1961 में बोली जाती थीं भारत में 1100 भाषाएँ
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मामला बेहद गंभीर है और इसकी खबर दी है रेडियो रूस ने जिसका शीर्षक है-आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त। रेडिओ ने पूरी ज़िम्मेदारी से तथ्यों का हवाला देते हुए बताया है कि भारत के एक शोध संस्थान 'भाषा' जिसे 'भाषा शोध एवं प्रकाशन केन्द्र' भी कहा जाता है, के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आधी सदी में भारत ने अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ खो दी हैं।
इस क्षेत्र के एक शोधकर्ता गणेश देवी के अनुसार, सन् 1961 में भारत में 1100 भाषाएँ बोली जाती थीं लेकिन अब उनमें से 220 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। ये भाषाएँ सपेरों, ज्योतिषियों, स्वदेशी चिकित्सकों द्वारा बोली जाती थीं। भारत की 3-4 प्रतिशत जनसंख्या, यानी लगभग पाँच करोड़ लोग ऐसी भाषाएँ बोल सकते थे।
भारत में दो भाषाओं, हिन्दी और अंग्रेज़ी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है जबकि 22 अन्य भाषाओं का देश के राज्यों में सरकारी भाषा के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त
Fri, Jul 26, 2013 at 8:51 PM
दायर केस को वापस लें सरना बंधु-जत्थेदार श्री अकाल तख्त साहिब
कहा-अपनी भूलों की क्षमा याचना के लिए गुरुद्वारा रकाबगंज में करवाए श्री अखंड पाठ
यथा शक्ति मुताबिक लंगर लगाने का भी आदेश
श्री अकाल तख्त साहिब के आदेशों का इन-बिन करेंगे पालन-सरना बंधु

अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग) नवंबर 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों की यादगार के खिलाफ हाईकोर्ट में पटिशन दायर करने के बाद श्री अकाल तख्त साहिब पर तलब किए गए सरना बंधुओं को श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ने श्री अकाल तख्त साहिब से आदेश दिया है, कि वह उक्त केस को तुरंत वापस लें। इसके अलावा सरना बंधुओं को यह भी आदेश दिया गया है कि वे क्षमा याचना के लिए गुरुद्वारा रकाबगंज में श्री अखंड पाठ के साथ-साथ यथा शक्ति मुताबिक लंर लगाए। उधर, इस मौके पर सरना बंधुओं ने कहा, कि हम श्री अकाल तख्त साहिब के फैसले को मंजूर करते हैं।
नवंबर 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों की यादगार को गुरुद्वारा रकाब गंज में बनाए जाने के विरोध में हाईकोर्ट में याचिका दायर करने पर श्री अकाल तख्त साहिब पर तलब किए गए परमजीत सिंह सरना अपने भाई के साथ आज पांच सिंह साहिबानों के समक्ष पेश हुए। इस दौरान उन्होंने पांच सिंह साहिबानों को अपना लिखित स्पष्टीकरण पेश किया। पांच सिंह साहिबानों ने विचार करने के बाद परमजीत सिंह सरना और उनके भाई मंजीत सिंह सरना पर अपना फैसला ले लिया। पांच सिंह साहिबानों के इस फैसले को श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने श्री अकाल तख्त साहिब से सुनाया। जिसमें आदेश दिया गया कि सरना बंधु तुरंत कोर्ट में दायर किए गए केस को वापस लें। इसके साथ वे दोनों सिख दंगों के पीड़ित परिवारों के साथ गुरुद्वारा रकाबगंज में श्री अखंड पाठ रखवाएं और यथा शक्ति मुताबिक लंगर भी लगाएं और अपनी भूलों की क्षमा याचना करें। इससे पूर्व सिंह साहिबानों से मिलने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए परमजीत सिंह सरना और हरविंदर सिंह सरना ने स्पष्ट किया, कि वे श्री अकाल तख्त साहिब को समर्पित हैं और श्री अकाल तख्त साहिब के प्रत्येक आदेश की इन-बिन पालना करेंगे। उन्होंने कहा, कि सिंह साहिबानों ने उनसे यही वादा लिखित में भी लिया है। परमजीत सिंह सरना ने यहां फिर स्पष्ट किया, कि वह सिख विरोधी दंगों में मारे गए लोगों की यादगार के खिलाफ नहीं है। बल्कि वह यह नहीं चाहते हैं, कि गुरुओं के शहीदी स्थल में किसी अन्य की शहीदी यादगार की स्थापना हो। सजा सुनने के बाद भावुक हुए परमजीत सिंह सरना ने कहा, कि वह हमेशा से ही श्री अकाल तख्त साहिब को समर्पित रहें हैं। उन्होंने कहा, कि उन्हें श्री अकाल तख्त साहिब से जो भी हुकुम हुआ है, वह उन्हें मंजूर है।
सरना बन्धु श्री अकाल तख्त साहिब के सामने नतमस्तक
06-जून-2013 17:02 IST
राष्ट्रपति नेरखी आधारशिला
राष्ट्रपतिश्री प्रणब मुखर्जी ने आज भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी।
श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा किसरकार तथा जनता के बीच भाषा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। सामाजिक कल्याण तथा विकास के कार्यक्रमों की सफलता भाषा पर निर्भर करती है। इसलिए हमें हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देना चाहिए। हमारे राष्ट्र को जोड़ने में हिंदी का अह्म योगदान है। यह भारत की सामाजिक तथा सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
राष्ट्रपतिमहोदय ने कहा किसमाज और राष्ट्र के विकास में शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ते अपराध अत्यंत चिंता का विषय हैं। इसके अलावा, हमारे समाज को आत्मचिन्तन करते हुए नैतिकता में हो रहे पतन को भी रोकने की जरूरत है। हमारे विश्वविद्यालयों को नैतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए एक अभियान चलाना होगा। उन्होंने कहा किहमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे युवाओं में देश के प्रति प्रेम; दायित्वों का निर्वाह; सभी के प्रति करुणा; भिन्नताओं का सम्मान; महिलाओं और बुजुर्गों का आदर; जीवन में सच्चाई और ईमानदारी; आचरण में अनुशासन तथा कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की भावना हो।
श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि2010-20 के दशक को अभिनव प्रयोग का दशक घोषित किया गया है। उन्होंने कहा किपिछले महीने, मुझे उत्तर प्रदेश और असम के दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों में इनोवेशन क्लबों के उद्घाटन का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि मैंने विश्वविद्यालयों में आयोजित प्रदर्शनियों को भी देखा। उन्होंने विश्वविद्यालय से आग्रह किया किवह अपने यहां भी नवान्वेषण संस्कृति शुरू करने के लिए पहल करे।
इस अवसर पर 'अटल संवाद' नामक एक न्यूज़लेटर भी जारी किया गया, जिसकी पहली प्रतिराष्ट्रपतिमहोदय को भेंट की गई। (PIB)
वि. कासोटिया/अरुण/मनीषा-2659
Ram Setu A Construction Engineering Wonder - Rajiv Dixit
16-मई-2013 20:16 ISTविशेष लेख -अशोक शर्मा
शब्द को पूरी सामर्थ्य के साथ कविता में स्थापित करने में माहिर अल्हड़ बीकानेरी की इसी प्रतिभा ने उन्हें एक तरफ तो गजलों के उस्ताद के रूप में, वहीं दूसरी ओर हास्यरस में देश के सर्वाधिक सिद्ध रचनाकार के रूप में भी मान्यता दिलवाई। उनकी कविताओं में फूलों की महक और कांटों की चुभन, दोनों ही हैं। छंद, गीत, गजल और पैरोडियों के रचयिता अल्हड़ जी ऐसे अनूठे कवि थे, जिन्होंने हास्य को गेय बनाने की परंपरा की भी शुरुआत की। समाज को उन्होंने कविताओं की प्रयोगशाला बनाया। उनके कवि मन की कोमल कल्पनाएं जब यथार्थ की पथरीली जमीन से टकरातीं, तो तीक्ष्ण व्यंग्य की व्युत्पत्ति सहज भाव से हो जाती।
अल्हड़ जी एक ऐसे छंद शिल्पी थे, जिन्हें छंद शास्त्र का व्यापक ज्ञान था। अपनी पुस्तक 'घाट-घाट घूमे' में अल्हड़ जी लिखते हैं, ''नई कविता के इस युग में भी छंद का मोह मैं नहीं छोड़ पाया हूं, छंद के बिना कविता की गति, मेरे विचार से ऐसी ही है, जैसे घुंघरुओं के बिना किसी नृत्यांगना का नृत्य..... '' वे अपनी हर कविता को छंद में लिखते थे और कवि सम्मेलनों के मंचों पर उसे गाकर प्रस्तुत करते थे। वह एक ऐसे छंद शिल्पी थे, जिन्हें छंद शास्त्र का पूरा ज्ञान था। यही नहीं गज़ल लिखने वाले कवियों और शायरों के लिए उन्होंने गज़ल का पिंगल शास्त्र भी लिखा, जो उनकी पुस्तक 'ठाठ गज़ल के' में प्रकाशित हुआ। 17 मई, 1937 को हरियाणा के रेवाड़ी जिले के बीकानेर गांव में जन्मे प्रख्यात हास्य कवि अल्हड़ जी का असली नाम श्री श्याम लाल शर्मा था। सन् 1954 में उन्होंने हरियाणा की मैट्रिक परीक्षा में 86 प्रतिशत अंक प्राप्त करके पूरे प्रदेश में पहला स्थान प्राप्त किया था। मैट्रिक करने के पश्चात उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की लेकिन ईश्वर को तो कुछ और ही मंजूर था और इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष की परीक्षा में वे फेल हो गये। इसी दौरान मैट्रिक की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की वजह से उन्हें डाक तार विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गई और दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित जी.पी.ओ. पोस्ट आफिस में उन्होंने डाक तार विभाग में नौकरी शुरू की।
इसी दौरान उनका सम्पर्क दिल्ली के मशहूर कव्वाल श्री नहीफ देहलवी से हुआ और उन्होंने 1962 से माहिर बीकानेरी उपनाम से ऊर्दू में गज़लें लिखनी शुरू कीं। उनका गज़लें लिखने का सिलसिला 1967 तक चलता रहा। 'रेत पर जहाज' गजल संग्रह में प्रकाशित एक गजल दिल को छूने वाली है : ''मरुस्थल तो मनाता है नदी को
तरस लेकिन कब आता है नदी को
नए शाइर-सा ये गुस्ताख झरना
गजल अपनी सुनाता है नदी को
हिमाकत देखिए इक बुलबुले की
इशारों पर नचाता है नदी को'' एक कवि सम्मेलन में हास्य कवि काका हाथरसी की फुलझडि़यां सुनकर वे अत्यधिक प्रभावित हुये। अपनी पुस्तक ''अभी हंसता हूं'' में अल्हड़ जी लिखते हैं, मैंने भी गम्भीर गीतों और गजलों को विराम देते हुए ''कह अल्हड़ कविराय'' की शैली में सैंकड़ों फुलझडि़यां लिख मारीं।'' यही वह मोड़ था, जिसने उन्हें माहिर बीकानेर बना दिया और उन्होंने हास्य कवितायें लिखनी शुरू की। धर्मयुग में उनका मुक्तक पहली बार प्रकाशित हुआ। वह इस प्रकार था- ''कोई कोठी है न कोई प्लाट है
दोस्तो अपना निराला ठाठ है।
एक बीवी तीन बच्चे और हम
पाँच प्राणी एक टूटी खाट है। ''इसी तरह एक अन्य खूबसूरत गजल में अल्हड़ जी कहते हैं : ''इठलाई घास
तभी लेखनी की प्यास जगी
लिख मारी घास पे गजल
मेरे राम जी'' यह अल्हड़ जी की प्रतिभा और लगन का ही करिश्मा था कि सन् 1970 आते-आते वे देश में एक लोकप्रिय हास्य कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। काव्य शुरू श्री गोपाल प्रसाद व्याज जी के मार्गदर्शन में अल्हड़ जी ने अनूठी हास्य कवितायें लिख कर उनकी अपेक्षाओं पर अपने को खरा साबित किया। अल्हड़ जी ने हिन्दी हास्य कविता के क्षेत्र में जो विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त कीं, उनमें 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' के सम्पादक श्री मनोहर श्याम जोशी, 'धर्मयुग' के सम्पादक श्री धर्मवीर भारती और 'कादम्बिनी' के संपादक श्री राजेन्द्र अवस्थी की विशेष भूमिका रही। अल्हड़ जी की कवितायें 'लोट पोट', 'दीवाना तेज', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', और 'धर्मयुग' जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हुईं। उन्हीं दिनों अल्हड़ जी की कविता 'हर हाल में खुश हैं' जब 'साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी तो यह कविता पाठकों द्वारा बहुत पसंद की गई।
अल्हड़ जी अपनी हास्य कविताओं में सामाजिक और राजनैतिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। अपनी बात को कविता के माध्यम से वे बहुत ही सहज रूप से अभिव्यक्त करते थे। श्री अल्हड़ बीकानेरी ने हास्य- व्यंग्य कवितायें न सिर्फ हिन्दी बल्कि ऊर्दू, हरियाणवी संस्कृत भाषाओं में भी लिखीं और ये रचनायें कवि-सम्मेलनों में अत्यंत लोकप्रिय हुईं। उनके पास कमाल का बिंब विधान था। राजनीतिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में उनकी यह टिप्पणी देखिए :
''उल्लू ने बढ़ के हंस की थामी नकेल है
कुदरत का है कमाल मुकद़्दर का खेल है'' इसी तरह महंगाई पर पौराणिक संदर्भों का सहारा लेकर वे खूबसूरती से अपनी बात कहते हैं : ''बूढ़े विश्वामित्रों की हो सफल तपस्या कैसे
चपल मेनका-सी महंगाई फिरे फुदकती ऐसे
जैसे घोड़ी बिना लगाम, सीताराम, राधेश्याम
भज मन, बमभोले का नाम, सीताराम, राधेश्याम'' अल्हड़ जी को 'ठिठोली पुरस्कार', 'काका हाथरसी पुरस्कार', 'टेपा समान', हरियाणा गौरव समान' आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। अनेकों पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त करने वाले अल्हड़ जी विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे और वे बहुत ही सरल स्वभाव के थे। अल्हड़ जी की प्रकाशित पुस्तकें हैं- 'भज प्यारे तू सीताराम', 'घाट-घाट घमू', 'अभी हंसता हूं', 'अब तो आंसू पोंछ', 'भैंसा पीवे सोमरस', 'ठाठ गज़ल के', 'रेत पर जहाज़', 'अनझुए हाथ', 'खोल न देना द्वार', 'जय मैडम की बोल रे', 'बैस्ट ऑफ अल्हड़ बीकानेरी' और 'मन मस्त हुआ'। अल्हड़ जी की हास्य-कव्वाली' 'मत पूछिये फुर्सत की घडि़या हम कैसे गुजारा करते हैं' और हरियाणावी कविता 'अनपढ़ धन्नों' ने कवि-सम्मेलनों के मंचों पर लोकप्रियता के नये कीर्तिमान स्थापित किये। लगभग 50 वर्षों से अधिक की काव्य यात्रा में उनकी 12 पुस्तकें प्रकाशित हुईं और वे जीवन के अंतिम समय तक काव्य रचना में व्यस्त रहे। डाक तार विभाग में अपनी नौकरी भी उन्होंने पूरी की और वे दिल्ली के पटेल चौक स्थित डाक तार मुख्यालय से सहायक पोस्ट मास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुये। वर्ष 2009 के जून मास में क्रूर काल ने देश के हास्य व्यंग्य के इस महान कवि को हमसे छीन लिया।(PIB)*लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।वि.कासोटिया/रीता/सुनीता
26-मई-2013 16:36 IST
ऐसी घटनाएं हमारे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के विरूद्ध हैं
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के संदेश का अनूदित पाठ इस प्रकार है:
"मैं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले की कड़ी निंदा करता हूं। मैं उन लोगों के परिवारों के प्रति गहरी सहानुभूति प्रकट करता हूं जिन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी। मैं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री विद्याचरण शुक्ल सहित इस कायरतापूर्ण हमले में घायल लोगों के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार के लिए दुआ करता हूं।
मैंने राज्य के मुख्यमंत्री से बात की है और उनसे अनुरोध किया है कि घायलों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाए तथा अपहृत लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
मैं हमलावरों से अपील करता हूं कि अपहृत लोगों को जल्द से जल्द छोड़ दें।
ऐसी घटनाएं हमारे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के विरूद्ध हैं। सरकार किसी भी तरह की हिंसा के दोषी लोगों पर कड़ी कार्रवाई करेगी।" (PIB)
***
वि. कासोटिया/प्रदीप/सतपाल/शदीद- 2506
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06-अप्रैल-2013 20:17 IST
विशेष लेख -विश्व नाथ त्रिपाठी

बहुमुखी प्रतिभा के धनी महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का कार्य क्षेत्र बहुत व्यापक था। सन् 1861 में प्रयाग में उनका जन्म हुआ था। वे एक महान देश भक्त, स्वतंत्रता सेनानी विधिवत्ता, संस्कृत वाड्.मय और अंग्रेजी के विद्वान, शिक्षाविद , पत्रकार और प्रखर वक्ता थे। उस युग में 25 वर्ष की आयु में उनमें इतनी राष्ट्रीय चेतना थी कि उन्होंने 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भाग लिया और उसे संबोधित किया। वे सन् 1909, 1918, 1932 और 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। सन् 1931 में उन्होंने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।
राष्ट्रीय आंदोलन में अपना पूर्ण् योगदान देने के उद्देश्य से महामना ने 1909 में वकालत छोड़ दी यदयपि उस समय वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पंडित मोती लाल नेहरू और सर सुन्दर लाल जैसे प्रथम श्रेणी के वकीलों में गिने जाते थे। लकिन दस साल बाद उन्होंने चौरा-चौरी कांड के मृत्युदण्ड के सजायाफ्ता 156 बागी स्वतंत्रता सेनानियों की पैरवी की और उनमें से 150 को बरी करा लिया।
यदि कभी कोई इतिहासकार स्वतंत्रता आंदोलन का वास्तिवक मूल्यांकन करेगा तो महामना का योगदान लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी के समकक्ष आंकने को बाध्य होगा। लेकिन इसे एक विडम्बना ही कहना चाहिए कि उस देश में उनका नाम अधिकांश लोग केवल ‘बनारस हिन्दू विश्वविदयालय’ के संस्थापाक तथा एक महान शिक्षाविद् के रूप में ही जानते हैं। वास्तव में महामना अपने द्वारा किये गए कार्यों का न तो स्वयं प्रचार करते थे और न चाहते थे कि उनके द्वारा किए गए सद्कार्यों का कोई दूसरा भी प्रचार करें। वे सही मायने में एक कर्मयोगी थे। मालवीय जी अपने द्वारा शुरू किये कार्य को किसी योग्य व्यक्ति को सौंपकर दूसरे नए कार्य में जुट जाते थे। उनके नाम का कहीं उल्लेख न हो इस बात पर वह इतना ध्यान देते थे कि अपने बनाए अपने घरों के बाहर भी उन्होंने अपना नाम कभी नहीं लिखवाया।
19 वीं शताब्दी में नव जागरण और राष्ट्रीय चेतना का स्फुरण हो रहा था। एक तरफ युवकों में राष्ट्रीय चेतना अंकुरित हो रही थी तो दूसरी तरफ मैकाले के जोर देने पर कम्पनी सरकार ने 1835 में अंग्रेजी शिक्षा प्रचार का प्रस्ताव पास कर दिया, एतदर्थ देश में यत्र-तत्र अंग्रेजी के स्कूल खोले जाने लगे। अब प्रश्न उठा अदालती भाषा का और स्कूलों में हिन्दी को एक अनिवार्य विषय के रूप में रखने का। इन दोनों बातों में हिन्दी का घोर विरोध हुआ। इस विरोध की कहानी भी बहुत रोचक है। मुगलकाल में अदालतों की भाषा फारसी चल आ रही थी। अंग्रेजी-शासन काल में भी प्रारंभ में यही परम्परा चलती रही किन्तु सर्वसाधारण जनता की फारसी-भाषा और उसकी लिपि सम्बन्धी कठिनाइयों को देखकर सन् 1836 में कम्पनी सरकार ने आज्ञा जारी की कि सारा अदालती काम देश की प्रचलित भाषाओं में हुआ करे। इसके परिणाम स्वरूप संयुक्त प्राइज़ में हिन्दी खड़ी बोली को वहां की अदालती भाषा स्वीकार कर लिया गया। सारा अदालती कार्य हिन्दी भाषा और लिपि में होने लगा। कम्पनी सरकार भाषा संबंधी इस नीति पर चिरकाल तक न टिक सकी। केवल एक साल के पश्चात् उत्तरी भारत के सब दफ्तरों की भाषा उर्दू कर दी गई। यह सब मुसलमानों के विरोध के कारण हुआ। इस प्रकार मान-मर्यादा और आजीविका की दृष्टि से सबके लिये उर्दू सीखना आवश्यक हो गया और देश-भाषा के नाम पर स्कूलों में छात्रों को उर्दू पढाई जाने लगी। इस प्रकार हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के पढ़ने वालों की संख्या दिन प्रतीदिन कम होने लगे।
हिन्दी को अदालतों से बाहर निकालने के कार्य में तो मुसलमानों को सफलता मिल चुकी थी, अब वे इसे शिक्षा क्षेत्र से बाहर निकालने में प्रयत्नशील थे। जब सरकार स्कूलों और मदरसों में हिन्दी के अनिवार्य रूप से पढ़ाये जाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही थीं तब प्रभावशाली मुसलमानों-सर सैय्यद अहमद खां आदि ने उसका उ्ग्र विरोध किया। अन्तत: 1884 में सरकार को अपना विचार छोड़ना पडा। सर सैय्यद अहमद खां का अंग्रेजों के बीच बड़ा मान था। वे हिन्दी को एक ‘गंवारू’ भाषा समझते थे। वे अंग्रेजी को उर्दू की ओर झुकाने की लगातार कोशिश करते रहे। इसी समय राजा शिव प्रसाद ‘सितारे हिन्द’ का इस क्षेत्र में आगमन हुआ। वे भी अंग्रेजों के कृपा पात्र थे और हिन्दी के परम पक्षपाती थे। अंत: हिन्दी की रक्षा के लिए उन्हें खड़ा होना पड़ा। वे इस कार्य में बराबर चेष्ठाशील रहे। यह झगड़ा बीसों वर्ष तक ‘भारतेन्दु’ हरिश्चंद्र के समय तक रहा।
इस हिन्दी-उर्दू संघर्ष में राजा शिव प्रसाद ‘सितारे हिन्द’ के समय में ही राजा लक्ष्मण सिंह भी हिन्दी के संरक्षक बन कर सामने आये। अनेक विघ्न-बाधाओं के होने पर भी शिव प्रसाद ने हिन्दी के उद्धार-कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हीं के प्रयत्नों से कम्पनी सरकार को स्कूलों में हिन्दी शिक्षा को स्थान देना पडा।
जिस प्रकार दोनों राजाओं के सप्रयत्नों से संयुक्त प्रान्त में हिन्दी का प्रचार कार्य आरम्भ हुआ, उसी प्रकार उनके समसामयिक बाबू नवीन चन्द्र राय ने पंजाब में समाज सुधार तथा हिन्दी-प्रचार कार्य आरम्भ किया। बंगाल में राजा राममोहन राय वेदान्त और उपिनषदों का ज्ञान लेकर आगे आये और उन्होंने वहां ‘ब्रह्म-समाज’ की स्थापना की। उन्होंने वेदान्त-सूत्र का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित कराया।
उधर उत्तरी भारत में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वैदिक धर्म-प्रचार और ‘आर्य समाज’ की स्थापना कर जनता को अपनी ओर आकार्षित किया। उन्होंने हिन्दुस्तान को आर्यावर्त तथा हिन्दी को आर्य भाषा का नाम दिया तथा प्रत्येक आर्य के लिए आर्यभाषा का पढ़ना आवश्यक ठहराया। स्वामी दयानन्द तथा उनके द्वारा स्थापित ‘आर्य समाज’ ने हिन्दी भाषा के प्रचार में जो महत्वपूर्ण कार्य किया, वह चिरस्मरणीय है।
अब देश में इस प्रकार का वातावरण बन रहा था कि संयुक्त प्रान्त (आज के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) के बुद्धिजीवियों के लिए यह बर्दाश्त करना असंभव होने लगा था कि सुसंस्कृत तथा समृद्ध भाषा हिन्दी के होते हुए भी पराधीन होने के कारण प्रान्त की जनता को समस्त राजकीय कार्य में विदेशी भाषा फारसी अथवा अंग्रेजी का प्रयोग करना पड़े। अंत: 19 वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते अनेक स्वाभिमानी देशभक्त बुद्धिजीवियों ने इस बात का बीड़ा उठाया कि प्रदेश में विदेशी भाषा की जगह ‘निज भाषा’ के प्रयोग की शासकीय अनुमति मिल जाय। इस कड़ी में अत्यन्त महातवपूर्ण प्रयास राजा शिवप्रसाद द्वारा भी सन् 1868 में किया गया जो उपर्युक्त विदशेी लिपियों के हिमायतियों के विरोध के कारण सफल न हो सका।
राजा शिव प्रसाद की भांति बहुतों ने अदालतों में देवनागरी लिपि के प्रवेश के लिये जब-तब छिटपुट प्रयत्न किया लेकिन सभी असफल रहे। 1848 में प्रयाग में हिन्दी उद्धारिणी-प्रतिनिधि मध्यसभा की स्थापना हुई। मालवीय जी ने इसमें जी खोलकर काम किया, व्यारव्यान दिए, लेख लिखे और अपने मित्रों को भी उस काम में भाग लेने के लिए उत्प्रेरित किया। उन्होंने नए सिरे से अदालतों में नागरी के प्रवेश का प्रयन्त किया। मालवीय जी ने इस बात पर गम्भीरता से विचार किया कि अब तक इस दिशा में क्यों सफलता नहीं मिली। महामना ने व्यवस्थित ढंग से इस काम को हाथ में लिया। एक ओर तो उन्होंने देवनागरी लिपि के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान की योजना शुरू की दूसरी ओर बहुत सी सामग्री एकत्रित कर ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजूकेशन’ नाम की पुस्तक लिखी। इसमें हिन्दी का प्रयोग सरकारी कामकाज में क्यों किया जाय इसकी प्रचुर सामग्री थी।
इसी प्रकार आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता ‘भारतेन्दु’ हरिश्चंद्र द्वारा काशी में स्थापित ‘नागर प्रचारिणी सभा’ भी नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में लगी थी। किन्तु मुचित मार्गदर्शन प्राप्त न होने के कारण उसकी स्थिति बिगड़ रही थी। मालवीय जी ने ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की गतिविधियों में आरंभ से ही अत्यधिक रूचि ली तथा ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ को भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार के कार्य में प्रगतिशील बनाकर उसे एक प्रकार से पुनर्जीवित कर दिया।
जब मालवीय जी नागरी प्रचार आन्दोलन के मुखिया बने तब हिन्दी के सबसे बड़े विरोधी सर सैययद अहमद खां का इन्तिकाल हो चुका था, पर मोहसुनुल मुल्क ने नागरी के विरूद्ध घनघोर आन्दोलन शुरू कर दिया। लॉर्ड कर्जन की सरकार भी उनकी ओर झुकी जा रही थी पर मालवीय जी से टक्कर लेना भी टेढ़ी खीर थी। दिन-रात एक करके अपनी वकालत के सुनहरे दिनों में धुन के साथ मालवीय जी ने गहरी छानबीन के साथ नागरी के पक्ष में प्रमाण और आकड़े इकट्ठे किये। सैकड़ों जगह डेपुटेशन भेजे गए और हिन्दी भाषा और नागरी लिपि की सुन्दरता, सहजता और उपयोगिता दिखाई गई। मालवीय जी ने वकालत करते हुए भी अपने मित्र पंडित श्रीकृण जोशी के साथ मिलकर घोर परिश्रम किया। अपने पास से रूपये खर्च करके उपरोक्त कोर्ट लिपि का इतिहास, विगत अधिकारियों की सम्मतियां एकत्र करके एक बड़ी सुन्दर पुस्तक ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्रायमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्टर्न प्रौविन्सेज’ लिखी। यह अम्यर्थना लेख लेकर 2 मार्च सन् 1898 ई. को अयोध्या नरेश महराजा प्रताप नारायण सिहं मांडा के राजा राम प्रसाद सिहं, आवागढ़ के राजा बलवंत, डॉ. सुन्दर लाल आदि के साथ मालवीय जी का एक दल गवर्न्मेंट हाउस प्रयाग में छोटे लाट साहब सर एन्टोनी मेक्डॉलेन से मिला। मालवीय जी की मेहनत सफल हो गई। उनकी सब बातें मान ली गईं। अन्त में 18 अप्रैल सन् 1900 ई. को सर ए.पी. मैक्डॉलेन ने एक विज्ञप्ति (गवर्न्मेंन गजट) निकाली जिससे अदालतों में तथा शासकीय कार्यों में नागरी को भी स्थान मिल गया। लेकिन देश के हिन्दी विरोधी लोगों ने इस पर खूब ऊधम मचाया। इस आदेश के विरोध में जगह-जगह सभाएं की गई। प्रस्ताव भेजे गए कि हिन्दी को इस प्रकार स्वीकार न किया जाय। पर मालवीय जी भी अपने अभियान में डटे रहे। हिन्दी के पक्ष में भी सभाएं हुईं प्रस्ताव भेजे गए। अत: लाट साबह तनिक भी विचलित न हुए और अन्त में बड़े लाट साहब की अनुमति से यह नियम बन गया कि सभी लोग अपनी अर्जी, शिकायत की दरखास्त चाहे हिन्दी या फारसी में दे सकते हैं। अदालतों, शासकीय कार्यालयों को निर्देश दे दिया गया कि सभी कागजात जैसे सम्मन आदि, जो सरकार की ओर से जनता के लिए निकाले जायेंगे वह दोनों लिपियों यानी नागरी और फारसी में लिखे अथवा भरे होंगे। सरकार ने इसके साथ ही यह भी ऐलान कर दिया कि आगे किसी भी व्यक्ति को तभी सरकारी नौकरी मिल सकेगी जब वह हिन्दी भाषा का भी जानकार हो। जो कर्मचारी हिन्दी नहीं जानते थे उन्हें एक साल के भीतर हिन्दी सीखने को कहा गया अन्यथा वे नौकरी से अलग कर दिए जायेंगे। इस प्रकार मालवीय जी के अथक प्रयास से हिन्दी का प्रवेश संयुक्त प्रान्त के शासकीय कार्यालयों में हुआ।
महामना हिन्दी के प्रति समर्पित थे। वे चाहते थे कि शिक्षा का माध्यम भी हिन्दी हो। सन् 1882 ई्. में अंग्रेजों ने एक शिक्षा कमीशन बैठाया। इसका मुख्य उद्देश्य था कि यह निधार्रित हो कि शिक्षा का माध्यम क्या हो और शिक्षा कैसे दी जाये? इस आयोग में साक्ष्य के लिए महामना पंडित मदनमोहन मालवीय तथा ‘भारतेन्दु’ हरिश्चन्द्र चुने गए थे। ‘भारतेन्दु’ अस्वस्थता के कारण आयोग के सम्मुख उपस्थित नहीं हो पाये। उन्होंने अपना लिखित बयान आयोग को भेजा था। परन्तु महामना आयोग के सामने उपस्थित हुए थे। उन्होंने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया था कि शिक्षा समस्त क्षेत्रों में दी जाय और वह हिन्दी भाषा में हो।
महामना वर्ष 1886 ई. से कांग्रेस से जुडकर देश की राजनीति में आजादी की लड़ाई का हिस्सा बन चुके थे। तभी से उनका सम्पर्क देश के बड़े राजनेताओं से हो गया था। धीरे-धीरे उनको देश के बड़े राजनेता के रूप में जाना जाने लगा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1909 के अधिवेशन के वह अध्यक्ष चुने गए। देश के व्यापक भ्रमण और गहन जन सर्म्पक से उन्हें यह स्पष्ट दिखने लगा कि अनेक भाषाओं के इस देश में भारत के स्वतंत्र होने पर किसी एक भाषा को सम्पर्क भाषा के लिए राष्ट्रभाषा का रूप लेना पड़ेगा। उन्होंने देखा कि देश के अधिकांश भूभाग में अधिक से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की हिन्दी बोलते और समझते थे। जबकि देश की अन्य भाषाएं यद्यपि उतनी ही महत्वपूर्ण थी पर उनका दायरा सीमित था। वे इतने विशाल जनसमुदाय के द्वारा बोली और समझी नहीं जाती थीं। एक स्वतंत्र राष्ट्र को जोड़ने के लिए एक राष्ट्र भाषा के रूप में मालवीय जी ने हिन्दी की महत्ता को परखा। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि देश के अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में लोगों को हिन्दी जानने व समझने का मौका मिलना चाहिए। अंत: सन् 1910 ई. में महामना के प्रयासों से काशी में ‘’हिन्दी साहित्य सम्मेलन’’ की स्थापना हुई। मालवीय जी इसके प्रथम अध्यक्ष बने। धीरे-धीरे पूरे देश में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ की शाखाएं खोली गईं। इसके माध्यम से देश के अहिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों को हिन्दी पढ़ने व सीखने का अवसर मिला। अपने स्वभाव के अनुरूप मालवीय जी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना करने के बाद इसे आगे चलाने के लिए बाबू पुरूषोत्तम दास टण्डन को सौंप दिया।
सन् 1918 में इन्दौर में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में महात्मा गांधी इसके अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में हिन्दी के प्रचार का एक नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने दक्षिण भारत में राष्ट्रभाषा हिन्दी-प्रचार का काम प्रारम्भ किया। 1935 में दूसरी बार इन्दौर में हुए सम्मेलन के अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए महात्मा गांधी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि ‘’मेरा क्षेत्र दक्षिण में हिन्दी-प्रचार है। सन् 1918 में जब आपका अधिवेशन यहां हुआ था तब से दक्षिण में हिन्दी-प्रचार के कार्य का आरम्भ हुआ है।’’ महात्मा गांधी ने मालवीय जी के हिन्दी-प्रचार की प्रशंसा करते हुए कहा था ‘’सबसे पहला अधिवेशन सन् 1910 में हुआ था। उसके सभापति मालवीय जी महाराज ही थे। उनसे बढ़ कर हिन्दी-प्रेमी भारत वर्ष में हमें कहीं नहीं मिलेगा। कैसा अच्छा होता यदि वह आज भी इस पद पर होते। उनका हिन्दी प्रचार-क्षेत्र भारतव्यापी है; उनका हिन्दी का ज्ञान उत्कृष्ट है।’’
महात्मा गांधी मालवीय जी का बड़ा सम्मान करते थे। वे मालवीय जी के राष्ट्रभाषा हिन्दी सम्बन्धी विचारों से पूर्णत: सहमत थे। महात्मा गांधी कहते थे कि ‘’यह भाषा का विषय बड़ा भारी और बड़ा महत्वपूर्ण है।’’
अन्तत: हिन्दी के महत्व को सभी ने समझा। कालान्तर में कांग्रेस के अधिवेशन में हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा बनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्राप्त हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 14 सितम्बर 1949 के दिन हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया। भारतीय संविधान में राजभाषा हिन्दी के प्रबन्ध में अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।
आज इस देश के लोगों को शायद इस बात का अहसास भी न होगा कि भारत में हिन्दी को विश्वविदयालयों में एक विषय के रूप में कोई भी मान्यता प्राप्त नहीं थी। मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविदयालय में हिन्दी को सर्वप्रथम एक विषय के रूप में मान्यता दी। आज हिन्दी में पढ़ाई सारे विश्वविदयालयों में प्रचलित है। हिन्दी साहित्य के पुरोधा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पं; अयोध्या सिहं उपाध्याय ‘हरिऔध’, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि इसी विश्वविदयालय के हिन्दी विभाग के रत्न थे। मालवीय जी को हिन्दी के अखबारों का जनक कहना भी अतिशयोक्ति न होगी। कालाकॉकर (प्रतापगढ़) से ‘हिन्दुस्तान’ का संपादन करने के बाद उन्होंने प्रयाग से वर्ष 1907 में प्रकाशित ‘अभ्युदय’ और उसके बाद ‘मर्यादा’ का संपादन किया। इन समाचार पत्रों और इनके संपादकीय को जो सफलता और लोकप्रियता मिली वह अन्य समाचार पत्रों के लिये मार्गदर्शक बनी।
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