Monday, February 13, 2023

ताज़ा ग़ज़ल//विजय तिवारी ‘विजय’

Sunday 12th February 2023 at 01:16 PM

जिसमें मिलेगी अतीत और आज की झलक 


लुधियाना12 फरवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां शिक्षा और साहित्य से जुड़े बहुत से लोग रहते हैं। बुलंद आवाज़ लेकिन बहुत ही सलीके से सच कहने वाले इन लोगों से मिल कर, इनका कलाम पढ़ कर लगता है जैसे भोपाल के जलवायु में ही कोई ऐसा जादू है जो कलम में इंकलाब ले आता है। वहां भोपाल जा कर इन लोगों के जनजीवन को नज़दीक से देखने का मन भी अक्सर होता है और कुछ समय इनके पास रहने का भी। बहुत ही गहरी बातें बहुत ही सादगी से कह जाते हैं ये लोग। कलम और कलाम की दुनिया में इनका कद बहुत ऊंचा ही बना रहता है इसके बावजूद मिलने वालों को इनकी विनम्रता और स्नेह हमेशां के लिए  अपना भी बना लेते हैं ये लोग। विजय तिवारी विजय  लम्बे समय से बहुत ही सादगी से बहुत ही गहरी बातों की शायरी  करते आ रहे हैं। उनकी शायरी सियासत की साज़िशों की बात भी करती है और जी टी रोड पर जीने को तरसती ज़िंदगी की बात भी। देखिए उनकी एक ग़ज़ल की झलक। आज के महाभारत में घिरे अभिमन्यु की चर्चा भी आपको इसी शायरी में मिलेगी और इसके साथ ही हिंदी की मधुरता और उर्दू की मिठास को एक दुसरे के नज़दीक लाने का ज़ोरदार प्रयास भी। मुशायरा कहीं भी हो उनकी हाज़री उसमें चार चाँद लगा देती है। उनकी कोशिश भी होती है कि निमंत्रण मिलने पर शामिल भी ज़रूर हुआ जाए। इसके बावजूद कभी कभी कोई मजबूरी आन ही पड़ती है तो उनके चाहने वाले उदास हो जाते हैं। आपको उनकी शायरी कैस लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही।  --रेक्टर कथूरिया 

कितनी मुश्किल से कटा दिन होश के मारों के बीच। 

शाम ए ग़म का शुक्रिया ले आई मयख़ारों के बीच ...


क्या कभी देखा है वो ग़ुब्बारा ग़ुब्बारों के बीच। 

पेट की ख़ातिर भटकता दौड़ता कारों के बीच...


रिंद ओ साक़ी जाम ओ पैमाना तलबगारों के बीच। 

आ गये सब ग़म के मारे अपने ग़मख़्वारों के बीच... 


चीख़ता ही रह गया मैं अम्न हूँ मैं अम्न हूँ। 

दब गई आवाज़ मेरी मज़हबी नारों के बीच...


बार ए ग़म से लड़खड़ाकर क्या गिरा मस्जिद में आज । 

यूँ घिरा जैसे शराबी कोई दींदारों के बीच...


मौसम ए तन्हाई में बहते हैं आँसू इस क़दर। 

दस्त में बहता हो जैसे झरना कुहसारों के बीच...


बज़्म ए जानाँ में मुझे देखा गया कुछ इस तरह। 

जैसे कोई ग़म का नग़मा कहकहाज़ारों के बीच...


या ख़ुदा अहल ए अदब में यूँ रहे मेरा वुजूद। 

एक जुगनू आसमाँ पर चाँद और तारों के बीच...


एक अभिमन्यु घिरा फिर धर्म संसद में ‘विजय’

रिश्तेदारों चाटुकारों और सियहकारों के बीच

                           ----विजय तिवारी ‘विजय’

चलते चलते विजय साहिब का ही एक और शेयर:

किसी के इश्क में दुनिया लुटा कर

सुखनवर हो गए हैं कुल मिलाकर! 

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Wednesday, February 1, 2023

इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती ने किया विशेष आयोजन

01st February 2023 at 2:45 PM WhatsApp  

डाक्टर पूनम माटिया भी विशेष तौर पर शामिल हुईं 


गाज़ियाबाद: 1 फरवरी 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

डाक्टर पूनम माटिया जी जैसी साहित्यिक शख्सियत जहां भी हों वहां साहित्य के फूल निरंतर खिलते रहते हैं। केवल किसी एक इलाके में ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी साहित्य की सुगंध निरंतर महसूस होने लगती है। हिंदी स्क्रीन के लिए प्राप्त हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस कार्यक्रम की हम चर्चा कर रहे हैं यह आयोजन गत  दिनों 28 जनवरी 2023 दिन शनिवार को चन्द्रनगर क्लब में हुआ। प्रबंधकों के सफल प्रबंध के कारण यह एक यादगारी आयोजन बन पाया। 

इसी कार्यक्रम में लेखक बीरसैन जैन सरल की पुस्तक "सरल काव्य मंजूषा" का लोकार्पण भी हुआ। पुस्तक विमोचन के सुअवसर पर कवि सम्मेलन भी किया गया। इस मुशायरे में जिसमें वरिष्ठ गीतकार रामचरण साथी के संचालन में हास्य कवि सुनहरी लाल तुरन्त, गीतकार कवि इन्द्रजीत सुकुमार, पूनम माटिया, राजेन्द्र प्रसाद राजन ने श्रैत्र के श्रौताओ का अपनी कविताओं से खूब मनोरंजन किया। बीरसैन सरल ने भी अपनी "आज बचपन की याद बहुत आती है" कविता सुनाकर श्रोताओं को बचपन की यादों में खो जाने को मजबूर कर दिया संस्था के महामंत्री अखिलेश कुलश्रेष्ठ ने समापन पर विशेष अतिथि श्री श्री भगवान अग्रवाल निगम पार्षद, सभा के अध्यक्ष मनोज कुमार शर्मा, प्रवीण आर्या, मंच संचालन गीतकार रामचरण साथी, अन्य सभी कवियों का आभार प्रकट किया।

इस सुअवसर पर विशेष तौर पर शामिल हुईं जानीमानी शायरा डाक्टर पूनम माटिया की मौजूदगी अपने आप में बहुत यादगारी रहीं। डा पूनम माटिया वही शायरा हैं जिन्होंने दशकों पहले काव्य साधना शुरू की थी। उनकी पुस्तकों  की चर्चा साहित्यिक क्षेत्रों में अक्सर होती रहती है। हिंदी के साथ साथ अंग्रेज़ी और पंजाबी में भी उनके बारे में लिखा जाता। 

आजकल अपने अनुभव का खज़ाना वह फिर से साहित्य प्रेमियों में बाँट रही हैं। 

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Tuesday, January 31, 2023

बेटियों के जन्म के बधाई गीत लेखन सहित 4 प्रतियोगिताओं की घोषणा

 Monday 30th January 2023 at 04:54 PM

प्रविष्टयां: अंतिम तिथि 20 फरवरी//सरोकार समूह का आयोजन


भोपाल
: 30 जनवरी 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

 एक बच्ची के साथ कुमुद सिंह 
न किसी सरकार से कोई गिला और न ही किसी समाज से कोई शिकायत; बस केवल खुद की कोशिशों के दम पर समाज को बदलने के ज़ोरदार प्रयास। कुमुद सिंह एक पारस की तरह हैं जो भी मिले वह सोना बन जाता है। असली सोने से भी खरे सोने जैसा सच्चा इंसान। इसी तरह बना है कुमुद सिंह जी का विशाल काफिला जो कहता है-जीत ही लेंगें बाज़ी हम तुम खेल अधूरा छूटे न!

पहली मुलाकात में ही चुंबक जैसी शख्सियत की तरह अपना बना लेने वाली कुमुद सिंह के शब्दों में भी बहुत दम होता है और अंदाज़ क्यूंकि उनकी आवाज़ नफा  नुकसान वाले कारोबारी दिल और दिमाग से नहीं आती बल्कि समाज को बदलने वाले उस जनून वाले दिल दिमाग से आती है जिसने सिर्फ एक बात पल्ले बाँधी हुई है कि बाकियों को छोडो हम क्या कर सकते हैं। इसी कोशिश ने उनकी आवाज़ में वह असर पैदा किया है कि उनसे मिल कर उनके विरोधी भी उनकी तरह सोचने लगते हैं। अब उन्होंने एक और नई ज़ोरदार कोशिश की घोषणा की है जिससे समाज को कुछ अक्ल आ सकेगी और इसमें सुधर भी होगा। बच्चियों को बोझ समझने वाले इस नासमझ समाज को बच्चियों की खूबियों का पता चल सकेगा। 

लैंगिक समानता आधारित समाज की रचना के उद्देश्य से अपने अभियान की श्रंखला में सामाजिक संगठन सरोकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर चार प्रतियोगिताओं की घोषणा की गई है. बेटियों के जन्म के बधाई गीत लेखन की राष्ट्रस्तरीय प्रतियोगिता के साथ ही निबंध लेखन, रील बनाओ, फोटोग्राफी की राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए भी प्रविष्टयां आमंत्रित की गई हैं. प्रतियोगिताओं  में शामिल होने के लिए  प्रविष्टयां भेजने की अंतिम तिथि 20 फरवरी 2023 है. प्रतियोगिताओं के विजेताओं को आकर्षक पुरस्कारों और प्रमाणपत्र के अलावा सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए जाएंगे। 


सरोकार समूह की सचिव कुमुद सिंह ने बताया कि
सभी प्रतियोगिताएं राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जा रही हैं, जिनके नियम और शर्तें तय कर दी गई हैं. बेटियों के जन्म के बधाई गीतों को छोड़कर निबंध लेखन का विषय ‘लैंगिक समानता आधारित दुनिया की रचना मेरी भूमिका”  है और शब्द सीमा अधिकतम 800 शब्द रखी गई है. रील बनाओ प्रतियोगिता का विषय ‘एक जेंडर समावेशी दुनिया’ (a gender inclusive world) है और अवधि 1 मिनट रखी गई है. राष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता का विषय ‘ एक जेंडर न्यूट्रल दुनिया कैसी दिखेगी’ ऱखी गई है. प्रतिभागी अपनी प्रविष्टयां एक या उससे अधिक भी भेज सकते हैं. सभी रचनाएं, रील और फोटो प्रामाणिक और मौलिक होना चाहिए. प्रविष्टयां sarokarcompetition@gmail.com या व्हाट्सएप नंबर-9926311225, 7566874989, 8319269297 पर भेजी जा सकती हैं. पीडीएफ अथवा जेपीजी और फोटो जेपीजी फार्मेट में स्वीकार की जाएंगी.

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Wednesday, January 25, 2023

अंतस् की 42 वीं गोष्ठी//दो काव्य-पुस्तकों का विमोचन

Wednesday 25th January 2023 at 01:02 PM

'अभी तो सागर शेष है..' और मन की गली (पार्ट 2) लोकार्पित हुए 


नई दिल्ली
: 21 जनवरी 2023: (
हिंदी स्क्रीन ब्यूरो):: 

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव काल में तथा गणतंत्र दिवस और वसंत उत्सव के माहौल में आयोजित अंतस् की 42 वीं गोष्ठी काव्य के विभिन्न रसों और विधाओं में उत्कृष्ट, मनहर अभिव्यक्तियों से आच्छादित रही।

इस गोष्ठी की अध्यक्षता की डॉ आदेश त्यागी ने। आर डब्ल्यू ए, विवेक विहार, दिल्ली के प्रधान श्री आनंद गोयल  के सान्निध्य में उन्ही के निवास स्थान पर आयोजित इस गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में श्री देवेंद्र गिरी (प्रधान ए ब्लॉक) अति विशिष्ट अतिथि श्री शिव कुमार गुप्ता (प्रधान, बाला जी मंदिर) ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से ऊर्जा प्रदान की।

बतौर विशिष्ट अतिथि डॉ तारा गुप्ता ने शिरकत की।

अनुशासित एवं रोचक संचालन  पूनम माटिया का रहा।

श्रीमती अंशु जैन और श्रीमती सुनीता अग्रवाल के श्रेष्ठ संयोजन में आयोजित इस नवरस गोष्ठी में वागीश्वरी के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन के उपरांत वाणी-वंदना अपने सुमधुर स्वर में प्रस्तुत की डॉ ममता वार्ष्णेय ने।

स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत किया श्री देवेंद्र प्रसाद सिंह ने।

श्रेष्ठ काव्य प्रस्तुत किया डॉ आदेश त्यागी, डॉ तारा गुप्ता, डॉ ममता वार्ष्णेय, डॉ पूनम माटिया, श्री सत्येंद्र जैन सरस, श्री रजनीश त्यागी राज, डॉ नीलम वर्मा, श्री देवेंद्र प्रसाद सिंह, श्री विनयशील चतुर्वेदी, श्री सुरेशपाल वर्मा जसाला और श्रीमती अनुपमा पांडेय भारतीय ने।

काव्य पाठ की सरस धारा के अतिरिक्त इस गोष्ठी की विशेषता रहा दो काव्य-पुस्तकों का मंचासीन द्वारा विमोचन।

पूनम माटिया कृत 'अभी तो सागर शेष है..' द्वितीय परिष्कृत संस्करण

 तथा 

श्रीमती सुनीता अग्रवाल द्वारा लिखित -मन की गली(पार्ट 2) लोकार्पित हुए।

विशेष उद्बोधनों के क्रम में    मंचासीन अतिथियों द्वारा सभा को संबोधित किया गया तथा श्रीमती पूजा गोयल ने रोचक कविता का  पाठ किया।

सुधि और सहृदय श्रोताओं के रूप में उपस्थित अनेक गणमान्य व्यक्तियों में  श्री नरेश माटिया, श्री निर्मल जैन, श्रीमती पूजा गोयल, श्रीमती राजरानी गुप्ता, श्रीमती ऋतु भाटिया, श्री मनोज शर्मा, श्रीमती सुमन राजदान और श्रीमती बिमला शर्मा शामिल रहे।

अंत में औपचारिक रूप से सभी को श्रीमती अंशु जैन ने सभी की उपस्थिति और काव्यात्मक समिधा हेतु धन्यवाद ज्ञापित किया।

जन-गण-मन के सामूहिक गान के बाद स्वादिष्ट जलपान का सभी ने आनंद लिया। श्री आनंद गोयल जी के नवजात पौत्र की ख़ुशी में ग़ज़ब रसगुल्लों के साथ समाप्त हुई यह अविस्मरणीय गोष्ठी।

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Monday, January 16, 2023

लगातार लोकप्रिय हो रहा है नीलिमा शर्मा का कहानी संग्रह कोई ख़ुशबू उदास करती

Monday: 16th January 2023 at 11:46 AM 

भोपाल में राधा अवधेश स्मृति कथासम्मान से सम्मानित भी किया गया


भोपाल
: 16 जनवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::

हिन्दी साहित्य से स्नेह रखने वाले सभी लोगों को यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता होगी कि जानीमानी लेखिका नीलिमा शर्मा का कहानी संकलन लगातार लोकप्रिय होता जा रहा है। कल भोपाल में विश्व मैत्री संघ में  कहानी संग्रह कोई ख़ुशबू उदास करती है पुस्तक के लिए नीलिमा शर्मा को राधा अवधेश स्मृति कथासम्मान से सम्मानित किया गया। आयोजन में बहुत से गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। 

यह कार्यक्रम भोपाल में श्यामला हिल्स पर राजीव सभागार मे आयोजित किया गया था। इस समारोह में  कई लोगो को उनके साहित्य समाज मे योगदान के लिए सम्मानित किया गया। वहां पर उनकी कहानी  "टुकड़ा टुकड़ा ज़िंदगी" का कहानी पाठ भी किया गया।

इस कहानी का शशि बंसल जी ने  प्रभावशाली तरीके  से  पाठ किया।  यह कहानी कोरोनाकाल  में लॉकडाउन के समय घर मे कैद  एक सहायिका की मनोस्तिथि  एवं जिजीविषा की कहानी  है। इस कहानी  को मौजूद श्रोताओं द्वारा बहुत सराहा गया। इस कहानी में कोरोनाकाल के उस नाज़ुक दौर में इसका सामना करने वाले लोगों की मानसिक स्थिति और अन्य कठिनाइयों का भी गहन विश्लेषण जैसा प्रस्तुतिकरण है।

इस समारोह में उनके अलावा हरि भटनागर जी एवं  हरीश पाठक जी ने भी अपनी कहानियों का पाठ किया। विश्व मैत्री संस्था की अध्यक्ष सन्तोष श्रीवास्तव जी  ने बहुत कुशलता एवं मनोयोग से इस कार्यक्रम को सम्पन्न कराया। इसके लिए वह बधाई की पात्र है। 

इस मौके पर भोपाल शहर के विभिन्न साहित्यकारों के अलावा अन्य शहरों से आये साहित्यकार भी मौजूद थे। 

नीलिमा शर्मा का यह पहला कहानी संग्रह है। इसमें स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित 11 कहानियों को संग्रहित किया गया है। 

स्त्रीमन के विभिन्न कोनों की पड़ताल करती यह कहानियाँ सचमुच बेहतरीन हैं। नीलिमा शर्मा ने  इसके पहले आठ कहानी संग्रहों का संपादन एवं सहलेखन किया है। उनकी  कहानियों का उर्दू, पंजाबी, इंग्लिश, बंगला और जापानी भाषा मे भी अनुवाद हो चुका है।  उनके कहानी संग्रह कोई ख़ुशबू उदास करती  है का पंजाबी वर्जन भी जल्द ही प्रकाशित होगा।

पुरस्कार में शाल श्रीफल पुष्प सम्मानपट्ट के साथ5100  की नकद राशि दी गयी है ।

Monday, August 15, 2022

चल अकेला गाते गाते चले गए डाक्टर भारत

उनके बिन सब मेले सूने हो गए


लुधियाना
: 14 अगस्त 2022: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::

कल फिर आ रही है 15 अगस्त की तारीख। स्वतंत्रता दिवस के आयोजन कल भी होंगें। कल फिर फहराए जाएंगे तिरंगे लेकिन डाक्टर भारत के बिन सब सूना लगेगा कल भी। वह इस बरस भी नज़र नहीं आएंगे। उन्होंने पूरी उम्र होश संभालते ही स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आयोजन मनाने शुरू कर दिए थे। हम लोग कई बरसों से इस आयोजन को लुधियाना के सिविल लाईन्स इलाके में स्थित न्यू कुंदनपुरी इलाके में देख रहे थे। इसके इलावा अयोध्या, फैज़ाबाद, आज़मगढ़, दिल्ली, मुंबई, भोपाल और कई अन्य जगहों पर भी भी डाक्टर भारत एफ आई बी के बैनर तले इस तरह के आयोजन करवाते रहे। इस बार भी उनकी अनुपस्थिति खटकती रहेगी। प्रस्तुत हैं सबसे पहले उनकी स्मृति में कुछ पंक्तियां: 

डाक्टर भारत ने झंडा उठाया था यह! 

उम्र भर हां तिरंगा झुलाया था यह!

आखिरी साँस तक वह समर्पित रहे! 

इसी की बात की, इस पर लड़ते रहे!

अपनी हर सांस इस पर न्योछावर करी!

अपनी पूरी उम्र इस के ही नाम की!

इन्हीं गलियों में झंडा फहराया था यह!

साल में दो समागम उन्हीं के तो थे!

साल में ये दो मेले उन्हीं के तो थे!

देश भक्ति के गीत वो गाते रहे!

देशभक्ति की बातें जगाते रहे!

सबसे मिलते रहे और मिलाते रहे!

झंडा ऊंचा रहे ये ही गाते रहे!

हर एक घर में तिरंगा पहुँचाया था यह!

ज़िंदगी भर वो खुद मुश्किलों में रहे!

फिर भी हंसते रहे, मुस्कराते रहे!

देश भक्ति के मेले लगाते रहे!

देश भक्ति की महफिल सजाते रहे!

चाय समोसों के लंगर लगाते रहे!

देश भक्ति के नारे लगाते रहे!

देश भक्ति का मकसद जगाया था यह!

उनके बिन आज सूनी न्यू कुंदनपुरी!

उनके बिन आज वैसी कोई महफिल नहीं!

न वो तंबू. कनातें, न वो कुर्सियां, 

उनके बिन आज गीतों की महफिल नहीं!

खो गए रूठ कर हमसे जाने कहां!

वो तिरंगा न जाने किसे दे गए!

उनके बिन कैसा मौसम अब आया है यह!

15 अगस्त 2018 को स्वतंत्रता दिवस पर जो आयोजन हुआ वह भी यादगारी था। डाक्टर भारत की सहयोगी टीम में सोनू शर्मा और उनके साथी राजू बंगा और दुसरे नौजवान पूरी तरह सक्रिय थे। बेलन ब्रिगेड की अनीता शर्मा भी विशेष तौर पर उस आयोजन में आईं। भाजपा की महिला नेत्री सुधा खन्ना ने विशेष हाज़िरी लगवाई। कांग्रेस के पार्षद डाक्टर जय प्रकाश भी पहुंचे थे। पड़ोस के ही लोकप्रिय डाक्टर राज गिल्होत्रा हमेशां इस तरह के आयोजनों में सक्रिय रह कर काम करवाते लेकिन खुद परदे के पीछे बने रहते। उस समय भी डाक्टर भारत की रहनुमाई में चलने वाले जानेमाने संगठन FIB ने कहा था कि सियासत से ऊपर उठ कर तिरंगे से जुड़ा भी जाए और सभी को जोड़ा भी जाए। वो कितना पहले सक्रिय थे तिरंगे  को घर घर ले जाने के लिए। 

कभी कभी जुबां पर शिकवा शिकयत भी आता है। डाक्टर साहिब आपके बिन कौन है यहाँ---बहुत जल्दी कर दी आप ने जाने में। कितनी लम्बी योजनाएं बना लीं थी।  क्या बनेगा अब उन योजनाओं का? उन पर काम भी शुरू था लेकिन आप अचानक हम सभी से रूठ गए।  आखिर ऐसा भी क्या हुआ था? काश उस दुनिया में कोई फोन मिल जाता या उस दुनिया का कुछ पता मिल जाता। लेकिन नामुमकिन जैसा ही है सब। बस अब उनकी बातें ही याद रह गयीं। वो भी बहुत कम लोग ही कर पाते हैं। जो बातें आप ने बतायीं थी उन्हें जल्द ही कलम से सबके सामने लाना भी है। अफ़सोस जिन्होंने चाईना गेट वाली टीम में हर सहयोग का वायदा किया था वही लोग डाक्टर साहिब के जाते ही बदल गए। और और मामलों में उलझ गए। शायद यही है दुनिया। 

उनकी पुरानी तस्वीरें अक्सर सामने आ जाती हैं तो बहुत सी पुरानी याद भी दिलाती हैं। उस दौर को एक बार तो फिर से जीवंत कर देती हैं ये तस्वीरें। हर तस्वीर बहुत कुछ याद दिला देती है--

तिरंगा हमेशां ऊंचा रहे-डाक्टर भारत राम का मकसद था यह और जीवन भर रहा। उसमें कभी उन्होंने समझौता न किया।  तिरंगे की बात आती तो वह पूरी तरह अड़ जाते। उनके लिए सबसे ऊपर था तिरंगा। 

देश हमेशां सुरक्षित हाथों में रहे उनका मिशन भी रहा। उनके स्रोत और साधन सीमित थे। फिर भी वह जासूसी में काम आने वाले सामान मंगवाते रहते। छुपे हुए कैमरे उनके पास अक्सर रहते जिन्हें उन्होंने अपनी टीम के ख़ास लोगों में बांटा भी था किसी न किस खास मिशन के लिए। अगर किसी को किसी ख़ास ख़ुफ़िया मिशन पर भेजते तो खतरों का पूरा आकलन करते। छुपे रह कर एक एक्स्ट्रा टीम ले कर उसके पीछे पीछे या आसपास रहते। अपने किसी जासूस या टीम को कभी खतरे में न पड़ने देते। कभी कभी तो हम हैरान रह जाते जिस जिस की डयूटी लगाई होती उसे आगाह करते हुए कहते आज घर परिवार के साथ जहाँ जा रहे हो वहां का प्रोग्राम रद्द कर दो। खतरा है वहां। इस तरह अपने लोगों को बचा भी लेते। डाक्टर भारत को किसी का पारिवारिक प्रोग्राम कैसे पता चलता थे यह आज भी रहस्य है। 

देश भक्ति डाक्टर भारत राम  की रग रग में रची हुई थी। बहुत सी देश विरोधी वारदातों को उन्होंने समझ से पहले सूंघ लें और फिर झट से इसकी सूचना सुरक्षा तंत्र को भी देनी। आतंकी खतरों से जगह करके बहुत सी जानें बचाई। कभी कभी आतंकी लोग भी आ जाते कि जो लेना है लो लेकिन हमारे कामों में टांग मत अड़ाओ। डाक्टर भारत सब कुछ नकार देते। उल्टा उन्हें कहते जो करना है करो लेकिन निर्दोषों का खून मत बहाओ। मेरे देश की तरफ आंख उठा कर मत देखो। मैं तिरंगे के दुश्मनों से कोई समझौता नहीं कर सकता। कभी कभी तो अपनी बातों से उनका ह्रदय परिवर्तन भी कर देते। आतंकी धमकियों की प्रवाह किए बगैर उन्हें सीधी राह पर-सद मार्ग पर  लाने के लिए डाक्टर भारत हमेशां प्रयासशील रहे। 

कांग्रेस की नीतियों से उन्हें इश्क था। शायद उनकी सियासत कांग्रेस के निकट रही हो। बड़े बड़े नेताओं से वह मिलते भी रहे। उनकी आलोचना भी करते रहे। अपने समय की लौह महिला इंदिरा गांधी के फैन भी रहे। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहिब का तो बेहद आदर करते थे। उम्र भर देश उनके लिए सर्वोप्रिय रहा। आखिरी सांस तक यह भावना नहीं बदली। 

बड़े बड़े लोगों से मिलना जुलना रहा लेकिन उन्होंने कभी इसका फायदा नहीं उठाया। चाहते तो लाल बत्ती वाली गाड़ी, बंगला फ़्लैट सब ले सकते थे लेकिन नहीं। भावुक थे। दिल से सोचते थे। नफा नुकसान तो कभी नहीं सोचा उन्होंने। 

उनके लिए देश किसी इमारत का नाम नहीं था बल्कि देश की जनता थी असली भारत। समाज में एकता बनी रहे इसके लिए वह आखिरी सांस तक प्रयासशील रहे। साम्प्रदायिक और फूट डालने वालों के खिलाफ हर दिन लड़ते रहे।  फुट और नफरत की सियासत से उन्हें सख्त नफरत थी। प्रेम के पुजारी थे, प्रेम के ही दूत थे। हर तरफ प्रेम ही चाहते थे। प्रेम की रक्षा के लिए हर जंग भी लड़ सकते थे।  

डाक्टर भारत ज़िंदगी भर अभावों में रहे लेकिन मुस्कराते रहे। कोई नियमित आमदनी तो थी नहीं। फक्कड़ सवभाव लेकिन दिल में बादशाही भी। इसके बावजूद मेहमानों के लिए चायपानी का खर्चा कभी कभी हर रोज़ तीन सो रुपयों से भी ज़्यादा बढ़ जाता। किसी दिन किसी को खाना खिलाना पड़ जाता या शाम को जाम चला तो खर्चा और भी बढ़ भी जाता। जो भी आता इन्हीं बातों में खर्च हो जाता। उन्होंने दोस्तों की आवभगत में कभी कोई कसर न छोड़ी. कभी कोई कंजूसी न की। दोमोरिया  दोमोरिया पुल की मार्कीट में बहुत ही पुराने बने हुए प्रीतम ढाबे में कभी कभी शाम को ओंकार पुरी साहिब भी खर्चे पानी से हाथ खड़े कर जाते और दुसरे लोग भी। इसके बावजूद महफ़िल जारी रहती। प्रीतम ढाबे के मालिक को थोड़ी सी आशंका होती कि कि डाक्टर साहिब की जेब संकट में हैं। वह आ कर हाथ जोड़ कर कहता डाक्टर साहिब आपका अपना ही ढाबा है। कोई चिंता मत करना। हिसाब किताब होता रहेगा। और महफ़िल जारी रहती। डेस्क पर पड़ा उनका जासूसी छल्ला आसपास की खबर लेता रहता।  हम लोग नाराज़ भी होते लेकिन डाक्टर भारत मुस्करा कर सब माहौल हल्का बना देते। जवाबी सवाल करते अरे भाई कोई फैज़ाबाद से आ रहा है, कोई मुंबई से, कोई दिल्ली से तो कोई आज़मगढ़ से क़ज़ा उन्हें जलपान भी न कराया जाए? 

उम्र के आखिरी दिनों में बिजली बोर्ड वाले उनका मीटर काट गए। बिल अदा नहीं हो पाया था। इसका गहरा सदमा लगा उन्हें। वह उदास रहने लगे। बिल की रकम कुछ हज़ारों में ही थी लेकिन फिर भी बहुत बड़ी न थी। दोस्तों से मिल जल कर भी वह रकम भी अदा न हुई।

उदास थे। जिन लोगों के लिए मैंने कभी अपना कुछ न बनाया। किसी बड़े से बड़े मामले में समझौता न किया। उन लोगों ने मुझे बिल की रकम के लायक भी न समझा! एक अकाली लीडर ने कहा अच्छा ही हुआ अब जल्दी घर जाया करोगे। यूं भी पंखे की हवा से सेहत खराब होती है। उसने शायद मज़ाक में कहा था लेकिन उन बातों ने भी उनको गहरी ठेस पहुंचाई। डाक्टर भारत ने इन्हें दिल पर ले लिया। एक दिन दिल का दर्द अचानक शिद्दत से उठा और पूरी टीम को अकेला छोड़ गए। शायद कह रहे थे-यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! कभी कभी लगता है अच्छा हुआ इस मतलबी दुनिया को छोड़ गए यहां दिल की बातें कौन समझता है? लेकिन उनके बाद पैदा हुई उदासी भी नहीं जाती। 

अब पूरी टीम में कोई नहीं है उन जैसा। डाक्टर भारत FIB टीम के सक्रिय सदस्यों को चाईना गेट टीम बोला करते थे। सारी उम्र उन्होंने इस टीम के प्रेम में काटी लेकिन हम लोग उन्हें हार्ट अटैक से बचा नहीं पाए। वह अपने FIB दफ्तर से अपनी बेटी की कार से घर की तरफ गए और फिर कभी लौट कर नहीं आए। हम इंतज़ार कर रहे थे शाम हो गई अभी आए  क्यूं नहीं! उस आखिरी दिन के घटनाक्रम को सोच सोच कर स्वयं पर ही आत्म ग्लानी  होती है हम कैसे दोस्त थे उन्हें सही वक्त पर किसी महंगे अस्पताल में नहीं लेजा पाए। 

अब भी दिल में दर्द उठता है उनके जाने के बाद। कोई तो आगे आए जो उनके मिशन को आगे ले जाने को राज़ी हो। पूरे समाज के लिए अपूरणीय क्षति है उनका इस तरह चले जाना--

-----आज भी उनके पड़ोस में रहना याद आता है।  उनके बिना अब न वो सिविल लाईन्ज़ का न्यू कुंदनपुरी वाला इलाका अच्छा लगता है न ही यहाँ मोहाली का इलाका जहां हमने एकसाथ आना था। वो भी अकेले चले गए। हम भी अकेले रह गए। याद आता है वो गीत चल अकेला चल अकेला चल अकेला! तेरा मेला पीछे छूटा बाबू चल अकेला!

                  --रेक्टर कथूरिया

               पंजाब स्क्रीन मीडिया समूह

बहुत सी यादें हैं बाकी फिर कभी सही---

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Sunday, July 31, 2022

प्रेमचंद के नाम में कैसे जुड़ा 'मुंशी'

पूरी कहानी बता रहे हैं जाने माने लेखक राजिंद्र साहिल 

लुधियाना: 31 जुलाई 2022: (राजिंद्र साहिल//हिंदी स्क्रीन)::

आज महान कथाकार प्रेमचंद की जयंती है। इस अवसर उन्हें बड़ी आत्मीयता से याद भी किया जा रहा है। उनके नाम के साथ 'मुंशी' शब्द का प्रयोग भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। दरअसल वे मुंशी जैसे किसी पद पर कभी कार्यरत नहीं रहे। फिर यह 'मुंशी' आया कहां से? 

"हंस' पत्रिका जब आरंभ की गई, तब उसके दो संपादक निश्चित हुए। पहले प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और दूसरे स्वयं प्रेमचंद। संपादक के तौर पर दिया गया : मुंशी - प्रेमचंद।

बाद में इन दोनों शब्दों के बीच से '-' हाइफन भुला दिया गया और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का 'मुंशी' प्रेमचंद के साथ जुड़ गया और वे बन गये मुंशी प्रेमचंद।

(प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी द्वारा लिखित प्रेमचंद की जीवनी 'प्रेमचंद घर में' इस तथ्य का उद्घाटन किया गया है।