Thursday, April 16, 2020

महिला सशक्तिकरण के दावों में एक कहानी यह भी

Posted on FB: Thursday: 16 April 2020 at 8:57 AM
...और उसने सारी दास्तान हिमांशु कुमार जी को लिख भेजी 
सोशल मीडिया//फेसबुक: 16 अप्रैल 2020: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::
बहुत से कलमकार हैं जिन्हें तकरीबन हर मामले में या तो अपने अपने दल के रंग की राजनीति नज़र आती है या फिर हिन्दू-सिख या हिन्दू मुस्लिम का नज़रिया जाग उठता है। समाज में और क्या क्या हो रहा है यह सब उन्हें नज़र नहीं आता या फिर वे इसे देखना ही नहीं चाहते। वे गोदी मीडिया बन जाते हैं या मनमौजी मीडिया। ऐसे माहौल में एक नाम है हिमांशु कुमार का जो इस बार भी लाये हैं एक ख़ास कहानी। जो रुलाती है, झंक्झौरती है, सवाल पूछती है,शर्मिंदा करती है। कहानी सच्ची है लेकिन नायका के आग्रह पर उसका नाम पता छुपा लिया गया है। पढ़ते हुए आंसू आएं तो आने देना। गुस्सा आये तो भी आने देना। आपको यह कहानी कैसी लगी अवश्य बताना। -रेक्टर कथूरिया
साभार चित्र 
फेसबुक पर आपकी पोस्ट पढ़कर आपके प्रगतिशील विचारों और आपके बच्चों के साथ आपके संबंधों से प्रभावित होकर आपको इनबाक्स में यह लिख रही हॅू।
प्रस्तुति:हिमांशु कुमार 
मैं आपके साथ अपनी कहानी साझा कर रही हूं यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से लिखते हैं तो कृपया मेरा नाम और मेरी कंपनी का नाम मत लिखिए।

'एम ए पूरा करने के बाद मुझे रेडियो में टेंपरेरी उद्घोषक की नौकरी मिल गई थी मेरे परिवार ने मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डालना शुरू किया।

मुझसे कहा गया कि मेरे ससुराल वाले तय करेंगे कि मुझे आगे पढ़ना है या नहीं।

मैंने अपनी जिंदगी के लिए किसी के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया।

मेरे परिवार वालों ने मुझे गाली दी मेरे माता पिता और मेरा भाई मुझे बुरी तरह से पीटते थे।

मैंने घर में भूख हड़ताल की और ज़हर खाकर देखा, लेकिन शादी के लिए इंकार कर दिया।

मैंने कहा मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं ताकि कोई मेरे साथ बुरा व्यवहार या मेरे सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके जैसा आप लोगों ने मेरी मां के साथ किया।

मेरे परिवार के लिए यह सब असहनीय था।

अंत में एक दिन शाम के समय मुझे मेरे घर से बाहर फेंक दिया गया।

मैंने सिर्फ एक जोड़ी कपड़े पहने हुए थे।

मेरे पावों में मेरी चप्पल भी नहीं थी और ना मेरा चश्मा था।

मेरे पास कोई पैसा नहीं था।

मेरी सहेली अपने दो सूट लाई जो साइज में छोटे थे लेकिन मेरे बहुत काम आए 4 महीने बाद मैंने पटरी पर से जींस पैंट ली।

मुझे रेडियो में काम मिला मैं 3:00 बजे सुबह उठती थी 4:00 बजे ट्रेन पकड़ती थी 5:00 बजे काम शुरू करती थी

मेरे विश्वविद्यालय की बस दो दोस्त थीं।

मैं गैर कानूनी तौर पर अपनी एक जूनियर साथी के कमरे में छुप कर रही।

लेकिन एक दबंग समलैंगिक लड़की जो मुझे अपने कमरे में रखना चाहती थी उसने मेरे मना करने पर मेरी शिकायत वॉर्डन से कर दी।

मैं फिर से सड़क पर आ गई मेरी एक दोस्त मुझे अपने हॉस्टल में ले गई।

मैंने दो शिफ्ट में काम करना शुरू किया मैं चार-पांच दिन तक बिना सोए कई बार भूखी सोती थी।

मेरे माता पिता ने रिश्तेदारों से कहा हुआ था कि मैं हॉस्टल में रह रही हूं यह बात मुझे 2 साल बाद तब पता चली जब मेरे पड़ोसी मुझे मिले।

मेरे पिता ने मेरे संपादक को फोन किया और कहा कि मैं चरित्रहीन हूं मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए।

एक दिन कमजोरी की वजह से मैं घर में बेहोश हो गई।

मेरा संपादक नेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का धंधा करता था उसने मुझे वेश्यावृत्ति में जाने के लिए और आराम से कमाई करने के लिए कई इशारे किए।

जब मुझे इस सब के बारे में पता चला मैंने वहां से नौकरी छोड़ दी।

दो जगह काम करने के बाद मुझे एक बड़े टीवी चैनल में नौकरी मिली।

मेरे परिवार वाले मुझसे ईर्ष्या करते थे।

मेरी मां ने कहा कि वह पैसा देकर मेरा बलात्कार करवा देगी।

उस दिन मेरे मन से उन लोगों के लिए रहा सहा सम्मान भी समाप्त हो गया।

वह 1997 का साल था अब से चार साल पहले मैं उनसे मिलने गई उन्होंने मुझे नहीं पहुंचाना।

और मुझे घर में आने भी नहीं दिया।

अंत में वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मुझसे बात करेंगे।

वह लोग उसी तरह से बात कर रहे थे और उसी तरह नाराज थे।

मैंने कोई गलती नहीं करी थी मैं घर से भागी नहीं ना मैं गर्भवती हुई।

उनके लिए सामाजिक तौर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

लेकिन फिर भी वो नाराज है।

मेरा भाई जो आपने कैरियर में कुछ खास नहीं कर सका था वह मेरी हैसियत देखकर मुझसे जलन करने लगा।

मैं चैनल बदल कर आगे बढ़ती गई आज 24 साल बाद भी वह मुझसे उतनी ही नफरत करते हैं।

आज वह इस बात से ज्यादा नाराज है कि मैं इतनी अच्छी कमाई कैसे कर रही हूं।

मेरा इतना अच्छा घर कैसे हैं और मेरा मकान उनके बेटे को क्यों नहीं मिलेगा क्योंकि उनका बेटा ही उनका खानदान चलाएगा।

मेरे भाई के दो बेटियां हैं वे उनके साथ उदार है परंतु मेरे लिए नहीं।

मुझे लगातार मनोचिकित्सक की दवाइयां और इलाज कराते रहना पड़ता है।

मुझे अभी भी रात को सपने आते हैं कि मुझे घर से निकाला जा रहा है।

लेकिन मैं आज खुश हूं कि मैंने अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया।

मेरे पास तीन बिल्लियां है और कई आवारा पशु हैं जिन्हें मैंने बचाया है।

मेरा भाई आज भी मुझसे बातचीत करता है लेकिन वह कहता है तुम गलत थी।

मैंने उन्हें दूसरी बार मौका दिया लेकिन वह दूसरी बार भी फेल हो गए।

मेरे घर में लड़के और लड़की के बीच में भेद किया जाता है।

मेरा भाई मुझसे कहता था मुझसे बराबरी मत करो मैं लड़का हूं तुम लड़की हो।

मेरा भाई कहता है कि मैं उसके लिए प्रेरणा हूं हालांकि वह यह भी कहता है कि तुम ने हम सब को बहुत परेशानी में डाला और तुम इसलिए कर पाईं क्योंकि तुमने कुछ उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

1 दिन मेरा भाई पिताजी के साथ ऑफिस आया क्योंकि लोग कहते थे कि तुम्हारी बेटी कहां है हमें दिखाओ मेरा भाई चाहता था कि मैं वहां जाकर अपना मुंह दिखाऊं।

मैंने मना किया तो मुझे भाई ने बीच बाजार में थप्पड़ मारा मैंने पुलिस में रिपोर्ट कराई कि मेरी जान को इन लोगों से खतरा है।

मेरे परिवार वाले सोचते थे मैं पैसा नहीं कमा पाऊंगी इसलिए उन्होंने मुझे घर से निकाला।

लेकिन जब हमारे पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कहा कि तुम्हारी बेटी तो बहुत अच्छे से है तो मेरे परिवार वाले ज्यादा परेशान हुए।

दो साल से मेरा एक पुरुष मित्र हैं और मैं उसके साथ बहुत खुश हूं।


Wednesday, April 8, 2020

क्रिएटिव राइटर्स ग्रुप ने लॉक डाउन के दौर में भी कराया मुशायरा

इस बार का विषय था पत्ते, जिन पर बहुत ही खूबसूरती से लिखा गया
लुधियाना: 7 अप्रैल 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
कोरोना का कहर टूटा तो इससे बचाव के लिए लॉक डाऊन सबसे आवश्यक था। लॉक डाउन के बिना कोई और चारा  भी नहीं था लेकिन इसके लागू होते ही ज़िंदगी थम सी गई। लोग अपने अपने घरों में कैद हो कर रह गए। कोरोना के कारण हुए इस लॉक डाउन में हालत नज़रबंदी जैसी हो कर रह गई। दुनिया की रफ्तार एक दम थम गई। इस थमे हुए माहौल में वे लोग फिर भी सक्रिय रहे जो थमने जानते ही नहीं। वे लोग जिन्हें तूफानों के सामने चिराग जलाने की हिम्मत नसीब में मिली है। जो वे लॉक डाउन की पालना करते हुए नहीं थमे। घरों में कैद हो कर भी वे  नहीं रुके। उनकी सोच चलती रही। उनके जज़्बात चलते रहे। उनकी कलम भी चलती रही। कोरोना ने उन्हें अपने अपने घरों में कैद तो करवा दिया लेकिन उनके ख्यालों की उड़ान जारी रही। युवा कलमकारों के दिलों की धड़कन जसप्रीत कौर फलक ने इस दिशा में बहुत ही शिद्दत से सोच विचार की। इस गहरी सोच विचार के बाद एक स्पेशल किस्म का आईडिया उनके दिमाग में उतरा। बात बहुत ज़बरदस्त थी लेकिन उसे प्रेक्टिस में लाना आसान भी नहीं था। इसे सोचना तो  मुश्किल था ही लेकिन इसे लागू करके दिखाना और भी मुश्किल था। फिर उन्होंने यह आईडिया वरिष्ठ कलमकार और विज्ञानी डाक्टर जगतार सिंह धीमान के साथ भी शेयर किया और इसकी सफलता के लिए उनका आशीर्वाद मांगा।  बात डाक्टर धीमान के भी दिल को लगी। उन्होंने भी इस पर गंभीरता से सोचा। उनके अंतरमन में बैठे कवि ने इसे अपने ढंग से सोचा, उम्र भर विज्ञान का अध्यन करने वाली सोच के सिस्टम ने अपने ढंग से सोचा और रजिस्ट्रार के पद पर बैठे प्रशासक ने अपने नज़रिये से अपना मशवरा दिया। फैसला हुआ कि अपने अपने घर में बैठ कर साहित्य की सरगर्मी चलाई जाये। एक ऑनलाइन मुशायरा शुरू किया जाये जिसमें नयी उम्र के कलमकारों को पहल दी जाये। बस यहीं से शुरू हुआ एक विशेष मुशायरा। इसमें कोरोना का दर्द भी था,कोरोना की बंदिशें भी और लॉक डाउन की ज़िंदगी के कड़वे मीठे अनुभव भी। यह आइडिया पत्रकारिता में उम्र गुजरने वाले अश्वनी जेतली को भी बेहद जचा और उन्होंने आखिर मूल तौर पर तो वह भी शायर ही ठहरे। शायरी ने युवा अवस्था में ही बहुत जनून में थी और बाद में पत्रकारिता ने भी अपना रंग उनकी शख्सियत में जोड़ दिया। वह भी इस काफिले में शामिल हो गए। उसके बाद शुरू लॉक डाऊन के नियमों की पालना करते हुए मुशायरा कराने का सिलसिला। अब यह सिलसिला हर रोज़ चलता है। हर रोज़ ही कोई नया विष भी सुझाया जाता है। नयी कलमों प्रोत्साहित करने के लिए उनका मार्गदर्शन भी होता है और आलोचना भी। देखिये इसका थोड़ा सा रंग यहाँ भी , इन रचनाओं को विस्तृत रूप से अलग से भी प्रकाशित किया जा रहा है। साहित्य स्क्रीन में भी। 
जब इस ग्रुप में पत्तों पर कुछ लिखने को कहा गया तो गुरवीर सियाण ने लिखा:
पत्तों जैसे बन सकते हो क्या..!
हवाओं से लड़ सकते हो क्या..!
है क्या तुझमें इतनी क़ुव्वत..!
खुशी-खुशी झड सकते हो क्या..!
पत्तों जैसे बन सकते हो क्या..!
इसी तरह सिद्धार्थ ने भी इसी विषय पर बहुत ही सफलता से अपना हाथ आज़माया। उन्होंने कहा:
 बात पेंड़ो की,शाखा की हर कोई करता है,
बिछड़े हुए पत्तों की कौन सुना करता है।।
ये जो नए हैं डाली पर शान से खड़े हैं,
कल गिर जो गए तो बेजान से पड़े हैं।।
कालेज की छात्रा नवयोवना शायरा सारा सैफी ने तो कमाल ही कर दिया। भावनायों को बहुत ही संगीतमय अंदाज़ में प्रस्तुत करते हुए आज के इंसान पर गहरी चोट भी की:
सूखा पत्ता तेज़ हवा से 
उड़कर मेरे घर आया
इक ठोकर से मैनें उसको
जब आगे को सरकाया

बोला यूँ ना ठुकरा मुझको
मुझ पर भी हरियाली थी
पँछी भी सब खुश थे मुझसे
खुश मुझसे हर डाली थी
मैं तपता था कड़ी धूप में
करता था तुम पर साया

आज भी आग में जलकर मैं
सेक तुम्हें दे सकता हूँ
अपने ऊपर आज भी तेरे
 दुःख सारे ले सकता हूँ
 वो तो एक इन्सान है जिसने
 काम लिया और ठुकराया
सरू जैन साहिबा ने भी कमाल के अंदाज़ में अपनी बात कही। ज़रा आप भी पढिये:
यह सच है टूटा पत्ता
वापिस नहीं आता शाख़ पर।                                                             
पर नयी कोंपले फूटी                                         
अक्सर पतझड़ के बाद ही।
यह पत्ता टूटकर भी वफ़ा ही करे।                 
कितनी सुंदर चाह लिए दिल में।                         
चाहे मैं बिछुड़ूँ भी पेड़ से;                                 
फिर भी यह तो हरा भरा रहे।
इसी तरह कार्तिका सिंह ने भी पत्तों पर लिखते हुए उम्र और इंसानी ज़िंदगी की व्यथा को ही लिखा:
 पत्ते बस पत्ते होते हैं!
उग आते हैं--झड़ जाते हैं!
हरे रंग से पीले रंग तक 
रोज़ कहानी कह जाते हैं!
बात पते की कह जाते हैं!

Monday, March 30, 2020

ज़िंदगी से जितना इश्क वाम के लोग करते हैं शायद और कोई नहीं

लेकिन कामरेड समता तदबीरों को छोड़ कर लकीरों की तरफ क्यूं?
लुधियाना: 30 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//हिंदी स्क्रीन)::
जब जब भी मुलाकात हुई मुझे हर बार जसप्रीत कौर समता वाम विचारधारा से प्रभावित लडकी लगी।  कभी कभी तो मुझे उस पर यह प्रभाव जनून की हद तक भी महसूस हुआ। फिर कई बार नज़दीक से भी उसकी बातें सुनी। बार बार लगा कि उसके दिल में कोई दर्द है जिसे उसने छुपा लिया है। जैसे पंजाबी के जानेमाने शायर प्रोफेसर मोहन सिंह कहते हैं न--
होली होली बन गया 
मित्रां दा गम 
लोकां दा  गम  
बस समता मुझे हर बार उसी प्रक्रिया से गुज़रती हुई लगी। अपने गम को जनता के गम में तब्दील करती हुई। वह गमा क्या था मैंने कभी नहीं पूछा। मुझे ऐसे सवाल कभी भी अच्छे नहीं लगते। कुछ भी ऐसा पूछने पर मुझे लगता जैसे मैं नियमों के विपरीत जा रहा हूँ। अंग्रेजी में एक शब्द आता है-एन्क्रोचमेंट। बस कुछ भी ऐसा पूछना मुझे एनक्रोच करना ही लगता। समय गुज़रता रहा।  इसके साथ ही एक दर्द समता के चेहरे पर हर वक़्त रहने वाली मुस्कान के पीछे छुपा सा झलकता रहा। फिर दबे सुर की कुछ बातें भी सुनीं जो इधर सुन कर उधर से निकल भी जाती रहीं। जब जब भी मुझे अपनी कवरेज में कोई मुश्किल महसूस होती तब तब समता मुझे सहायता देने को सामने होती। जब उसने पहली बार कैमरे के सामने माईक पकड़ा तो सबके लिए हैरानी थी। उस दिन पंजाबी भवन में जस्टिस कोलसे पाटिल एक विशेष आयोजन में आये हुए थे। माईक समता के हाथों में था और कैमरा मैंने खुद संभाल लिया। मैं जस्टिस कोलसे की यादगारी तस्वीरों को कैमरे में कैद क्र लेना चाहता था। जब मन में ऐसी भावना हो तो ध्यान पूरी तरह कैमरे में रखना पड़ता है। मैं भी ध्यान मग्न था लेकिन मन में चिंता थी कि अब उनसे ऐसे बौद्धिक सवाल कौन पूछेगा जो उनके स्तर के भी हों। ऐसे में समता ने कमाल कर दिए। उसने बहुत अच्छे सवाल पूछे। स्टोरी भी बहुत अच्छी बनी। इसके इसी ग्रुप में रहने वाला कामरेड अरुण उसे हर बार मज़ाक मज़ाक में एक दिन की पत्रकार बता कर बार बार हंसाता।  लेकिन वह पंजाब स्क्रीन टीम की एक ऐसी सदस्य बन गयी थी जिसे आड़े वक़्तों की साथी कहा जा सकता है। जब जब भी फेसबुक खोलता तो समता की कोई न कोई पोस्ट सामने होती। हर पोस्ट में लोगों के साथ हो रहे अन्याय की बात का ज़िक्र होता। मुझे हैरानी भी होती कि क्या इस लड़की को अपना कोई गम ही नहीं? समय अलग अलग रंग दिखाता रहा। आज फेसबुक पर समता की पोस्ट बिलकुल ही अलग रंग की थी। उसने काव्यपूर्ण शब्दों में कहा:
मुकम्मल हुआ हो इश्क़ जिसका
उसकी हथेली देखनी है,

कैसी होती है वो
 " लक़ीर "
जो मेरे हाथों में नहीं है...!!!
मेरे लिंए यह पोस्ट किसी हैरानी से कम नहीं थी। हर समय लोगों के दर्द की बात करने वाली लड़की आज अपने दिल के दर्द की बात कर रही थी। मैंने झट से एक कुमेंट करते हुए समता से कहा:
शायद किसी ने सही कहा है:

हाथों की चंद लकीरों का!
यह खेल है बस तकदीरों का!

पे इसी गीत में आगे चल कर इसका जवाब भी है:
तक़दीर है क्या, में क्या जानूँ,
में आशिक हूँ तदबीरों का...!

....और कामरेड तक़दीर पर नहीं तदबीर पर भरोसा करते हैं Jaspreet Kaur Samta जी...
इस बात को कभी भूलना नहीं।

वैसे प्रकृति के नियमों में मैंने कई बार इसे सच होते देखा कि जब प्रकृति किसी चीज़ को छीनती है तो वास्तव में जल्द ही उससे बेहतर हमें थमा भी देती है।

सो हिम्मत और हौंसला ज़रूरी है।

किसी शायर ने बहुत पहले कहा था:
हालात के कदमों पे कलन्दर नहीं गिरता।
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता।
गिरते हैं समंदर में आ आ के कई दरिया!
लेकिन किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता!
           देखना एक दिन आपको मेरी बातें याद आएंगी। हिम्मत रखना।
                                                 --रेक्टर कथूरिया 
               (समता पर और चर्चा फिर कभी सही फ़िलहाल इतना ही)

Monday, March 9, 2020

कविता-कथा कारवां ने किया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर शानदार आयोजन

नई और स्थापित कलमों ने अपने कलाम से समाज को झंकझौरा
लुधियाना: 8 मार्च, 2020: (*हिंदी स्क्रीन टीम)::
सतलुज क्लब में आज आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम कई मायनों में अलग था। बिलकुल  सुखद अहसास। 
साहित्यिक और अन्य विविध क्षेत्रों से सबंधित लोगों से भरी यह सभा उस प्यार का अहसास करवा रही थी  जो आजकल ऐसे आयोजनों से लुप्त होता जा रहा है। एक लंबे समय के बाद यह अनोखी लेकिन सुखद सभा देखी जिसमें सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था। सारा कार्यक्रम घड़ी की सुइयों के अनुसार चल रहा था। यूं लगता था जैसे  उपस्थित लोगों के दिलों का प्राकृतिक सौंदर्य बाहर सभी के सामने भी व्यक्त हो रहा हो। बहुत से अन्य आयोजनों की तरह यहाँ कोई किसी को मंच से घूर नहीं रहा था। कोई भी मनमानी करने या करवाने के लिए अपनी आँखों से किसी को कोई ऐसा इशारा नहीं कर रहा था कि ऐसा नहीं ऐसा करो।
यह एक  ऐसा आयोजन था जिसमें न तो किसी पार्टी के हक में कोई नारे लग  न ही और न ही किसी राजनीतिक दल का विरोध या समर्थन हो रहा था। केवल कलम का रंग और महिलाओं की स्थिति-इसी पर था सारा फोकस। कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर  ही ध्यान केंद्रित किया गया था। अपने इस मकसद को सफल बनाने के लिए शायरी भी हो रही थी, साहित्य चर्चा भी, सम्मान भी और पैनल चर्चाएँ भी।  सब कुछ बहुत दिलचस्प था।सबसे बड़ी बात यह कि आज का यह साहित्यिक आयोजन गुटबंदियों और तिकड़मबाज़ियों से पूरी तरह मुक्त था।
इस कार्यक्रम का आयोजन सतलुज क्लब लुधियाना में कविता-कथा कारवां की तरफ से किया गया था। यह संगठन पूरी तरह साहित्य को समर्पित है। इस कार्यक्रम ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को बहुत ही सशक्त ढंग से मनाया। पूरे आयोजन को संस्थान की अध्यक्षा जसप्रीत कौर फलक के नेतृत्व में सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। किरण बाला (आईआरएस) संयुक्त आयुक्त जेएसटी, जालंधर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। विशिष्ट अतिथि किरण साहनी भाषा विभाग पंजाब थे। महिलाओं से सबंधित मुद्दे बहुत प्रमुखता से। 
उभरती हुई युवा कलमों में जो अधिकतर कालेज की लड़कियां थीं उनके कविता पाठ  शुभारम्भ रमा शर्मा द्वारा किया गया। जबकि रश्मि अस्थाना ने मंच का संचालन किया। वाणीप्रीत कौर, रूप कंवल, सारा, दीपिका, कार्तिका, अयान सूद और लखविंदर कौर ने कविता पाठ किया। प्रख्यात कवियों के सत्र का मंच संचालन अनु शर्मा कौर ने किया। सुश्री सरिता जैन और डाक्टर सीमा ग्रेवाल ने भी कविता का पाठ किया।
इसके बाद सम्मान पत्र देकर सभी को सम्मानित किया गया। पार्थ पुरस्कार दीप्ति सलूजा को दिया गया। मदर टेरेसा अवार्ड प्रकाश कौर (यूनिक होम जालंधर) को दिया गया जो छोटे बच्चों के पालन पोषण उल्लेखनीय काम कर रही हैं।  माता गुजरी पुरस्कार मनराज कौर को, दिलीप कौर टिवाणा पुरस्कार इंद्रजीतपाल कौर को, राजबीर कौर राव पुरस्कार पुष्पिंदर कौर को,वाग्देवी पुरस्कार प्रिंसिपल प्रवीण शर्मा को दिया गया।
इस कार्यक्रम के दौरान ही जसप्रीत कौर फलक की काव्य पुस्तक 'रेत पर रंगोली' का दूसरा संस्करण भी लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया था। इसी तरह, यह पुरस्कार ग्रैंड-मदर अवार्ड संतोष गुप्ता, कमला कौशल, निर्मल खन्ना, हरजीत कौर गोगिया और सत्या बजाज को दिया गया। जसप्रीत कौर फलक पूरे कार्यक्रम की जान रहीं। इस शानदार कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए दर्शकों द्वारा भारी संख्या में  बधाई दी गई। इस अवसर पर एक फोटो प्रदर्शनी का भी आयोजन किया  गया। अमलतास की इन तस्वीरों  को क्लिक किया था जानीमानी शायरा जस प्रीत कौर ने। जस प्रीत की इन तस्वीरों ने हाल ही में इन तस्वीरों ने हाल ही बहुत लोकप्रियता हासिल की है और दिखाया है कि कुछ सीखने या करने का जनून हो तो किसी भी उम्र में कौशल हासिल किया जा सकता है। लोग जस प्रीत शायरा को कैमरे से कविता लिखने वाली शायरा  जानते हैं।  
आज जस प्रीत ने एक और कमाल दिखाया। टप्पे सुनाते सुनाते उन्होंने गया-तेरे विच्चों रब्ब दिस्सदा, तनुं सजदा मैं तां कीता। इसी तरह अन्य मेहमानों ने भी अपना अपना कमाल दिखाया। 
जालंधर से आई मोहतरमा नूपुर संधू ने लड़कियों की वशिष्ठता पर एक खास नुक्ता उठाया। उन्होंने कहा  कि लड़कों से उनकी तुलना न करें। मत कहो हमारी बेटी एक लड़के की तरह है। ऐसा कह कर वास्तव में लड़कों को उच्च  बताने की कोशिश की जाती है और लड़कियों को अपमानित किया जाता है। लड़कियों को लड़कों की तरह बुलाना एक तरह से लड़कियों का अपमान है।
कार्यक्रम में उपस्थित साहित्य जगत के लेखक, संपादक और कवि राजेंद्र साहिल ने कहा, मैं हमेशा अपनी बेटी को बेटी कहकर खुश होता हूं। इस प्रकार एक विचार शुरू हुआ कि बेटी को बेटी कहा जाना चाहिए। कई लोगों ने अपनी सोच को  में मिलाया जिसे आज की विशेष उपलब्धि कहा जा सकता है। विभिन्न कॉलेजों की युवा लड़कियों ने अपनी कलम का रंग दिखाया और कमाल कर दिया। 
उनकी शायरी में महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों का जिक्र था, लेकिन रोना नहीं था। इस उत्पीड़न के खिलाफ एक जोरदार संघर्ष की घोषणा की गई थी। "भविष्य हमारा है" - इस स्वर का जाप था। 
इस आयोजन में जालंधर, अमृतसर, हिसार, चंडीगढ़, दिल्ली और अन्य शहरों के व्यक्ति शामिल थे। अपनी विकलांगता को व्यक्त करने में एडवोकेट दीपू सलूजा का साहस एक मिसाल था। इसी तरह बठिंडा से पहुंची मैडम सीमा ग्रेवाल ने कई शानदार बातें कही। उन्होंने अपनी खूबसूरत किताब के बारे में हिंदी स्क्रीन की टीम से भी बात की।
डाक्टर बबीता जैन, प्रो.साल भारद्वाज, मैडम रमा शर्मा, मैडम अनु शर्मा, सरिता जैन, मैडम जतिंदर कौर संधू, मिस वनिता, श्वेता शर्मा और अन्य।   इनकी बातें दिल में उतरते समय हम सभी को कुछ करने की प्रेरणा मिली। इन सभी रिपोर्टों को भी अलग से प्रस्तुत किया जा रहा है। इस आयोजन के आठ अलग-अलग खंड थे और हर भाग का प्रधानगी मंडल और मंच सचिव अलग था।
कुल मिलाकर, यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन था जिसमें हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी और उर्दू से जुड़े  कलमकार भी मौजूद थे।  यह आयोजन लंबा अवश्य था, लेकिन फिर भी, दर्शकों और दर्शकों ने इस का आनंद लेना जारी रखा।
संपूर्ण कार्यक्रम के समापन में, डाक्टर जगतार सिंह धीमान, रजिस्ट्रार सी टी यूनिवर्सिटी ने अपने विचार दिए। अध्यापन से जुडी शायरा रश्मि अस्थाना ने धन्यवाद के शब्द कहे।
अंत में बात किताबों की भी। हो सकता है कि इस समारोह में किसी अतिथि का स्वागत न किया गया हो। जो कोई भी किताब सीमा ग्रेवाल और राजिंदर साहिल ह्यूरन को लेनी चाहिए, ने पुस्तक को सभी के लिए बहुत सम्मान और सम्मान के साथ प्रस्तुत किया। दिलचस्प तथ्य यह है कि ये किताबें सस्ती नहीं थीं। बहुत महंगे प्रिंट बहुत स्टाइलिश थे।
यदि किसी को भी कीमत चुकानी चाहिए, तो लेखक और प्रबंधक बहुत विनम्र थे और केवल इतना कहा कि उन्हें इसे पढ़ना चाहिए। मेहमानों ने घर-घर जाकर किताबें लीं।
(*हिंदी स्क्रीन टीम में इस आयोजन की कवरेज पर कृतिका सिंह, रेक्टर कथूरिया और अन्य सदस्य। कुछ और सामग्री देखें  हिंदी और पंजाबी  की कुछ दूसरी पोस्टों में)

Tuesday, March 3, 2020

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर होगा कविता कथा कारवां का विशेष आयोजन

आपके दिलों पर दस्तक देगा यह आयोजन तांकि आप जाग सकें
लुधियाना: 03 मार्च 2020: (हिंदी स्क्रीन ब्यूरो)::
समय की नब्ज़ पर हाथ रख कर उसे पहचानना और अगर सब कुछ विपरीत भी चल रहा हो तब भी अपने निश्चित उद्देश्य की ओर आगे बढ़ना सभी के बस में नहीं होता। अँधियों के सामने चिराग जलाने की हिम्मत हर किसी में कहाँ!  जसप्रीत कौर फलक और उनके सहयोगियों की टीम अपने संगठन कविता-कथा-कारवां के बैनर तले एक बार फिर लेकर आ रही हैं एक विशेष काव्य आयोजन। इस बार का आयोजन समर्पित होगा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को। महिला सशक्तिकरण के दावों का सच, क्या है आज भी समाज की हकीकत, कहां खड़े हैं हम सब...ऐसे बहुत से सवालों की चर्चा होगी लेकिन कविता के मधुर से अंदाज़ में। समझने वाले समझ जायेंगे और  जो नहीं समझना चाहेंगे उनके दिलों में भी एक तड़प तो उठा ही जायेगा यह आयोजन। कितने सच्चे हैं हमारे दावे? आपके दिलों पर दस्तक देगा यह आयोजन तांकि आप जग सकें। 
कविता- कथा- कारवाँ (रजि.) के तत्वावधान से जसप्रीत कौर फ़लक की अध्यक्षता में एक बैठक बुलाई गई। इस अवसर इस संस्था के सहयोगी सदस्यों विभा कुमारिया शर्मा, अनु पुरी, रश्मि अस्थाना, अनू कौल, जसविंदर कौर  ने भाग लिया। सर्व सम्मति से यह निर्णय लिया गया कि-इस अवसर पर समाज के लिए समर्पित , समाज में जागरूकता पैदा करने वाली, विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली खेल,कला, साहित्य में महिलाओं वर्चस्व सिद्ध करने वाली विभूतियों को सम्मानित किया जाएगा।नई कलमों के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आमन्त्रित सुप्रसिद्ध कवयित्रियां  को कविता वाचन के लिए पहुचेंगी। समाज में नारी और उसकी स्थिति पर विचार गोष्ठी आयोजित किया जाएगा जिसमें समाज के कुछ प्रतिष्ठित व जिम्मेदार नागरिकों को विचार- विमर्श के लिए आमंत्रित किया जाएगा। कार्यक्रम का समापन स्मृति प्रतीक चिन्ह तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान कर के किया जाएगा। सम्पूर्ण कार्यक्रम 8 मार्च को सतलुज क्लब में ठीक 10:30 बजे प्रारम्भ होकर 1:30 बजे सम्पन्न होगा।  इसमें कौन कौन शामिल होगा इसका विस्तृत विवरण भी आजकल में ही जारी किया जायेगा।  अपने कैलेंडर पर भी निशान लगा लीजिये और डायरी पर भी। इस आयोजन में आ कर आप फायदे में ही रहेंगे।दिमाग में ज्ञान और दिलों में संवेदना जगायेगा यह आयोजन।  

Sunday, February 16, 2020

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी गुरदासपुर पंजाब में

एक दिवसीय विशेष आयोजन दिनांक 14 मार्च, 2020 को
साथियो,
राजकीय महाविद्यालय, गुरदासपुर, पंजाब द्वारा साहित्य संचय फाउंडेशन, दिल्ली एवं बोहल शोध मंजूषा, भिवानी, हरियाणा के सहयोग से एक दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी, दिनांक 14 मार्च, 2020 को  ‘भारतीय संस्कृति में संस्कृत एवं हिंदी भाषा का योगदान’, विषय पर आयोजित किया जायेगा ।
संगोष्ठी स्थल:-  
राजकीय महाविद्यालय, गुरदासपुर, पंजाब
उपविषय:
1 वैदिक कालीन शिक्षा पद्धति 
2. वैदिक कालीन ग्राम्यजीवन 
3. भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संचेतना  
4. वेदों में नारी की भूमिका  
5. भारतीय संस्कृति में पंजाबी भाषा का योगदान 
6.  भारतीय संस्कृति में छतीसगढ़ी भाषा का योगदान 
7.  भारतीय संस्कृति में डोगरी भाषा का योगदान 
8.  भारतीय संस्कृति में पाली भाषा का योगदान 
9 भारतीय संस्कृति में क्षेत्रीय भाषाओँ का योगदान
10. भारतीय संस्कृति और सिनेमा 
11. भारतीय संस्कृति और मीडिया 
12. भारतीय संस्कृति और लोकनाट्य 
13. भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्य 
14. भारतीय संस्कृति और रंगमंच 
15. भारतीय संस्कृति और लोकपर्व
16. भारतीय संस्कृति में धर्म एवं पंथ 
17. भारतीय संस्कृति और प्रवासी साहित्य
18.  पंजाब के हिन्दी साहित्यकार
19.  विदेशो में भारतीय संस्कृति और पंजाब के प्रवासी साहित्यकार
20.  पंजाब का हिन्दी साहित्य में योगदान
21.  हिन्दी सिनेमा और पंजाब
22. अग्रेजी साहित्य और पंजाब
23.  संस्कृत साहित्य को पंजाब का योगदान
24.  पंजाब में रचित सन्त साहित्य
25. डी.ए.वी. संस्थाओ का हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान
26. आर्य समाज का हिन्दी, संस्कृत साहित्य में योगदान
27. पंजाब के सिक्ख गुरूओं का भारतीय संस्कृति में योगदान  
उक्त शीर्षकों के अतिरिक्त मुख्य विषय से जुड़े अन्य विषयों पर भी शोधालेख भेजे जा सकते हैं। विषय चयन से पूर्व संयोजक से विचार करना उचित होगा।

शोध आलेख आमंत्रित हैं- आलेख संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी एवं पंजाबी में भाषा मे आलेख स्वीकार किये जायेंगे।

● आप अपने मौलिक शोध् आलेख seminar14march20@gmail.com
 पर 14 फ़रवरी 2020 तक कृतिदेव, वॉकमैन चाणक्य 901-95 अथवा यूनिकोड में वर्ड फाइल में भेज सकते हैं। पी.डी.एफ. एवं स्कैन फाइल स्वीकार नहीं की जायेंगी ।
शोधालेखों में सन्दर्भ आलेख के अंत में दिए जायें. संदर्भ देना अनिवार्य होगा. 
● आलेख ISBN नंबर अंकित पुस्तक में प्रकाशित होंगे। आलेख कम से कम 2000 शब्दों का हो।
● स्वीकृत आलेखों को पुस्तकीय रुप में लोकार्पण किया जायेगा।
● 15 चयनित शोध्-पत्रों को प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा एवं उन्हें विशेष ‘स्मृति चिह्न' से सम्मानित किया जाएगा। 
● सभी प्रतिभागियों को निशुल्क , स्मृतिचिह्न, प्रमाणपत्र एवं पुस्तक प्रदान किये जाएंगे।
● स्मृतिचिह्न उन्हीं प्रतिभागियों को दिये जाएंगे जिनका आलेख एवं पंजीकरण 14 फ़रवरी 2020 तक प्राप्त होगा एवं संगोष्ठी में उपस्थित होंगे।
● शोध् पत्र के अन्त में अपना पूरा नाम, घर/कॉलेज का पता, मोबाइल नं., ईमेल अवश्य लिखें। इसके अभाव में शोध् पत्र को निरस्त किया जा सकता है।
(यदि किसी कारणवश आप संगोष्ठी में नही आ पाते हैं तो सिर्फ पुस्तक एवं प्रमाणपत्र ही पोस्ट किए जाएंगे, स्मृतिचिह्न पोस्ट नही किया जाएगा)
पंजीकरण शुल्क
14 फ़रवरी 2020 से पूर्व 
प्राध्यापक : 700
शोधार्थी तथा अन्य प्रतिभागी : 500
14 फ़रवरी से पश्चात्
प्राध्यापक : 900
शोधार्थी तथा अन्य प्रतिभागी : 600
डाक खर्च : 150 
बैंक विवरण
Paytm, phone pay, google pay - 9136175560
खाता संख्या- 6729179894
खाता धारक का नाम : साहित्य संचय 
Ifsc- IDIB000S216
Bank- Indian Bank
Branch- Sonia vihar, Delhi
संयोजक : डॉ. केवल  कृष्ण मल्होत्रा -9815242960
आयोजक : 
साहित्य संचय फाउंडेशन
अध्यक्ष, मनोज कुमार 9136175560
डॉ नरेश सिहाग 'एडवोकेट' 8708822674 (राजस्थान)
सुमन रानी- 9050289680 (हरियाणा)
डॉ विनोद तनेजा पंजाब 
9876865695
संजय कुमार- 8769406872(राजस्थान)
डॉ संगम वर्मा-9463603737(पंजाब)
ज्योति कुशवाहा-8223002666(छत्तीसगढ़)
वीरेंदर तिवारी- 9140671058 (उत्तर प्रदेश),
डॉ विनोद कुमार-9876758830 (पंजाब)
अभय कुमार -8507440700 (बिहार)
रवि कुमार -7780960421 (जम्मू)
सुशील भगत- 8803035823 (जम्मू)
कमलेश- 8699801601 (पंजाब)
 भारती- 9599091536 (हिमाचल प्रदेश)
डॉ विनय श्रीवास्तव- 7080820498 (उत्तराखंड)
रेखा -9530752446 (पंजाब)
डिंपल -783785820 (पंजाब)
संरक्षक : बी आर राणा, प्रिंसीपल, राजकीय महाविद्यालय, गुरदासपुर, पंजाब

Monday, February 10, 2020

हर इकन्नी खर्च कर बैठे//रेक्टर कथूरिया

पड़ी मुश्किल तो देखा हर चवन्नी खर्च कर बैठे!
जमा पूंजी बहुत थी पर सभी हम खर्च कर बैठे!
लड़कपन भी, जवानी भी, बुढापा खर्च कर बैठे!

कमाया था बहुत सम्भाल न पाए मगर हम सब,
पड़ी मुश्किल तो देखा हर चवन्नी खर्च कर बैठे!

मोहब्बत ने कहा था मान लो मेरा कहा अब तो,
कहा माना मगर दिल और दुनिया खर्च कर बैठे!

बड़े सपने सजाए थे, बड़े तिकड़म लड़ाए था,
खुली जब नींद तो देखा वो सब कुछ खर्च कर बैठे!

मोहब्बत की हकीकत उलझनों के भंवर सी निकली,
फंसे इस भंवर में तो हर इकन्नी खर्च कर बैठे।

सफर इस जन्म का दुशवार था, दुशवार ही निकला;
हकीकत तब खुली जब हर हकीकत खर्च कर बैठे।

मोहब्बत में बहुत अब फर्क जीने और मरने का;
कि जीना था जिसे तक के, उसी को खर्च कर बैठे!
                                              --रेक्टर कथूरिया
 आप इसे यहां Your Quotes पर भी देख सकते हैं यहां क्लिक करके