Wednesday, March 10, 2021

क्या मोहब्बत अकेलेपन से निजात दिलवा सकती है?

अमृता प्रीतम का कहना भी इस संबंध में ध्यान से सुनिए 


इंटरनेट/सोशल मीडिया//लुधियाना: 10 मार्च 2021: (हिंदी स्क्रीन)::

जानीमानी शायरा अमृता प्रीतम की बातों से सहमति हो यह ज़रूरी भी नहीं और अमृता जी  ने कभी इसकी अपेक्षा भी नहीं की होगी। हमारी सहमति की अमृता को कभी ज़रूरत भी नहीं रही। उन्होंने जीवन के आरम्भिक दौर में ही बेबाकी और हिम्मत भी जुटा ली थी और अकेले चलना भी सीख लिया था। 
शादी के बाद साहिर लुधियानवी साहिब के साथ जो अंतरंगता महसूस की वह स्थाई तौर पर उनके जीवन का हिस्सा तो कभी न बन सकी फिर भी यह इश्क उनके जीवन की उपलब्धि ज़रूर रहा। बिलकुल उसी तरह जैसे बिन बरसी काली घटा ज़िंदगी की तपती दोपहरी में यादगारी पल छोड़ जाती है जो उम्र भर राहत देते रहते हैं। साहिर साहिब के साथ विवाह की बात एक ऐसी शादी बन के रही जो हकीकतों के बहुत नज़दीक हो कर भी कभी हकीकत न बन सकी। शायद सही है कि जोड़ियां ऊपर वाला तय करता है। जीवन में मिली असफलताओं, नाकामियों और निराशाओं के अंधेरों में इमरोज़ का आना अमृता के लिए एक रूहानी ख़ुशी जैसा रहा। काफी देर उसने खुद को अमृता प्रीतम की बजाए अमृता इमरोज़ भी लिखा। बहुत से लोग इसे अभी भी सहन नहीं कर पाते। भूल जाते हैं की अमृता को भी अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीने का हक़ था। आप कौन होते हैं इसमें एन्क्रोचमेंट करने वाले! अमृता जी की ज़िंदगी में इमरोज़ के आने  पर एतराज़ भी हुए, बुरा भला भी कहा गया और  लोगों ने अमृता जी को अमृता इमरोज़ के तौर पर नहीं अमृता प्रीतम के तौर पर ही याद किया। इसकी चर्चा भी हुई लेकिन अमृता मैडम ने तो जो ठान लिया वही किया। ज़िंदगी भर यही असूल रहा। शायद इस पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अरुता प्रीतम को मिलना किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं समझा जाता था। लोग दूर दूर से उनके घर के-25 हौज़खास में जाते, कुछ पल रुकते और बहुत सा स्कून  ले कर लौटते।  यह पल उनकी जीवन भर की ख़ास उपलब्धियों में शामिल रहते। 
इसी बीच साहिर लुधियानवी साहिब ने भी जो बहुत ही गहरे गीत लिखे वे इसी तरह की उदासी भरी कटु अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करते हुए ही लिखे। इन्हीं में से एक गीत था: 

महफ़िल से उठ जानेवालों, 

तुम लोगों पर क्या इल्ज़ाम 

तुम आबाद घरों के वासी, 

मैं आवारा और बदनाम 

मेरे साथी, मेरे साथी, 

मेरे साथी खाली जाम...... 

बाद में यही गीत फिल्म दूज का चांद में भी शामिल हुआ। 

इसका संगीत तैयार  किया था रौशन साहिब ने और इसे आवाज़ दी थी मोहम्मद रफी साहिब ने। इस गीत में भी उसी अकेलेपन की तरफ इशारा किया गया है जो मोहब्बत करने वालों को ही मिला करती है। 

अमृता प्रीतम की रचनाओं में भी इसी अकेलेपन का अहसास होता है। जब उसे अधिकतर लोग गालियों जैसी भाषा में ही सम्बोधन और याद किया करते थे उस दौर में जानेमाने कहानीकार कुलवंत सिंह विर्क की तरफ से स्नेह और सम्मान में मिली सौगात ज़ख्मों पर मरहम जैसी थी। अमृता जी ने कहा भी है शायद कहीं कि लोग मुझे जी भर कर गालियां दे क्र भी रुला नहीं पाते लेकिन विर्क मुझे अपने अच्छेपन से रुला देते हैं। उनदिनों पंजाब के बुद्धिजीवी, पत्रकार और खास कर एक स्थापित अख़बार अमृता के पीछे पड़े थे। उन दिनों विर्क की सौगात का मिलना ख़ास बात। थी।  वोह भजन जैसा बहुत ही लोकप्रिय गीत है न-जैसे सूरज की गर्मी में तपते हुए तन को मिल जाये तरुवर की छाया! बस उसी तरह के अहसास की अनुभूति कराती हुई यह सौगात अमृता प्रीतम को हमेशां याद रहीं। उन्होंने अपने अंदाज़ से ही जीवन जिया। लेखन में उनके अनुशासन की बातें तो अमिया कुंवर जी ने भी बहुत ही नज़दीक हो कर देखीं। 

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उतरावों चढ़ावों से भरी हुई ज़िंदगी में अमृता जी ने कब और कैसे इस तरह का साहित्य लिखा होगा सचमुच एक करिश्मे जैसी बात है। हम लोग तो ज़रा ज़रा सी बात पर बेचैन हो कर आपा खो बैठते हैं। अमृता की रचनाएं पढ़ते हुए यूं लगता जैसे स्कून की बरसात हो रही हो। इस तरह लगता जैसे हम बहुत ऊंचा उठ गए हों। अमृता का साहित्य एक ऐसा पर्यावरण आसपास बना देता है कि उसमें हम किसी उड़नखटोले में बैठा महसूस करते हैं।  अपने जीवन की मानसिकता के स्तर से कुछ ऊंचाई पर उठे हुए। उस सुरताल के ज़रा सा टूटते ही हम फिर आम जैसी ज़िंदगी की परेशानियों में घिर जाते क्यूंकि वह ऊंचाई हमारी उपलब्धि नहीं होती बल्कि अमृता प्रीतम से उधर ली हुई ऊंचाई होती है। 

लेकिन इस के साथ ही एक हकीकत यह भी है कि अमृता प्रीतम को पढ़ने के बाद दिल और दिमाग में जज़्बातों के तूफ़ान न उठें यह हो ही नहीं सकता। अमृता प्रीतम को पढ़ने के बाद शायद आपको पहली बार खुद से प्रेम होने का आभास हो। पहली बार शायद आपको लगे कि इस सिस्टम और समाज को बदलना ज़रूरी है। हो सकता है पहली बार आप को आपके ही अंतर्मन में बगावत की सुर सुनाई दे। हो सकता है पहली बार आपको  लगे कि आप खुद के रूबरू हो रहे हैं। उस रुबरू के दौरान खुद ही खुद से कई तरह के सवाल भी कर सकते हैं। ज़्यादातर यह सवाल मोहब्बत को ले कर होते या बंदिशों को लेकर होते। धर्मकर्म और लाईफस्टाईल के मुद्दे भी उठते हैं। बहुत से लोगों को अमृता प्रीतम का कटे हुए बालों वाला स्टाईल उम्र भर अखरता रहा। कइयों को अमृता जी का सिगरेट और शराब पीना भी बेहद बुरा लगा। जून-1984 और नवंबर-1984 के बाद तो पंजाब के बहुत से लोगों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ अमृता प्रीतम जी की पुराणी दोस्ती भी खटकती रही। उन पर कविताएं भी लिखीं गईं कि बुल्ले शाह को आवाज़ लगा कर पुकारने वाली अब दिल्ली में इतना कुछः हुआ देख कर भी चुप्प कयूं रही? शायद ये विवाद अब हमेशां बने  क्यूंकि  शख्सियत ही  दरम्यान नहीं रही। 

मोहब्बत पर एक टवीट सामने आया है। टविटर पर अमृता के नाम से ही उसके कुछ चाहने वालों ने शायद एक प्रोफाईल बना रखा है। इस टवीट में दर्ज है:इंसान अपने अकेलेपन से निजात पाने के लिए मुहब्बत करता है, और मुहब्बत इस बात की तस्दीक करती है कि उसका अकेलापन अब ताउम्र कायम रहेगा। इन शब्दों में छिपी हकीकत और गहराई बहुत ही सूक्ष्मता से दिल में उतरती है और उसके बाद दिमाग को चढ़ जाती है। उस वक़्त मोहब्बत के इतने पहलू दिमाग में आने लगते हैं कि इंसान मोहब्बत के रंगों से ही चकरा जाता है। कुल मिला कर आज की पीढ़ी को अमृता जी की अधिक से अधिक कताबें पढ़नी चाहियें। इन नावलों कहानियों के पात्र आज भी आपको अपने आसपास घुमते और सक्रिय मिलेंगे। अजीब इतफ़ाक़ है की वक़्त ने उनकी रिहायश के-25, हौज़खास का अस्तित्व भी नहीं रहने दिया। उनके चाहनेवालों ने उसे  के तौर पर  कोई ज़ोरदार प्रयास भी किया।  अमृता जी  उनकी यादगार। 

प्रस्तुति:रेक्टर कथूरिया 

6 comments:

  1. रेक्टर साहेब उम्दा आर्टिकल
    अमृता प्रीतम को पढ़कर वाक़ई अच्छा लगता है। अपने अकेलेपन, मुहब्बत को कभी छुपाया, दबाया नहीं अमृता जी ने।
    एक बात जो बड़बोल-सी लगती है -एक बार मेरे फ्री वर्स (छंदमुक्त) रचनाएं पढ़कर मधुर नजमी जी ने कहा था तुम्हारी ये रचनाएं अमृता प्रीतम की याद दिलाती हैं।

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    1. जी इन अनमोल विचारों के लिए हार्दिक आभार---

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  2. Rector saheb apne bilkul sahi farmaya ki Amrita Pritam ji k bare me ki unko padh k khud k ander se hi bagawat hone lgti hai ki sachmuch is system me badlaw ki zarurt hai .Bahut khoobsurat likha apne

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    1. जी हार्दिक आभार--नाम पता या फोन नम्बर देने में कोई दिक्कत आए तो संदेश में ही शामिल क्र दिया करें प्लीज़--वैसे तकनीकी टीम इस पर काम कर रही है--

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    1. प्रदीप शर्मा जी बहुत बहुत शुक्रिया

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