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Sunday, November 22, 2020

मैरी और मायकिल////कहानी//कौशल बंधना पंजाबी

 Whatsapp: 21st  November 2020 at 02:31 PM

 मानवीय मन की संवेदना जगाती नई रचना 

मैरी और मायकिल यही नाम रख दिए पड़ोसी भाभी ने उस प्रेमी जोड़े या पति पत्नी कहो। दोनों हमेशां साथ साथ रहते ,,, शायद उनको कुत्ते की योनि में अपने रिश्ते की एहमियत का अहसास हो चुका था।

दोनों ज़्यादातर रोटी भाभी के यहां ही खाते मगर राखी पूरी गली की करते। घुसने नहीं देते किसी को। बहुत बार मैरी मां बनी पर उसके बच्चे हर बार चलती फिरती गाड़ियों की भेंट चढ़ गए।

इस बार भी दो तीन बच्चे गाड़ियों की भेंट चढ़ गए थे। एक  को गंभीर चोट आई तो तरस खाकर उसे भाभी उठाकर ले आईं। उसका इलाज भी करवाया गया एक बुज़ुर्ग माता से, जो इन्सानी हड्डियों की माहिर हैं। ईश्वर की कृपा से वो बच्चा थोड़ा चलने फिरने भी लगा। यह पुण्य का काम था मुझे भी अच्छा लगा उन बेज़ुबानों की मदद करना।

मैरी के बच्चों को एक दो बार मैंने नाली में फंसने पर बचाया था उस बेज़ुबान को ये भी याद रहा आजतक। मुझे देखकर पूंछ हिलाकर परिचय देती कि वह सब समझती है।

पर मां तो मां है बेशक इन्सान हो या जानवर औलाद का मोह अलग ही होता है। इस बार उसके बच्चे मरे तो वह आक्रामकता पर उतर आई। हर आते जाते को भौंकने काटने भागने लगी।

गली वालों को फिर भी कुछ नहीं बोली यह भी उसकी समझदारी थी। मगर भाभी भी डर गईं कहीं काट लिया किसी को तो उनका नाम ख़ामख़ां बजेगा कि उनके गेट पर जो डेरा डाले रहती थी।

अब बच्चों को बेशक भाभी के घर से भी खाने को मिलता था मगर मैरी और मायकिल अपने मां बाप होने का फ़र्ज़ फिर भी निभाते,,,, कहीं से कुछ खाने को मिलता तो बच्चों के खाने को ले आते।

मगर इस बार कुछ अलग सी घटना घटी जो किसी के भी समझ ना आई,,,, मुझे बुख़ार था मैं लेटी थी,,,,गली में से लवली दीदी की आवाज़ें आ रही थीं।

मैंने बेटी को बोला ये लवली दीदी तो ऐसे बोलती नहीं कभी,,,, क्योंकि काम में बिज़ी होती, ज़रूर कोई गंभीर बात है। बेटी बोली मां आप ठीक नहीं, लेटी रहो । मगर मैं हिम्मत करके उठी । बाहर जाकर दीदी से पूछा क्या हुआ दी ,,,आप क्यों बोल रही हैंं,,,वह अपने घर के आगे की जगह धुल रही थीं। यहां मीट, चावल और हल्दी सी बिखरी थी।कुत्तों को भगाने को एक सोटी सी थी हाथ में।

बोले देखो कौशल जी ये आज दिन में तीसरी बार हुआ।अब सभी वहां इकट्ठा हो चुके थे और यह सोचने को मजबूर थे की यह किसी की कोई शरारत तो नहीं।

अब आजकल कोई जादू टोना को तो नहीं मानता वह यह भी बोले मगर सोच सभी की यह थी कि तीन बार एक खाना और कुत्तों को एक ही जगह मिली । सभी अपनी अपनी सोच में थे और अपने अपने विचार भी रख रहे थे। कुत्तों से ऐतराज़ भी सभी जता ही रहे थे बातों बातों में।

मैं वहां खड़ी सोच रही थी क्या मैरी को कोई ऐसा ठिकाना तो नहीं मिल गया जो खाना बच्चों के लिए चुराकर लाती हो। फिर सोचा, अब इन बच्चों का क्या होगा अगर भाभी ने छोड़ दिया।क्या इस बार भी एक एक कर गाड़ियों के नीचे आ जाएंगे। खुले आंगन में बैठे रहते थे।

सुबह उठे तो देखा पड़ोसी भाई जी ने गेट के आगे थोड़ी रोक लगा दी, अब डर तो उनका भी सच्चा था।

बच्चे उदास थे भाभी के बुलाने भागने वाले चुप चाप बैठे थे।और मैरी और मायकिल भी उदास नज़रों से गेट को ताक रहे थे। फिर मैरी और मायकिल दो बच्चों को ले गए,,मगर वह लौट आए ।अब भी गली में दूर दूर बैठे हैं उदास। पता नहीं कितनी उम्र शेष है उनकी। गाड़ियों की भेंट चढेगें या बचेंगे,,,,जिस ईश्वर ने पैदा किया अब वही जाने क्या होगा आगे। (हिंदी स्क्रीन) 

भाखड़ा nngl।

पंजाब।©®

Saturday, July 25, 2020

वो दो रोटियां-आशीर्वाद है मेरे लिए//*रुबीता अरोड़ा

25th July 2020 at 11:05 AM
 आज भी मेरी यादों का खास खज़ाना हैं वो दो रोटियां 
प्रतीकत्मक तस्वीर जिसे Cottonbro ने 25 अक्टूबर 2019 को 8:46 बजे सुबह खींचा  
मैं अपने मायके में सबसे छोटी थी,सबकी लाडली। कभी ज़्यादा काम नहीं किया था। लेकिन ससुराल में मैंने बड़ी बहू बन कर कदम रखा। ऊपर से सासु मां अक्सर बीमार रहती थी इसीलिए परिवार की सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी। समय पर सबको खाना देना, पूरे घर का ध्यान रखना आदि आदि। इन सबमें सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रही थी कि तभी मेरी दादी सास, जो पहले अलग घर में रहती थी, अब हमारे साथ रहने आ गई। घर में एक सदस्य तो बढा पर दादी के स्वभाव ने दिल जीत लिया। अस्सी साल की बूढ़ी दादी छड़ी लेकर पूरे घर में घूम-फिर कर निरीक्षण करती, हर किसी का ध्यान रखती, प्यार की मूरत लेकिन जरूरत पड़ने पर किसी को भी डाँटने की आदत ने जल्द ही उन्हें  पूरे घर की जान बना दिया। मुझे रोज़ अकेले सबका काम करते देखती तो उन्हे बहुत बुरा लगता। बस इसीलिए वे हमेशा किसी न किसी तरीके से मेरी मदद करने की कोशिश के चक्कर में मौका मिलते ही रसोई मे चली जाती पर भारी-भरकम शरीर, कमज़ोर आंखों की वजह से कुछ और ही कर बैठती और उनकी पकाई रोटियों का तो कहना ही क्या मोटी मोटी आधी कच्ची, आधी जली हुई जिन्हें खाना मेरे लिए आसान न होता हालाकिं बाकी सदस्य चुपचाप खा लेते। मैं हमेशा मना करती, बार-बार कहती आप आराम करो। मै बना लूंगी। कई बार तो हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठाना पड़ता लेकिन वह भी कहां मानने वाली थीं। जब भी मै कही इधर-उधर किसी काम से बाहर जाती या किसी दिन काम ज़्यादा होता तो थक कर सो जाती तो उन्हें मौका मिल जाता, चुपचाप रसोई में जाती और फिर पूरे परिवार की रोटियां सेंक डालती। 
*लेखिका रुबीता अरोड़ा 
सबके लिए सेंकने के बाद दो अलग से सेंकती, बेहद सावधानी के साथ और उन्हे बडे प्यार से अलग से लपेट कर रखती। जब मै रसोई मे जाने लगती तो पहले ही निर्देश देती मैने सबकी रोटियां सेंक दी है, तेरी दो अलग से बनाकर रखी है-पतली पतली, छोटी-छोटी जैसी तू खाती है। मना मत करना मैने बड़े प्यार से बनाई है। 
रोटियां देखती तो उनमें और बाकी रोटियों में कोई ज्यादा अंतर न होता पर उनमें दादी का मेरे प्रति प्यार जरूर झलकता। कई बार देवर शरारत से रोटियां हाथ में लेकर कहता हमारे लिए कच्ची-पक्की और अपनी बहू के लिए अच्छी-अच्छी आज तो ये दो रोटियां मैं खाऊँगा तो दादी छड़ी लेकर उसके पीछे भागती, उस पर चिल्लाती और हम सब खूब हंसते। दादी का कहना था बहू दिन-रात हमे हमारी मर्जी का खिलाती है तो उसका भी हक है कभी-कभार आराम से बैठकर खाने का। कई बार बाहर से कुछ खाकर आओ तो वैसे भी भूख न होती पर दादी के प्यार के सामने नतमस्तक होना पडता।  वो दो रोटियां साधारण न रहकर आशीर्वाद बन जाती मेरे लिए। भूख न होने के बावजूद मुझे खानी पडती। परन्तु ये हर बार मुझे अहसास दिलाती कि मैं भी परिवार की महत्वपूर्ण सदस्य हूं और परिवार में कोई है जो मेरे लिए इतना सोचता है। आज चूंकि दादी इस दुनिया में नहीं है तो कोई नहीं है इस तरह प्यार से बिठाकर खिलाने के लिए, खुद ही बनाना पडता है। बहुत याद आती हैं वो दो रोटियां। मिस यू दादी। 
 *रुबिता अरोड़ा मूल तौर एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं लेकिन साहित्य में रूचि के चलते वह अक्सर ज़िंदगी की छोटी बड़ी बातों पर लिखती रहती हैं ।