Showing posts with label Research. Show all posts
Showing posts with label Research. Show all posts

Saturday, August 10, 2013

आधी सदी में भारत ने खो दी अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ

1961 में बोली जाती थीं भारत में 1100 भाषाएँ 
                                                     Photo: EPA
मामला बेहद गंभीर है और इसकी खबर दी है रेडियो रूस ने जिसका शीर्षक है-आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त। रेडिओ ने पूरी ज़िम्मेदारी से तथ्यों का हवाला देते हुए बताया है कि भारत के एक शोध संस्थान 'भाषा' जिसे 'भाषा शोध एवं प्रकाशन केन्द्र' भी कहा जाता है, के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आधी सदी में भारत ने अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ खो दी हैं।
इस क्षेत्र के एक शोधकर्ता गणेश देवी के अनुसार, सन् 1961 में भारत में 1100 भाषाएँ बोली जाती थीं लेकिन अब उनमें से 220 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। ये भाषाएँ सपेरों, ज्योतिषियों, स्वदेशी चिकित्सकों द्वारा बोली जाती थीं। भारत की 3-4 प्रतिशत जनसंख्या, यानी लगभग पाँच करोड़ लोग ऐसी भाषाएँ बोल सकते थे।
भारत में दो भाषाओं, हिन्दी और अंग्रेज़ी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है जबकि 22 अन्य भाषाओं का देश के राज्यों में सरकारी भाषा के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त

Sunday, February 10, 2013

चमत्कारी औषधि:व्यक्ति सदा युवा और स्वस्थ रह सकेगा

9.02.2013, 09:33
बनें चिर युवा//डेढ़ साल बाद बिकने लगेगी G5 औषधि
नोवोसिबीर्स्क में विकसित औषधि के सारे प्री-क्लीनिकल टेस्ट पूरे
                        © फ़ोटो: ru.wikipedia.org
नोवोसिबीर्स्क के वैज्ञानिकों ने “संजीवनी” खोज ली है| उन्होंने एक अद्वितीय औषधि बनाई है जो मज्जा से स्टेम सेल यानी तना–कोशिकाएं बनवाती है| ये कोशिकाएं किसी भी रुग्ण अंग के पुनरुज्जीवन की क्षमता रखती हैं| सो, इस चमत्कारी औषधि की बदौलत व्यक्ति सदा युवा और स्वस्थ रह सकेगा|

स्टेम सेल से चिकित्सा का तो आजकल फैशन पूरे ज़ोरों पर है| इनसे दिल का दौरा (इन्फेर्क्शन), मस्तिष्क-आघात (ब्रेन हैमरेज) तथा कई तरह की गंभीर चोटों का इलाज करने में मदद मिल सकती है| सौंदर्य-उपचार यानी कोस्मेटोलोजी में तो इनकी सहायता से त्वचा को फिर से युवा बनाने के दावे किए जाते हैं| समस्या बस इतनी है कि इन कोशिकाओं के उपयोग की जो विधि इन दिनों प्रचलित है वह निरापद नहीं है, इस औषधि का विकास करनेवाली कंपनी के जनरल डायरेक्टर आंद्रेई अर्तामोनोव बताते हैं|

देखिए, आजकल काम कुछ इस तरह होता है: अस्थि-मज्जा से ताना-कोशिकाएं निकाली जाती हैं| फिर उन्हें विशेष द्रव्य में रखकर उनकी संख्या बढ़ाई जाती है और इसके बाद उन्हें “रोगी” की रक्त-प्रणाली में पुनः प्रवेशित किया जाता है| ध्यान देने की बात यह है कि इन कोशिकाओं का मल्टीप्लिकेशन मानव-शरीर के बाहर होता है| मानव शारीर में इन्हें डाले जाने के बाद इनका विभेदीकरण कैसे होगा यह कोई नहीं कह सकता – ये रुग्ण अंग में पहुँच कर उस अंग की कोशिकाओं का पुनर्निर्माण कर देंगी तो व्यक्ति स्वस्थ हो जाएगा, लेकिन अगर ये स्वस्थ अंग में पहुँच जाएं तो वहाँ क्या होगा? ह्रदय में पसली उग आई तो? दरअसल ऐसी कोशिकाएं मानव-शरीर के लिए “पराई” ही होती हैं|

अब नोवोसिबिर्स्क के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का हल ढूँढ लिया है| उन्होंने G5 कोड-नाम वाली औषधि बनाई है| यह मनुष्य की अस्थि-मज्जा को नई तना-कोशिकाएं बनाने की “प्रेरणा” देती है| ये नवनिर्मित कोशिकाएं स्वयं ही विक्षत अंग को ढूँढ लेती हैं, और उसका “पुनर्निर्माण” कर देती हैं| विशेषज्ञ के शब्दों में G5 औषधि इन “मरम्मती-कोशिकाओं” को “घर” प्रदान कराती है, वे शरीर से बाहर नहीं जातीं| यह पुनरुज्जीवन औषधि है| अब तक संसार में इसका कोई समरूप नहीं है, आंद्रेई अर्तामोनोव कहते हैं:

आज के दिन में ऐसी कोई औषधि नहीं है| हमारी G5 अस्थि मज्जा को अपनी ही तना-कोशिकाएं बनाने की “प्रेरणा” देती है और ये कोशिकाएं मानव शरीर के भीतर ही रहती हैं| ज्यों-ज्यों मनुष्य की आयु बढ़ाती है, त्यों-त्यों उसके शरीर में तन-कोशिकाओं की संख्या कम होती जाती है, अतः हमारे अंगों के पुनरुज्जीवन की प्रक्रिया रुक जाती है, हम बूढ़े होने लगते हैं| अब चिकित्सा-विज्ञान में इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि शरीर स्वयं अपने को बहाल करता जाए| 

आज तक सारी चिकित्सा लक्षणों को दूर करने वाली ही है| दर्द हो रहा है – दर्दहारी गोली दवाई ले लो| मानव शरीर में अंतर्निहित क्षमता का उपयोग करना कहीं अधिक मुश्किल काम है, लेकिन सही रास्ता यही है| इसी की बदौलत हम सब “युवा और सुखी हो पाएंगे, यह याद कर पाएंगे कि बचपन में हम कैसे थे|”

नोवोसिबीर्स्क में विकसित औषधि के प्री-क्लीनिकल टेस्ट सारे पूरे हो गए हैं| शीघ्र ही क्लीनिकल टेस्टिंग भी शुरू होगी| यह आशा की जा सकती है कि डेढ़ साल बाद G5 औषधि बिकने लगेगी|(रेडियो रूस से साभार)  
बनें चिर युवा//डेढ़ साल बाद बिकने लगेगी G5 औषधि Care, Health, Medicine, Traditional, Life, New Concept, Research,
 चमत्कारी औषधि:व्यक्ति सदा युवा और स्वस्थ रह सकेगा
       

धरती पर आ रहा है शीत-युग

9.02.2013, 18:45
निकट भविष्य में ही पृथ्वी पर शीत-युग
© Flickr.com/woodleywonderworks/cc-by
दो रूसी वैज्ञानिकों ने वैश्विक उष्मीकरण के विचार का खंडन किया है और कहा है कि इसके विपरीत निकट भविष्य में ही पृथ्वी पर शीत-युग आरंभ होने जा रहा है| गैस उद्योग अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक व्लादीमिर बश्किन और राऊफ गलिऊलिन ने अपने लेख में कहा है कि पश्चिमी देशों में ही वैश्विक उष्मीकरण का शोर मचाया जा रहा है, जिसका असली कारण लोगों के मन में यह बात बिठाना है कि परम्परागत ईंधन स्रोतों – तेल, कोयले और गैस – की मांग कम होनी चाहिए, मांग कम तो दाम भी कम| इन विद्वानों के मत में इसके उलट अब सूर्य की सक्रियता में भरी गिरावट आ रही है, जिसकी वजह से वैश्विक शीत-युग आरंभ हो रहा है| उनका कहना है कि 2014 में ही औसत तापमान गिराने लगेगा और इस सदी के मध्य तक वह न्यूनतम तक पहुँच जाएगा|(रेडियो रूस से साभार)

Monday, February 4, 2013

महाकाल को मानव कैसे जीतेगा?

10.11.2012, 17:47 
सूरज बूढ़ा और पुराना हो जाएगा और वह सड़ने लगेगा 
बाद में मानव को मंगल ग्रह से भी दर-बदर होना पड़ेगा
                                                                                                                        © www.nasa.gov        (Courtesy:Voice of Russia)
क़रीब 2 अरब 80 करोड़ साल बाद सूरज बूढ़ा और पुराना हो जाएगा और वह सड़ने लगेगा यानी वह फूलना शुरू हो जाएगा और एक विशाल लाल आग के गोले में बदल जाएगा। सूरज में होने वाले इन बदलावों का पृथ्वी पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा । ज़मीन पर गर्मी इस बुरी तरह से बढ़ जाएगी कि जीवन पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगा। एक भी जीव-जन्तु इस धरती पर बाक़ी नहीं रहेगा। वैसे तो एक अरब 80 करोड़ साल बाद ही पृथ्वी पर रहने वाले जीव-जन्तु और मनुष्य ख़त्म हो जाएँगे, लेकिन पानी में रहने वाले तरह-तरह के जीवाणु और कीटाणु तथा ज़मीन के भीतर गहराई में रहने वाले जीव फिर भी बचे रह जाएँगे।

यह भविष्यवाणी उन ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने की है, जो पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के लुप्त होने की प्रक्रिया का क्रमबद्ध ढंग से अध्ययन कर रहे हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने न सिर्फ़ सूर्य की गरमी बढ़ने से पृथ्वी पर होने वाले बदलावों का अध्ययन किया है, बल्कि उन्होंने यह भी देखा है कि यदि अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में कोई बदलाव होता है तो उसका पृथ्वी के जीवों पर क्या असर पड़ेगा।

नक्षत्रशास्त्री यह जानते हैं कि सूरज की तरह के सितारे आख़िर में विशालकाय लाल गोलों में बदल जाते हैं और उनमें होने वाला बदलाव हमेशा इसी ढंग से होता है। जब हमारा सूरज आग के लाल विशालकाय गोले में बदलेगा तो उसका आकार बीसियों गुना बढ़ जाएगा और उसकी धूप की झलक भी पीली नहीं बल्कि लाल दिखाई देगी। सूरज जब फूलकर बुध और शुक्र ग्रहों को निगलकर पृथ्वी के महासागरों का पानी सुखा देगा, उससे बहुत पहले ही पृथ्वी पर परिस्थितियाँ जीवन के लायक नहीं रह जाएँगी। मास्को विश्वविद्यालय की एक जीव-वैज्ञानिक येलेना वराब्योवा भी इस बात से सहमत हैं कि जीवाणु और कीटाणु ही हमारी पृथ्वी के अन्तिम वासी होंगे क्योंकि वे ही सबसे पहले पृथ्वी पर अवतरित भी हुए थे। सबसे पहले धरती पर उन्हीं का जन्म हुआ था। येलेना वराब्योवा ने कहा :

आज भी इस तरह के जीवाणुओं और कीटाणुओं की कमी नहीं है, जो गर्म पानी के जलाशयों और ख़ूब नमकीन पानी में रहते हैं। वैसे भी जीवाणु ऐसे जीव होते हैं, जो मानव के मुक़ाबले कठिन से कठिन जीवन-परिस्थितियों को भी झेलकर अपने अस्तित्त्व को सुरक्षित रखते हैं। हम आज यह कल्पना कर सकते हैं कि जब पृथ्वी पर जीवाणुओं के रूप में जीवन की शुरूआत हुई थी तो कैसी परिस्थितियाँ रही होंगी। तब न तो पेड़-पौधे ही थे और न ही दूसरी तरह की वनस्पतियाँ या जीव-जन्तु। इन जीवाणुओं से ही पृथ्वी पर जीवन की रचना हुई। इन जीवाणुओं के क्रमिक विकास से ही बाद में वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं और मानव-जीवन का विकास हुआ।

तो जीवाणु ही पृथ्वी पर लम्बे समय तक जिएँगे। लेकिन मानवजाति क्या करे? वह कहाँ जाए? जीव-वैज्ञानिक येलेना वराब्योवा ने कहा -- मंगल-ग्रह पर जाकर रहा जा सकता है... :

मंगल-ग्रह पर उसके ध्रुवीय क्षेत्र में ठोस बर्फ़ के रूप में पानी जमा है। गरमी बढ़ने पर यह पानी तरल रूप ग्रहण कर लेगा और नदियों के रूप में बहने लगेगा, तब मंगल पर भी जीवन फूट पड़ेगा। शायद मंगल ही वह जगह है, जहाँ जाकर, पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा होने पर मानवजाति अपना जीवन बचा सकती है।

लेकिन बाद में मानव को मंगल ग्रह से भी दर-बदर होना पड़ेगा यानी कहीं और जाना होगा। तब तक शायद मानवजाति को अन्तरिक्ष में उपस्थित दूसरे नक्षत्र-मंडलों की भी विस्तृत जानकारी हो जाएगी। कहीं न कहीं तो ऐसी परिस्थितियाँ होंगी ही, जहाँ जाकर आदमी रह सकेगा। बहुत से रूसी वैज्ञानिक भी अपने ब्रिटिश सहयोगियों की बातों से सहमत हैं। हाँ, वे उनके द्वारा बताई गई अवधि को कुछ संदेह की निगाह से देखते हैं। इसका कारण यह है कि पृथ्वी जिन प्रक्रियाओं से गुज़रेगी, उन पर न सिर्फ़ सूरज पर बढ़ने वाली गर्मी का असर पड़ेगा या पृथ्वी की कक्षा में होने वाले बदलावों का असर पड़ेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि पृथ्वी की जलवायु और जीवमण्डल में उन प्रक्रियाओं की वज़ह से क्या बदलाव आएँगे। अभी से इसकी भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है। हमारा विज्ञान आज, अभी तक इतना ज़्यादा विकसित नहीं हुआ है कि वह जीव-मंडल में आने वाले बदलावों में लगने वाले समय की भविष्यवाणी कर सके। वैसे भी बात सदियों-सहस्त्राब्दियों की नहीं, करोड़ों-अरबों वर्षों की हो रही है। (रेडियो रूस से साभार)