Saturday, May 31, 2014

भारतीय भाषायें लागू करने के लिए एक पत्र मोदी के नाम

 Sat, May 31, 2014 at 9:58 AM
आजादी के 67 साल बाद भी फिरंगी भाषा की दासता शर्मनाक
प्रतिष्ठा में,                                                                                                            30 मई,2014
श्री नरेन्द्र मोदी,
प्रधानमंत्री

भारत  

विषय- आजादी के 67 साल बाद भी देश की व्यवस्था को अंग्रेजी की दासता से मुक्त करके देश में भारतीय भाषायें लागू करने के लिए 
(1)संघ लोकसेवा आयोग (2) सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में जारी अंग्रेजी की अनिवार्यता हटाने के लिए
-संविधान एवं संसद की देख रेख में चल रहा है भारत में अंग्रेजी का विस्तार
जय हिन्द! मान्यवर, देश की आजादी के 67 साल बाद भी देश, उसी फिरंगी भाषा (अंग्रेजी) की दासता शर्मनाक ढ़ग से जकड़ा हुआ है जिसकी गुलामी से मुुक्ति के लिए देश के लाखों सपूतों ने अपना सर्वस्व बलिदान देते हुए शताब्दियों तक लम्बा ऐतिहासिक संघर्ष किया था। देश के हुक्मरानों की अंग्रेजी दासता के अंध मोह के कारण आज संसार का सबसे बडा लोकतंत्र अपने नाम, अपनी भाषा व अपने इतिहास के साथ साथ लोकशाही के लिए तरस रहा है। आज देश में न्यायपालिका सहित पूरी व्यवस्था में अंग्रेजी का ही राज चल रहा है। देश में सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में ही नहीं संघ लोकसेवा आयोग से लेकर शिक्षा, प्रतिष्ठा व रोजगार पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा की दासता में जकड़ा हुआ है। लोकशाही के नाम पर देश की सवा सौ करोड़ जनता को 15 अगस्त 1947 के बाद बैशर्मी से गूंगा बहरा बना कर लोकशाही व मानवाधिकार का गला ही घोट लिया है।
इसी फिरंगी भाषा की गुलामी से देश को मुक्त कराने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन तीन दशक से अधिक समय से निरंतर संघर्ष कर रहा है। देश की अस्मिता, सम्मान व लोकशाही को अंग्रेजी के अंध मोह में रौंद रहे हुक्मरानों की धृष्ठता को देख कर भारतीय भाषा आंदोलन ने 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर अखण्ड धरना दे कर देश की आजादी को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का ऐतिहासिक आंदोलन शुरू कर रखा है। हमारा साफ मानना है कि भले ही देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजाद हो गया हो परन्तु देश के हुकमरानों के फिरंगी भाषा के प्रति अंध मोह के कारण देश की आजादी आज भी 67 सालों से अंग्रेजी भाषा द्वारा गुलाम बनायी गयी है। पूरे तंत्र में उसी फिरंगी भाषा का राज चलने के कारण आज भी भारत राष्ट्रमण्डल देशों की प्रमुख ब्रिट्रेन की सम्राज्ञी का ही गुलाम बना हुआ है। जिस देश का अपने देश की ीााषा का शासन, न्याय, शिक्षा, रोजगार व सम्मान में राज न हो वह देश गुलामी से बदतर स्वयं भू गुलाम उसी विदेशी भाषा का होता है जिसका राज उस देश में चल रहा होता है।
आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था। उस प्रस्ताव को लागू करने के सवाल पर भारत का शासन एवं प्रशासन हमेशा से स्वयं को बचाता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को लागू करने का मामला हो या सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय में जनता की भाषा में सुनवाई का सवाल हो ! संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ स्वयं संसद ने भी अपने प्रस्ताव को संवैधानिक कारणों के चलते हमेशा दबाने की कोशिश ही की है। दरअसल कारण जो भी हो, डरावने सचों का सामना करने का जिगरा ना भारत की संसद एवं शासन व्यवस्था के पास बचा है और ना ही समाज के पास ! सब अपनी-अपनी सुविधानुसार कामचलाऊ झूठ के सहारे चल रहे हैं । अंग्रेजी का आरक्षण भारत में अनंतकाल तक चलता रहेगा ! यह डरावना सच भारत के संविधान में ही लिख दिया गया था। संविधान के इस भयानक सच पर कभी सीधी बात नहीं होती। क्योंकि संविधान सर्वोपरि है। लिहाजा अंग्रेजी का चक्रव्यूह अब गांवों तक को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। सर्वोच्च न्यायालय एवं संसद भी सर्वोपरि है। इन पर उंगली उठाना गुनाह है। यह डर भी जनता की नसों में उतारा जा चुका है। संविधान-संसद एवं सरकारों की देखरेख में अंग्रेजी की जड़ों को भारत की नसों में गहरे उतारने के साथ-साथ भारत की भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए भी सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर अपनी-अपनी सुविधानुसार ठग-विधाऐं भारत में चल रही हैं । ऐसी ही एक ठग विधा का आयोजन भारत सरकार की तरफ से प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर से शुरू होता है जो दो सप्ताह तक चलता है। इसमें सिर्फ ‘सरकारी ठग’ ही शामिल होते हैं। इस आयोजन के द्वारा अरबों रूपयों के उस फंड का औचित्य सिद्ध किया जाता है जो सरकार में बैठे ‘भाषा आंदोलनकारियों’ पर प्रत्येक वर्ष खर्च किया जा रहा है।
इन ‘सरकारी आंदोलनकारियों’ के प्रयासों के चलते सरकारी विभागों में भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिश पर लगभग 5 वर्ष में एक बार राष्ट्रपति के आदेश जारी करने की भी परम्परा है। परम्परागत राष्ट्रपति के ये आदेश किन रद्दी की टोकरियों के हवाले कर दिये जाते हैं, इसकी फिक्र ना कभी संसद को रही और ना ही राष्ट्रपति भवन को। भाषा के सवालों को लेकर संसद एवं राष्ट्रपति भवन के बीच चलती आ रही इस ठग विधा का यह दूसरा नमूना है। भारतीय भाषाओं के सवाल पर संविधान के बाद, अब तक ठगी एवं झूठ का सबसे बडा उदाहरण स्वयं संसद ने लगभग 45 वर्ष पूर्व 18 जनवरी 1968 को पेश किया था। भारतीय भाषाओं को लागू करने हेतु इस दिन संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था, उसका नाम दिया गया संसदीय संकल्प। वह संकल्प पिछले 45 वर्षों से कभी संसद के बाहर नहीं जा पाया। संसद के ओर संकल्पों की तरह यह संकल्प भी संसद की कैद में दर्ज हो चुका है। भारत में अनंतकाल तक अंग्रेजी के आरक्षण की संवैधानिक किलेबंदी के चलते, आखिर किस आधार पर संसद ने भारतीय भाषाओं को लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया? इस प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति क्या है? संसदीय प्रस्तावों के प्रति स्वयं संसद की जिम्मेदारी एवं जवाबदेही क्या है? भाषायी मुद्दे पर जनता की भावनाओं के साथ पिछले 45 वर्षों से जारी इस संसदीय छल पर किसे कटघरे में खडा करें? और कौन करे? कौन देगा इन सवालों के जवाब?
कुछ ऐसे ही सवालों के उत्तरों की तलाश में, हिन्दुस्तान में अंग्रेजी को बलात थोपने के सबसे बडे़ केन्द,्र संघ लोक सेवा आयोग पर 16 अगस्त 1988 से विश्व के सबसे लम्बे धरने की शुरूआत हुई। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाऐं भारतीय भाषाओं में हो! भाषा आंदोलनकारियों की इस मांग से सहमति जताते हुए 175 संसद सदस्यों ने भी अपने हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह को दिया था। 12 मई 1994 को पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के नेतृत्व में देश के सभी शीर्ष राजनीतिक नेताओं/दलों का सामूहिक धरना संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य द्वार पर दिया गया। इसमें राष्ट्रीय समाचार पत्रों के सम्पादकों, 50 से अधिक संसद सदस्यों, विधायकों, पूर्व राज्यपालों सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया। इसी दिन संसद के दोनों सदनों में सभी दलों ने मुखर होकर भारतीय भाषाओं के सवाल पर अपना पक्ष रखा। लेकिन संविधान के अनुच्छेदों में पद, पैसा एवं प्रतिष्ठा केवल अंग्रेजी वर्ग के लिए आरक्षित कर दिये जाने की किसी ने चर्चा नहीं की। लिहाजा वह भाषायी आक्रोश हमेशा की तरह केवल रस्म अदायगी बन कर रह गया।
विवश होकर भाषा आंदोलनकारियों ने स्वयं संसद में भाषा के सवाल पर देश का ध्यान आकर्षित करने की योजना बनायी। 21 अप्रेल, 1989 एवं 10 जनवरी 1991 को आंदोलनकारी संसद में प्रवेश कर गये। नारेबाजी एवं पर्चे फेंकने की घटना के बीच एक आंदोलनकारी भी दर्शक दीर्घा से नीचे लोक सभा में कूद गया। नतीजा सिर्फ इतना निकला कि वह अपनी पसलियां तुडवाकर दो महीने अस्पताल में रहा और संसद ने 18 जनवरी 1968 के उस बेजान प्रस्ताव को पुनः अगले दिन ध्वनिमत से पारित कर अपने हाथ खडे़ कर दिये। संघ लोक सेवा आयोग पर चल रहे निरंतर धरने को लगभग 14 वर्ष हो चुके थे। इसी बीच अनेक सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से आंदोलनकारियों की सीधी झडपें भी हुई। अनेक विरोध प्रदर्शनों, आमरण अनशन एवं लम्बे धरने से आजीज आकर भारतीय भाषाओं को लागू करने के बजाय, अचानक सरकार की देखरेख में धरने को नेस्तनाबूद कर दिया गया, आंदोलकारियों का सामान, तम्बू आदि उखाडकर फेंक दिये गये। संसद द्वारा पारित प्रस्ताव को लागू करने के लिए चल रहे अनवरत सत्याग्रह को तहस-नहस करने की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही पर किसी भी राजनीतिक दल एवं नेता ने अपना विरोध नहीं जताया। संसद में भाषाओं के सवाल पर मुखर रहने वाले नेताओं ने भी अपने मुंह सिल लिए थे। संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय ने भी सचमुच आंखों पर पट्टी बांध ली थी। अंग्रेजी की इन पट्टियों को सारे हिन्दुस्तानी मिलकर नोंचे! संसद की चैखट पर पुनः ऐसी एक शुरूआत संघ लोक सेवा आयोग के कुछ जिंदा बचे पुराने सत्याग्रहियों ने कर दी है। ताकि संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय जैसे शीर्ष संवैधानिक संस्थानों से भारतीय भाषाओं की बहाली का मार्ग प्रशस्त होकर भारत के गांवों तक जाऐ। हमें आशा है कि आप देश की लोकशाही की हो रही इस दुर्दशा को देख कर शीघ्र ही देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति दिलाने के अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करेंगे ।
संघ लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी का आरक्षण
सर्वोच्च न्यायालय व अधिकांश उच्च न्यायालय की तरह, संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी का आरक्षण बरकरार है। जून 2011 से सिविल सेवा की प्रा. परीक्षा में 22.5 अंक का अंग्रेजी का प्रश्न पत्र अनिवार्य कर दिया गया है, अंग्रेजी एवं किसी एक भारतीय भाषा के अनिवार्य प्रश्नपत्र के अलावा। संसद से लेकर सड़क पर जनप्रतिनिधियों व प्रबुद्ध लोगों ने पुरजोर विरोध किया। इसके बाबजूद अंग्रेजी की सर्वोच्चता व भारतीय भाषाओं की उपेक्षा का षडयंत्र जारी है। सिविल सेवा के अलावा आयोग द्वारा ली जा रही अन्य अखिल भारतीय सेवाऐं, जिनमें भारतीय भाषाओं को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है-
क्र.सं. परीक्षा माध्यम
1. सम्मिलित चिकित्सा सेवा परीक्षा अंग्रेजी
2. इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा अंग्रेजी
3. भारतीय वन सेवा परीक्षा अंग्रेजी
4. स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिस परीक्षा अंग्रेजी
5. भारतीय आर्थिक सेवा अंग्रेजी
6. भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा अंग्रेजी
7. भूविज्ञानी परीक्षा अंग्रेजी
8. सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा अंग्रेजी का 100 अंक का प्रश्न पत्र अनिवार्य
9. राष्ट्रीय रक्षा अकादमी अंग्रेजी का 100 अंक का प्रश्न पत्र अनिवार्य
10. केन्द्रिय पुलिस बल परीक्षा ...........................................
12. अनुभाग अधिकारी परीक्षा ...........................................
नोट- उपरोक्त परीक्षाओं के अलावा अन्य विभागीय परीक्षाओं में भी लिखित एवं साक्षात्कार में केवल अंग्रेजी का माध्यम है।
भारतीय भाषा आंदोलन
डा बलदेव वंशी                   पुष्पेन्द्र चैहान (संयोजक)                        देवसिंह रावत(महासचिव)
                                     दूरभाष- ; 9999590115. ;                          9910145367                          
महेशकांत पाठक (धरना प्रभारी)                                                         देवेन्द्र भगत

Thursday, January 2, 2014

PAU - एक उमीद ..एक संकल्प//सिद्धार्थ शर्मा

Thu, Jan 2, 2014 at 12:36 PM
सप्त दिशा के सारे मण्डल सब ने खोजे होंगे 
मैने तो भारत खोजा है PAU  के अन्दर
सप्त दिशा के सारे मण्डल 
सब ने खोजे होंगे 
मैने तो भारत खोजा हैं 
PAU  के अन्दर 
भरत बीज संजीवन करना
इसको मैं सम्मान कहू 
हर किस्लय मुझ से खिल जाए 
इसको मैं वरदान कहू 

बडे बडे विद्दालयों ने 
manager बांटे होंगे 
मैने तो leader देखे हैं 
इस छोटे घर के अन्दर 

हे PAU ! ! ! हे सखा मेरे ! ! ! 
इस देश में भूखी जनता हैं 
जन जन कि भूख मिटानी हैं 
ये धर्म मेरा ही बनता हैं 

सप्त दिशा के सारे मण्डल 
सब ने खोजे होंगे 
मैने तो भारत खोजा हैं 
PAU  के अन्दर   

-सिद्धार्थ शर्मा (सत्र 2004-08)
Best Poet Inter college PAU youth Fest (2004-05 & 2005-06)

Tuesday, December 31, 2013

बाबा रामदेव चलाएंगे पहली मार्च से घर-घर जाकर वोट फार मोदी कैंपेन

Tue, Dec 31, 2013 at 1:58 PM
कहा-लोगों को पानी मुफ्त देना सरकार का दायित्व
केजरीवाल ने नया क्या किया
अमृतसर: 31 दिसंबर 2013 : (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन//हिंदी स्क्रीन): 
देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने और विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार से टक्कर लेने वाले योग गुरु बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया है, कि इस समय देश को नरिंदर मोदी जैसे दिग्गज नेता की जरूरत है, जो लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने में समर्थ हैं। वह आज अमृतसर पहुंचे थे। पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने कहा, कि 2014 में देवत्व की स्थापना के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी उनका आंदोलन जारी रहेगा। अपने आंदोलन के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा, कि एक मार्च से वह और उनके कार्यकर्ता पूरे देश में घर-घर जाकर वोट फार मोदी और भ्रष्टाचार समेत अन्य मुद्दों के खिलाफ वोट करने के लिए लोगों से अपील करेंगे। इसके अलावा 23 मार्च को शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में वह दिल्ली में एक बहुत बड़ा योग कैंप लगा रहे हैं, जिसमें एकसाथ पूरे देश में करीब दस करोड़ लोग एकसाथ योगाभ्यास करेंगे।
   नरिंदर मोदी के प्रचारक के रूप में बाबा रामदेव के आगे आने के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा, कि वह नरिंदर मोदी के प्रचारक नहीं है। बल्कि वह इसलिए उनका साथ दे रहे हैं, क्योंकि नरिंदर मोदी और उनके मुद्दे एकसमान है। इसलिए वह नरिंदर मोदी का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। आम आदमी पार्टी की ओर से सत्ता में आते ही लोगों को मुफ्त पानी जैसी सुविधा दिए जाने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, कि इसमें केजरीवाल ने नया क्या किया। उन्होंने कहा, कि पहले आम आदमी पार्टी को अपनी विचार धारा स्पष्ट करनी होगी कि उनकी विचारधारा वामपंथी है या कुछ और। दिल्ली में नरिंदर मोदी के जादू के फेल होने के बारे में बाबा रामदेव ने कहा, यदि वहां मोदी फैक्टर नहीं चला होता, तो भाजपा की हालत कांग्रेस से भी बदत्तर होती।

Sunday, September 22, 2013

काव्य रचना// रिवाज़// डॉ अ कीर्तिवर्धन

दीवार खिंची आँगन में,मन भी बँट गए,
जब से अलग चूल्हे का चल गया रिवाज !

रहते थे एक घर में ,परिवार एक साथ,
अकेले रहने का अब चल गया रिवाज़ |

टूटने लगे हैं घर जब से गली गाँव में,
बच्चों के मन से बुजुर्गों का मिट गया लिहाज |

दीवार खिंची आँगन में,मन भी बँट गए,
जब से अलग चूल्हे का चल गया रिवाज |

दीवारें क्या खिंची माँ-बाप बँट गए,
बताने लगे हैं बच्चे अब खर्च का हिसाब |

मुश्किल है आजकल बच्चों को डांटना,
देने लगे हैं बच्चे हर बात का जवाब |

दिखते नहीं हैं बूढों के भी बाल अब सफ़ेद,
लगाने लगे हैं जब से वो बालों में खिजाब |

दौलत की हवस ने "कीर्ति" कैसा खेल खेला,
बदल गया है आजकल हर शख्स का मिजाज |


डॉ अ कीर्तिवर्धन अपने लेखों आलेखों की तरह काव्य रचना में भी अपनी कला अक्सर दिखाते रहते हैं। 
उनका सम्पर्क नबर है:
8265821800


काव्य रचना// रिवाज़// डॉ अ कीर्तिवर्धन

Friday, September 13, 2013

डॉ अ कीर्तिवर्धन पर रचनाएं आमंत्रित

Fri, Sep 13, 2013 at 1:47 PM
आदरणीय ,
                विषय :- डॉ अ कीर्तिवर्धन  की समग्र पड़ताल करता सुरसरी का विशेषांक।
बड़े ही हर्ष के साथ सूचित करना चाहते हैं कि बिहार से प्रकाशित सुप्रसिद्ध साहित्यक पत्रिका “ सुरसरी “ ने डॉ अ कीर्तिवर्धन के समग्र व्यक्तित्व , कृतित्व एवं साहित्यक यात्रा का मूल्यांकन करने का निर्णय लिया है

वरिष्ठ साहित्यकार , सरल , सहज , मानवीय दृष्टिकोण से ओत -प्रोत डॉ अ कीर्तिवर्धन सम्पूर्ण देश में जाने - पहचाने व पढ़े जाते हैं।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उनके अनेक पाठक, शुभचिंतक व मित्र हैं।  आपकी अब तक सात पुस्तकें प्रकाशित हैं , जिनमे से बाल साहित्य पर “ सुबह सवेरे “ , बुजुर्गों की दशा - दिशा पर प्रथम ग्रन्थ के रूप में मान्य “ जतन से ओढ़ी चदरिया “ तथा  आलेखों का संग्रह “ चिंतन बिंदु “ बहुचर्चित रही हैं।  अनेक पत्र -पत्रिकाओं में सहयोगी , अतिथि सम्पादक, परामर्शद डॉ वर्धन समाज सेवा व ट्रेड यूनियन से भी जुड़े हैं। वह बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं।

साहित्यक उपलब्धियों के रूप में 400 से अधिक पत्र -पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं का निरंतर प्रकाशन, 60  से अधिक सम्मान व उपाधियाँ , अनेकों रचनाओं का कोंकण , तमिल , नेपाली , उर्दू , अंगिका , मैथिलि व अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद व प्रकाशन तथा अनेकों संस्थाओं से सम्बद्धता है।  आप उत्तर प्रदेश साहित्यकार स्वाभिमान समिति के सदस्य , दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मलेन के कार्यकारिणी सदस्य , अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ,मुज़फ्फरनगर ईकाई के अध्यक्ष होने के साथ साथ अनेकों संस्थाओं के उत्तर प्रदेश संयोजक भी हैं।

श्री कीर्तिवर्धन जी का जन्म शामली में हुआ और वर्तमान में आप नैनीताल बैंक की मुज़फ्फरनगर शाखा में कार्यरत हैं।  आप पिछले 33  वर्षों से बैंक में सेवारत है। नैनीताल बैंक स्टाफ एसोसिएशन के महामंत्री व ट्रेड यूनियन के विभिन्न पदों पर रहते हुए आपने अपनी कार्यकुशलता के साथ जुझारू छवि स्थापित की।  वर्तमान में आप नैनीताल बैंक इम्पलाईज यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।  आपकी कार्य प्रणाली तथा मृदु व्यवहार बैंक के ग्राहकों , साथी कर्मचारियों एवं प्रबंधकों द्वारा भी सराहनीय रहा है।  

वर्धन जी की लोकप्रियता , सहजता , सरलता तथा साहित्यक उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए सन 2011 में प्रमुख राष्ट्रीय पत्रिका “ कल्पान्त “ ने भी उन पर केन्द्रित “ साहित्य का कीर्तिवर्धन “ विशेषांक प्रकाशित किया था , जिसकी व्यापक चर्चा तथा प्रसंशा हुई थी।  आपकी कवितायें , शोध आलेख तथा निबन्ध अपनी अलग शैली के कारण पहचान छोड़ते हैं।  समीक्षा करने की समालोचनात्मक दृष्टि उन्हें विशिष्ट बनाती है तो पुस्तकों की भूमिका लिखते  समय वह प्रेरणा व प्रोत्साहन देते दिखाई पड़ते हैं।

आदरणीय , आप कीर्तिवर्धन जी के बाल सखा, विद्यार्थी जीवन के साथी , सामाजिक कार्यों के सहयोगी , ट्रेड यूनियन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले मित्र , साहित्य में पाठक , प्रसंशक , अग्रज , बैंक में ग्राहक एवं साथी , रिश्तेदार , दोस्त , समाज सेवा के क्षेत्र में उनके अग्रणीय यानि किसी न किसी रूप में कीर्तिवर्धन जी से जुड़े रहे रहे हैं , उनके कृतित्व व व्यक्तित्व के पहलुओं से परिचित हैं।  

हमारा आपसे अनुरोध है कि आप अपनी यादों एवं कीर्तिवर्धन जी के साथ लिए गए अनुभवों मे से कुछ हमारे साथ साझा करें।  उनके साथ लिए गए विभिन अवसरों के फोटो तथा आपके संस्मरण पत्रिका को गरिमा प्रदान करेंगे तथा कीर्तिवर्धन जी के व्यक्तित्व को भी नई उंचाईयां प्रदान करेंगे।

सभी पत्र - पत्रिकाओं के सम्मानित संपादकों से भी विनम्र अनुरोध है कि इस विज्ञप्ति को अपनी पत्रिका में स्थान प्रदान कर अनुगृहित करें तथा अपने विचारों से भी अवगत कराने की कृपा करें।

माननीय , आपसे अनुरोध है कि डॉ अ कीर्तिवर्धन से सम्बंधित अपने संस्मरण , विचार , उनकी पुस्तकों पर समीक्षा , कविताओं का मूल्याङ्कन ,  उनके साथ बिताये गए क्षणों के चित्र , शुभकामना सन्देश , आशीर्वचन , उनकी रचनाओं का किसी अन्य भाषा में अनुवाद आदि हमें निम्न पते पर अथवा सीधे डॉ कीर्तिवर्धन जी को निम्न पते पर प्रेषित करें।  

आप सम्बंधित सामग्री e mail से भी भेज सकते हैं -------
कृपया अपना फोटो भी संलग्न करें।
                                                                                     
पता --                                                                               निवेदक
डॉ अ कीर्तिवर्धन                                                     अश्विनी कुमार आलोक                                           
विद्यालक्ष्मी निकेतन                                               सम्पादक - “ सुरसरी “
53 -महालक्ष्मी एन्क्लेव ,जानसठ रोड ,                     प्रोफेसर्स कॉलोनी, महनार
मुज़फ्फरनगर -251001 (उत्तर प्रदेश)                        वैशाली -844506 ( बिहार )

08265821800                                                      09801699936

a.kirtivardhan@gmail.com                                 ashwinikumaralok@gmail.com

Friday, August 30, 2013

पंखे की जगह भारत की घड़ी चल रही है...!

मेरठ कैंट के रहने वाले मित्र Ravinder Singh Sethi ने एक रचना फेसबुक पर पोस्ट की है जिसे अग्रिम धन्यवाद सहित यहाँ भी प्रकशित किया जा रहा है। यह रचना उनकी है या किसी और की अभी यह भी स्पष्ट नहीं है पर यह रचना देश की जिस दुखद और चिंतनीय हालत पर काव्यपूर्ण व्यंग्य शैली में बहुत प्रकाश डालती है वह देश और उसकी यह हालत हम सब की अवश्य है। इस हालत से उबरने और सुधरने की ज़िम्मेदारी भी हम सब की है। इस रचना पर आप क्या चाहते हैं आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। ---रेक्टर कथूरिया  
एक आदमी ने धरती से किया प्रस्थान... 
यमराज के कक्ष में
घड़ियां देखकर रह गया हैरान..
हर देश की अलग घड़ी थी...
कोई छोटी, कोई बड़ी थी...
कोई दौड़ रही, कोई बंद, कोई तेज, कोई मन्द...
उनकी अलग-अलग रफ्तार देखकर
आदमी चकराया...
कारण पूछा तो यमराज ने बताया...
हर घड़ी की उसी हिसाब से है रफ्तार..
जिस हिसाब से हो रहा है उस देश में
भ्रष्ट्रचार..

आदमी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई...
लेकिन भारत की घड़ी कहीं भी नजर
नहीं आई..

आदमी मुस्कुराया, यमराज के कान
में फुसफुसाया..
कांग्रेस वाले भ्रष्टाचार यहां भी ले
आए..
सच-सच बताओ, घड़ी न रखने के
कितने पैसे खाए..

यमराज बोले: तेरे शक की सुई तो
बिना बात उछल रही है..
मेरे बेड रूम में जाकर देख ..
..
पंखे की जगह भारत की घड़ी चल
रही है...

Tuesday, August 20, 2013

अब चौरासी कोसी परिक्रमा पर भी चला सरकारी डंडा

                                                                                                                                    Tue, Aug 20, 2013 at 2:35 PM
अयोध्या एक बार फिर से सियासी आग की चपेट में 
लेखक राजीव गुप्ता
संतो की अगुआई और विश्व हिन्दू परिषद के सहयोग से चलने वाली आगामी 25 अगस्त से अयोध्या-क्षेत्र में प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा यात्रा को उत्तरप्रदेश सरकार ने अनुमति देने से मना कर दिया. जिसके चलते देश भर में  हर जगह उत्तरप्रदेश सरकार के इस रवैये का विरोध हो रहा है. चुनाव के नज़दीक आते-आते शांत रहने वाला अयोध्या एक बार फिर से सियासत की आग की चपेट में आ गया है. उत्तरप्रदेश के प्रमुख गृहसचिव आरएम श्रीवास्तव के अनुसार अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को चैत्र पूर्णिमा से बैशाख पूर्णिमा तक (25 अप्रैल- 20 मई) पारंपरिक तरीके से इस वर्ष में संपन्न करवा दिया गया है तो इसका क्या यह अर्थ लगाया जाय कि अब इस वर्ष कोई भी अयोध्या की चौरासी-कोसी परिक्रमा नही कर सकता ? क्या शासन व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं पर भी नियंत्रण करेगा ? सौभाग्य से मेरा जन्म अयोध्या के चौरासी कोसी परिक्रमा क्षेत्र के समीप ही हुआ है और हम अपनी-अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं के अनुरूप बचपन में वर्ष में दो-तीन बार भी अयोध्या जी की चौरासी-कोसी परिक्रमा करते थे. अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा का अनुष्ठान अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार वर्षभर में कोई भी, कभी भी और कई बार भी कर सकता है. संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता के चलते प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार दिया है और सत्ता की यह जवाबदेही होती है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन न होने दे. इसके लिए ही देश में कानून व्यवस्था बनाये रखने हेतु केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने अर्द्धसैनिक बलों का गठन किया गया है.

उत्तरप्रदेश सरकार का यह तर्क गले नही उतरता है कि उसे इस प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा से अगर राज्य में कानून व्यवस्था भंग होने का अन्देशा है. अगर राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने हेतु उसके पास पी.ए.सी के जवान कम पड रहे है तो वह अन्य राज्यों अथवा केन्द्र से अधिक संख्या में अर्द्धसैनिकों की मांग कर सकती है. अगर उत्तरप्रदेश सरकार अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए इस विषय पर स्थानीय स्तर पर ही संभाल लेती तो इस विषय का समाधान वही हो जाता और इसका सीधा असर उसकी छवि पर भी पडता. सरकार के इस रवैये के चलते किसी भी समुदाय के लोगों को किसी भी प्रकार की आपत्ति नही होती साथ ही समाज़-सत्ता के टकराव को भी रोका जा सकता है. परंतु उत्तरप्रदेश सरकार ने ऐसा न करके अब इस विषय को देशव्यापी बनाते हुए इसका राजनीतिकरण कर दिया है. जिसके फलस्वरूप उत्तरप्रदेश सरकार के इस तानाशाही रवैये के चलते देश की कानून-व्यवस्था ही दांव पर लग गई है. अत: अब देश की कानून – व्यवस्था भंग न हो इसके लिए केन्द्र सरकार को अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उत्तरप्रदेश सरकार को यह आश्वासन देते हुए कि उसे पर्याप्त संख्या में अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध करवाये जायेंगे, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जनित उसके इस तनावपूर्ण फैसले पर हस्तक्षेप करते हुए उसे अपने फैसले को वापस लेने के लिये बाध्य करे. ताकि देश में तनाव बढने की बजाय एक सकारात्मक सन्देश जाए.

उत्तरप्रदेश सरकार ने विहिप की प्रस्तावित चौरासी कोसी परिक्रमा पर अब तक चली आ रही चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर नई परंपरा डालने का आरोप लगाया. दरअसल इसी विषय पर अपना मत स्पष्ट करने हेतु ही संतो की अगुआई में अशोक सिंहल समेत एक दल मुलायम सिंह यादव से 10 अगस्त को मिला था और मुलायम सिंह यादव ने उन्हे इस चौरासी कोसी परिक्रमा के अनुष्ठान को पूर्ण करने की मौखिक स्वीकृति भी दी थी. वास्तव में यह विवाद बारबंकी के टिकैतपुर से लेकर गोंडा तक के कुछ किमी. तक नये मार्ग को लेकर है. ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान समय में सरयू नदी का जलस्तर बढ जाता है जिससे सरयू नदी को नाव की सहायता से पार करना संभव नही है. इसलिये विहिप ने एक विकल्प के रूप में नया मार्ग चुना. अगर उत्तरप्रदेश सरकार को विहिप के इस वैकल्पिक नये मार्ग से कुछ परेशानी है तो इस बारे में विहिप ने लचीला रूख अपनाया है. उत्तरप्रदेश सरकार को बजाय चौरासी कोसी परिक्रमा रोकने के विहिप को संवाद हेतु आमंत्रित कर इस समस्या का हल ढूंढना चाहिए.

अगर यह टकराव जल्दी ही नही खत्म नही हुआ तो अयोध्या की इस चौरासी कोसी परिक्रमा का भी राजनीतिकरण होना तय है. जिसका असर आने वाले चुनावों पर भी पडेगा. उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उठाये गये इस तानाशाही कदम से विशुद्ध रूप से राजनैतिक कदम है क्योंकि इस टकराहट से हिन्दू और मुस्लिम वोंटो का जबरदस्त ध्रुवीकरण होगा. जिसका लाभ भाजपा और सपा दोनो ही दल उठायेंगे. भाजपा बहुसंख्यंको को रिझाने का प्रयास करेगी और सपा अल्पसंख्यकों पर डोरे डालेगी. इससे पहले भी अयोध्या का राजनीतिकरण हो चुका है. ध्यान देने योग्य है कि मुलायम सिंह यादव जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन्होने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था तबसे लेकर आजतक बहुसंख्यक समाज मुलायम के साथ मन से नही जुड पाया है. लोग कुछ इसी तरह भाजपा पर भी विश्वासघात का आरोप लगाते है. वे तर्क देते है कि भाजपा राममन्दिर निर्माण के मुद्दे पर ही सत्ता में आयी थी और सत्ता में आते ही उसने सबसे पहले अपने एजेंडे में से राममन्दिर-निर्माण के मुद्दे को ही निकाल दिया. यहाँ यह स्पष्ट होना चाहिए कि भाजपा के एजेंडे में आज भी राममन्दिर – निर्माण का विषय है. अटल जी की अगुआई में सरकार एनडीए की बनी थी न कि भाजपा की. भाजपा ने देश को स्थायी सरकार देने हेतु ही एनडीए का गठन किया था. एनडीए गठन के समय यह तय किया गया था कि अगर विवादित विषय धारा 370, राम-मन्दिर निर्माण जैसे विषयों को अलग कर दिया जाय तो देश को एक स्थायी सरकार मिल सकती है. इसी को ध्यान रखते हुए भाजपा ने सभी विषयों को यथावत अपने एजेंडे मे ही रखा और एनडीए के एजेंडे में से सभी विवादित विषयों को हटा दिया था. जिसके चलते लोग आज भी भाजपा पर विश्वासघात का आरोप लगाते है. अयोध्या में राममन्दिर निर्माण का विषय इस समय देश की सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है. अत: आस्था के इस विषय पर राजनीति करने का अधिकार किसी भी राजनैतिक दल को नही है. राममन्दिर निर्माण के नाम पर देश का ध्यान भटकाने की अपेक्षा उत्तरप्रदेश सरकार जल्दी से जल्दी अयोध्या की चौरासी कोसी यात्रा पर अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे. क्योंकि समाज-सत्ता का टकराव किसी भी सूरत में देश-हित के लिए ठीक नही होता और दोनो पक्षों को टकराव की बजाय आपस में संवाद कर  इस समस्या का हल  निकालना चाहिये.        -राजीव गुप्ता, 09811558925