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Saturday, May 31, 2014

भारतीय भाषायें लागू करने के लिए एक पत्र मोदी के नाम

 Sat, May 31, 2014 at 9:58 AM
आजादी के 67 साल बाद भी फिरंगी भाषा की दासता शर्मनाक
प्रतिष्ठा में,                                                                                                            30 मई,2014
श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री

भारत  

विषय- आजादी के 67 साल बाद भी देश की व्यवस्था को अंग्रेजी की दासता से मुक्त करके देश में भारतीय भाषायें लागू करने के लिए 
(1)संघ लोकसेवा आयोग (2) सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में जारी अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाने के लिए
-संविधान एवं संसद की देख रेख में चल रहा है भारत में अंग्रेजी का विस्तार
जय हिन्द! मान्यवर, देश की आजादी के 67 साल बाद भी देश, उसी फिरंगी भाषा (अंग्रेजी) की दासता शर्मनाक ढ़ग से जकड़ा हुआ है जिसकी गुलामी से मुुक्ति के लिए देश के लाखों सपूतों ने अपना सर्वस्व बलिदान देते हुए शताब्दियों तक लम्बा ऐतिहासिक संघर्ष किया था। देश के हुक्मरानों की अंग्रेजी दासता के अंध मोह के कारण आज संसार का सबसे बडा लोकतंत्र अपने नाम, अपनी भाषा व अपने इतिहास के साथ साथ लोकशाही के लिए तरस रहा है। आज देश में न्यायपालिका सहित पूरी व्यवस्था में अंग्रेजी का ही राज चल रहा है। देश में सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में ही नहीं संघ लोकसेवा आयोग से लेकर शिक्षा, प्रतिष्ठा व रोजगार पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा की दासता में जकड़ा हुआ है। लोकशाही के नाम पर देश की सवा सौ करोड़ जनता को 15 अगस्त 1947 के बाद बैशर्मी से गूंगा बहरा बना कर लोकशाही व मानवाधिकार का गला ही घोट लिया है।
इसी फिरंगी भाषा की गुलामी से देश को मुक्त कराने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन तीन दशक से अधिक समय से निरंतर संघर्ष कर रहा है। देश की अस्मिता, सम्मान व लोकशाही को अंग्रेजी के अंध मोह में रौंद रहे हुक्मरानों की धृष्ठता को देख कर भारतीय भाषा आंदोलन ने 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर अखण्ड धरना दे कर देश की आजादी को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का ऐतिहासिक आंदोलन शुरू कर रखा है। हमारा साफ मानना है कि भले ही देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजाद हो गया हो परन्तु देश के हुकमरानों के फिरंगी भाषा के प्रति अंध मोह के कारण देश की आजादी आज भी 67 सालों से अंग्रेजी भाषा द्वारा गुलाम बनायी गयी है। पूरे तंत्र में उसी फिरंगी भाषा का राज चलने के कारण आज भी भारत राष्ट्रमण्डल देशों की प्रमुख ब्रिट्रेन की सम्राज्ञी का ही गुलाम बना हुआ है। जिस देश का अपने देश की ीााषा का शासन, न्याय, शिक्षा, रोजगार व सम्मान में राज न हो वह देश गुलामी से बदतर स्वयं भू गुलाम उसी विदेशी भाषा का होता है जिसका राज उस देश में चल रहा होता है।
आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था। उस प्रस्ताव को लागू करने के सवाल पर भारत का शासन एवं प्रशासन हमेशा से स्वयं को बचाता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को लागू करने का मामला हो या सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय में जनता की भाषा में सुनवाई का सवाल हो ! संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ स्वयं संसद ने भी अपने प्रस्ताव को संवैधानिक कारणों के चलते हमेशा दबाने की कोशिश ही की है। दरअसल कारण जो भी हो, डरावने सचों का सामना करने का जिगरा ना भारत की संसद एवं शासन व्यवस्था के पास बचा है और ना ही समाज के पास ! सब अपनी-अपनी सुविधानुसार कामचलाऊ झूठ के सहारे चल रहे हैं । अंग्रेजी का आरक्षण भारत में अनंतकाल तक चलता रहेगा ! यह डरावना सच भारत के संविधान में ही लिख दिया गया था। संविधान के इस भयानक सच पर कभी सीधी बात नहीं होती। क्योंकि संविधान सर्वोपरि है। लिहाजा अंग्रेजी का चक्रव्यूह अब गांवों तक को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। सर्वोच्च न्यायालय एवं संसद भी सर्वोपरि है। इन पर उंगली उठाना गुनाह है। यह डर भी जनता की नसों में उतारा जा चुका है। संविधान-संसद एवं सरकारों की देखरेख में अंग्रेजी की जड़ों को भारत की नसों में गहरे उतारने के साथ-साथ भारत की भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए भी सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर अपनी-अपनी सुविधानुसार ठग-विधाऐं भारत में चल रही हैं । ऐसी ही एक ठग विधा का आयोजन भारत सरकार की तरफ से प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर से शुरू होता है जो दो सप्ताह तक चलता है। इसमें सिर्फ ‘सरकारी ठग’ ही शामिल होते हैं। इस आयोजन के द्वारा अरबों रूपयों के उस फंड का औचित्य सिद्ध किया जाता है जो सरकार में बैठे ‘भाषा आंदोलनकारियों’ पर प्रत्येक वर्ष खर्च किया जा रहा है।
इन ‘सरकारी आंदोलनकारियों’ के प्रयासों के चलते सरकारी विभागों में भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिश पर लगभग 5 वर्ष में एक बार राष्ट्रपति के आदेश जारी करने की भी परम्परा है। परम्परागत राष्ट्रपति के ये आदेश किन रद्दी की टोकरियों के हवाले कर दिये जाते हैं, इसकी फिक्र ना कभी संसद को रही और ना ही राष्ट्रपति भवन को। भाषा के सवालों को लेकर संसद एवं राष्ट्रपति भवन के बीच चलती आ रही इस ठग विधा का यह दूसरा नमूना है। भारतीय भाषाओं के सवाल पर संविधान के बाद, अब तक ठगी एवं झूठ का सबसे बडा उदाहरण स्वयं संसद ने लगभग 45 वर्ष पूर्व 18 जनवरी 1968 को पेश किया था। भारतीय भाषाओं को लागू करने हेतु इस दिन संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था, उसका नाम दिया गया संसदीय संकल्प। वह संकल्प पिछले 45 वर्षों से कभी संसद के बाहर नहीं जा पाया। संसद के ओर संकल्पों की तरह यह संकल्प भी संसद की कैद में दर्ज हो चुका है। भारत में अनंतकाल तक अंग्रेजी के आरक्षण की संवैधानिक किलेबंदी के चलते, आखिर किस आधार पर संसद ने भारतीय भाषाओं को लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया? इस प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति क्या है? संसदीय प्रस्तावों के प्रति स्वयं संसद की जिम्मेदारी एवं जवाबदेही क्या है? भाषायी मुद्दे पर जनता की भावनाओं के साथ पिछले 45 वर्षों से जारी इस संसदीय छल पर किसे कटघरे में खडा करें? और कौन करे? कौन देगा इन सवालों के जवाब?
कुछ ऐसे ही सवालों के उत्तरों की तलाश में, हिन्दुस्तान में अंग्रेजी को बलात थोपने के सबसे बडे़ केन्द,्र संघ लोक सेवा आयोग पर 16 अगस्त 1988 से विश्व के सबसे लम्बे धरने की शुरूआत हुई। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाऐं भारतीय भाषाओं में हो! भाषा आंदोलनकारियों की इस मांग से सहमति जताते हुए 175 संसद सदस्यों ने भी अपने हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह को दिया था। 12 मई 1994 को पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के नेतृत्व में देश के सभी शीर्ष राजनीतिक नेताओं/दलों का सामूहिक धरना संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य द्वार पर दिया गया। इसमें राष्ट्रीय समाचार पत्रों के सम्पादकों, 50 से अधिक संसद सदस्यों, विधायकों, पूर्व राज्यपालों सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया। इसी दिन संसद के दोनों सदनों में सभी दलों ने मुखर होकर भारतीय भाषाओं के सवाल पर अपना पक्ष रखा। लेकिन संविधान के अनुच्छेदों में पद, पैसा एवं प्रतिष्ठा केवल अंग्रेजी वर्ग के लिए आरक्षित कर दिये जाने की किसी ने चर्चा नहीं की। लिहाजा वह भाषायी आक्रोश हमेशा की तरह केवल रस्म अदायगी बन कर रह गया।
विवश होकर भाषा आंदोलनकारियों ने स्वयं संसद में भाषा के सवाल पर देश का ध्यान आकर्षित करने की योजना बनायी। 21 अप्रेल, 1989 एवं 10 जनवरी 1991 को आंदोलनकारी संसद में प्रवेश कर गये। नारेबाजी एवं पर्चे फेंकने की घटना के बीच एक आंदोलनकारी भी दर्शक दीर्घा से नीचे लोक सभा में कूद गया। नतीजा सिर्फ इतना निकला कि वह अपनी पसलियां तुडवाकर दो महीने अस्पताल में रहा और संसद ने 18 जनवरी 1968 के उस बेजान प्रस्ताव को पुनः अगले दिन ध्वनिमत से पारित कर अपने हाथ खडे़ कर दिये। संघ लोक सेवा आयोग पर चल रहे निरंतर धरने को लगभग 14 वर्ष हो चुके थे। इसी बीच अनेक सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से आंदोलनकारियों की सीधी झडपें भी हुई। अनेक विरोध प्रदर्शनों, आमरण अनशन एवं लम्बे धरने से आजीज आकर भारतीय भाषाओं को लागू करने के बजाय, अचानक सरकार की देखरेख में धरने को नेस्तनाबूद कर दिया गया, आंदोलकारियों का सामान, तम्बू आदि उखाडकर फेंक दिये गये। संसद द्वारा पारित प्रस्ताव को लागू करने के लिए चल रहे अनवरत सत्याग्रह को तहस-नहस करने की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही पर किसी भी राजनीतिक दल एवं नेता ने अपना विरोध नहीं जताया। संसद में भाषाओं के सवाल पर मुखर रहने वाले नेताओं ने भी अपने मुंह सिल लिए थे। संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय ने भी सचमुच आंखों पर पट्टी बांध ली थी। अंग्रेजी की इन पट्टियों को सारे हिन्दुस्तानी मिलकर नोंचे! संसद की चैखट पर पुनः ऐसी एक शुरूआत संघ लोक सेवा आयोग के कुछ जिंदा बचे पुराने सत्याग्रहियों ने कर दी है। ताकि संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय जैसे शीर्ष संवैधानिक संस्थानों से भारतीय भाषाओं की बहाली का मार्ग प्रशस्त होकर भारत के गांवों तक जाऐ। हमें आशा है कि आप देश की लोकशाही की हो रही इस दुर्दशा को देख कर शीघ्र ही देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति दिलाने के अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करेंगे ।
संघ लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी का आरक्षण
सर्वोच्च न्यायालय व अधिकांश उच्च न्यायालय की तरह, संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी का आरक्षण बरकरार है। जून 2011 से सिविल सेवा की प्रा. परीक्षा में 22.5 अंक का अंग्रेजी का प्रश्न पत्र अनिवार्य कर दिया गया है, अंग्रेजी एवं किसी एक भारतीय भाषा के अनिवार्य प्रश्नपत्र के अलावा। संसद से लेकर सड़क पर जनप्रतिनिधियों व प्रबुद्ध लोगों ने पुरजोर विरोध किया। इसके बाबजूद अंग्रेजी की सर्वोच्चता व भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का षडयंत्र जारी है। सिविल सेवा के अलावा आयोग द्वारा ली जा रही अन्य अखिल भारतीय सेवाऐं, जिनमें भारतीय भाषाओं को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है-
क्र.सं. परीक्षा माध्यम
1. सम्मिलित चिकित्सा सेवा परीक्षा अंग्रेजी
2. इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा अंग्रेजी
3. भारतीय वन सेवा परीक्षा अंग्रेजी
4. स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस परीक्षा अंग्रेजी
5. भारतीय आर्थिक सेवा अंग्रेजी
6. भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा अंग्रेजी
7. भूविज्ञानी परीक्षा अंग्रेजी
8. सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा अंग्रेजी का 100 अंक का प्रश्न पत्र अनिवार्य
9. राष्ट्रीय रक्षा अकादमी अंग्रेजी का 100 अंक का प्रश्न पत्र अनिवार्य
10. केन्द्रिय पुलिस बल परीक्षा ...........................................
12. अनुभाग अधिकारी परीक्षा ...........................................
नोट- उपरोक्त परीक्षाओं के अलावा अन्य विभागीय परीक्षाओं में भी लिखित एवं साक्षात्कार में केवल अंग्रेजी का माध्यम है।
भारतीय भाषा आंदोलन
डा बलदेव वंशी                   पुष्पेन्द्र चैहान (संयोजक)                        देवसिंह रावत(महासचिव)
                                     दूरभाष- ; 9999590115. ;                          9910145367                          
महेशकांत पाठक (धरना प्रभारी)                                                         देवेन्द्र भगत

Tuesday, December 31, 2013

बाबा रामदेव चलाएंगे पहली मार्च से घर-घर जाकर वोट फार मोदी कैंपेन

Tue, Dec 31, 2013 at 1:58 PM
कहा-लोगों को पानी मुफ्त देना सरकार का दायित्व
केजरीवाल ने नया क्या किया
अमृतसर: 31 दिसंबर 2013 : (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन//हिंदी स्क्रीन): 
देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने और विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार से टक्कर लेने वाले योग गुरु बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया है, कि इस समय देश को नरिंदर मोदी जैसे दिग्गज नेता की जरूरत है, जो लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने में समर्थ हैं। वह आज अमृतसर पहुंचे थे। पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने कहा, कि 2014 में देवत्व की स्थापना के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी उनका आंदोलन जारी रहेगा। अपने आंदोलन के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा, कि एक मार्च से वह और उनके कार्यकर्ता पूरे देश में घर-घर जाकर वोट फार मोदी और भ्रष्टाचार समेत अन्य मुद्दों के खिलाफ वोट करने के लिए लोगों से अपील करेंगे। इसके अलावा 23 मार्च को शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में वह दिल्ली में एक बहुत बड़ा योग कैंप लगा रहे हैं, जिसमें एकसाथ पूरे देश में करीब दस करोड़ लोग एकसाथ योगाभ्यास करेंगे।
   नरिंदर मोदी के प्रचारक के रूप में बाबा रामदेव के आगे आने के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, कि वह नरिंदर मोदी के प्रचारक नहीं है। बल्कि वह इसलिए उनका साथ दे रहे हैं, क्योंकि नरिंदर मोदी और उनके मुद्दे एकसमान है। इसलिए वह नरिंदर मोदी का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। आम आदमी पार्टी की ओर से सत्ता में आते ही लोगों को मुफ्त पानी जैसी सुविधा दिए जाने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, कि इसमें केजरीवाल ने नया क्या किया। उन्होंने कहा, कि पहले आम आदमी पार्टी को अपनी विचार धारा स्पष्ट करनी होगी कि उनकी विचारधारा वामपंथी है या कुछ और। दिल्ली में नरिंदर मोदी के जादू के फेल होने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, यदि वहां मोदी फैक्टर नहीं चला होता, तो भाजपा की हालत कांग्रेस से भी बदत्तर होती।

Friday, November 23, 2012

मोदी का जादू क्या है ?

गुजरात : जैसा मैने देखा // राजीव गुप्ता      
                                                                                                                                                                 Courtesy Photo
पिछ्ले दिनो मुझे गुजरात जाने का अवसर मिला. शहर की चकाचौन्ध से कोसो दूर ग्रामीणो के बीच कई दिनो तक उनके साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. अभी तक मैने गुजरात के बारे मे अच्छा – बुरा  मात्र मीडिया की माध्यम से ही सुना था परंतु गुजरात की आम-जनता से सम्मुख होने का यह अनुभव मुझे पहली बार प्राप्त हुआ. एक तरफ जहा मीडिया मोदी के जादू के बारे मे अपना आंकलन प्रस्तुत करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ वह 2002 मे गोधरा मे हुए दंगो से आगे सोच ही नही पा रहा. इसी बीच अमेरिका-ब्रिटेन द्वारा मोदी की तरीफ ने मुझे गुजरात देखने को और अधिक बेचैन कर दिया. एक तरफ जहां ये सेकुलर बुद्धिजीवी और मीडिया की आड़ में राजनेता अपनी राजनीति की रोटियां सेकने में व्यस्त है तो वही इससे कोसो दूर गुजरात अपने विकास के दम पर भारत के अन्य राज्यों को दर्पण दिखाते हुए उन्हें गुजरात का अनुकरण करने के लिए मजबूर कर रहा है . 
मोदी की जादू के बारे मे वहा के ग्रामीण-समाज से मुझे जानने का अवसर मिला. सड्के अपनी सौन्दर्यता से मेरा ध्यान अपनी ओर बार-बार खींच रही थी. पुवाडवा, चनडवाना, मांगरोल, धोरडो, खावडा, कुरण, धौलावीरा, लखपत, क़ानेर, उमरसर जैसे अनेक गांवो मे खस्ता हालत मे सड्को को ढूंढ्ने की मैने बहुत कोशिश की पर असफल रहा. लगभग हर गांव को सडको से जुडे हुए देखकर मुझे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की उस दूरदर्शिता की याद आ गयी जिसे उन्होने जोर देकर भारत के हर गांव को सडक से जोड्ने के लिये प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक योजना की शुरुआत की थी.

गुजरात के प्रत्येक गांव मे 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होती है ग्रामीणो की इस बात ने मुझे और हैरत मे डाल दिया, परंतु उनकी यह बात सौ प्रतिशत सच थी कि गुजरात के सभी गांवो मे बिजली कभी नही जाती. उत्सुकतावश मैने उनसे बिजली वितरण प्रणाली और बिजली चोरी की बात भी की तो उनके माध्यम से पता चला कि बिजली वितरण प्रणाली के चलते बिजली चोरी यहा सम्भव ही नही है क्योंकि हर घर मे बिजली का मीटर लगा है और पूरे गांव क एक अलग से बिजली का मीटर लगा है. हर गांव के सरपंच को यह निर्देश है कि गांव के बिजली के मीटर की रीडिंग और हर घर के मीटर की रीडिंग का कुल योग बराबर होना ही चाहिये अन्यथा जबाबदेही सरपंच के साथ-साथ पूरे गांव की ही होगी. परिणामत: बिजली चोरी का सवाल ही नही उठता.
                                                         Courtesy Photo
समरस ग्राम पंचायत के बारे मे उनसे पहली बार जानने का मौका मिला. ग्राम पंचायत को और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से नरेन्द्र मोदी द्वारा समरस ग्राम पंचायत की शुरुआत की गयी. समरस ग्राम पंचायत का अर्थ समझाते हुए मुझे उन लोगो ने मुझे बताया कि हमारे यहा अन्य राज्यो की भांति सरपंच का चुनाव कोई सरकारी मशीनरी द्वारा न होकर अपितु गांव के लोग ही मिलकर अपना सरपंच चुन लेते है और ऐसे सभी समरस ग्राम पंचायत को विकास हेतु सरकार अलग से वितीय सहायता देती है. परिणामत: सरपंच के चुनाव हेतु सरकारी खर्च बच जाता है और गांव के लोगो के मन-मुताबिक उनका मुखिया भी मिल जाता है.  कुरण गांव के लोगो ने सोढा प्राग्जि एवम सता जी का उदाहरण भी बताया कि उनके यहा मुस्लिम समुदाय की संख्या लगभग 50,000 है और हिन्दु समुदाय की संख्या लगभग 400 ही है परंतु सोढा प्राग्जि एवम सता जी जो कि हिन्दु समुदाय से ही थे उनके निर्णयो की कसमे आज भी लोग खाते है. छोटे-मोटे झगडो का निपटारा पंचायत द्वारा गांव मे ही कर दिया जाता है.   उन सबकी यह बात सुनकर मुझे मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पंच-परमेश्वर एवम गान्धी के पंचायत राज की याद आ गयी. वास्तव मे अपनी कई खूबियो के चलते गुजरात की पंचायत व्यवस्था देखने लायक है.
वैसे तो कुरण गांव मे रहने वाले लोग अनुसूचित जाति से सम्बन्धित है परंतु उस गांव के मन्दिर मे पुरोहित भी अनुसूचित जाति से ही है. इस गांव का आदर्श उन कुंठित राजनेतओ के मुह पर तमाचा है जो समाज विभेद की राजनीति करते हुए छुआछूत को बढावा देते हुए अपने वोट बैंक की राजनीति करते है. गुजरात के हर गांव मे एक पानी – संग्रहण की व्यवस्था है जिसका उपयोग सामूहिक रूप से सभी ग्रामीण अपने जानवरो को पानी पिलाने, कपडे धोने, एवम स्नान इत्यादि के लिये करते है. खेती की सिंचाई हेतु सरकार द्वारा कई छोटे-छोटे तालाब बनवाये गये है जिसमे बारिश का पानी संग्रहित किया जाता है. परिमात: किसानो को सिचाई हेतु भरपूर पानी मिलता है.

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इतना ही नही इस गांव मे ही 8वी तक का स्कूल है जिससे बच्चो को प्राथमिक पढाई हेतु गांव से बाहर जाने की नौबत ही नही आती. इस स्कूल मे लड्के – लड्कियो का अनुपात भी बराबर ही है. गांव के इस स्कूल की खासियत यह है कि यहा पर बच्चो को सीधे  बायोसेफ प्रोग्राम जो कि  जी सी ई आर टी, गान्धीनगर द्वारा संचालित होता है से उनका पूरा पाठ्यक्रम पढाया जाता है. इस स्कूल के  सभी बच्चो कम्पय़ूटर से न केवल अपने पाठ्यक्र्म को पूरा करते है अपितु वे अपनी समस्याये सीधे इंटरनेट के जरिये जी सी ई आर टी से भी पूछ सकते है. अध्यापिकाओ की संख्या अध्यापको की संख्या से अधिक ही है. इस स्कूल के पुस्तकालय की तरफ आप स्वत: ही खींचे चले जाते है.   
वैसे तो गांव के नजदीक ही कोई न कोई कम्पनी लगी है जिससे वहा के स्थानीय निवासियो को रोजगार सुलभ है परंतु लोगो का मुख्य व्यवसाय पशु-चारण और दुग्ध – उत्पादन ही है. एक-एक घर मे लगभग सैकडो गाय है. झुंड के झुंड चरती गायो को देखकर तो मुझे एक बार द्वापर युग और गुप्त-काल की याद आ गयी जहा नन्दगांव मे भगवान श्रीकृष्ण गायो को चराने जाते थे और दूध की नदिया बहती थी. मुझे सबसे आश्चर्य की बात यह लगी कि इन गायो का स्वामी हिन्दू समुदाय से न होकर मुस्लिम समुदाय से थे और वे सभी भी गाय को दूध-उत्पादन के लिये ही पालते है. हिन्दु समुदाय के साथ – साथ  उनके लिये भी गाय पूजनीय ही है साथ ही कभी भी वहा गाय का वध नही किया गया. घी से सराबोर रोटी के साथ छाछ अनिवार्यत: मिलेगी. इतना ही नही गांव के लोगो द्वारा दूध/छाछ सप्ताह मे दो दिन “मुफ्त” मे बांटा जाता है. एक बार तो मुझे लगा कि शायद मै किसी सपने मे हू परंतु यह ग्रामीण गुजरात की वास्तविकता थी. कई-कई दिन घर से बाहर लोग पशुओ को चराते रहते है और एक गाडी पैसे देकर उन पशुओ का सारा दूध इकट्ठा कर यात्रियो के लिये चलने वाली सरकारी बसो की सहायता से शहर मे पहुचा देती है. परिणामत: उन सभी को रोजगार उनके घर पर ही मिल जाता है.           
कच्छ के सफेद रण और भगवान द्त्तात्रेय के मन्दिर जहा कभी लोग जाने से भी डरते थे परंतु आज दृश्य पूर्णत: बदल चुका है. नरेन्द्र मोदी द्वारा इन स्थानो को पर्यटन का रूप देने से आज देश ही नही विदेशो से भी लोग कच्छ के सफेद रण और भगवान द्त्तात्रेय के मन्दिर को देखने आते है. हर वर्ष रणोत्सव मनाया जाता है जिसमे गुजरात के ग्रामोद्योग को बढावा देने हेतु हस्तकला इत्यादि की प्रदर्शनी लागायी जाती है जिसे देखने लाखो की संख्या मे विदेशी सैलानी आते है. परिणामत: वहा के ग्रामीण समाज को रोजगार वही उपलब्ध हो जाता है.                 इतना ही नही भुज से लगभग 19 किमी दूर एशिया का सबसे उन्नत केरा नामक एक गांव है. इनके घर शहर की कोठियो जैसे ही है व इस गांव के हर परिवार का कोई न कोई सद्स्य एनआरआई है.   

                                                     Courtesy Photo
महिलाये देर रात तक बिना किसी भय के शहर/गांव व नदियो/झीलो के सौन्दर्य घाटो पर घूमती है. अहमदाबाद का चिडियाघर सौन्दर्यता का एक विशिष्ट उदाहरण है. कानून – व्यवस्था के बारे मे गुजरात के कुछ पुलिसवालो से बात करके पता चला कि उन्हे अपवाद स्वरूप ही महीने मे किसी झगडे इत्यादि मे जाना पड्ता है. और तो और ग्रामीण गुजरात मे मुझे कही भी हिन्दु-मुस्लिम समुदाय के बीच किसी भी प्रकार की विभाजन की रेखा देखने को नही मिली जैसा कि बारबार मीडिया द्वारा दिखाया जाता है. इतना ही नही एक आंकड़े के अनुसार गुजरात में मुसलमानों की स्थिति अन्य राज्यों से कही ज्यदा बेहतर है . ध्यान देने योग्य है कि भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा गुजरात के मुसलमानों की प्रतिव्यक्ति आय सबसे अधिक है और सरकारी नौकरियों में भी गुजरात - मुसलमानों का प्रतिशत अन्य राज्यो की तुलना मे अव्वल नंबर पर है .  और तो और एक बार तो पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के 84वे स्थापन दिवस के मौके पर  गुजरात के कृषि विकास को देखते हुए यहा तक कहा था कि जलस्तर में गिरावट , अनियमित बारिश और सूखे जैसे समस्याओ के बावजूद गुजरात 9 प्रतिशत की अभूतपूर्व कृषि विकास दर के माध्यम से भारत के अन्य राज्यों पर अपना परचम लहरा है जबकि भारत की कुल कृषि विकास दर मात्र 3 प्रतिशत है . विश्व प्रसिद्द ब्रोकरेज मार्केट सीएलएसए ने  गुजरात के विकास विशेषकर इन्फ्रास्ट्रक्चर , ऑटोमोबाइल उद्योग तथा डीएमईसी प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए यहाँ तक कहा कि नरेंद्र मोदी गुजरात का विकास एक सीईओ की तरह काम कर रहे है . यह कोई नरेंद्र मोदी को पहली बार सराहना नहीं मिली इससे पहले भी अमेरिकी कांग्रेस की थिंक टैंक ने उन्हें 'किंग्स ऑफ गवर्नेंस' जैसे अलंकारो से अलंकृत किया . नरेंद्र मोदी को  टाइम पत्रिका के कवर पेज पर जगह मिलने से लेकर ब्रूकिंग्स के विलियम एन्थोलिस, अम्बानी बंधुओ और रत्न टाटा जैसो उद्योगपतियों तक ने एक सुर में सराहना की है .
Courtesy:Hindu Jan Jagruti Samiti
नरेंद्र मोदी की प्रशासक कुशलता के चलते फाईनेंशियल टाइम्स ने हाल ही में लिखा था कि देश के युवाओ के लिए नरेंद्र मोदी प्रेरणा स्रोत बन चुके है . पाटण जिले के एक छोटे से चार्णका गाँव में सौर ऊर्जा प्लांट लगने से नौ हजार करोड़ का निवेश मिलने से वहा के लोगो का जीवन स्तर ऊपर उठ गया . ध्यान देने योग्य है कि अप्रैल महीने में  नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी काउंसिल जनरल पीटर तथा एशियाई विकास बैंक के अधिकारियों की मौजूदगी में एशिया के सबसे बड़े सौर ऊर्जा पार्क का उद्घाटन किया था जिससे सौर ऊर्जा प्लांट से 605 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा जबकि शेष भारत का यह आंकड़ा अभी तक मात्र दो सौ मेगावाट तक ही पहुंच पाया है . भले ही कुछ लोग गुजरात का विकास नकार कर अपनी जीविका चलाये पर यह एक सच्चाई है कि गुजरात की कुल मिलाकर 11 पंचवर्षीय योजनाओं का बजट भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना के बजट के लगभग समकक्ष है .                                        
गुजरात के सरदार बल्लभ भाई पटेल को स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री न बनाकर इतिहास मे एक पाप किया गया जिसकी सजा पूरा देश आज तक भुगत रहा है परंतु वर्तमान समय मे अब ऐसा कोई पाप न हो यह सुनिश्चित करना होगा. नरेन्द्र मोदी जो कि संघ के प्रचारक भी रहे है परिणामत: उन्हे समाज के बीमारी की पहचान होने के साथ-साथ उन्हे उसकी दवा भी पता है. अत: अपनी इसी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता के चलते आज भारत ही नहीं विश्व भी नरेंद्र मोदी को भारत का भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता है जिसकी पुष्टि एबीपी नील्‍सन ,  सीएनएन-आईबीएन और इण्डिया टुडे तक सभी के सर्वेक्षण करते  है और तो और  नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का अनुमान कई सोशल साइटो पर  भी देखा जा सकता है .   

राजीव गुप्ता स्वतंत्र पत्रकार है:  9811558925
मोदी का जादू क्या है ?