Showing posts with label Mahatma Gandhi. Show all posts
Showing posts with label Mahatma Gandhi. Show all posts

Friday, October 2, 2020

अहिंसक पथ के प्रेरक: महात्‍मा गांधी

 11-अक्टूबर-2017 18:53 IST

   विशेष लेख                                                                                                        ए.अन्‍नामलाई   


सत्य और अहिंसा के पुजारी एवं देश में आजादी की अलख जगाने वाले महात्मा गांधी ऐसे दूरदर्शी महापुरुष थे जो पहले ही यह भांप लेते थे कि कौन-कौन सी समस्‍याएं आगे चलकर विकराल रूप धारण करने वाली हैं। इसकी बानगी आपके सामने है। 

  *ए.अन्‍नामलाई   
महात्मा गांधी ने जिन समस्‍याओं का सटीक समाधान खोजने पर अपना ध्‍यान केंद्रित किया था वे आज के हमारे युग में भारी बोझ बन गई हैं। विश्‍व स्‍तर पर फैली गरीबी, अमीर एवं गरीब के बीच बढ़ती खाई, आतंकवाद, जातीय युद्ध, उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, पूर्व और पश्चिम के बीच बढ़ता फासला, उत्तर और दक्षिण के बीच बढ़ती विषमता, धार्मिक असहिष्णुता तथा हिंसा जैसी समस्‍याओं पर अपनी नजरें दौड़ाने पर आप भी इस तथ्‍य से सहमत हुए बिना नहीं रहेंगे। यही नहीं, महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता एवं समानता, मित्रता एवं गरिमा, व्यक्तिगत कल्याण और सामाजिक प्रगति जैसे जिन महान आदर्शों के लिए संघर्ष किया था, उनके लिए हम आज भी लड़ रहे हैं।

महात्मा गांधी ने दुनिया के इतिहास में पहली बार  जंग लड़े बिना ही एक विशाल साम्राज्य के चंगुल से छुड़ाकर एक महान देश को आजादी दिला दी। उस समय तक अमेरिका और एशिया के जितने भी उपनिवेशों ने यूरोप की औपनिवेशिक ताकतों से अपनी आजादी हासिल की थी उसके लिए उन्‍हें भयावह एवं विनाशकारी जंग लड़नी पड़ी थी। वहीं, दूसरी ओर महात्मा गांधी ने शांतिपूर्ण तरीके से यानी अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश को बहुप्रतीक्षित आजादी दिला दी। यह इतिहास में ‘मील का पत्थर’ था। दूसरे शब्‍दों में, यह एक युगांतकारी घटना थी। यह निश्चित रूप से मानव जाति के इतिहास में महात्मा गांधी का अविस्मरणीय योगदान है - युद्ध के बिना आजादी।

दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह

यह अहिंसा की पहली जीत थी–सविनय अवज्ञा की पहली जीत। इसने पूरी दुनिया के समक्ष पहली बार यह साबित कर दिया कि अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए हिंसा का रास्‍ता अख्तियार करना एक अप्रचलित या पुरातन तरीका है।

जब भी किसी बिगड़ते हालात से पूरे विश्वास के साथ, साहस के साथ, दृढ़ता के साथ एवं धीरज के साथ निपटा जाता है तो अहिंसा की तुलना में कोई भी हथियार अधिक कारगर साबित नहीं होता है। यह धरसना नमक वर्क्स और भारत की आजादी के लिए छेड़े गए आंदोलन का सबक था। यह महात्मा गांधी का महान ऐतिहासिक सबक था, लेकिन दुर्भाग्यवश दुनिया को अब भी यह सबक सीखना बाकी है।

महात्मा गांधी वर्ष 1906 से लेकर 30 जनवरी 1948 को अपनी मृत्यु तक अपने अहिंसक आंदोलन एवं संघर्ष के साथ अत्‍यंत सक्रिय रहे थे। इस अवधि के दौरान उन्‍होंने भारतीय एम्बुलेंस कोर के एक स्वयंसेवक के रूप में दक्षिण अफ्रीका में हुए बोअर युद्ध और ज़ुलु विद्रोह में हिस्सा लिया। महात्मा गांधी दो विश्व युद्धों के साक्षी भी बने। 

उनका अहिंसक संघर्ष काफी सक्रिय रहा था और जब भी जरूरत पड़ी, तो उन्होंने अफ्रीका में युद्ध की तरह अपनी अहिंसा को कसौटी पर रखा। जब भारत में सांप्रदायिक हिंसा की आग फैल गई तो वह भारत के पूर्वी भाग चले गए, ताकि वहां आमने-सामने रहकर हिंसक हालात का जायजा लिया जा सके।  

नोआखली में शांति मिशन

 ‘शिकागो डेली’ के दक्षिण एशिया संवाददाता श्री फिलिप्स टैलबॉट महात्मा गांधी के ऐतिहासिक मिशन के प्रत्यक्ष साक्षी थे। वह पश्चिम बंगाल के नोआखली गए और वहां फैली सांप्रदायिक हिंसा के दौरान महात्मा गांधी के साथ समय बिताया।  उन्होंने कहा, ‘छोटे कद का एक वृद्ध व्‍यक्ति, जिसने निजी संपत्ति त्‍याग दी है, एक महान मानव आदर्श की तलाश में ठंडी धरती पर नंगे पैर घूम रहा है।’

तात्कालिक अभिप्राय            

अप्रैल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर ग्रेट ब्रिटेन में नए सिरे से चुनाव हुए और प्रधानमंत्री के रूप में लेबर पार्टी के क्लीमेंट एटली की अगुवाई में सरकार बनी, जिन्‍होंने भारत में विचार-विमर्श करने और स्वशासन का मार्ग प्रशस्‍त करने के लिए कैबिनेट मंत्रियों का एक प्रतिनिधिमंडल भारत भेजा। उस समय तक एक समुचित समझौता संभव नजर आ रहा था और एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाना था जिसके लिए कांग्रेस ने अपनी सहमति व्यक्त कर दी थी। हालांकि, जिन्ना एवं मुस्लिम लीग ने अलग राष्ट्र की वकालत की और 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के रूप में मनाया, जिस वजह से कलकत्ता और पूर्वी बंगाल में अप्रत्‍याशित रूप से दंगे भड़क उठे।

सच्‍चाई को परखना

प्रतिक्रियास्‍वरूप, इस तरह के दंगे बंगाल के नोआखली और टिपराह जिलों में भड़क उठे। तब महात्मा गांधी ने एक संवाददाता के इस सुझाव को स्‍मरण किया एवं उस पर गंभीरतापूर्वक मनन किया कि उन्‍हें खुद किसी दंगा स्‍थल पर जाना चाहिए और व्यक्तिगत उदाहरण के जरिए अहिंसक ढंग से दंगों को शांत करने का रास्ता दिखाना चाहिए। महात्मा गांधी के अनुसार, ‘अहिंसा की उनकी तकनीक कसौटी पर कसी जा रही है। यह देखना अभी बाकी है कि वर्तमान संकट में यह कितनी कारगर साबित होती है। यदि इसमें कोई सच्‍चाई नहीं है, तो बेहतर यही होगा कि मुझे खुद ही अपनी विफलता घोषित कर देनी चाहिए।’ ठीक यही विचार इस अवधि के दौरान उनके प्रार्थना भाषणों में बार-बार व्यक्त किया गया था।

बंगाल में सांप्रदायिक अशांति के बाद महात्मा गांधी का संदेश यह था कि ‘सांत्वना नहीं, बल्कि साहस ही हमें बचाएगा।’ तदनुसार, महात्मा गांधी 7 नवंबर 1946 को नोआखली पहुंच गए और 2 मार्च 1947 को बिहार रवाना हो गए। ध्‍यान देने योग्‍य बात यह है कि 77 साल की उम्र में भी महात्मा गांधी अहिंसा और हिन्दू-मुस्लिम एकता में अपने विश्वास की सच्‍चाई को परखने के लिए नंगे पांव पूर्वी बंगाल के एक दूरदराज गांव जाने से पीछे नहीं हटे। महात्मा गांधी खुद दिसंबर 1946 के आखिर तक श्रीरामपुर नामक एक छोटे से गांव में डटे रहे और अपने अनुयायियों को अन्य दंगा प्रभावित गांवों में यह निर्देश देकर भेज दिया कि वे उन गांवों में रहने वाले हिंदू अल्पसंख्यक की सुरक्षा और हिफाजत के लिए कोई भी जोखिम मोल लेने से पीछे न हटें। जनवरी में उन्‍होंने दो चरणों में नोआखली स्थित गांवों का व्यापक दौरा शुरू कर दिया। अपने बारे में उन्होंने कहा, ‘मैं पूरे वर्ष या उससे भी अधिक समय तक यहां रह सकता हूं। यदि आवश्यक हो, तो मैं यहां मर जाऊंगा। लेकिन मैं मौन रहकर विफलता को स्वीकार नहीं करूंगा।’

उनकी दिनचर्या

गांवों के अपने दौरे के दौरान महात्मा गांधी ने नियमित रूप से तड़के 4 बजे उठने की आदत डाल दी। सुबह की प्रार्थना पूरी करने के बाद वह एक गिलास ‘शहद युक्‍त पानी’ पीते थे और सुबह होने तक तकरीबन दो घंटे अपने पत्राचार में लगे रहते थे। सुबह 7.30 बजे वह एक कर्मचारी और अपनी पोती के कंधों पर अपने हाथ रखकर सैर पर निकल जाते थे। हाथ से बुनी शॉल में लिपटे यह वृद्ध व्‍यक्ति काफी तेज कदमों से आगे-आगे चला करते थे। वह वृद्ध भारतीय तीर्थयात्रियों की तरह नंगे पांव चला करते थे। उनके आसपास कुछ अभिन्‍न व्‍यक्ति रहते थे जैसे कि प्रोफेसर निर्मल कुमार बोस, जो उनके बंगाली दुभाषिया थे और परशुराम, जो एक प्रकार के निजी परिचारक-कम-स्टेनोग्राफर थे। इसके अलावा, उनके आसपास एक-दो युवक, कुछ समाचार संवाददाता और मुस्लिम लीग के प्रीमियर एच. एस. सुहरावर्थी द्वारा मुहैया कराई गई पुलिसकर्मियों की एक टीम  (महात्‍मा गांधी द्वारा बार-बार विरोध जताने के बावजूद) रहती थी। कई ग्रामीण भी उनके साथ उस गांव तक जाया करते थे जहां वह एक दिन ठहरते थे। शाम में प्रार्थना सभा आयोजित की जाती थी। इसके बाद एक परिचर्चा आयोजित की जाती थी जिस दौरान वह अपने जेहन में उठने वाले हर विचार को लोगों के सामने रखते थे जैसे कि गांव में साफ-सफाई, महिलाओं में पर्दा प्रथा, हिंदू-मुस्लिम एकता, इत्‍यादि। रात्रि लगभग 9 बजे वह मालिश के बाद स्नान करते थे। इसके बाद वह एक गिलास गर्म दूध के साथ जमीन के नीचे उपजने वाली एवं कटी हुई सब्जियों के उबले पेस्ट के रूप में हल्‍का भोजन लेते थे।

उनके मिशन की कवरेज

नोआखली में अपने प्रवास के लगभग चार महीनों में महात्‍मा गांधी ने 116 मील की दूरी तय की और 47 गांवों का दौरा किया। नवंबर-दिसंबर के दौरान एक महीने से भी ज्यादा समय तक वह श्रीरामपुर में एक ऐसे घर में रहे जो आधा जला हुआ था। उन्होंने 4 फरवरी और 25 फरवरी, 1947 को समाप्त दो समयावधि में अन्य गांवों का दौरा किया। वह 2 मार्च 1947 को हैमचर (नोआखली जिले में) से कलकत्ता होते हुए बिहार के लिए रवाना हो गए।

एक और ‘करो या मरो’ मिशन

महात्मा गांधी ने 5 दिसंबर, 1946 को नारनदास गांधी को लिखे एक पत्र में अपने मिशन के बारे में निम्नलिखित शब्दों में अभिव्यक्त किया:-

‘वर्तमान मिशन मेरे जीवन में शुरू किए गए सभी मिशनों में सबसे जटिल है. . . मुझे याद नहीं है कि मैंने अपने जीवन में इस तरह के घनघोर अंधेरे का अनुभव इससे पहले कभी किया भी था या नहीं। रात काफी लंबी प्रतीत हो रही है। मेरे लिए एकमात्र सांत्वना की बात यह है कि मैंने हार नहीं मानी है या निराशा को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है। यह पूरा किया जाएगा। मेरा मतलब यहां ‘करो या मरो’ से है। ‘करो’ से मतलब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द बहाल करने से है और ‘मरो’ से मतलब प्रयास करते-करते मिट जाने से है। इसे हासिल करना मुश्किल है। लेकिन सब कुछ ईश्वर की इच्छा के अनुरूप ही होगा।’ (सीडब्ल्यूएमजी, 86: 197-98)  

वह वास्तव में एक कठिन मार्ग पर नंगे पांव चलने वाले ‘अकेले तीर्थयात्री’ थे और वह लोगों की ता‍कत एवं अहिंसा की ताकत का नायाब प्रदर्शन करने में काफी हद तक सफल रहे।

मिशन गांधी:

जब पूरी दुनिया ने एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में अनुबंधित श्रम को स्वीकार कर लिया था, तब महात्‍मा गांधी ने इसका विरोध किया। जब पूरी दुनिया ने यह स्वीकार कर लिया कि ‘ताकतवर की बात ही सही माननी पड़ती है’, तब महात्‍मा गांधी ने यह साबित कर दिया कि ‘जो सही बात होती है उसे ताकतवर को भी माननी पड़ती है।’ जब पूरी दुनिया ने मार-काट वाली लड़ाइयां लड़ीं, तब उन्होंने एक अहिंसक लड़ाई लड़ी। उन्होंने हिंसा के स्‍थान पर अहिंसा को अपना कर इतिहास की दिशा ही बदल दी। अब तक हिंसा ही राजनीतिक विवादों को सुलझाने का अंतिम हथियार थी, लेकिन अहिंसक प्रतिरोध अर्थात सत्याग्रह के जरिए उनके योगदान के बाद अहिंसा ने पूरी दुनिया में लोगों के हालिया आंदोलन में सबसे अहम स्थान हासिल कर लिया है।  (PIB)

फोटोः हिंदी स्क्रीन इनपुट 

****

लेखक ए.अन्‍नामलाई, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, राजघाट, नई दिल्ली में निदेशक के पद पर कार्यरत है।  

****

Thursday, October 1, 2020

स्‍वच्‍छता की कमी एक अदृश्‍य हत्‍यारे की तरह है

 03-अक्टूबर-2017 09:39 IST

गांधी जी के लिए अहिंसा स्‍वच्‍छता के समान थी


गांधी जयंती-02 अक्टूबर को होती है। 
इस अवसर पर आयोजित “स्वच्छता ही सेवा” पखवाड़ा के संबंध में  *सुधीरेन्द्र शर्मा का विशेष लेख-

*सुधीरेन्द्र शर्मा

गंदगी और बीमारी के खिलाफ भारत के निर्णायक युद्ध को ‘स्‍वच्‍छता ही सेवा’ अभियान से ज़ोरदार बढ़ावा मिला है जो स्‍वच्‍छता की साझा जिम्‍मेदारी के बारे में हमारा ध्‍यान आकृष्‍ट करता है। देश में पहले से चलाए जा रहे ‘स्‍वच्‍छ भारत मिशन’ को और असरदार बनाने की इस मुहिम में जनता का आह्वान किया गया है कि वे साफ-सफाई को उन ‘दूसरे’ लोगों की जिम्‍मेदारी न समझें जो ‘हमारे’ इस दायित्‍व को ऐतिहासिक रूप से खुद निभाते आए हैं।   

महात्‍मा गांधी के घुमंतु जीवन में ऐसे अनगिनत अवसर आए जिनसे स्‍वच्‍छता और सेवा का संबंध स्‍पष्‍ट रूप से सामने आ जाता है और तब गांधीजी अपने आप को  ‘हरएक को खुद का सफाईकर्मी होना चाहिए’ के आदर्श के जीते-जागते उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। इस बात के बारे में आश्‍वस्‍त हो जाने पर कि वह ‘किसी को भी गंदे पांव अपने मस्तिष्‍क से होकर गुजरने नहीं देंगे’ गांधी जी ने झाड़ू को जीवन भर मजबूती से अपने हाथों में थामे रखा और ‘सफाईकर्मी की तरह’ अपनी सेवाएं उपलब्‍ध कराने का कोई अवसर नहीं गंवाया।  

 अफ्रीका में फीनिक्‍स से भारत में सेवाग्राम तक गांधीजी के आश्रम इस बात का जीता-जागता उदाहरण रहा कि स्‍वच्‍छता के लिए सेवा करने का क्‍या मतलब है। साफ-सफाई उनके लिए दिखावे के लिए की जाने वाली कोई गतिविधि न होकर सेवा का एक महान कार्य था जिसमें सभी आश्रमवासी रोजाना हिस्‍सा लेते थे। इससे यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि राष्‍ट्रपिता के लिए स्‍वच्‍छता का कार्य एक ऐसा सामाजिक हथियार था जिसका उपयोग वह साफ-सफाई में बाधा डालने वाली जाति और वर्ग की बाधाओं को दूर करने में करते थे और यह आज तक प्रासंगिक बना हुआ है।

लेकिन यह बात हैरान करने वाली है कि महात्‍मा गांधी ने आजादी हासिल करने के अपने अहिंसक आंदोलन की समूची अवधि के दौरान किस तरह स्‍वच्‍छता के अपने संदेश को जीवंत बनाए रखा। नोआखाली नरसंहार के बाद अहिंसा के अपने विचार और व्‍यवहार की अग्निपरीक्षा की घड़ी में गांधीजी ने अपने इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का कोई अवसर नहीं गंवाया कि स्‍वच्‍छता और अहिंसा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।   

एक दिन नोआखाली के गड़बड़ी वाले इलाकों में अपने शांति अभियान के दौरान उन्‍होंने पाया कि कच्‍ची सड़क पर कूड़ा और गंदगी इसलिए फैला दी गयी है ताकि वह हिंसाग्रस्‍त इलाके के लोगों तक शांति का संदेश न पहुंचा पाएं। गांधी जी इससे जरा भी विचलित नहीं हुए और उन्‍होंने इसे उस कार्य करने का एक सुनहरा अवसर माना जो सिर्फ वही कर सकते थे। आस-पास की झाडि़यों की टहनियों से झाड़ू बनाकर शांति और अहिंसा के इस दूत ने अपने विरोधियों की गली की सफाई की और हिंसा को ओर भड़कने से रोक दिया।   

उनके लिए ‘स्‍वस्‍थ्‍य तन, स्‍वस्‍थ मन’ की कहावत में कोई मूर्त अभिव्‍यक्ति अंतर्निहित नहीं थी, बल्कि इसमें एक गहरा दार्शनिक संदेश छिपा हुआ था। क्‍या कोई ऐसा व्‍यक्ति अपने मन में अहिंसक विचारों को प्रश्रय दे सकता है जिसके कृत्‍य दूसरे प्राणियों या प्रकृति के प्रति हिंसक होंॽ वह स्‍वच्‍छता को स्‍वतंत्रता के अपने राजनीतिक आंदोलन का अभिन्‍न अंग मानते थे और नि:संदेह वह स्‍वच्‍छता की कमी को हिंसक कृत्‍य के समान मानते थे। सचमुच, स्‍वच्‍छता की कमी से देश में आज भी लाखों बच्‍चे मौत की नींद सो जाते हैं और यह भी एक तरह की हिंसा ही है।     

      कोई आश्‍चर्य नहीं कि स्‍वच्‍छता की कमी एक अदृश्‍य हत्‍यारे की तरह है। गांधी जी को गंदगी में हिंसा का सबसे घृणित रूप छिपा हुआ दिखता था। इसलिए वह सामाजिक-राजनीतिक, दोनों ही तरह की स्‍वतंत्रता के मार्ग में स्‍वच्‍छता और अहिंसा सहयात्री की तरह मानते थे। गांधीजी पश्चिम में स्‍वच्‍छता के सुचिंतित नियमों को देख चुके थे इसलिए वह इन्‍हें अपने और अपने करोड़ों अनुयायियों के जीवन में अपनाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए।हालांकि इसके लिए उन्‍होंने जो कार्य शुरू किया उसमें से ज्‍यादातर अब भी अधूरे ही हैं।    

       ‘‘वर्षों पहले मैंने जाना कि शौचालय भी उतना ही साफ-सुथरा होना चाहिए जितना कि ड्राइंग रूम’’।अपनी जानकारी को ऊंचे स्‍तर पर ले जाते हुए गांधीजी ने अपने शौचालय को (वर्धा में सेवाग्राम के अपने आश्रम में) शब्‍दश: पूजास्‍थल की तरह बनाया क्‍योंकि उनके लिए स्‍वच्‍छता दिव्‍यता के समान थी। शौचालय को इतना महत्‍व देकर ही जनता को इसके महत्व के बारे में समझाया जा सकता है। इस पर अमल के लिए हमें गंदगी में रहने के बारे में अपनी उस धारणा में बदलाव लाना होगा जिसके तहत हम स्‍वच्‍छता को आम बात न मानकर एक अपवाद अधिक मानते हैं।  

       देश को 2 अक्‍तूबर 2019 तक खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य उसी दिशा में उठाया गया पहला कदम है। देश भर में 5 करोड़ से ज्‍यादा घरों में से हर एक में शौचालय का निर्माण करने का वादा एक चुनौती भरा लक्ष्‍य है, लेकिन ‘शौचालय आंदोलन’ को ऐसे ‘सामाजिक आंदोलन’ में बदलना, जिसमें शौचालयों का उपयोग आम बात बन जाए, तभी संभव है जब हम गांधी जी के जीवन से सबक लें। अन्‍य बातों के अलावा हमें शौचालयों की सफाई करने और सीवेज के गड्ढों को खाली करने के बारे में गांव के लोगों की अनिच्‍छा जैसी सामाजिक-सांस्‍कृतिक वर्जना को दूर करना होगा।      

कोई भी इस समस्‍या की गंभीरता का अनुमान उस तरह से नहीं लगा सकता जिस तरह गांधीजी ने खुद इसका आकलन किया था। एक बार जब कस्‍तूरबा गांधी ने शौचालय साफ करने और गंदगी का डब्‍बा उठाने में घृणा महसूस की थी तो गांधीजी ने उन्‍हें झिड़की दी थी कि अगर वह सफाई कर्मी का कार्य नहीं करना चाहतीं तो उन्‍हें घर छोड़कर चला जाना चाहिए। कई तरह से स्‍वच्‍छता उनके लिए अहिंसा की तरह, या शायद इससे भी ऊंची चीज थी।    

गांधी जी के जीवन के इस छोटे-से मगर महत्‍वपूर्ण प्रकरण में एक बहुमूल्‍य संदेश निहित है।अपने बाकी जीवन में इस पर अमल करते हुए कस्‍तूरबा ने अनजाने में ही ‘स्‍वच्‍छता ही व्‍यवहार है’ का परिचय दे दिया। अगले साल स्‍वच्‍छता अभियान के लिए यह प्रेरक संदेश हो सकता है। आखिर यही तो वह व्‍यवहार-परिवर्तन है जिसके संदेश को स्‍वच्‍छ भारत मिशन के जरिए करोड़ों लोगों के मन में बैठाने का प्रयास किया जा रहा है। (PIB)

फोटोः  हिंदी स्क्रीन इनपुट 

*******

*डॉ. सुधीरेन्द्र शर्मा स्‍वतंत्र लेखक, अनुसंधानकर्ता और शिक्षाविद हैं। इस लेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं।

 

Thursday, January 31, 2013

गांधी जी पर शैक्षणिक कार्य

31-जनवरी-2013 15:11 IST
'' ''फेथ एंड फ्रीडम: गांधी इन हिस्‍ट्री'' '' का विमोचन
हमेशा ही विशेषज्ञों और सामान्‍य पाठकों के बीच रुचिकर और उपयुक्‍त रहा है-उपराष्‍ट्रपति
उपराष्‍ट्रपति श्री एम. हामिद अंसारी ने 30 जनवरी 2013 को प्रो. मुशीरूल हसन द्वारा लिखी गई पुस्‍तक ''फेथ एंड फ्रीडम: गांधी इन हिस्‍ट्री'' का विमोचन नी दिल्ली में किया। पत्र सूचना कार्यालय के छायाकार ने उन यादगारी पलों को हमेशां के लिए अपने कैमरे से संजो कर रख लिया। (PIB photo)
उपराष्‍ट्रपति श्री एम. हामिद अंसारी ने कहा कि गांधी जी पर शैक्षणिक कार्य हमेशा ही विशेषज्ञों और सामान्‍य पाठकों के बीच रुचिकर और उपयुक्‍त रहा है। उनकी शहादत की वर्षगांठ पर इस कार्य का विमोचन अपने आप में गौरव प्रदान करता है। उन्‍होंने प्रो. मुशीरूल हसन द्वारा लिखी गई पुस्‍तक ''फेद एंड फ्रीडम: गांधी इन हिस्‍ट्री'' का विमोचन करने के बाद संबोधन में कहा कि गांधी जी पर लिखे सभी लेख इंसान, शिक्षक, समाज सुधारक, जन-नेता, सांप्रदायिक सद्भाव के उपदेशक, शक्तिशाली साम्राज्य के प्रतिवादी, नए तरह के राजनीतिक सक्रियतावाद के निर्माता अपने देश तथा नागरिकों की महान आत्‍माओं के कुछ पहलुओं पर आधारित है। प्रो. मुशीरूल हसन की पुस्‍तक पारंपरिक जीवनी और मानक इतिहास से परे है। यह पुस्‍तक विषयों के माध्‍यम से इतिहास के अनुसार चलती है। यह पुस्‍तक महात्‍मा गांधी के जीवन के उन पहलुओं तथा उनके द्वारा किए गए कार्य पर प्रकाश डालती है, जो हमें पता है परंतु उनका पर्याप्‍त विश्‍लेषण नहीं हो पाया है। 
उन्‍होंने बताया कि प्रो. मुशीरूल हसन का ध्‍यान गांधी जी के विचार तथा कार्य के दो विशिष्‍ट पहलुओं के विश्‍लेषण पर केंद्रित है। पहला उनकी ''काँग्रेसी मुसलमानों के साथ जटिल तथा अस्थिर संबंध जोकि एक अपेक्षाकृत अज्ञात प्रजाति और जिन कारणों से उन्‍होंने लीग के दावे यानी पाकिस्‍तान का चयन किया'' और दूसरा ''गांधी जी का दक्षिण एशिया में स्‍पष्‍टता और समझदारी से इस्‍लाम और मुस्लिम समुदाय की समझ की व्‍याख्‍या करना' (PIB)
***गांधी जी पर शैक्षणिक कार्य 

Monday, October 8, 2012

राष्ट्रिय विकास मंच ने किया एक और अहम एलान

गाँधी जी की विचारधारा को घर घर ले जाने का संकल्प  
13 अक्टूबर को होगा लुधियाना में बापू गाँधी का श्राद्ध
संकल्प लेते राष्ट्रिय विकास मंच के सदस्य और अन्य लोग 
महात्मा गाँधी का नाम और विचारधारा उनकी शहादत के बाद लगातार और जोर पकडती जा रही है। तेज़ी से से प्रासंगिक हो रहे गाँधी जी के विचार एक बार फिर युवायों को आकर्षित कर रहे हैं। उनके समर्थकों की सख्या भी बढ़ रही है और विरोधियों की भी। चर्चा उनक समर्थक भी उनके विचारों की करते हैं और उनके विरोधी भी। हालत यह है की गाँधी जी का विरोध करने वाले भी उनकी हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे को सीधे सीधे नायक कहने की हालत में नहीं हैं। गत दिनों एक स्कूली छात्रा ने आरती आई के ज़रिये प्रधानमन्त्री कार्यालय से एक सवाल पूछा कि महात्मा गाँधी को बापू गाँधी की उपाधि या नाम किस ने और कब दिया। इस सवाल का जवाब न तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिया और न ही गृह मन्त्रालय ने। आखिर इस बच्ची की तस्वीर, उसका सवाल और सरकार का इस पर टालमटोल का जवाब सब कुछ फेसबुक पर आ गया। राष्ट्र के बापू केसाथ यह कैसा मजाक ? जिस नमक आन्दोलन बापू ने सारी दुनिया हिला दी वही नमक देश में आजादी आ जाने के बाद महंगे भाव पर बिकने लगा। जिस स्वदेशी के नारे ने अँगरेज़ साम्राज्य की नींव हिला दी थी आजादी आ जाने के बाद आज उसी स्वदेशी की नीति को पांवों तले कुचल कर विदेशी कम्पनियों को घुटने टेक कर निमंत्रित किया जा रहा है की आईये और हमें लूटिये। देश के बापू के साथ यह कैसा खिलवाड़ ? सीधे विदेशी निवेश जको एक आवश्यक मुख्य नीती के तौर पर अपना लिया गया है। आज समझ आने लगा है की गाँधी जी ने आजादी आने के बाद कांग्रेस को भंग करने की बात क्यूं कही थी? महात्मा गाँधी का नाम लेने वाले लोग ही गाँधी जी के सपनों को धुल में मिला रहे हैं। हमारा संविधान जिस विचार, नीति और भावना की बात करता है हमारे कदम उस सब के पूरी तरह विपरीत जा रहे हैं। किसी भी तरह नहीं लगता कि  यह गाँधी जे के सपनों या विचारों की आजादी है ! 
राष्ट्रीय  विकास मंच के आयोजन की एक यादगारी तस्वीर  
हालात लगातार नाज़ुक हो रहे हैं। अमन, शांति और सदभावना के पुजारी महात्मा गाँधी को बापू कहने वाले देश में हत्या, साड्फूंक, खूनखराबा, लूटमार, बेईमानी, बलात्कार, भ्रूण हत्या, शोषण, बेरोज़गारी, छूयाछात जैसे कलंक एक आम बात हो चुकी है।  इन अत्यंत गंभीर हालात में राष्ट्रीय विकास मंच ने एक संकल्प लिया है गाँधी जी के विचारों को घर घर तक लेजाने का। इसकी औपचारिक शुरूआत की गयी दो अक्टूबर गाँधी जयंती के दिन। पहले दो छोटे छोटे से कार्यक्रम हुए लुधियाना के गोलबाग में, इसके बाद रखबाग और फिर 1 बजे गाँधी धाम पर हुआ मुख्य समारोह। गुरिंदर सूद, निर्दोष भारद्वाज, हरजीत सिंह नंदा और रवि सोई के मार्गदर्शन और संचालन में संकल्प लिया गया की वे सभी मिल कर छूआछात, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और देश में बढ़ रहे विदेशी के चलन का दत कर विरोध किया जायेगा।  ਇਹਨਾਂ ਅੱਤ ਦੇ ਗੰਭੀਰ ਹਾਲਾਤਾਂ ਵਿੱਚ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਵਿਕਾਸ ਮੰਚ ਨੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫੇਰ ਮਹਾਤਮਾ ਗਾਂਧੀ ਦੇ ਫਲਸਫੇ ਨੂੰ ਘਰ ਘਰ ਤੱਕ ਲਿਜਾਣ ਦਾ ਬੀੜਾ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ। दो अक्टूबर 2012 को शुरू हुआ यह अभियान 30 जनवरी तक जरी रहेगा। इस अभियान के अंतर्गत 13 अक्टूबर 2012 को बापू गाँधी का श्राद्ध भी किया जायेगा। गौरतलब है कि बापू के श्राद्ध का आयोजन किसी भी विचार्धार्क सन्गठन की और से शायद पहली बार किया जा रहा है। उल्लेखनीय है की 13 अक्टूबर 1948 के दिन को ही बापू गाँधी की अस्थियों का विसर्जन भी हुआ था। इस श्राद्ध में भाग लेने के इच्छुक नीचे दिए गए नम्बरों पर सम्पर्क भी कर सकते हैं। 
गुरिंदर सूद:               +91 98881 23786
रवि राज सोई:               +91 98884 92198
ਨਿਰਦੋਸ਼ ਭਾਰਦਵਾਜ :     +91 99884 03850

नीचे दिए गए दो पंजाबी लिंक भी देखें:
1*ਗਾਂਧੀਵਾਦ ਅੱਜ ਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿਚ–ਮੋਹਿਤ ਸੇਨ


2*13 ਅਕਤੂਬਰ ਨੂੰ ਹੋਵੇਗਾ ਬਾਪੂ ਗਾਂਧੀ ਦਾ ਸ਼ਰਾਧ ਲੁਧਿਆਣਾ ਵਿੱਚ 

राष्ट्रिय विकास मंच ने किया एक और अहम एलान