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Friday, February 11, 2022

साहित्य अकादमी की ओर से जारी हैं विशेष प्रयास

प्रविष्टि तिथि: 10 FEB 2022 6:36PM by PIB Delhi

बड़ी संख्‍या में भारतीय उत्कृष्ट ग्रंथों, लोकप्रिय कृतियों और उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं को विदेशी भाषाओं में सवंर्धित किया गया है: श्री जी. किशन रेड्डी

भारत सरकार ने साहित्य अकादमी (संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त निकाय) के माध्यम से भारतीय साहित्य के विदेशी भाषाओं में अनुवाद को बढ़ावा देने/प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर अनेक कदम उठाए हैं। इन वर्षों के दौरान अकादमी ने कई उत्कृष्ट भारतीय  ग्रंथों और लोकप्रिय भारतीय कृतियों को विदेशी भाषाओं में संवर्धित किया है, जैसे कि रामायण का अयोध्या कांड, जैसा कि कंबन द्वा कथित तमिल से अंग्रेजी में, मलयालम के चेम्मीन से अंग्रेजी और कई पूर्वी यूरोपीय भाषाओं में, तुलसीदास की कवितावली का अंग्रेजी में, प्रेमचंद के गोदान का अंग्रेजी में, एसएन पेंडसे की गारंबीचा बापू को अंग्रेजी में, विभूति भूषण बंद्योपाध्याय की पाथेर पांचाली का फ्रेंच में, कुछ उल्लेखनीय नाम हैं।

    अकादमी ने 10 विभिन्न भारतीय भाषाओं की निम्नलिखित 10 पुस्तकों का चीनी, रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया है:

  1. सैयद अब्दुल मलिक (असमिया) द्वारा सुरुज्मुख स्वप्ना
  2. तारा शंकर बंद्योपाध्याय (बंगाली) द्वारा आरोग्यनिकेतन
  3. झावेरचंद मेघानी (गुजराती) द्वारा वेविशाल
  4. निर्मल वर्मा द्वारा (हिंदी) कव्वे और कला पानी
  5. एस एल भैरप्पा (कन्नड़) द्वारा पर्व
  6. मनोज दास (उड़िया) द्वारा मनोज दसंका कथा ओ कहिनी
  7. गुरदयाल सिंह (पंजाबी) द्वारा मरही दा दिवा
  8. डी. जयकांतन (तमिल) द्वारा सिला नेरंगलिल सिला मणिदरगल
  9. आर विश्वनाथ शास्त्री द्वारा इलू (तेलुगु)
  10. राजिंदर सिंह बेदी द्वारा एक चादर मैली सी (उर्दू)

    उपर्युक्त अनुवादों और प्रकाशनों के अलावा, अकादमी ने कई शीर्षकों को विदेशी भाषाओं में प्रकाशित/अनुवादित किया है। विदेशों में भारतीय साहित्य को बढ़ावा देने के लिए विदेशी भाषाओं में अनूदित भारतीय कृतियों के प्रकाशन हैं:

 

क्रम संख्या

शीर्षक

अनूदित भाषा

  1.  

नबारुन भट्टाचार्य द्वारा हर्बर्ट

जर्मन

  1.  

खुशवंत सिंह द्वारा ट्रेन टू पाकिस्तान या पाकिस्तान मेल

स्वीडिश

  1.  

अंबाई द्वारा कातिल ओरुमान

फ्रेंच

  1.  

भरतला दा नाट्य शास्त्र कपिल वात्स्यायन द्वारा

रूसी

  1.  

भारतीय लघु कथाएँ ई.वी. रामकृष्णन

रूसी

  1.  

कविता

स्लोवेनियन

  1.  

द डुअल ऑफ द हार्ट

अंग्रेजी

  1.  

तेलुगू से अल्लम रजैया द्वारा भूमि

स्पेनिश

  1.  

हिंदी से जूठन वाल्मीकि द्वारा

स्पेनिश

  1.  

बांग्ला से महाश्वेता देवी द्वारा हजार चैरासी माँ

स्पेनिश

  1.  

उर्दू/अंग्रेजी राजिंदर सिंह बेदी द्वारा आई टेक दिस वुमन

स्पेनिश

  1.  

गुजराती/अंग्रेजी से सुरेश जोशी की लघु कथाएँ

स्पेनिश

  1.  

तमिल से सी.एस. चेलप्पा द्वारा वादिवासल

स्पेनिश

  1.  

सैयद अब्दुल मलिक द्वारा सूरजमुखिरस्वप्न

स्पेनिश

  1.  

तमिल से अशोकमित्रन द्वारा 18वां समानांतर

स्पेनिश

  1.  

पाश की 75 कविताएँ

स्पेनिश

  1.  

आई ऑफ गॉड

स्पेनिश

  1.  

कन्नड़ से डी.आर. बेंद्रे की स्पाइडर इन द वेब

स्पेनिश

 यह जानकारी आज राज्यसभा में संस्कृति, पर्यटन और पूर्वोत्तर विकास मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी ने दी।

Saturday, July 18, 2020

मंजुल भारद्वाज की कविताओं ने मोड़ा राजनैतिक बहस का रुख!

Sunday: 28th June 2020 at 8:00 PM to medialink32@gmail.com
 सत्ता और पूंजीवादी व्यवस्था नग्न रूप में सामने आ गए हैं  
अन्न के एक एक दाने को मोहताज हो गई देश की श्रमिक जनता-आखिर कौन है ज़िम्मेदार?
मुंबई: (सायली पावसकर रंगकर्मी//हिंदी स्क्रीन)::
कला के ज़रिये क्रांति को समर्पित मंजुल भारदवाज
आपदा मनुष्य को एक नयी पहचान देती है। आज की विकट स्थिति ने समाज, मानव प्रकृति और व्यवस्था के असली चेहरे को उजागर किया है, ऐसी स्थिति आमतौर पर हमारे सामने नहीं आती और यह दुनिया के इतिहास में पहली बार है (कम से कम मेरे जीवन में मैंने इसे पहली बार देखा और अनुभव किया है) जहां सत्ता, संविधान, व्यवस्था, सामाजिक स्थिति, मानवी प्रवृत्ति के विभिन्न पहलू सामने आ रहें हैं।
आज, पूरे विश्व के सामने प्रकृति में हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप, 'कोरोना' यह आपदा हमारे सामने है।  इस आपदा ने पूरी दुनिया में एक बड़ी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक तबाही का प्रभाव डाला है। यह तबाही बिना किसी भेदभाव के सभी को प्रभावित कर रही है।  जीवन बचाने का संघर्ष सभी का अनवरत जारी है।
उत्पन्न हुई आपदा के कारण समाज में सभी लोग जिम्मेदारी से काम कर रहें हैं।  स्वास्थ्य कर्मी जान बचाने के लिए काम कर रहें हैं। जरूरतमंदों की मदद के लिए सेवार्थी संगठन कार्य कर रहें हैं। लेकिन मौलिक मानवी अधिकारों के लिए कौन लड़ रहा है? जो स्थिति उत्पन्न हुई है, उसकी जड़ में कौन जा रहा है?  उसका निष्पक्ष विश्लेषण कौन कर रहा है?
लेखिका सायली पावसकर रंगकर्मी
किसी आपदा से उभरने के लिए समेकित प्रयास की आवश्यकता है। आज हमारे पास कितना भी धन या विलासिता क्यों न हो, स्वास्थ्य सेवाएं और कल्याणकारी राज्य संस्थाएं बहुमूल्य संसाधन हैं और ऐसी आपदाओं के समय उनकी अपरिहार्यता सिद्ध होती है। आज काल इंसानों पर कहर ढा रहा है, लेकिन इस काल को इंसान ने स्वयं निर्माण किया है।  मानवता को नष्ट करनेवाला यह भूमंडलीकरण का भयावह काल है!
फासीवादी शासन और उनका शासक, लोकतंत्र का भीड़तंत्र में परिवर्तन होना, धार्मिक रंगों के साथ समाज को लगातार विभाजित करती पूंजीवादी दलालों की मीडिया, समाज संवेदनहीन हो रहा है, वहाँ "मानवता" अपनी अंतिम सांसे ले रही है । इन आपदाओं से निपटने के दौरान हमारी व्यवस्था की खामियां हमारे सामने आयी हैं।  अब मुख्य मुद्दा यह है कि क्या इन खामियों को नजरअंदाज किया जाए या उन्हें महत्वपूर्ण बिंदुओं के रूप में प्रस्तुत किया जाए।  इस तरह के और कई मुद्दे सामने आने हैं, लेकिन वे सामने नहीं आ पाते।
ऐसे समय में, कलाकार, रचनाकार, नाटककार और साहित्यकार इनकी विशेष भूमिका है, जहाँ वे अपनी कला को माध्यम बनाते हुए अपने साहित्य रचनाओं के माध्यम से हेतुपूर्ण मौलिक प्रश्न, मौलिक अधिकार और उद्देश्य प्रस्तुत करेंगे। कलासत्व को मानवता के लिए एवं विश्व के सौहार्द के लिए रचनेवाले सृजनकार शाश्वत विचार स्वरूप इस काल से लड़ते हैं । इसी भूमिका के लिए रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज प्रतिबद्ध हैं ।
मज़दूरों के साथ हो रहे इस घातक प्रकरण के बारे में सभी को सहानुभूति है । आज के परिस्थिति में भी मज़दूरों के मुद्दे, उनके प्रश्न विकास के जुमलों में फंसे हैं। पहले ही मजदूरों कि यह हालत, उसपर उनके मौलिक अधिकारों का हनन, इससे यह स्पष्ट होता है कि, मजदूरों का इस यंत्रणा में कोई स्थान नहीं।
इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करता है कि यह बीमारी ऊपरी और मध्यम वर्गों से शोषित-गरीब वर्गों तक फैल गई है।  फिर भी, गरीब और मजदूर, शोषित और पीड़ित हैं।  कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि नव-उदारवादी व्यवस्था में, राजनैतिक क्षेत्र और समाज में श्रमिकों के लिए कोई सहवेदना नहीं बची है।  क्योंकि राजनैतिक कोष होने के बावजूद, मजदूर चलने के लिए मजबूर हैं।  भले ही धान के गोदाम भरे पड़े हैं, फिर भी भुखमरी होती है।  यह भूमंडलीकरण का भयावह सच है।
मंजुल भारद्वाज सर के अंदर बेचैनी थी, उनके अंदर का एक हिस्सा जहां विश्वास था, आस्था थी। उन्होंने इस तबाही में संसद, न्यायपालिका, इनके संवेदनहीनता को महसूस किया।  सत्ता और पूंजीवादी व्यवस्था नग्न रूप में सामने आ गए। लॉकडाउन में प्रगतिशील, बुद्धिजीवी, परिवर्तनवादी, मध्यम वर्ग सभी घर में तालेबंद हैं।  लेकिन ये मजदूर जहां मार्ग दिखा, उस दिशा में चल रहें हैं, तेज धूप में भोजन और पानी के बिना।  क्योंकि वे सरकार की शर्तों पर जीने को तैयार नहीं हैं।  वे जानवरों की तरह नहीं रहना चाहते। वे नए तरीके खोज रहें हैं और यह उनका एक सचेत आंदोलन है।  यह नयी, अनोखी, अलग दृष्टि मंजुल जी की कविता से व्यक्त होती है।
जहां मध्यम वर्ग इस बात पर सहमत था कि थाली और ताली पीट कर, दीये जलाकर सब कुछ पहले जैसे हो जाएगा, वहां सरकार मज़दूरों की पहल से हिल गई। मज़दूरों ने सरकार को जवाबदेही के लिए मजबूर किया।
एकांत की परिधि को भेदते हुए यह कवि अपने जीवित होने का अर्थ तलाश रहा है।  वह मानवीय प्रवृत्ति, यथार्थ, संवेदनाओं, पाखंडी सत्ता और मृत्यु का वर्णन अपनी काव्य रचनाओ में उजागर करता है।
  मंजुल भारद्वाज का एक काव्य अंदाज़ देखिये: अपने ज़िंदा होने पर शर्मिंदा हूँ !
  आजकल मैं श्मशान में हूँ
  कब्रिस्तान में हूँ
 सरकार का मुखिया हत्यारा है
 सरकार हत्यारी है
 अपने नागरिकों को मार रही है
 सरकारी अमला गिद्ध है
 नोंच रहा है मृत लाशों को
 देश का मुखिया गुफ़ा में छिपा है
 भक्त अभी भी कीर्तन कर रहे हैं
 इस त्रासदी पर
देश की सेना पुष्प वर्षा कर रही है
बैंड बजा रही है
मैं हूँ जलाई और दफनाई
लाशें गिन रहा हूँ
रोज़ ज़िंदा होने की
शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ
क्या क्या गुमान था
कोई संविधान था
कोई न्याय का मंदिर था
एक संसद थी
कभी एक लोकतंत्र था
आज सभी मर चुके हैं
ज़िंदा है सिर्फ़ मौत !
मज़दूरों के सत्याग्रह ने जीवन संघर्ष की मशाल जलाई। इसने मृत लोकतंत्र को पुनर्जीवित किया।  आज, उन्होंने अपनी विवशता को अपना हथियार बना लिया है, मौत से लड़ रहें हैं। जीने के लिए, मानवता को जिंदा रखने के लिए! क्रमशः बाकी अगली पोस्ट में
लेखिका:
सायली पावसकर रंगकर्मी
pawaskarsayali31@gmail.com
स्टेज के महारथी मंजुल भरद्वाज से सम्पर्क का ईमेल पता है:Manjul Bhardwaj <etftor@gmail.com> 

Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Sunday, January 12, 2020

शायरी में आज के सवाल उठाती रजनी शर्मा की एक रचना और

Sent: Friday: 10th January 2020:Whats app
दिल को छोड़ कर वह देश से पूछती है-हुआ क्या है!
लुधियाना: 12 जनवरी 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
कभी जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब ने लिखा था--दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है!आखिर  इस दर्द की दवा क्या है! यह ग़ज़ल बहुत मकबूल हुई और फ़िल्मी गीत के रूप में भी सामने आई। इसमें शब्द और संगीत का जो जादू महसूस होता है वह बहुत गहरे तक असर करता है।  यह फैसला करना मुश्किल सा लगता है कि इसके शब्द इस संगीत या इस धुन के लिखे गए या फिर यह धुन या संगीत इन शब्दों के लिए बनाई गई। जनाब गुलाम मोहम्मद साहिब ने इस की धुन बनाते समय जो कमाल दिखाया वह हमारे युग की एक विशेष उपलब्धि है। कितना सुंदर है यह संगीत और यह गीत इसकी विस्तृत चर्चा अलग से भी की गई है। यहां शायद इसका दोहराव भी होता अगर आज के युग की आधुनिक शायरा रजनी शर्मा ने अपनी यह रचना न भेजी होती। आज के हालात में हो रहे हर घटनाक्रम पर शायराना प्रतिक्रिया व्यक्त करने में बहुत अग्रणी है रजनी शर्मा। नवां शहर जैसे प्राकृतिक रंग में रंगे हुए  इलाके में रहने वाली रजनी शर्मा यूं तो अध्यापन के क्षेत्र  है लेकिन उसका अंतर्मन पूरे ब्राह्मण्ड से जुड़ा हुआ है। कहीं भी मानवता पर कुछ आघात जैसा कुछ होता है तो उसका कंम्पन,  उसका दर्द रजनी शर्मा के दिल तक भी पहुंचता है और दिमाग तक भी। इस असहनीय दर्द को झेल कर भी वह चुप नहीं बैठती। खामोश नहीं रहती। सवाल डॉ सवाल उठाती है। पूरी बुलंद आवाज़ से पूछती है। इस रचना में भी उस ने सवाल उठाये हैं। वह पूछती इस पूरे देश से, देश की जनता से और देश के कर्णधारों से। उसके यही सवाल दिल से देश तक की बात करते हैं, दुनिया तक पहुंचते हुए पूरे ब्राह्मण्ड को झंकझोरने का प्रयास करते हैं।  फिर मन के भावों का आवेग हिंदी में उठे या पंजाबी में-वह व्यक्त करके ही रहती है। देखिये उसकी शायरी की एक और झलक। -रेक्टर कथूरिया 
यह मेरे मुल्क को हुआ क्या है। 
क्या बताऊँ के मामला क्या है। 

मज़हबी चालों से उठी आँधी; 
नफ़रतों की यहाँ शिफा क्या है। 

बह रहा है लहू जो सब का तो;
दौर ए हिन्द की सजा क्या है। 

लिखनी है तो ग़ज़ल तू सच पे लिख;
झूठ का फिर ये काफिया क्या है। 

यह जो फ़रमान जारी वहशत के;
ताबो ताकत का ये नशा क्या है। 

मेरी दिवानगी पे हसते हैं;
होश वालों का माजरा क्या है। 

कलियों को यूँ सुलगते देखा तो;
दिल में मेरे ये दिलजला क्या है।                                    

आशिकी से जो ना मिले हम को;
ऐसा भगवान ओ ख़ुदा क्या है। 
                      --रजनी शर्मा

Saturday, May 31, 2014

भारतीय भाषायें लागू करने के लिए एक पत्र मोदी के नाम

 Sat, May 31, 2014 at 9:58 AM
आजादी के 67 साल बाद भी फिरंगी भाषा की दासता शर्मनाक
प्रतिष्ठा में,                                                                                                            30 मई,2014
श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री

भारत  

विषय- आजादी के 67 साल बाद भी देश की व्यवस्था को अंग्रेजी की दासता से मुक्त करके देश में भारतीय भाषायें लागू करने के लिए 
(1)संघ लोकसेवा आयोग (2) सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में जारी अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाने के लिए
-संविधान एवं संसद की देख रेख में चल रहा है भारत में अंग्रेजी का विस्तार
जय हिन्द! मान्यवर, देश की आजादी के 67 साल बाद भी देश, उसी फिरंगी भाषा (अंग्रेजी) की दासता शर्मनाक ढ़ग से जकड़ा हुआ है जिसकी गुलामी से मुुक्ति के लिए देश के लाखों सपूतों ने अपना सर्वस्व बलिदान देते हुए शताब्दियों तक लम्बा ऐतिहासिक संघर्ष किया था। देश के हुक्मरानों की अंग्रेजी दासता के अंध मोह के कारण आज संसार का सबसे बडा लोकतंत्र अपने नाम, अपनी भाषा व अपने इतिहास के साथ साथ लोकशाही के लिए तरस रहा है। आज देश में न्यायपालिका सहित पूरी व्यवस्था में अंग्रेजी का ही राज चल रहा है। देश में सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में ही नहीं संघ लोकसेवा आयोग से लेकर शिक्षा, प्रतिष्ठा व रोजगार पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा की दासता में जकड़ा हुआ है। लोकशाही के नाम पर देश की सवा सौ करोड़ जनता को 15 अगस्त 1947 के बाद बैशर्मी से गूंगा बहरा बना कर लोकशाही व मानवाधिकार का गला ही घोट लिया है।
इसी फिरंगी भाषा की गुलामी से देश को मुक्त कराने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन तीन दशक से अधिक समय से निरंतर संघर्ष कर रहा है। देश की अस्मिता, सम्मान व लोकशाही को अंग्रेजी के अंध मोह में रौंद रहे हुक्मरानों की धृष्ठता को देख कर भारतीय भाषा आंदोलन ने 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर अखण्ड धरना दे कर देश की आजादी को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का ऐतिहासिक आंदोलन शुरू कर रखा है। हमारा साफ मानना है कि भले ही देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजाद हो गया हो परन्तु देश के हुकमरानों के फिरंगी भाषा के प्रति अंध मोह के कारण देश की आजादी आज भी 67 सालों से अंग्रेजी भाषा द्वारा गुलाम बनायी गयी है। पूरे तंत्र में उसी फिरंगी भाषा का राज चलने के कारण आज भी भारत राष्ट्रमण्डल देशों की प्रमुख ब्रिट्रेन की सम्राज्ञी का ही गुलाम बना हुआ है। जिस देश का अपने देश की ीााषा का शासन, न्याय, शिक्षा, रोजगार व सम्मान में राज न हो वह देश गुलामी से बदतर स्वयं भू गुलाम उसी विदेशी भाषा का होता है जिसका राज उस देश में चल रहा होता है।
आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था। उस प्रस्ताव को लागू करने के सवाल पर भारत का शासन एवं प्रशासन हमेशा से स्वयं को बचाता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को लागू करने का मामला हो या सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय में जनता की भाषा में सुनवाई का सवाल हो ! संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ स्वयं संसद ने भी अपने प्रस्ताव को संवैधानिक कारणों के चलते हमेशा दबाने की कोशिश ही की है। दरअसल कारण जो भी हो, डरावने सचों का सामना करने का जिगरा ना भारत की संसद एवं शासन व्यवस्था के पास बचा है और ना ही समाज के पास ! सब अपनी-अपनी सुविधानुसार कामचलाऊ झूठ के सहारे चल रहे हैं । अंग्रेजी का आरक्षण भारत में अनंतकाल तक चलता रहेगा ! यह डरावना सच भारत के संविधान में ही लिख दिया गया था। संविधान के इस भयानक सच पर कभी सीधी बात नहीं होती। क्योंकि संविधान सर्वोपरि है। लिहाजा अंग्रेजी का चक्रव्यूह अब गांवों तक को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। सर्वोच्च न्यायालय एवं संसद भी सर्वोपरि है। इन पर उंगली उठाना गुनाह है। यह डर भी जनता की नसों में उतारा जा चुका है। संविधान-संसद एवं सरकारों की देखरेख में अंग्रेजी की जड़ों को भारत की नसों में गहरे उतारने के साथ-साथ भारत की भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए भी सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर अपनी-अपनी सुविधानुसार ठग-विधाऐं भारत में चल रही हैं । ऐसी ही एक ठग विधा का आयोजन भारत सरकार की तरफ से प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर से शुरू होता है जो दो सप्ताह तक चलता है। इसमें सिर्फ ‘सरकारी ठग’ ही शामिल होते हैं। इस आयोजन के द्वारा अरबों रूपयों के उस फंड का औचित्य सिद्ध किया जाता है जो सरकार में बैठे ‘भाषा आंदोलनकारियों’ पर प्रत्येक वर्ष खर्च किया जा रहा है।
इन ‘सरकारी आंदोलनकारियों’ के प्रयासों के चलते सरकारी विभागों में भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिश पर लगभग 5 वर्ष में एक बार राष्ट्रपति के आदेश जारी करने की भी परम्परा है। परम्परागत राष्ट्रपति के ये आदेश किन रद्दी की टोकरियों के हवाले कर दिये जाते हैं, इसकी फिक्र ना कभी संसद को रही और ना ही राष्ट्रपति भवन को। भाषा के सवालों को लेकर संसद एवं राष्ट्रपति भवन के बीच चलती आ रही इस ठग विधा का यह दूसरा नमूना है। भारतीय भाषाओं के सवाल पर संविधान के बाद, अब तक ठगी एवं झूठ का सबसे बडा उदाहरण स्वयं संसद ने लगभग 45 वर्ष पूर्व 18 जनवरी 1968 को पेश किया था। भारतीय भाषाओं को लागू करने हेतु इस दिन संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था, उसका नाम दिया गया संसदीय संकल्प। वह संकल्प पिछले 45 वर्षों से कभी संसद के बाहर नहीं जा पाया। संसद के ओर संकल्पों की तरह यह संकल्प भी संसद की कैद में दर्ज हो चुका है। भारत में अनंतकाल तक अंग्रेजी के आरक्षण की संवैधानिक किलेबंदी के चलते, आखिर किस आधार पर संसद ने भारतीय भाषाओं को लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया? इस प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति क्या है? संसदीय प्रस्तावों के प्रति स्वयं संसद की जिम्मेदारी एवं जवाबदेही क्या है? भाषायी मुद्दे पर जनता की भावनाओं के साथ पिछले 45 वर्षों से जारी इस संसदीय छल पर किसे कटघरे में खडा करें? और कौन करे? कौन देगा इन सवालों के जवाब?
कुछ ऐसे ही सवालों के उत्तरों की तलाश में, हिन्दुस्तान में अंग्रेजी को बलात थोपने के सबसे बडे़ केन्द,्र संघ लोक सेवा आयोग पर 16 अगस्त 1988 से विश्व के सबसे लम्बे धरने की शुरूआत हुई। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाऐं भारतीय भाषाओं में हो! भाषा आंदोलनकारियों की इस मांग से सहमति जताते हुए 175 संसद सदस्यों ने भी अपने हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह को दिया था। 12 मई 1994 को पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के नेतृत्व में देश के सभी शीर्ष राजनीतिक नेताओं/दलों का सामूहिक धरना संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य द्वार पर दिया गया। इसमें राष्ट्रीय समाचार पत्रों के सम्पादकों, 50 से अधिक संसद सदस्यों, विधायकों, पूर्व राज्यपालों सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया। इसी दिन संसद के दोनों सदनों में सभी दलों ने मुखर होकर भारतीय भाषाओं के सवाल पर अपना पक्ष रखा। लेकिन संविधान के अनुच्छेदों में पद, पैसा एवं प्रतिष्ठा केवल अंग्रेजी वर्ग के लिए आरक्षित कर दिये जाने की किसी ने चर्चा नहीं की। लिहाजा वह भाषायी आक्रोश हमेशा की तरह केवल रस्म अदायगी बन कर रह गया।
विवश होकर भाषा आंदोलनकारियों ने स्वयं संसद में भाषा के सवाल पर देश का ध्यान आकर्षित करने की योजना बनायी। 21 अप्रेल, 1989 एवं 10 जनवरी 1991 को आंदोलनकारी संसद में प्रवेश कर गये। नारेबाजी एवं पर्चे फेंकने की घटना के बीच एक आंदोलनकारी भी दर्शक दीर्घा से नीचे लोक सभा में कूद गया। नतीजा सिर्फ इतना निकला कि वह अपनी पसलियां तुडवाकर दो महीने अस्पताल में रहा और संसद ने 18 जनवरी 1968 के उस बेजान प्रस्ताव को पुनः अगले दिन ध्वनिमत से पारित कर अपने हाथ खडे़ कर दिये। संघ लोक सेवा आयोग पर चल रहे निरंतर धरने को लगभग 14 वर्ष हो चुके थे। इसी बीच अनेक सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से आंदोलनकारियों की सीधी झडपें भी हुई। अनेक विरोध प्रदर्शनों, आमरण अनशन एवं लम्बे धरने से आजीज आकर भारतीय भाषाओं को लागू करने के बजाय, अचानक सरकार की देखरेख में धरने को नेस्तनाबूद कर दिया गया, आंदोलकारियों का सामान, तम्बू आदि उखाडकर फेंक दिये गये। संसद द्वारा पारित प्रस्ताव को लागू करने के लिए चल रहे अनवरत सत्याग्रह को तहस-नहस करने की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही पर किसी भी राजनीतिक दल एवं नेता ने अपना विरोध नहीं जताया। संसद में भाषाओं के सवाल पर मुखर रहने वाले नेताओं ने भी अपने मुंह सिल लिए थे। संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय ने भी सचमुच आंखों पर पट्टी बांध ली थी। अंग्रेजी की इन पट्टियों को सारे हिन्दुस्तानी मिलकर नोंचे! संसद की चैखट पर पुनः ऐसी एक शुरूआत संघ लोक सेवा आयोग के कुछ जिंदा बचे पुराने सत्याग्रहियों ने कर दी है। ताकि संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय जैसे शीर्ष संवैधानिक संस्थानों से भारतीय भाषाओं की बहाली का मार्ग प्रशस्त होकर भारत के गांवों तक जाऐ। हमें आशा है कि आप देश की लोकशाही की हो रही इस दुर्दशा को देख कर शीघ्र ही देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति दिलाने के अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करेंगे ।
संघ लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी का आरक्षण
सर्वोच्च न्यायालय व अधिकांश उच्च न्यायालय की तरह, संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी का आरक्षण बरकरार है। जून 2011 से सिविल सेवा की प्रा. परीक्षा में 22.5 अंक का अंग्रेजी का प्रश्न पत्र अनिवार्य कर दिया गया है, अंग्रेजी एवं किसी एक भारतीय भाषा के अनिवार्य प्रश्नपत्र के अलावा। संसद से लेकर सड़क पर जनप्रतिनिधियों व प्रबुद्ध लोगों ने पुरजोर विरोध किया। इसके बाबजूद अंग्रेजी की सर्वोच्चता व भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का षडयंत्र जारी है। सिविल सेवा के अलावा आयोग द्वारा ली जा रही अन्य अखिल भारतीय सेवाऐं, जिनमें भारतीय भाषाओं को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है-
क्र.सं. परीक्षा माध्यम
1. सम्मिलित चिकित्सा सेवा परीक्षा अंग्रेजी
2. इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा अंग्रेजी
3. भारतीय वन सेवा परीक्षा अंग्रेजी
4. स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस परीक्षा अंग्रेजी
5. भारतीय आर्थिक सेवा अंग्रेजी
6. भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा अंग्रेजी
7. भूविज्ञानी परीक्षा अंग्रेजी
8. सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा अंग्रेजी का 100 अंक का प्रश्न पत्र अनिवार्य
9. राष्ट्रीय रक्षा अकादमी अंग्रेजी का 100 अंक का प्रश्न पत्र अनिवार्य
10. केन्द्रिय पुलिस बल परीक्षा ...........................................
12. अनुभाग अधिकारी परीक्षा ...........................................
नोट- उपरोक्त परीक्षाओं के अलावा अन्य विभागीय परीक्षाओं में भी लिखित एवं साक्षात्कार में केवल अंग्रेजी का माध्यम है।
भारतीय भाषा आंदोलन
डा बलदेव वंशी                   पुष्पेन्द्र चैहान (संयोजक)                        देवसिंह रावत(महासचिव)
                                     दूरभाष- ; 9999590115. ;                          9910145367                          
महेशकांत पाठक (धरना प्रभारी)                                                         देवेन्द्र भगत

Tuesday, August 20, 2013

अब चौरासी कोसी परिक्रमा पर भी चला सरकारी डंडा

                                                                                                                                    Tue, Aug 20, 2013 at 2:35 PM
अयोध्या एक बार फिर से सियासी आग की चपेट में 
लेखक राजीव गुप्ता
संतो की अगुआई और विश्व हिन्दू परिषद के सहयोग से चलने वाली आगामी 25 अगस्त से अयोध्या-क्षेत्र में प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा को उत्तरप्रदेश सरकार ने अनुमति देने से मना कर दिया. जिसके चलते देश भर में  हर जगह उत्तरप्रदेश सरकार के इस रवैये का विरोध हो रहा है. चुनाव के नज़दीक आते-आते शांत रहने वाला अयोध्या एक बार फिर से सियासत की आग की चपेट में आ गया है. उत्तरप्रदेश के प्रमुख गृहसचिव आरएम श्रीवास्तव के अनुसार अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को चैत्र पूर्णिमा से बैशाख पूर्णिमा तक (25 अप्रैल- 20 मई) पारंपरिक तरीके से इस वर्ष में संपन्न करवा दिया गया है तो इसका क्या यह अर्थ लगाया जाय कि अब इस वर्ष कोई भी अयोध्या की चौरासी-कोसी परिक्रमा नही कर सकता ? क्या शासन व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं पर भी नियंत्रण करेगा ? सौभाग्य से मेरा जन्म अयोध्या के चौरासी कोसी परिक्रमा क्षेत्र के समीप ही हुआ है और हम अपनी-अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं के अनुरूप बचपन में वर्ष में दो-तीन बार भी अयोध्या जी की चौरासी-कोसी परिक्रमा करते थे. अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा का अनुष्ठान अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार वर्षभर में कोई भी, कभी भी और कई बार भी कर सकता है. संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता के चलते प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार दिया है और सत्ता की यह जवाबदेही होती है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन न होने दे. इसके लिए ही देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने हेतु केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने अर्द्धसैनिक बलों का गठन किया गया है.

उत्तरप्रदेश सरकार का यह तर्क गले नही उतरता है कि उसे इस प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा से अगर राज्य में कानून व्यवस्था भंग होने का अन्देशा है. अगर राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने हेतु उसके पास पी.ए.सी के जवान कम पड रहे है तो वह अन्य राज्यों अथवा केन्द्र से अधिक संख्या में अर्द्धसैनिकों की मांग कर सकती है. अगर उत्तरप्रदेश सरकार अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए इस विषय पर स्थानीय स्तर पर ही संभाल लेती तो इस विषय का समाधान वही हो जाता और इसका सीधा असर उसकी छवि पर भी पडता. सरकार के इस रवैये के चलते किसी भी समुदाय के लोगों को किसी भी प्रकार की आपत्ति नही होती साथ ही समाज़-सत्ता के टकराव को भी रोका जा सकता है. परंतु उत्तरप्रदेश सरकार ने ऐसा न करके अब इस विषय को देशव्यापी बनाते हुए इसका राजनीतिकरण कर दिया है. जिसके फलस्वरूप उत्तरप्रदेश सरकार के इस तानाशाही रवैये के चलते देश की कानून-व्यवस्था ही दांव पर लग गई है. अत: अब देश की कानून – व्यवस्था भंग न हो इसके लिए केन्द्र सरकार को अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उत्तरप्रदेश सरकार को यह आश्वासन देते हुए कि उसे पर्याप्त संख्या में अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध करवाये जायेंगे, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जनित उसके इस तनावपूर्ण फैसले पर हस्तक्षेप करते हुए उसे अपने फैसले को वापस लेने के लिये बाध्य करे. ताकि देश में तनाव बढने की बजाय एक सकारात्मक सन्देश जाए.

उत्तरप्रदेश सरकार ने विहिप की प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा पर अब तक चली आ रही चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर नई परंपरा डालने का आरोप लगाया. दरअसल इसी विषय पर अपना मत स्पष्ट करने हेतु ही संतो की अगुआई में अशोक सिंहल समेत एक दल मुलायम सिंह यादव से 10 अगस्त को मिला था और मुलायम सिंह यादव ने उन्हे इस चौरासी कोसी परिक्रमा के अनुष्ठान को पूर्ण करने की मौखिक स्वीकृति भी दी थी. वास्तव में यह विवाद बारबंकी के टिकैतपुर से लेकर गोंडा तक के कुछ किमी. तक नये मार्ग को लेकर है. ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान समय में सरयू नदी का जलस्तर बढ जाता है जिससे सरयू नदी को नाव की सहायता से पार करना संभव नही है. इसलिये विहिप ने एक विकल्प के रूप में नया मार्ग चुना. अगर उत्तरप्रदेश सरकार को विहिप के इस वैकल्पिक नये मार्ग से कुछ परेशानी है तो इस बारे में विहिप ने लचीला रूख अपनाया है. उत्तरप्रदेश सरकार को बजाय चौरासी कोसी परिक्रमा रोकने के विहिप को संवाद हेतु आमंत्रित कर इस समस्या का हल ढूंढना चाहिए.

अगर यह टकराव जल्दी ही नही खत्म नही हुआ तो अयोध्या की इस चौरासी कोसी परिक्रमा का भी राजनीतिकरण होना तय है. जिसका असर आने वाले चुनावों पर भी पडेगा. उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उठाये गये इस तानाशाही कदम से विशुद्ध रूप से राजनैतिक कदम है क्योंकि इस टकराहट से हिन्दू और मुस्लिम वोंटो का जबरदस्त ध्रुवीकरण होगा. जिसका लाभ भाजपा और सपा दोनो ही दल उठायेंगे. भाजपा बहुसंख्यंको को रिझाने का प्रयास करेगी और सपा अल्पसंख्यकों पर डोरे डालेगी. इससे पहले भी अयोध्या का राजनीतिकरण हो चुका है. ध्यान देने योग्य है कि मुलायम सिंह यादव जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन्होने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था तबसे लेकर आजतक बहुसंख्यक समाज मुलायम के साथ मन से नही जुड पाया है. लोग कुछ इसी तरह भाजपा पर भी विश्वासघात का आरोप लगाते है. वे तर्क देते है कि भाजपा राममन्दिर निर्माण के मुद्दे पर ही सत्ता में आयी थी और सत्ता में आते ही उसने सबसे पहले अपने एजेंडे में से राममन्दिर-निर्माण के मुद्दे को ही निकाल दिया. यहाँ यह स्पष्ट होना चाहिए कि भाजपा के एजेंडे में आज भी राममन्दिर – निर्माण का विषय है. अटल जी की अगुआई में सरकार एनडीए की बनी थी न कि भाजपा की. भाजपा ने देश को स्थायी सरकार देने हेतु ही एनडीए का गठन किया था. एनडीए गठन के समय यह तय किया गया था कि अगर विवादित विषय धारा 370, राम-मन्दिर निर्माण जैसे विषयों को अलग कर दिया जाय तो देश को एक स्थायी सरकार मिल सकती है. इसी को ध्यान रखते हुए भाजपा ने सभी विषयों को यथावत अपने एजेंडे मे ही रखा और एनडीए के एजेंडे में से सभी विवादित विषयों को हटा दिया था. जिसके चलते लोग आज भी भाजपा पर विश्वासघात का आरोप लगाते है. अयोध्या में राममन्दिर निर्माण का विषय इस समय देश की सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है. अत: आस्था के इस विषय पर राजनीति करने का अधिकार किसी भी राजनैतिक दल को नही है. राममन्दिर निर्माण के नाम पर देश का ध्यान भटकाने की अपेक्षा उत्तरप्रदेश सरकार जल्दी से जल्दी अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा पर अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे. क्योंकि समाज-सत्ता का टकराव किसी भी सूरत में देश-हित के लिए ठीक नही होता और दोनो पक्षों को टकराव की बजाय आपस में संवाद कर  इस समस्या का हल  निकालना चाहिये.        -राजीव गुप्ता, 09811558925

Monday, August 19, 2013

रक्षा बंधन पर राष्‍ट्रपति की शुभकामनाएं

19-अगस्त-2013 16:33 IST
समाज का प्रत्‍येक सदस्‍य इस त्‍यौहार पर महिलाओं के लिए सम्‍मान की भावना अपनाये
Courtesy Photo
राष्‍ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने रक्षा बंधन के अवसर पर अपने संदेश में देशवासियों को शुभकामनाएँ दी है। उन्‍होंने अपने संदेश में कहा है कि रक्षा बंधन का त्‍यौहार भाई-बहन के बीच विश्‍वास, प्‍यार और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्‍होंने कहा कि यह हमारे लिए महिलाओं खासकर लड़कियों के कल्‍याण के प्रति समर्पित होने का अवसर है। उन्‍होंने कहा कि महिलाओं को सुरक्षित और सौहार्दपूर्ण वातावरण उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए ताकि, उनकी प्रतिभा विकसित हो और वे राष्‍ट्र निर्माण में पूरी भागीदारी कर सके। राष्‍ट्रपति ने कहा कि महिलाओं के सम्‍मान के लिए पारंपरिक सांस्‍कृतिक मूल्‍यों को ध्‍यान में रखा जाना चाहिए। 

राष्‍ट्रपति ने आशा व्‍यक्‍त की कि समाज का प्रत्‍येक सदस्‍य इस त्‍यौहार पर महिलाओं के लिए सम्‍मान की भावना अपनायेगा। 

वि.कासोटिया/इ. अहमद/गांधी/सुमन- 5678

Saturday, August 10, 2013

आधी सदी में भारत ने खो दी अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ

1961 में बोली जाती थीं भारत में 1100 भाषाएँ 
                                                     Photo: EPA
मामला बेहद गंभीर है और इसकी खबर दी है रेडियो रूस ने जिसका शीर्षक है-आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त। रेडिओ ने पूरी ज़िम्मेदारी से तथ्यों का हवाला देते हुए बताया है कि भारत के एक शोध संस्थान 'भाषा' जिसे 'भाषा शोध एवं प्रकाशन केन्द्र' भी कहा जाता है, के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आधी सदी में भारत ने अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ खो दी हैं।
इस क्षेत्र के एक शोधकर्ता गणेश देवी के अनुसार, सन् 1961 में भारत में 1100 भाषाएँ बोली जाती थीं लेकिन अब उनमें से 220 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। ये भाषाएँ सपेरों, ज्योतिषियों, स्वदेशी चिकित्सकों द्वारा बोली जाती थीं। भारत की 3-4 प्रतिशत जनसंख्या, यानी लगभग पाँच करोड़ लोग ऐसी भाषाएँ बोल सकते थे।
भारत में दो भाषाओं, हिन्दी और अंग्रेज़ी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है जबकि 22 अन्य भाषाओं का देश के राज्यों में सरकारी भाषा के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त