Wednesday, June 7, 2023

आम जनता के जीवन को भी नज़दीक से देखा है लेखिका सुमिता ने

आंच में हैं गहन संवेदना का अहसास करवाती कविताएं 

मोहाली: 7 जून 2023: (कार्तिका कल्याणी सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सुमिता कुमारी उन कलमकारों में से हैं जो सत्ता में या सत्ता के नज़दीक रहते हुए भी अपने अंतर्मन में छुपे हुए  लेखक को जागरूक रखते हैं। आसपास के क्षेत्र में सब कुछ बारीकी से देखते भी हैं और फिर उसे बहुत ही सलीके से व्यक्त भी करते हैं। जब अनुभूति की अभिव्यक्ति का ढंग शायरी हो तो ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। इस ज़िम्मेदारी का अहसास आपको सुमिता जी की रचना में नज़र भी आएगा। गहनता से महसूस भी होगा। 

डयूटी के साथ साथ कलम की साधना आसान नहीं होती। बहुत से अनुशासन और बहुत से नियम--सब याद रखना पड़ता है। इस सब के बाद सम्भव हो पति है साहित्य की साधना। सुमिता कुमारी का जन्म 12 जून, 1983 को रामपुर नगवाँ, पालीगंज, पटना (बिहार) में हुआ। वह इतिहास एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर हैं। उनकी कविताएँ एवं कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ‘मौसम बदलने की आहट’ नामक कविता-संग्रह में कुछ कविताएँ शामिल हैं। ‘आँच’ उनका पहला कविता-संग्रह है। शायरी बहुत ही कोमल संवेदना भरी साधना होती है और इसके ज़रिए निष्ठुर समाज की बात करना बेहद मुश्किल भी होता है लेकिन सुमिता जी ने यह सब आसानी से किया। उनका काव्य संग्रह आंच बताता है कि उनकी काव्य साधना को अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान कितना तपना पड़ा होगा। कैसे कैसे हालात सामने आए हो सकते हैं।   

कलम और जीवन दोनों के दरम्यान संतुलन भी सहज नहीं होता। वर्तमान में वह बिहार के नालंदा में  प्रखंड विकास पदाधिकारी हैं। इसलिए समाज के बहुत से वर्गों के साथ उनका आमना सामना होता ही है। समाज के इन विभिन्न वर्गों के विभिन्न जीवन ढंग, दोगले चेहरे और गिरगिट की तरह बदलते रंग उन्होंने सब बहुत नज़दीक से देखा होगा।

उनमें कलम की क्षमता अद्भुत है। सुमिता कुमारी प्रतिभावान कवि और गद्यकार हैं। उन्होंने अपने आस-पास के जीवन को भी कविता में ढाला है और इस तरह कुछ मर्मस्पर्शी कविताओं की भी रचना की है। इन कविताओं की विशेषता यह है कि यह पहली बार पढ़ने या सुनने पर ही दिल में उतरती चली जाती हैं।  एक महिला होने के नाते उन्होंने महिला जीवन की विषमताओं और कठिनाइयों को भी नज़दीक से देखा। 

महिला जीवन को जब कोई महिला देखती है तो उसकी नज़र वो सब भी देख पाती है जिसे देखना या समझना सब के बस में होता ही नहीं। अगर इस पीड़ा को देखने समझने वाली महिला लेखिका भी हो तो बात ही कुछ और हो जाती है। उनको पढ़ने वाले प्रबुद्ध पाठक बताते हैं कि यहाँ स्त्रियों के पारिवारिक जीवन और श्रमिक स्त्रियों के संघर्ष तथा जीवट के नए चित्र मिलते हैं। ‘आँच’ शीर्षक कविता जीवन-संग्राम और प्रतिरोध की विशिष्ट कविता है। धान रोपती स्त्रियों और वृद्धाओं के जीवन के विश्वसनीय रेखांकन द्रवीभूत करते हैं। इन कविताओं की तेज आँच हमें तप्त कर देती है। अधिकांशतः ये कविताएँ गद्यबद्ध हैं। कहीं-कहीं लय का भी मिश्रण है। भाषा सरल, सहज और मुहावरेदार है। मगही के अनेक शब्दों का निपुण व्यवहार कवि की सृजन-क्षमता को दर्शाता है और उनकी रचनाओं को अद्वितीय बनाता है। कुछ नए बिम्ब और अलंकरण भी कवि ने सिरजे हैं। मगही भाषा की समृद्धि का समुचित उपयोग हिन्दी कविता में कम ही हो पाया है। इस तरह इस पुस्तक में संकलित रचनाओं ने इस पुस्तक को उन पुस्तकों के वर्ग में भी ला दिया है जो भाषा को अमीर बनाने में अपना योगदान देती हैं। 

उनको नज़दीक से जानने वाले साहित्यकार और कलाकार बताते हैं कि पेशे से प्रशासनिक पदाधिकारी होते हुए भी सुमिता जी ने निरन्तर काव्य-साधना की है और जीवन को बहुत ध्यान से देखा है। बहुत बारीकी से जीवन के उतराव चढ़ाव का जहां अध्यन किया है। लोगों के जीवन और उनके दुःख सुख बहुत ही नज़दीक हो कर देखे हैं। वास्तव में बाहरी दुनिया के साथ-साथ आन्तरिक दुनिया का भी वह अनवरत अवलोकन करती रहती हैं और इसके साथ साथ अत्यन्त व्यस्त दिनचर्या के बावजूद भी काव्य-रचना के लिए किंचित अवकाश निकाल ही लेती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए पाठक इसीलिए खो से जाते हैं क्यूंकि इन कविताओं में आवेग और त्वरा है जो सुमिता जी को बाक़ी सभी समकालीनों से पृथक एक विशिष्ट स्थान पर स्थापित करती है। इसलिए देश और दुनिया के साहित्य से भी उनका सम्पर्क निरंतर बना रहता है। वह पाठकों के पत्रों का जवाब भी देती हैं और उनके व्हाटसएप्प संदेशों का भी। समय मिलने पर आयोजनों में शामिल होने का भी प्रयास करती हैं। 

जल्द ही हमें उनकी काव्य रचनाओं और अन्य रचनाओं का नया संकलन भी मिले ऐसी आशा भी है और आकांक्षा भी। हम जल्दी ही देख पाएंगे उनकी नई पुस्तक इसकी उम्मीद हम भी को है। उनकी काव्य रचनाओं को पंजाबी और अन्य भाषाओं में अनुदित करने की संभावनाओं पर भी बात जल्दी ही हम सभी के पास खुशखबरी बन कर आएगी।  

देखिए उनकी एक रचना का रंग भी:

प्रेम//सुमिता

आसान नहीं था 

उसे जिंदगी में वापस खींच लाना

सब कुछ देकर ही तो उसने यह जिंदगी चुनी थी

वह हंसता-गाता और रोता भी था

लेकिन खुद को समभाव ही दिखाया सबको

मानवीय भावनाएं उसे साबित कर सकती थी सांसारिक

उसने कभी वादा किया था 

कि उसे सौंप देगा अपने जीवन का बसन्त

और पतझड़ में बिखरते हुए भी

उसने किसी सावन में भीगना नहीं चुना

उसे जिंदगी से मोह बस इतना था 

कि जिंदगी किसी की अमानत है

और देह से अपनापन इतना ही 

कि देह ने बसा रखी है किसी और की आत्मा

जिसका त्याग उसकी हत्या के बराबर है

उसे देखकर महसूस होता 

कि विरक्त-सा यह आदमी

लड़ रहा है युद्ध 

स्वयं के विरुद्ध

अपनी काया में जी रहा है अनागत अस्तित्व

जो कभी उसके जीवन का हिस्सा न बन सका


वह आंखें कितनी अनमोल होंगी 

उसकी बातें कितनी मर्मस्पर्शी

जिसमें डूबकर 

कोई सारी उम्र पार नहीं उतरना चाहता

भूल जाना चाहता है दुनियां

लेकिन उसे नहीं भूलना चाहता

उसके जाते

दुनियां में प्रेम करने लायक कुछ नहीं रहा


यह किसका भाग्य है किसका दुर्भाग्य

कितना उचित है कितना अनुचित

बहस का मुद्दा हो सकता है

मगर आधुनिकता के दौर में 

ऐसी आत्माओं ने ही बचा रखी है

प्रेम की आत्मा...

सुमिता (27-01-23)

आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। 

                                                                                 प्रस्तुति:कार्तिका कल्याणी सिंह (हिंदी स्क्रीन डेस्क)

Thursday, April 13, 2023

प्रेम में हारे हुए पुरुष//शिखा पांडेय

गहरे अहसास की गहरी रिपोर्ट जैसी है यह पोस्ट 


सोशल मीडिया
: 13 अप्रैल 2023: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

सोशल मीडिया का ज़माना है। यह  बात अलग है कि आजकल केवल सियासत से जुडी बातों का ही गंभीरता से नोटिस लिया जाता है जबकि बहुत कुछ और भी होता है जिसे पढ़ते, सुनते जा देखते हुए मन में बहुत कुछ कौंधने लगता है। ऐसी ही एक रचना गत रात भी पढ़ी जिसे पोस्ट किया गया था 22 अप्रैल 2020 को। 

कोई ज़माना था जब केवल पुरुष  पर ही काव्य रचनाएं लिखी जाती रही। उनकी कथाएं और गाथाएं बनती रहीं। जल्द ही ट्रेंड बदला और प्रशंसा भरे इस साहित्य में महिलाओं की निंदा कम हो गई। फिर नारी की प्शारशंसा का रिवाज भी शुरू हुआ। बहुत सा साहित्य लिखा गया और बहुत सी फ़िल्में भी बनीं। शायद इसलिए कि धीरे धीरे  महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया था। समय के साथ साथ यह अनुपात बार बार बदलता ही चला गया। इस बदलते हुए अनुपात में नारी का दर्द तो सामने आता रहा और बहुत से कानून भी बनें लेकिन पुरुष का दर्द नज़रअंदाज़ होता रहा। इसी बीच नर-नारी की बराबरी की आवाज़ ने ज़ोर पकड़ा और इस पर भी लिखा जाने लगा कि मर्द को भी दर्द होता है। वह भी रोता है बेशक छुप कर ही सही। इसी विषय पर सोशल मीडिया में एक काव्य जैसी रचना फेसबुक पर भी नज़र आई। लेखिका का नाम शिखा पांडेय बताया गुया लेकिन उनसे सम्पर्क नहीं हो सका। फिलहाल आप यह पोस्ट पढिए जिसमें आपको काव्य रस का अहसास भी महसूस होगा। अंतर्मन में चलते द्वंद और पीड़ा का भी अहसास होगा।  आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी। स्नेह के साथ आप का--रेक्टर कथूरिया 

यह है वो रचना 

प्रेम में हारे हुए पुरुष

कहीं दूर गाँव या शहर में

ढूँढते हैं एक शांत कोना

जहाँ होता है मध्यम अलसाया हुआ अँधेरा

उदास पुरवाई को लिये हुए

वो जूझते है अपने ही अंतर्मन में छुपे अपनी नाकामी के सवालों से, क्योंकि वो पुरुष है इसलिए कह नही सकते किसी से भी अपनी व्यथा....

गुम करने लगते है खुद को बेवज़ह मुस्कुराहटों की तहरीरों में....झोंक देते हैं स्वयं को रोज़गार की भट्टी में

और जब इनसे में शांत नही होता उनका चित्त तो आ जाते हैं किसी सोशल मीडिया के द्वार पर और ढूढने लगते हैं किसी द्वार पर झूठा प्रेम....जी हां सिर्फ झूठे प्रेम को ही ढूढते है क्योंकि नही जाना चाहते छोड़कर ये अपने पुराने अक्स को......और बन जाते है दुनिया की नज़र में बेग़ैरत और लानत भरे बेशर्म पुरुष, और फिर इसी झूठी दुनिया मे लिप्त होकर

वे खोजते हैं अपनी पवित्रता को।

और अंत में अब  वो रोज देखते हैं उस हाथ की  हथेलियों में गहरी रेखाओं को

जिन्हें देखकर किसी भविष्य वक्ता ने कहा कि

तुम भाग्यशाली हो...❤️

- शिखा पांडेय


Sunday, April 9, 2023

एक आंदोलन है प्रगतिशील लेखक संघ//सुसंस्कृति परिहार

9th April 2023 at 8:54 AM

    स्थापना दिवस 9 अप्रैल पर विशेष   

प्रगतिशील लेखक संघ का उदय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अहम् मुद्दे को लेकर हुए लेखकों के आंदोलन से हुआ।प्रगतिशील लेखकों के आंदोलन की उत्पत्ति 'अंगारे' के प्रकाशन में देखा जा सकता है, यह नौ लघु कहानियों का संग्रह और अहमद अली, सज्जाद ज़हीर, राशिद जहाँ और महमूद द्वारा एक-अभिनय नाटक- 1932 में उज़-ज़फ़र को समेटे हुए है।यह पुस्तक  नागरिकों और धार्मिक अधिकारियों की नाराजगी के साथ सामने आई जिसको  संयुक्त प्रांत की सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था।  

इस पुस्तक के लेखक ने इसके लिए कोई क्षमा याचना नहीं की वे इसे लॉन्च करने के परिणामों से डरे नहीं वे  केवल 'इसे लॉन्च करने के अधिकार और इसके   सामान्य रूप से मानव जाति और भारतीय लोगों के लिए सर्वोच्च महत्व के सभी मामलों में स्वतंत्र आलोचना और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए खड़े हो गए। इसी अधिकार की प्राप्ति के लिए  प्रगतिशील लेखकों की एक लीग का तुरंत गठन किया, और कहा गया कि  लेखक समय-समय पर अंग्रेजी और हमारे देश की विभिन्न भाषाओं में अपने  संग्रह प्रस्तुत करें। जो इस विचार में रुचि रखते हैं, वे हमसे संपर्क करें। प्रगतिशील लेखक और उनका साहित्य सामने आ गया।इतना ही काफी था।

इसके बाद तो इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना लंदन में 1935 में हुई जिसके अध्यक्ष बने सज़्जाद ज़हीर। वे सन् 1933में लंदन गए थे अध्ययन के लिए  लेकिन उनके दिलों दिमाग में 'अंगारे 'तैर रहे थे। 1936 में ज़हीर हिंदुस्तान आ गए और लखनऊ में रिफा -ए-आम क्लब में सैयद सज्जाद जहीर और अहमद अली के नेतृत्व में  9अप्रैल 1936 को अखिल भारतीय लेखक संघ की स्थापना की गई थी ।  प्रथम अध्यक्ष बने थे मुंशी प्रेमचंद। यहाँ आने से पूर्व वे अलीगढ़ में डॉ॰ अशरफ, इलाहबाद में अहमद अली, मुम्बई में कन्हैया लाल मुंशी, बनारस में प्रेमचंद, कलकत्ता में प्रो॰ हीरन मुखर्जी और अमृतसर में रशीद जहाँ को घोषणापत्र की प्रतियाँ भेज चुके थे। वे भारतीय अतीत की गौरवपूर्ण संस्कृति से उसका मानव प्रेम, उसकी यथार्थ प्रियता और उसका सौन्दर्य तत्व लेने के पक्ष में थे लेकिन वे प्राचीन दौर के अंधविश्वासों और धार्मिक साम्प्रदायिकता के ज़हरीले प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे। 

उनका विचार था कि ये साम्राज्यवाद और जागीरदारी की सैद्धांतिक बुनियादें हैं। इलाहाबाद पहुंचकर सज्जाद ज़हीर अहमद अली से मिले जो विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रवक्ता थे। अहमद अली ने उन्हें प्रो॰एजाज़ हुसैन, रघुपति सहाय फिराक, एहतिशाम हुसैन तथा विकार अजीम से मिलवाया. सबने सज्जाद ज़हीर का समर्थन किया। शिवदान सिंह चौहान और नरेन्द्र शर्मा ने भी सहयोग का आश्वासन दिया। प्रो॰ ताराचंद और अमरनाथ झा से स्नेहपूर्ण प्रोत्साहन मिला। सौभाग्य से जनवरी 1936 में हिन्दुस्तानी एकेडमी का वार्षिक अधिवेशन हुआ। अनेक साहित्यकार यहाँ एकत्र हुए - सच्चिदानंद सिन्हा, डॉ॰ अब्दुल हक़, गंगा नाथ झा, जोश मलीहाबादी, प्रेमचंद, रशीद जहाँ, अब्दुसत्तार सिद्दीकी इत्यादि। सज्जाद ज़हीर ने प्रेमचंद के साथ प्रगतिशील संगठन के घोषणापत्र पर खुलकर बात-चीत की। सभी ने घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। अहमद अली के घर को लेखक संगठन का कार्यालय बना दिया गया। पत्र-व्यव्हार की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। सज्जाद ज़हीर पंजाब के दौरे पर निकल पड़े. इस बीच अलीगढ में
सज्जाद ज़हीर के मित्रों -डॉ॰ अशरफ, अली सरदार जाफरी, डॉ॰ अब्दुल अलीम, जाँनिसार अख्तर आदि ने स्थानीय प्रगतिशील लेखकों का एक जलसा ख्वाजा मंज़ूर अहमद के मकान पर फरवरी १९३६ में कर डाला। अलीगढ में उन दिनों साम्यवाद का बेहद ज़ोर था। वहां की अंजुमन के लगभग सभी सदस्य साम्यवादी थे और पार्टी के सक्रिय सदस्य भी। यहीं मुंशी प्रेमचंद ने अपने प्रथम उद्बोधन में कहा था कि यूं तो साहित्य  की बहुत-सी परिभाषाएं की गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबंध के रूप में हों, चाहे कहानियों के या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।साहित्यकार का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने साफ तौर पर कहा थ-" केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, - उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।"

मौजूदा दौर में भी प्रगतिशील लेखक संघ सक्रिय है। इसका सत्रहवाँ राष्ट्रीय सम्मेलन जयपुर में हुआ था जिसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर तमिल के बहुप्रतिष्ठित लेखक श्री पुन्नीलन और राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक प्रो. सुखदेव सिंह सिरसा चुने गए थे। अब अगला सम्मेलन 20, 21 और 22 अगस्त को हरिशंकर परसाई की जन्मशताब्दी के अवसर पर जबलपुर में आयोजित होगा।  यह लेखक समूह अपने लेखन से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता का समर्थन करता है और कुरीतियों अन्याय व पिछड़ेपन का विरोध करता है। जबलपुर में होने जा रहा सम्मेलन सुविख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की समर्पित है वे एक परिवर्तन कामी रचनाकार थे उनके व्यंग्य आज के दौर में सबसे ज्यादा प्रासंगिक हैं। परसाई जी के व्यंग्य की शिष्टता का संबंध उच्चवर्गीय मनोरंजन से ना होकर समाज में सर्वहारा की उस लड़ाई से अधिक है जो आगे जाकर मनुष्य की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। यही प्रगतिशील लेखक संघ का प्रमुख उद्देश्य भी है।

Thursday, March 23, 2023

पत्रकारिता बचाओ दिवस के मौके पर एकजुट हुआ मीडिया

Thursday 23rd March 2023 at 07:55 PM

पत्रकारिता को दरपेश चुनौतियों और खतरों की हुई चर्चा 

चण्डीगढ: 23 मार्च 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क):: 

आज मीडिया कर्मी देश के तकरीबन सभी कोनों में एकत्र हुए और अपनी एकजुटता का इज़हार भी किया।चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में  स्थित प्लाज़ा मार्किट में आज मीडिया की चहल पहल रही। मौका था शहीदी दिवस का और आव्हान था पत्रकारिता बचाओ दिवस मनाने का।  बहुत से पत्रकारों ने आज इस आश्य के संकल्प भी लिए। चंडीगढ़ एंड हरियाणा जर्नलिस्ट यूनियन (रजि.) द्वारा इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन के आह्वान पर देश के महान शहीदों के बलिदान दिवस पर आज पत्रकारिता बचाओ (सेव जर्नलिज्म) दिवस मनाया। इस मौके पर और चंडीगढ़ के सेक्टर 17 स्थितप्लाज़ा मार्कीट ग्राउंड में ही में पत्रकारों की मांगों को लेकर धरना दिया गया और प्रदर्शन भी  किया गया। इस अवसर पर पंजाब व चंडीगढ़ जर्नलिस्ट यूनियन के सदस्य व पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। सीएचजेयू ने पत्रकारिता पर निरंतर बढ़ रहे संकट पर चिंता जताते हुए सरकार से पत्रकारों की मांगों को तुरंत पूरा करने की मांग भी की। आज गोदी मीडिया का भी खुल कर विरोध हुआ। आज के आयोजन में सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकार लोग भी शामिल हुए। जनहित से जुड़े विभिन्न चैनल अपनी मौजूदगी का अहसास करने पहुंचे हुए थे। इन लोगों ने कवरेज भी बहुत गंभीरता और बारीकी से की। 

पत्रकारिता सचमुच गंभीर संकट और खतरों में है इसलिए आज की इस बैठक में चंडीगढ़ एंड हरियाणा जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष राम सिंह बराड़, प्रदेश महासचिव सुरेंद्र गोयल, ललित धीमान, सतीश शर्मा,
अख्तर फारूखी, रंजना शुक्ला, प्रवीण कुमार, कमलजीत सिंह, अजीत सिंह व इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव बलविंदर जम्मू, पीसीजेयू के प्रदेशाध्यक्ष बलबीर सिंह जंडू, ङ्क्षबदू सिंह, जय सिंह छिब्बर, तरलोचन सिंह सहित अनेक वरिष्ठ पत्रकार उपस्थित रहे। यूनियन के नेताओं ने शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को श्रद्धांजलि देते हुुए कहा कि शहीदे आजम भगत सिंह खूद एक पत्रकार थे और उनका जीवन हमेशा पत्रकारों को प्रेरणा देता रहेगा। इस बैठक के अवसर पर शहीदे आज़म भगत सिंह को एक पत्रकार के तौर पर भी याद किया गया। 

इन खतरों, संकटों और चुनौतियों पर इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन काफी समय से चर्चा भी करती आ रही है। पत्रकारिता बचाओ दिवस मनाने के मकसद से बुलाई गई इस बैठक को संबोधित करते हुए आईजेयू के राष्ट्रीय महासचिव बलविंदर सिंह जम्मू ने कहा कि पत्रकारों की जायज मांगों की पिछले काफी समय से निरंतर अनदेखी हो रही है। उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि पत्रकारों को कोरोना काल से पहले रेल यात्रा दौरान रियायती दरों पर यात्रा सुविधा मिलती रही है, जिसे कोरोना काल के दौरान अस्थाई तौर पर बंद किया गया था, लेकिन अब हालात सामान्य होने के बावजूद भी उसे अभी बहाल नहीं किया गया। इसे तुरंत बहाल किया जाए। पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र व राज्य स्तर पर पत्रकार संरक्षण कानून बनाए जाएं, ताकि पत्रकार अपना कर्तव्य बिना किसी दबाव व भय के पूरा कर सकें। प्रेस परिषद के स्थान पर मीडिया परिषद का गठन किया जाए और उसमें राष्ट्रीय स्तर की तमाम यूनियनों व संगठनों को प्रतिनिधित्व दिया जाए। राष्ट्रीय स्तर की सभी यूनियनों व संगठनों को केंद्रीय मीडिया एक्रीडेशन कमेटी व राज्य एक्रीडेशन कमेटियों में प्रतिनिधित्व बहाल किया जाए। गौरतलब है कि इस तरह की एक्रीडेशन मीडिया को अपनी डयूटी निभाने के लिए भी आवश्यक है। 

आज के इस आयोजन के मौके पर पत्रकारिता को दरपेश चुनौतियों की भी विस्तृत चर्चा हुई और मीडिया नेताओं ने कहा कि पत्रकारों पर देश भर में विभिन्न स्थानों पर झूठे मामले दर्ज करना बंद किया जाए। पत्रकारों को मुख्यधारा के कोरोना योद्वा मानते हुए कोरोना काल में मारे गए सभी पत्रकारों के परिवारों को उचित आर्थिक सहायता दी जाए। सरकार और समाज को भी इस तरफअपना नैतिक कर्तव्य निभाना चाहिए।  

कुछ और मांगें भी उठाईं गई। इसके साथ ही पीआईबी एक्रीडियेशन रूलज में से गैर जरूरी व पक्षपाती नियम व शर्तें हटाई जाएं। उन्होंने कहा कि देशभर में एक ऐसा माहौल कायम किया जाए, जिससे पत्रकार स्वतंत्रता के साथ निष्पक्ष होकर अपना कर्तव्य निभा सके। 

मीडिया कर्मियों से जुडी हुईं इन मांगों और चुनौतियों की चर्चा करते हुए बलविंदर सिंह जम्मू ने कहा कि आज प्रैस की स्वतंत्रता कसौटी पर लगी हुई है और भारतीय मीडिया दुनिया भर में 150वें स्थान पर पंहुच गया है। सीएचजेयू अध्यक्ष राम सिंह बराड़ ने कहा कि चंडीगढ़ एंड हरियाणा जर्नलिस्ट यूनियन ने काफी समय पहले यूनियन ने प्रदेश सरकार को पत्रकारों की मांगों बारे ज्ञापन सौंपे थे, लेकिन अभी तक उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। पत्रकारों की जायज मांगों को तुरंत स्वीकार करके सरकार उन्हें राहत प्रदान करे।

Thursday, March 16, 2023

महिला काव्य मंच लुधियाना इकाई की मार्च माह की काव्य गोष्ठी

Thursday 16th March 2023 at 06:07 PM

सीमा भाटिया की अध्यक्षता में हुआ विशेष आयोजन 


लुधियाना: 16 मार्च 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

करीब ढाई तीन बरस पूर्व लुधियाना में हिंदी स्क्रीन की टीम को महिला काव्य मंच की एक बैठक में जाने का सुअवसर मिला। बहुत ही सादगी भरे आयोजन में अनुशासन और समय सीमा का विशेष ध्यान रखा जा रहा था। इस मौके पर करीब हर उम्र की लेखिकाएं थीं। हिंदी का रंग भी था, पंजाबी का भी और उर्दू का भी। इस शायरी में दर्द महिलाओं से भी जुड़ा हुआ था और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से भी। देश विदेश में फैली हिंसा ने भी महिला काव्य मन को आहत किया था और लगातार बढ़ती हुई महंगाई ने भी। ज़िंदगी के इन सभी रंगों की झलका महसूस हुई महिला काव्य मंच के मुशायरे में। इस बार भी शायरी का रंग यादगारी रहा। 

महिला काव्य मंच लुधियाना इकाई की मार्च माह की काव्य गोष्ठी श्री नरेश नाज़ के सानिध्य में लुधियाना इकाई की अध्यक्ष सीमा भाटिया की अध्यक्षता में आयोजित की गयी। इस काव्य गोष्ठी में मंच संचालन का उत्तरदायित्व शैली रूबानी ने मां सरस्वती को नमन कर बडी कुशलता से निभाया। मुख्य अतिथि के रूप में पंजाब इकाई की मुख्य अतिथि इरा दीप जी और विशिष्ट अतिथि महासचिव बेनू सतीश कांत शामिल हुईं।कार्यक्रम में सभी कवयित्रियों ने उत्साह से भाग लिया और सभी ने बेहद उम्दा प्रस्तुति की। भाग लेने वाली कवयित्रियों में मोनिका कटारिया, ज्योति बजाज,शांति जैन,पूनम सपरा,संगीता भंडारी,मनीषा शर्मा,श्रद्धा शुक्ला और अर्चना खापरान रहीं।अंत में अध्यक्ष सीमा भाटिया नें सभी का धन्यावाद किया और एक अत्यंत सफल गोष्ठी के लिये संगीता भंडारी ने सभी को बधाई दी।

Monday, February 13, 2023

ताज़ा ग़ज़ल//विजय तिवारी ‘विजय’

Sunday 12th February 2023 at 01:16 PM

जिसमें मिलेगी अतीत और आज की झलक 


लुधियाना12 फरवरी 2023: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

भोपाल एक ऐसा शहर है जहां शिक्षा और साहित्य से जुड़े बहुत से लोग रहते हैं। बुलंद आवाज़ लेकिन बहुत ही सलीके से सच कहने वाले इन लोगों से मिल कर, इनका कलाम पढ़ कर लगता है जैसे भोपाल के जलवायु में ही कोई ऐसा जादू है जो कलम में इंकलाब ले आता है। वहां भोपाल जा कर इन लोगों के जनजीवन को नज़दीक से देखने का मन भी अक्सर होता है और कुछ समय इनके पास रहने का भी। बहुत ही गहरी बातें बहुत ही सादगी से कह जाते हैं ये लोग। कलम और कलाम की दुनिया में इनका कद बहुत ऊंचा ही बना रहता है इसके बावजूद मिलने वालों को इनकी विनम्रता और स्नेह हमेशां के लिए  अपना भी बना लेते हैं ये लोग। विजय तिवारी विजय  लम्बे समय से बहुत ही सादगी से बहुत ही गहरी बातों की शायरी  करते आ रहे हैं। उनकी शायरी सियासत की साज़िशों की बात भी करती है और जी टी रोड पर जीने को तरसती ज़िंदगी की बात भी। देखिए उनकी एक ग़ज़ल की झलक। आज के महाभारत में घिरे अभिमन्यु की चर्चा भी आपको इसी शायरी में मिलेगी और इसके साथ ही हिंदी की मधुरता और उर्दू की मिठास को एक दुसरे के नज़दीक लाने का ज़ोरदार प्रयास भी। मुशायरा कहीं भी हो उनकी हाज़री उसमें चार चाँद लगा देती है। उनकी कोशिश भी होती है कि निमंत्रण मिलने पर शामिल भी ज़रूर हुआ जाए। इसके बावजूद कभी कभी कोई मजबूरी आन ही पड़ती है तो उनके चाहने वाले उदास हो जाते हैं। आपको उनकी शायरी कैस लगी अवश्य बताएं। आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी ही।  --रेक्टर कथूरिया 

कितनी मुश्किल से कटा दिन होश के मारों के बीच। 

शाम ए ग़म का शुक्रिया ले आई मयख़ारों के बीच ...


क्या कभी देखा है वो ग़ुब्बारा ग़ुब्बारों के बीच। 

पेट की ख़ातिर भटकता दौड़ता कारों के बीच...


रिंद ओ साक़ी जाम ओ पैमाना तलबगारों के बीच। 

आ गये सब ग़म के मारे अपने ग़मख़्वारों के बीच... 


चीख़ता ही रह गया मैं अम्न हूँ मैं अम्न हूँ। 

दब गई आवाज़ मेरी मज़हबी नारों के बीच...


बार ए ग़म से लड़खड़ाकर क्या गिरा मस्जिद में आज । 

यूँ घिरा जैसे शराबी कोई दींदारों के बीच...


मौसम ए तन्हाई में बहते हैं आँसू इस क़दर। 

दस्त में बहता हो जैसे झरना कुहसारों के बीच...


बज़्म ए जानाँ में मुझे देखा गया कुछ इस तरह। 

जैसे कोई ग़म का नग़मा कहकहाज़ारों के बीच...


या ख़ुदा अहल ए अदब में यूँ रहे मेरा वुजूद। 

एक जुगनू आसमाँ पर चाँद और तारों के बीच...


एक अभिमन्यु घिरा फिर धर्म संसद में ‘विजय’

रिश्तेदारों चाटुकारों और सियहकारों के बीच

                           ----विजय तिवारी ‘विजय’

चलते चलते विजय साहिब का ही एक और शेयर:

किसी के इश्क में दुनिया लुटा कर

सुखनवर हो गए हैं कुल मिलाकर! 

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Wednesday, February 1, 2023

इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती ने किया विशेष आयोजन

01st February 2023 at 2:45 PM WhatsApp  

डाक्टर पूनम माटिया भी विशेष तौर पर शामिल हुईं 


गाज़ियाबाद: 1 फरवरी 2023: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

डाक्टर पूनम माटिया जी जैसी साहित्यिक शख्सियत जहां भी हों वहां साहित्य के फूल निरंतर खिलते रहते हैं। केवल किसी एक इलाके में ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी साहित्य की सुगंध निरंतर महसूस होने लगती है। हिंदी स्क्रीन के लिए प्राप्त हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस कार्यक्रम की हम चर्चा कर रहे हैं यह आयोजन गत  दिनों 28 जनवरी 2023 दिन शनिवार को चन्द्रनगर क्लब में हुआ। प्रबंधकों के सफल प्रबंध के कारण यह एक यादगारी आयोजन बन पाया। 

इसी कार्यक्रम में लेखक बीरसैन जैन सरल की पुस्तक "सरल काव्य मंजूषा" का लोकार्पण भी हुआ। पुस्तक विमोचन के सुअवसर पर कवि सम्मेलन भी किया गया। इस मुशायरे में जिसमें वरिष्ठ गीतकार रामचरण साथी के संचालन में हास्य कवि सुनहरी लाल तुरन्त, गीतकार कवि इन्द्रजीत सुकुमार, पूनम माटिया, राजेन्द्र प्रसाद राजन ने श्रैत्र के श्रौताओ का अपनी कविताओं से खूब मनोरंजन किया। बीरसैन सरल ने भी अपनी "आज बचपन की याद बहुत आती है" कविता सुनाकर श्रोताओं को बचपन की यादों में खो जाने को मजबूर कर दिया संस्था के महामंत्री अखिलेश कुलश्रेष्ठ ने समापन पर विशेष अतिथि श्री श्री भगवान अग्रवाल निगम पार्षद, सभा के अध्यक्ष मनोज कुमार शर्मा, प्रवीण आर्या, मंच संचालन गीतकार रामचरण साथी, अन्य सभी कवियों का आभार प्रकट किया।

इस सुअवसर पर विशेष तौर पर शामिल हुईं जानीमानी शायरा डाक्टर पूनम माटिया की मौजूदगी अपने आप में बहुत यादगारी रहीं। डा पूनम माटिया वही शायरा हैं जिन्होंने दशकों पहले काव्य साधना शुरू की थी। उनकी पुस्तकों  की चर्चा साहित्यिक क्षेत्रों में अक्सर होती रहती है। हिंदी के साथ साथ अंग्रेज़ी और पंजाबी में भी उनके बारे में लिखा जाता। 

आजकल अपने अनुभव का खज़ाना वह फिर से साहित्य प्रेमियों में बाँट रही हैं। 

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