर पर भी याद किया गया। 

इन खतरों, संकटों और चुनौतियों पर इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन काफी समय से चर्चा भी करती आ रही है। पत्रकारिता बचाओ दिवस मनाने के मकसद से बुलाई गई इस बैठक को संबोधित करते हुए आईजेयू के राष्ट्रीय महासचिव बलविंदर सिंह जम्मू ने कहा कि पत्रकारों की जायज मांगों की पिछले काफी समय से निरंतर अनदेखी हो रही है। उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि पत्रकारों को कोरोना काल से पहले रेल यात्रा दौरान रियायती दरों पर यात्रा सुविधा मिलती रही है, जिसे कोरोना काल के दौरान अस्थाई तौर पर बंद किया गया था, लेकिन अब हालात सामान्य होने के बावजूद भी उसे अभी बहाल नहीं किया गया। इसे तुरंत बहाल किया जाए। पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र व राज्य स्तर पर पत्रकार संरक्षण कानून बनाए जाएं, ताकि पत्रकार अपना कर्तव्य बिना किसी दबाव व भय के पूरा कर सकें। प्रेस परिषद के स्थान पर मीडिया परिषद का गठन किया जाए और उसमें राष्ट्रीय स्तर की तमाम यूनियनों व संगठनों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। राष्ट्रीय स्तर की सभी यूनियनों व संगठनों को केंद्रीय मीडिया एक्रीडेशन कमेटी व राज्य एक्रीडेशन कमेटियों में प्रतिनिधित्व बहाल किया जाए। गौरतलब है कि इस तरह की एक्रीडेशन मीडिया को अपनी डयूटी निभाने के लिए भी आवश्यक है। 

आज के इस आयोजन के मौके पर पत्रकारिता को दरपेश चुनौतियों की भी विस्तृत चर्चा हुई और मीडिया नेताओं ने कहा कि पत्रकारों पर देश भर में विभिन्न स्थानों पर झूठे मामले दर्ज करना बंद किया जाए। पत्रकारों को मुख्यधारा के कोरोना योद्वा मानते हुए कोरोना काल में मारे गए सभी पत्रकारों के परिवारों को उचित आर्थिक सहायता दी जाए। सरकार और समाज को भी इस तरफअपना नैतिक कर्तव्य निभाना चाहिए।  

कुछ और मांगें भी उठाईं गई। इसके साथ ही पीआईबी एक्रीडियेशन रूलज में से गैर जरूरी व पक्षपाती नियम व शर्तें हटाई जाएं। उन्होंने कहा कि देशभर में एक ऐसा माहौल कायम किया जाए, जिससे पत्रकार स्वतंत्रता के साथ निष्पक्ष होकर अपना कर्तव्य निभा सके। 

मीडिया कर्मियों से जुडी हुईं इन मांगों और चुनौतियों की चर्चा करते हुए बलविंदर सिंह जम्मू ने कहा कि आज प्रैस की स्वतंत्रता कसौटी पर लगी हुई है और भारतीय मीडिया दुनिया भर में 150वें स्थान पर पंहुच गया है। सीएचजेयू अध्यक्ष राम सिंह बराड़ ने कहा कि चंडीगढ़ एंड हरियाणा जर्नलिस्ट यूनियन ने काफी समय पहले यूनियन ने प्रदेश सरकार को पत्रकारों की मांगों बारे ज्ञापन सौंपे थे, लेकिन अभी तक उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। पत्रकारों की जायज मांगों को तुरंत स्वीकार करके सरकार उन्हें राहत प्रदान करे।

Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Wednesday, April 24, 2013

मालवीय जी और हि‍न्‍दी

06-अप्रैल-2013 20:17 IST
वि‍शेष लेख                                                                           -वि‍श्‍व नाथ त्रि‍पाठी

बहुमुखी प्रतिभा के धनी महामना पंडि‍त मदन मोहन मालवीय का कार्य क्षेत्र बहुत व्‍यापक था। सन् 1861 में प्रयाग में उनका जन्‍म हुआ था। वे एक महान देश भक्‍त, स्‍वतंत्रता सेनानी वि‍धि‍वत्‍ता, संस्‍कृत वाड्.मय और अंग्रेजी के वि‍द्वान, शि‍क्षावि‍द , पत्रकार और प्रखर वक्‍ता थे। उस युग में 25 वर्ष की आयु में उनमें इतनी राष्‍ट्रीय चेतना थी कि‍ उन्‍होंने 1886 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधि‍वेशन में भाग लि‍या और उसे संबोधि‍त कि‍या। वे सन् 1909, 1918, 1932 और 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्‍यक्ष चुने गए। सन् 1931 में उन्‍होंने दूसरे गोलमेज सम्‍मेलन में भारत का प्रतिनिधित्‍व भी कि‍या।
  राष्‍ट्रीय आंदोलन में अपना पूर्ण्‍ योगदान देने के उद्देश्‍य से महामना ने 1909 में वकालत छोड़ दी यदयपि‍ उस समय वे इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में पंडित मोती लाल नेहरू और सर सुन्‍दर लाल जैसे प्रथम श्रेणी के वकीलों में गि‍ने जाते थे। लकि‍न दस साल बाद उन्‍होंने चौरा-चौरी कांड के मृत्‍युदण्‍ड के सजायाफ्ता 156 बागी स्‍वतंत्रता सेनानियों की पैरवी की और उनमें से 150 को बरी करा लि‍या।
  यदि‍ कभी कोई इति‍हासकार स्‍वतंत्रता आंदोलन का वास्‍ति‍वक मूल्‍यांकन करेगा तो महामना का योगदान लोकमान्‍य ति‍लक और महात्‍मा गांधी के समकक्ष आंकने को बाध्‍य होगा। लेकि‍न इसे एक वि‍डम्‍बना ही कहना चाहि‍ए कि‍ उस देश में उनका नाम अधि‍कांश लोग केवल ‘बनारस हि‍न्‍दू वि‍श्‍ववि‍दयालय’ के संस्‍थापाक तथा एक महान शि‍क्षावि‍द् के रूप में ही जानते हैं। वास्‍तव में महामना अपने द्वारा कि‍ये गए कार्यों का न तो स्‍वयं प्रचार करते थे और न चाहते थे कि उनके द्वारा किए गए सद्कार्यों का कोई दूसरा भी प्रचार करें। वे सही मायने में एक कर्मयोगी थे। मालवीय जी अपने द्वारा शुरू कि‍ये कार्य को कि‍सी योग्‍य व्‍यक्‍ति‍ को सौंपकर दूसरे नए कार्य में जुट जाते थे। उनके नाम का कहीं उल्‍लेख न हो इस बात पर वह इतना ध्‍यान देते थे कि अपने  बनाए अपने घरों के बाहर भी उन्‍होंने अपना नाम कभी नहीं लि‍खवाया।
    19 वीं शताब्‍दी में नव जागरण और राष्‍ट्रीय चेतना का स्‍फुरण हो रहा था। एक तरफ युवकों में राष्‍ट्रीय चेतना अंकुरि‍त हो रही थी तो दूसरी तरफ मैकाले के जोर देने पर कम्‍पनी सरकार ने 1835 में अंग्रेजी शि‍क्षा प्रचार का प्रस्‍ताव पास कर दि‍या, एतदर्थ देश में यत्र-तत्र अंग्रेजी के स्‍कूल खोले जाने लगे। अब प्रश्‍न उठा अदालती भाषा का और स्‍कूलों में हि‍न्‍दी को एक अनिवार्य वि‍षय के रूप में रखने का। इन दोनों बातों में हि‍न्‍दी का घोर वि‍रोध हुआ। इस वि‍रोध की कहानी भी बहुत रोचक है। मुगलकाल में अदालतों की भाषा फारसी चल आ रही थी। अंग्रेजी-शासन काल में भी प्रारंभ में यही परम्‍परा चलती रही कि‍न्‍तु सर्वसाधारण जनता की फारसी-भाषा और उसकी लि‍पि‍ सम्‍बन्‍धी कठि‍नाइयों को देखकर सन् 1836 में कम्‍पनी सरकार ने आज्ञा जारी की कि‍ सारा अदालती काम देश की प्रचलि‍त भाषाओं में हुआ करे। इसके परि‍णाम स्‍वरूप संयुक्‍त प्राइज़ में हि‍न्‍दी खड़ी बोली को वहां की अदालती भाषा स्‍वीकार कर लि‍या गया। सारा अदालती कार्य हि‍न्‍दी भाषा और लि‍पि‍ में होने लगा। कम्‍पनी सरकार भाषा संबंधी इस नीति‍ पर चि‍रकाल तक न टि‍क सकी। केवल एक साल के पश्‍चात् उत्‍तरी भारत के सब दफ्तरों की भाषा उर्दू  कर दी गई। यह सब मुसलमानों के वि‍रोध के कारण हुआ। इस प्रकार मान-मर्यादा और आजीवि‍का की दृष्‍टि‍ से सबके लि‍ये उर्दू सीखना आवश्‍यक हो गया और देश-भाषा के नाम पर स्‍कूलों में छात्रों को उर्दू पढाई जाने लगी। इस प्रकार हि‍न्‍दी तथा अन्‍य भारतीय भाषाओं के पढ़ने वालों की संख्‍या दि‍न प्रतीदि‍न  कम होने लगे।
हि‍न्‍दी को अदालतों से बाहर नि‍कालने के कार्य में तो मुसलमानों को सफलता मि‍ल चुकी थी, अब वे इसे शि‍क्षा क्षेत्र से बाहर नि‍कालने में प्रयत्‍नशील थे। जब सरकार स्‍कूलों और मदरसों में हि‍न्‍दी के अनि‍वार्य रूप से पढ़ाये जाने के प्रस्‍ताव पर वि‍चार कर रही थीं तब प्रभावशाली मुसलमानों-सर सैय्यद अहमद खां आदि‍ ने उसका उ्ग्र वि‍रोध कि‍या। अन्‍तत: 1884 में सरकार को अपना वि‍चार छोड़ना पडा। सर सैय्यद अहमद खां का अंग्रेजों के बीच बड़ा मान था। वे हि‍न्‍दी को एक ‘गंवारू’ भाषा समझते थे। वे अंग्रेजी को उर्दू की ओर झुकाने की लगातार कोशि‍श करते रहे। इसी समय राजा शि‍व प्रसाद ‘सि‍तारे हि‍न्‍द’ का इस क्षेत्र में आगमन हुआ। वे भी अंग्रेजों के कृपा पात्र थे और हि‍न्‍दी के परम पक्षपाती थे। अंत: हि‍न्‍दी की रक्षा के लि‍ए उन्‍हें खड़ा होना पड़ा। वे इस कार्य में बराबर चेष्‍ठाशील रहे। यह झगड़ा बीसों वर्ष तक ‘भारतेन्‍दु’ हरि‍श्‍चंद्र के समय तक रहा।
इस हि‍न्‍दी-उर्दू संघर्ष में राजा शि‍व प्रसाद ‘सि‍तारे हि‍न्‍द’ के समय में ही राजा लक्ष्‍मण सिंह भी हि‍न्‍दी के संरक्षक बन कर सामने आये। अनेक वि‍घ्‍न-बाधाओं के होने पर भी शि‍व प्रसाद ने हि‍न्‍दी के उद्धार-कार्य में महत्‍वपूर्ण योगदान दि‍या। इन्‍हीं के प्रयत्‍नों से कम्‍पनी सरकार को स्‍कूलों में हि‍न्‍दी शि‍क्षा को स्‍थान देना पडा।
     जि‍स प्रकार दोनों राजाओं के सप्रयत्‍नों से संयुक्‍त प्रान्‍त में हि‍न्‍दी का प्रचार कार्य आरम्‍भ हुआ, उसी प्रकार उनके समसामयि‍क बाबू नवीन चन्‍द्र राय ने पंजाब में समाज सुधार तथा हि‍न्‍दी-प्रचार कार्य आरम्‍भ कि‍या। बंगाल में राजा राममोहन राय वेदान्‍त और उपि‍नषदों का ज्ञान लेकर आगे आये और उन्‍होंने वहां ‘ब्रह्म-समाज’ की स्‍थापना की। उन्‍होंने वेदान्‍त-सूत्र का हि‍न्‍दी में अनुवाद प्रकाशि‍त कराया।
     उधर उत्‍तरी भारत में स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती ने वैदि‍क धर्म-प्रचार और ‘आर्य समाज’ की स्‍थापना कर जनता को अपनी ओर आकार्षित कि‍या। उन्‍होंने हि‍न्‍दुस्‍तान को आर्यावर्त तथा हि‍न्‍दी को आर्य भाषा का नाम दि‍या तथा प्रत्‍येक आर्य के लि‍ए आर्यभाषा का पढ़ना आवश्‍यक ठहराया। स्‍वामी दयानन्‍द तथा उनके द्वारा स्‍थापि‍त ‘आर्य समाज’ ने हि‍न्‍दी भाषा के प्रचार में जो महत्‍वपूर्ण कार्य कि‍या, वह चि‍रस्‍मरणीय  है।  
अब देश में इस प्रकार का वातावरण बन रहा था कि‍ संयुक्‍त प्रान्‍त (आज के उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड) के बुद्धि‍जीवि‍यों के लि‍ए यह बर्दाश्‍त करना असंभव होने लगा था कि‍ सुसंस्‍कृत तथा समृद्ध भाषा हि‍न्‍दी के होते हुए भी पराधीन होने के कारण प्रान्‍त की जनता को समस्‍त राजकीय कार्य में विदेशी भाषा फारसी अथवा अंग्रेजी का प्रयोग करना पड़े। अंत: 19 वीं शताब्‍दी के मध्‍य तक आते-आते अनेक स्‍वाभि‍मानी देशभक्‍त बुद्धि‍जीवि‍यों ने इस बात का बीड़ा उठाया कि‍ प्रदेश में वि‍देशी भाषा की जगह ‘नि‍ज भाषा’ के प्रयोग की शासकीय अनुमति‍ मि‍ल जाय। इस कड़ी में अत्‍यन्‍त महातवपूर्ण प्रयास राजा शि‍वप्रसाद द्वारा भी सन् 1868 में कि‍या गया जो उपर्युक्‍त वि‍दशेी लि‍पि‍यों के हि‍मायति‍यों के वि‍रोध के कारण सफल न हो सका।
     राजा शि‍व प्रसाद की भांति‍ बहुतों ने अदालतों में देवनागरी लि‍पि‍ के प्रवेश के लि‍ये जब-तब छि‍टपुट प्रयत्‍न कि‍या लेकि‍न सभी असफल रहे। 1848 में प्रयाग में हि‍न्‍दी उद्धारि‍णी-प्रति‍नि‍धि‍ मध्‍यसभा की स्‍थापना हुई। मालवीय जी ने इसमें जी खोलकर काम कि‍या, व्‍यारव्‍यान दि‍ए, लेख लि‍खे और अपने मि‍त्रों को भी उस काम में भाग लेने के लि‍ए उत्‍प्रेरि‍त कि‍या। उन्‍होंने नए सि‍रे से अदालतों में नागरी के प्रवेश का प्रयन्‍त कि‍या। मालवीय जी ने इस बात पर गम्‍भीरता से वि‍चार कि‍या कि‍ अब तक इस दि‍शा में क्‍यों सफलता नहीं मि‍ली। महामना ने व्‍यवस्थि‍त ढंग से इस काम को हाथ में लि‍या। एक ओर तो उन्‍होंने देवनागरी लि‍पि‍ के पक्ष में हस्‍ताक्षर अभि‍यान की योजना शुरू की दूसरी ओर बहुत सी सामग्री एकत्रि‍त कर ‘कोर्ट कैरेक्‍टर एण्‍ड प्राइमरी एजूकेशन’ नाम की पुस्‍तक लि‍खी। इसमें हि‍न्‍दी का प्रयोग सरकारी कामकाज में क्‍यों कि‍या जाय इसकी प्रचुर सामग्री थी।
     इसी प्रकार आधुनि‍क हि‍न्‍दी के जन्‍मदाता ‘भारतेन्‍दु’ हरिश्‍चंद्र द्वारा काशी में स्‍थापि‍त ‘नागर प्रचारि‍णी सभा’ भी नागरी लि‍पि‍ के प्रचार-प्रसार में लगी थी। कि‍न्‍तु मुचि‍त मार्गदर्शन प्राप्‍त न होने के कारण उसकी स्‍थि‍ति‍  बि‍गड़ रही थी। मालवीय जी ने ‘नागरी प्रचारि‍णी सभा’ की गति‍वि‍धि‍यों में आरंभ से ही अत्‍यधि‍क रूचि‍ ली तथा ‘नागरी प्रचारि‍णी सभा’ को भी हि‍न्‍दी के प्रचार-प्रसार के कार्य में प्रगति‍शील बनाकर उसे एक प्रकार से पुनर्जीवि‍त कर दि‍या।
     जब मालवीय जी नागरी प्रचार आन्‍दोलन के मुखि‍या बने तब हि‍न्‍दी के सबसे बड़े वि‍रोधी सर सैययद अहमद खां का इन्‍ति‍काल हो चुका था, पर मोहसुनुल मुल्‍क ने नागरी के वि‍रूद्ध घनघोर आन्‍दोलन शुरू कर दि‍या। लॉर्ड कर्जन की सरकार भी उनकी ओर झुकी जा रही थी पर मालवीय जी से टक्‍कर लेना भी टेढ़ी खीर थी। दि‍न-रात एक करके अपनी वकालत के सुनहरे दि‍नों में धुन के साथ मालवीय जी ने गहरी छानबीन के साथ नागरी के पक्ष में प्रमाण और आकड़े इकट्ठे कि‍ये। सैकड़ों जगह डेपुटेशन भेजे गए और हि‍न्‍दी भाषा और नागरी लि‍पि‍ की सुन्‍दरता, सहजता और उपयोगि‍ता दि‍खाई गई। मालवीय जी ने वकालत करते हुए भी अपने मित्र पंडि‍त श्रीकृण जोशी के साथ मि‍लकर घोर परि‍श्रम कि‍या। अपने पास से रूपये खर्च करके उपरोक्‍त कोर्ट लि‍पि‍ का इति‍हास, वि‍गत अधि‍कारि‍यों की सम्‍मति‍यां एकत्र करके एक बड़ी सुन्‍दर पुस्‍तक ‘कोर्ट कैरेक्‍टर एण्‍ड प्रायमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्‍टर्न प्रौवि‍न्‍सेज’ लि‍खी। यह अम्‍यर्थना लेख लेकर 2 मार्च सन् 1898 ई. को अयोध्‍या नरेश महराजा प्रताप नारायण सि‍हं मांडा के राजा राम प्रसाद सि‍हं, आवागढ़ के राजा बलवंत, डॉ. सुन्‍दर लाल आदि‍ के साथ मालवीय जी का एक दल गवर्न्‍मेंट हाउस प्रयाग में छोटे लाट साहब सर एन्‍टोनी मेक्‍डॉलेन से मि‍ला। मालवीय जी की मेहनत सफल हो गई। उनकी सब बातें मान ली गईं। अन्‍त में 18 अप्रैल सन् 1900 ई. को सर ए.पी. मैक्‍डॉलेन ने एक वि‍ज्ञप्‍ति‍  (गवर्न्‍मेंन गजट) नि‍काली जि‍ससे अदालतों में तथा शासकीय कार्यों में नागरी को भी स्‍थान मि‍ल गया। लेकि‍न देश के हि‍न्‍दी वि‍रोधी लोगों ने इस पर खूब ऊधम मचाया। इस आदेश के वि‍रोध में जगह-जगह सभाएं की गई। प्रस्‍ताव भेजे गए कि‍ हि‍न्‍दी को इस प्रकार स्‍वीकार न कि‍या जाय। पर मालवीय जी भी अपने अभि‍यान में डटे रहे। हि‍न्‍दी के पक्ष में भी सभाएं हुईं प्रस्‍ताव भेजे गए। अत: लाट साबह तनि‍क भी वि‍चलि‍त न हुए और अन्‍त में बड़े लाट साहब की अनुमति‍ से यह नि‍यम बन गया कि‍ सभी लोग अपनी अर्जी, शि‍कायत की दरखास्‍त चाहे हि‍न्‍दी या फारसी में दे सकते हैं। अदालतों, शासकीय कार्यालयों को निर्देश दे दि‍या गया कि‍ सभी कागजात जैसे सम्‍मन आदि‍, जो सरकार की ओर से जनता के लि‍ए नि‍काले जायेंगे वह दोनों लि‍पि‍यों यानी नागरी और फारसी में लि‍खे अथवा भरे होंगे। सरकार ने इसके साथ ही यह भी ऐलान कर दि‍या कि‍ आगे कि‍सी भी व्‍यक्‍ति‍  को तभी सरकारी नौकरी मि‍ल सकेगी जब वह हि‍न्‍दी भाषा का भी जानकार हो। जो कर्मचारी हि‍न्‍दी नहीं जानते थे उन्‍हें एक साल के भीतर हि‍न्‍दी सीखने को कहा गया अन्‍यथा वे नौकरी से अलग कर दि‍ए जायेंगे। इस प्रकार मालवीय जी के अथक प्रयास से हि‍न्‍दी का प्रवेश संयुक्‍त प्रान्‍त के शासकीय कार्यालयों में हुआ।
     महामना हि‍न्‍दी के प्रति समर्पित थे। वे चाहते थे कि‍ शि‍क्षा का माध्‍यम भी हि‍न्‍दी हो। सन् 1882 ई्. में अंग्रेजों ने एक शि‍क्षा कमीशन बैठाया। इसका मुख्‍य उद्देश्‍य था कि‍ यह नि‍धार्रि‍त हो कि‍ शि‍क्षा का माध्‍यम क्‍या हो और शि‍क्षा कैसे दी जाये? इस आयोग में साक्ष्‍य के लिए महामना पंडित मदनमोहन मालवीय तथा ‘भारतेन्‍दु’ हरि‍श्‍चन्‍द्र चुने गए थे। ‘भारतेन्‍दु’ अस्‍वस्‍थता के कारण आयोग के सम्‍मुख उपस्‍थि‍त  नहीं हो पाये। उन्‍होंने अपना लि‍खि‍त बयान आयोग को भेजा था। परन्‍तु महामना आयोग के सामने उपस्‍थि‍त हुए थे। उन्‍होंने अपने बयान में इस बात पर जोर दि‍या था कि‍ शि‍क्षा समस्‍त क्षेत्रों में दी जाय और वह हि‍न्‍दी भाषा में हो।
     महामना वर्ष 1886 ई. से कांग्रेस से जुडकर देश की राजनीति‍ में आजादी की लड़ाई का हि‍स्‍सा बन चुके थे। तभी से उनका सम्‍पर्क देश के बड़े राजनेताओं से हो गया था। धीरे-धीरे उनको देश के बड़े राजनेता के रूप में जाना जाने लगा। भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के 1909 के अधि‍वेशन के वह अध्‍यक्ष चुने गए। देश के व्‍यापक भ्रमण और गहन जन सर्म्‍पक से उन्‍हें यह स्‍पष्‍ट  दि‍खने लगा कि‍ अनेक भाषाओं के इस देश में भारत के स्‍वतंत्र होने पर कि‍सी एक भाषा को सम्‍पर्क भाषा के लि‍ए राष्‍ट्रभाषा का रूप लेना पड़ेगा। उन्‍होंने देखा कि‍ देश के अधि‍कांश भूभाग में अधि‍क से अधि‍क लोग कि‍सी न कि‍सी प्रकार की हि‍न्‍दी बोलते और समझते थे। जबकि‍ देश की अन्‍य भाषाएं यद्यपि उतनी ही महत्‍वपूर्ण थी पर उनका दायरा सीमि‍त था। वे इतने वि‍शाल जनसमुदाय के द्वारा बोली और समझी नहीं जाती थीं। एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र को जोड़ने के लिए एक राष्‍ट्र भाषा के रूप में मालवीय जी ने हि‍न्‍दी की महत्‍ता को परखा। उन्‍होंने यह भी अनुभव कि‍या कि‍ देश के अहि‍न्‍दी भाषी क्षेत्रों में लोगों को हि‍न्‍दी जानने व समझने का मौका मि‍लना चाहि‍ए। अंत: सन् 1910 ई. में महामना के प्रयासों से काशी में ‘’हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन’’ की स्‍थापना हुई। मालवीय जी इसके प्रथम अध्‍यक्ष बने। धीरे-धीरे पूरे देश में ‘हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन’ की शाखाएं खोली गईं। इसके माध्‍यम से देश के अहि‍न्‍दी भाषी क्षेत्र के लोगों को हि‍न्‍दी पढ़ने व सीखने का अवसर मि‍ला। अपने स्‍वभाव के अनुरूप मालवीय जी ने हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन की स्‍थापना करने के बाद इसे आगे चलाने के लि‍ए बाबू पुरूषोत्‍तम दास टण्‍डन को सौंप दि‍या।
सन् 1918 में इन्‍दौर में हुए हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य सम्‍मेलन के अधि‍वेशन में महात्‍मा गांधी इसके अध्‍यक्ष बने। उनके नेतृत्‍व में हि‍न्‍दी के प्रचार का एक नया अध्‍याय शुरू  हुआ। उन्‍होंने दक्षि‍ण भारत में राष्‍ट्रभाषा हि‍न्‍दी-प्रचार का काम प्रारम्‍भ कि‍या। 1935 में दूसरी बार इन्‍दौर में हुए सम्‍मेलन के अधि‍वेशन को सम्‍बोधित करते हुए महात्‍मा गांधी ने अपने अध्‍यक्षीय भाषण में कहा कि‍ ‘’मेरा क्षेत्र दक्षि‍ण में हि‍न्‍दी-प्रचार है। सन् 1918 में जब आपका अधि‍वेशन यहां हुआ था तब से दक्षि‍ण में हि‍न्‍दी-प्रचार के कार्य का आरम्‍भ हुआ है।’’ महात्मा गांधी ने मालवीय जी के हि‍न्‍दी-प्रचार की प्रशंसा करते हुए कहा था ‘’सबसे पहला अधि‍वेशन सन् 1910 में हुआ था। उसके सभापति‍ मालवीय जी महाराज ही थे। उनसे बढ़ कर हि‍न्‍दी-प्रेमी भारत वर्ष में हमें कहीं नहीं मि‍लेगा। कैसा अच्‍छा होता यदि‍ वह आज भी इस पद पर होते। उनका हि‍न्‍दी प्रचार-क्षेत्र भारतव्‍यापी है; उनका हि‍न्‍दी का ज्ञान उत्‍कृष्‍ट है।’’
महात्‍मा गांधी मालवीय जी का बड़ा सम्‍मान करते थे। वे मालवीय जी के राष्‍ट्रभाषा हि‍न्‍दी सम्‍बन्‍धी वि‍चारों से पूर्णत: सहमत थे। महात्‍मा गांधी कहते थे कि‍ ‘’यह भाषा का वि‍षय बड़ा भारी और बड़ा महत्‍वपूर्ण है।’’
  अन्‍तत: हि‍न्‍दी के महत्‍व को सभी ने समझा। कालान्‍तर में कांग्रेस के अधि‍वेशन में हि‍न्‍दी को ही राष्‍ट्रभाषा बनाने के प्रस्‍ताव को स्‍वीकृति‍ प्राप्‍त हुई। स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति‍ के बाद 14 सि‍तम्‍बर 1949 के दि‍न हि‍न्‍दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्‍वीकृत कि‍या गया। भारतीय संवि‍धान में राजभाषा हि‍न्‍दी के प्रबन्‍ध में अनुच्‍छेद 343 (1) के अनुसार संघ की राजभाषा हि‍न्‍दी और लि‍पि‍ देवनागरी होगी।
     आज इस देश के लोगों को शायद इस बात का अहसास भी न होगा कि‍ भारत में हि‍न्‍दी को वि‍श्‍ववि‍दयालयों में एक वि‍षय के रूप में कोई भी मान्‍यता प्राप्‍त नहीं थी। मालवीय जी ने बनारस हि‍न्‍दू वि‍श्‍ववि‍दयालय में हि‍न्‍दी को सर्वप्रथम एक वि‍षय के रूप में मान्‍यता दी। आज  हि‍न्‍दी में पढ़ाई सारे वि‍श्‍ववि‍दयालयों में प्रचलि‍त है। हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य के पुरोधा आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल, पं; अयोध्‍या सि‍हं उपाध्‍याय ‘हरि‍औध’, आचार्य हजारी प्रसाद द्वि‍वेदी आदि‍ इसी वि‍श्‍ववि‍दयालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग के रत्‍न थे। मालवीय जी को हि‍न्‍दी के अखबारों का जनक कहना भी अति‍शयोक्‍ति‍ न होगी। कालाकॉकर (प्रतापगढ़) से ‘हि‍न्‍दुस्‍तान’ का संपादन करने के बाद उन्‍होंने प्रयाग से वर्ष 1907 में प्रकाशि‍त ‘अभ्‍युदय’ और उसके बाद ‘मर्यादा’ का संपादन कि‍या। इन समाचार पत्रों और इनके संपादकीय को जो सफलता और लोकप्रि‍यता मि‍ली वह अन्‍य समाचार पत्रों के लि‍ये मार्गदर्शक बनी।
--------वि‍श्‍व नाथ त्रि‍पाठी
    बी-47 कौशाम्‍बी, गाजि‍याबाद-201010
फोन: 0120-4372290


वि. कासोटिया/ सतपाल/दयाशंकर/संजना-62

Friday, January 18, 2013

सभी कार्यक्षेत्रों की महिलाओ का सम्मान

भारत को ब्रह्माण्ड़ गुरु की गरिमा वापस दिलाने का प्रयास 
दामिनी की जान हम नहीं बचा पाए उसके बाद इस तरह की घटनायों की मुक्कमल रोकथाम भी नहीं कर पाए लेकिन इस के बावजूद महिला सम्मान को लेकर एक आन्दोलन अवश्य खड़ा हुआ जो लगातार मजबूत हो रहा है। जहाँ एक और महिलायों और उनकी पौशाक को लेकर बहुत ज़िम्मेदार समझे जाने वाले लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं वहीँ इस नाज़ुक समय में महिलायों के समान को लेकर एक विशेष आयोजन भी हो रहा है। महिला रत्नों के सम्मान में आप अपने क्षेत्र की महिलायों के नामांकन भी भेज सकते हैं साथ ही आलेख, सुझाव, सहयोग और विज्ञापन भी। इस विशेष आयोजन में कर्मठसत्यानिष्ठ,  कर्तव्यनिष्ठ,  संघर्षशीलप्रतिभाशालीसमाजसेवीराष्ट्रहित  में कार्य करने वाली सभी कार्यक्षेत्रों की महिलाओ का सम्मान किया जायेगा। आयोजकों का कहना है कि विश्व सभ्यता की रक्षासुरक्षा एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति के विकास व विस्तार हेतु संकल्प के साथ इस हाभियान मे सहयोग करों सफलता आपके कदम चूमेंगी। आपका छोटा सा प्रयास भारत को विश्वगुरु ही नही वरन्
ब्रह्माण्ड़ गुरु की प्राचीन गरिमा वापस दिलाएगा। सम्पर्क   : भावना त्यागी भारतीय (011 22528272, 9013666652) और भू त्यागी भारतीय (विश्व चिंतक) (09999466822, 9013666651) आप अपने सुझाव यहाँ भी भेज सकते हैं जिन्हें आयोजकों तक पहुंचा दिया जायेगा।-- रेक्टर कथूरिया 
*महिला रत्नों का सम्मान                                         *सभी कार्यक्षेत्रों की महिलाओ का सम्मान

नामांकन आमन्त्रण महिला और मीडिया 2013 FFF.pdf
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