Thursday, September 30, 2021

भारतीय अर्थव्यवस्था को परत दर परत खोलती है--पुस्तक "उलटी गिनती"

 Thursday: 30th September 2021 at 5:40 PM

"उलटी गिनती" पुस्तक में हैं बहुत से सबंधित सवालों का जवाब 

नई दिल्ली: 30 सितंबर 2021: (हिंदी स्क्रीन डेस्क)::

MRP 250/- (Paperback)
अच्छे दिनों का वायदा, फिर उस वायदे को चुनावी जुमला बताया जाना, साथ ही नोट बंदी, जीएसटी, कोविड का आतंक, लॉक डाऊन का प्रहार और बेरोज़गारी व भूख के मारे मज़दूरों का पलायन। देश की जनता ने निकट अतीत में ही बहुत से ह्रदय विदारक दृश्य देखे हैं।  

अर्थव्यवस्था पर आर्थिक हमला बेहद नाज़ुक स्थिति में हुआ। कोविड महामारी ने तो भारतीय अर्थव्यवस्था को ऐसे समय तहस-नहस कर दिया जब यह पहले से ही गहरे ढाँचागत मन्दी से जूझ रही थी। करोड़ों लोगों के रोजगार गँवा देने और उनके सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव लौटने के बीच शेयर बाजार न केवल तेजी से पटरी पर लौटा बल्कि जल्दी ही ऊँचाइयों पर पहुँच गया। इस तरह कोविड युग की यादें लम्बे समय तक भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग पर छाई रहेंगी। गौरतलब है कि 2020 के भारत में चरम आर्थिक असमानता जिस तरह प्रमुखता से दिखाई दे रही है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई। इस चरम आर्थिक असमानता ने बहुत सी आशंकाओं को भी जन्म दिया जिसे लेकर मज़दूरों के गंभीर आंदोलन भी खड़े हुए। 

इस स्थिति पर बहुत कुछ लिखा गया। बहुत कुछ लिखा जा रहा है। बहुत कुछ अभी लिखा जाना है। बेहद सख्त लॉकडाउन थोपे जाने का सिलसिला शुरू होने के एक साल बाद, ‘उलटी गिनती’ इस आपदा के आर्थिक परिणामों/प्रभावों की समझ बनाने की कोशिश करती है और इसकी पड़ताल करती है कि क्या भारत सुधार-प्रक्रिया की कुछेक अहम उपलब्धियों यानी प्रतियोगिता और गरीबी में तेज़ गिरावट को, उलटने के करीब है। बहुत ही महत्वपूर्ण और नाज़ुक सा विश्लेषण भी है यह। इस किताब को दस्तावेज़ भी कहा जा सकता है। 

इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है कि भारत के लिए समय तेजी से निकलता जा रहा है। यहां तक कि बढ़त के सर्वोत्तम सालों के दौरान, भारत पर्याप्त रोज़गार पैदा करने या मानव विकास की दिशा में ठोस प्रगति करने में विफल रहा। अब जनसांख्यिकी लाभांश के दौर के अन्तिम दशक में, भारत की अर्थव्यवस्था को दोबारा गति देने के लिए एक साहसिक नजरिए की जरूरत है। आखिर कौन जुटाएगा यह साहस? कौन दे सकेगा इस जरजराती महसूस हो रही अर्थव्यवस्था को गति? महंगाई जिस चरम पर है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

यह पुस्तक ‘उलटी गिनती’ सतत सुधार के लिए एक खाका भी पेश करती है जो भारत को तेज़ बढ़त की पटरी पर वापस ला सकता है और न्यूनतम सम्भव समय में उसकी युवा आबादी के लिए करोड़ों रोजगार पैदा कर सकता है। क्या यह सम्भव हो सकेगा? क्या आम जनता की निराशा को विराम देना सम्भव रह गया है? क्या महंगाई पर अंकुश की कोई संभावना बाकी बची है? इस महंगाई ने सबसे ज़्यादा मार रसोई पर मारी है। 

ऐसा बहुत कुछ है जिसे पढ़ते हुए या जिसकी बात करते हे नए नए सवाल पैदा होंगें। महामारी और लॉकडाउन के दौरान हुई गंभीर आर्थिक क्षति की पहली व्यापक समीक्षा पेश करती किताब। इस किताब ने इन सवालों का जवाब देने की भी कोशिश की है। जमीनी स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के गहरे जख्मों की पड़ताल करती यह किताब। इसका यही अंदाज़ इसे ख़ास भी बनाता है। 

सारे प्रस्तुतिकरण को देख कर कहा जा सकता है कि ‘उलटी गिनती’ पुस्तक व्यापक समृद्धि की ओर बढ़ने और पर्याप्त रोजगार सृजन के साथ फिर से ऊँची बढ़त हासिल करने के लिए सुधार का एक टिकाऊ एजेंडा मुहैया कराती है। यह एजेंडा हौंसला भी देता है और उत्साह भी बढ़ाता है। 

इसके साथ ही एक सौगात भी है जो पुस्तक खरीदने वालों को एकदम निशुल्क मिलेगी। आप भविष्य में अपनी बचत के कौन-से सुरक्षित रास्ते अपनाएँ, इस बारे में विश्वसनीय सुझाव और तथ्य पेश करती 16 पृष्ठों की एक पुस्तिका ‘उलटी गिनती’ किताब के साथ निःशुल्क। यह लघु पुस्तिका बहुत ही काम की होगी। आप इसे संभाल कर रखना चाहेंगे। 

Thursday, September 23, 2021

सोनिया पाहवा की दूसरी पुस्तक "कीमती जज़्बात" हुई रिलीज़

Thursday 23rd September 2021 at 08:22 PM Whatsapp

GCG लुधियाना में सहायक प्रोफेसर हैं मिस सोनिया पाहवा


लुधियाना: 23 सितंबर 2021: (अमृतपाल सिंह//कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

लुधियाना के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में से एक है लड़कियों का राजकीय कालेज अर्थात जीसीजी। इस शिक्षण संस्थान में जहां सिलेबस की पढ़ाई होती है हुए उच्च शिक्षा प्रदान की जाती है वहीं साहित्य और कला के क्षेत्र में ऊँची उड़ान का मौका सभी को दिया जाता है। इसका अहसास हुआ एक नई पुस्तक के विमोचन को देख कर। 

अपनी पहली पुस्तक "ट्यून इनटू द वर्ल्ड ऑफ रेडियो" की शानदार सफलता के बाद गवर्नमेंट कॉलेज गर्ल्स, लुधियाना में सहायक प्रोफेसर का तौर पर कार्यरत्त सोनिया पाहवा ने आज अपनी दूसरी पुस्तक, कीमती जज़्बात का विमोचन किया।  

पुस्तक का विमोचन करते हुए सहायक प्रोफेसर सोनिया पाहवा ने कहा कि वह लंबे समय से अपनी भावनाओं को पाठकों तक पहुंचाना चाहती थीं।  इस पुस्तक में लिखी गई शायरी के माध्यम से उन्होंने अपनी अनमोल भावनाओं को लोगों के सामने पेश किया है और उम्मीद है कि पहली किताब की तरह इस किताब को भी लोगों का प्यार मिलेगा| यह किताब Amazon, Flipkart आदि पर मिल सकती है।

इस पुस्तके के विमोचन की औपचारिक रस्म अदा करते हुए गवर्नमेंट कॉलेज गर्ल्स, लुधियाना की प्रिंसिपल डॉ सुखविंदर कौर ने कहा कि यह उनके कॉलेज के लिए बहुत ही गर्व की बात है।  मैडम सोनिया पाहवा की इस किताब में शायरी को बेहद खूबसूरत अंदाज में पेश किया गया है और वे ना केवल अध्यापन के क्षेत्र में नाम कमा रही हैं बल्कि लेखन के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना रही हैं। 

इस तरह यह कॉलेज व समस्त स्टाफ के लिए फखर की बात है।  पुस्तक के विमोचन के अवसर पर श्रीमती कृपाल कौर (उप प्रधानाचार्य), श्रीमती गुरजिन्दर बराड़ (अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष) तथा अन्य स्टाफ सदस्य उपस्थित थे। अन्य साहित्य प्रेमियों ने भी ीा आयोजन में भाग लिया। 

Tuesday, September 14, 2021

हर पल सुनहरा:हिंदी के साथ--पूनम बाला

 14th September 2021 at 12:20 PM

प्रताप कालेज आफ ऐजुकेशन ने भी मनाया हिंदी दिवस 


लुधियाना
: 14 सितंबर 2021: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

शायद कोविड नियमों की मजबूरियां इस बार भी आड़े आ रही हों वरना प्रताप कालेज आफ ऐजुकेशन, लुधियाना आयोजनों को भव्य अंदाज़ में किया करता है। इस मामले में यह कालेज हमेशां ही बहुत अच्छी कारगुज़ारी दिखाता रहा है। इस बार कालज द्वारा "हिंदी दिवस" के उपलक्ष्य में बहुत ही सादगी से हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। इस बार भी जिन संस्थानों से बड़े पैमाने पर हिंदी दिवस मनाए जाने की अपेक्षा थी उनमें प्रताप कालेज ऑफ़ एजुकेशन भी एक था। मौजूदा हालात में इतना भी बहुत है। 

इस बार भी हिंदी दिवस आया तो कालेज का वही जाना पहचाना चेहरा आगे आया-प्रोफेसर पूनम बाला का। कालेज में ही कार्यरत्त हिंदी की सहायक शिक्षिका श्रीमती पूनम बाला ने संयोजिका के रूप में समूह स्टाफ सदस्यों व विद्यार्थियों को हिंदी दिवस की बधाई देते हुए समारोह की शुरुआत की। सरस्वती वंदना के पश्चात अपने सम्बोधन में उन्होंने हिंदी दिवस मनाये जाने का औचित्य बताया।उन्होंने अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से सभी को हिंदी भाषा अपनाने के लिए प्रेरित किया। भारत की नई शिक्षा नीति के अनुसार हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात महाविद्यालय के भावी शिक्षकों द्वारा हिंदी को समर्पित कविताओं का काव्य पाठ किया गया।इस अवसर पर उपस्थित समूह स्टाफ सदस्यों ने भावी अध्यापकों द्वारा उच्चरित कविताओं की सराहना की। उल्लेखनीय है कि पूनम बाला बहुत ही अच्छी शायरी करती हैं। दिल को छू लेने वाली शायरी। साथ ही मंच संचालन में भी किसी प्रोफेशनल एंकर से काम नहीं हैं उनकी कला। 

कालेज डायरेक्टर डा.बलवंत सिंह तथा प्रिंसिपल डा.मनप्रीत कौर ने एक संदेश द्वारा सभी को हिंदी दिवस की बधाई दी।अंत में समारोह की संयोजिका श्रीमती पूनम बाला ने सभी का धन्यवाद  किया। गौरतलब है कि हिंदी और साहित्य के मामले में कालेज की प्रिंसिपल डा. मनप्रीत कर बहुत ही गहरा ज्ञान रखती हैं। 

Saturday, September 11, 2021

मनोज धीमान ने लिखी एक और हिंदी फिक्शन किताब

'ये मकान बिकाऊ है' (लघुकथा संग्रह) बाजार में भी चर्चा में भी  

पुस्तक समाज के कई पहलुओं, व्यवस्था और शासकों की कार्यशैली को करती है उजागर

लुधियाना: 11 सितंबर 2021: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::

आज के युग की पत्रकारिता आसान नहीं होती। लगातार इसका अभ्यास करते करते निष्ठुरता सी आने लगती है। घटनाओं की खबर बनाते वक़्त स्पेस और टाईम को देखते हुए उसकी बेरहमी से कांटछांट करनी पड़ती है। सामूहिक हत्याकांड की खबर आ जाए तो आंसू बहाने से पहले खबर कवर करनी होती है। इसके बावजूद हमारे पुराने मित्र मनोज धीमान ने अपनी संवेदना बचाए रखी। उसे मरने नहीं दिया। अपनी मासूमियत भी बचाए रखी जिसका बचना आज के युग में असम्भव सा ही हो गया है। मनोज की जीवन शैली से ही निकली है मनोज की चौथी पुस्तक। फ़िलहाल पढ़िए पुस्तक के आने की खबर बाकी बात फिर कभी करते हैं मनोज धीमान पर भी और मनोज जी की साहित्यिक रचना पर भी।  --रेक्टर कथूरिया 


पंजाब में पिछले तीन दशकों से अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार मनोज धीमान ने
एक और हिंदी फिक्शन किताब 'ये मकान बिकाऊ है' (लघुकथा संग्रह) लिखी है, जिसका औपचारिक रूप अभी विमोचन नहीं हुआ है। लेकिन, यह किताब बाजार में आ गई है और पाठकों के हाथ में पहुंचते ही यह चर्चा का विषय बन गई है।

इस लघुकथा संग्रह में धीमान ने लगभग सभी विषयों जैसे राजनीति, धर्म, आर्थिक समस्या, सामाजिक विषमता, प्रेम, खराब संबंध और मीडिया पर अपनी कलम चलाई है। उन्होंने मानव मन में उत्पन्न हुई निराशा, दहशत, भय, त्रासदी को मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया है। लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार पांडे ने कहा, "जिस तरह ये सभी विषय एक-दूसरे से संबंधित हैं, उसी तरह लघुकथाएं एक के बाद एक समस्याओं को व्यक्त करती रहती हैं।" 

लघु कथाओं के बारे में बोलते हुए डॉ पांडे ने कहा कि प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण है। उन्होंने कहा कि लघु कथाएँ समाज के कई पहलुओं, व्यवस्था और शासकों की कार्यशैली को उजागर करती हैं। उन्होंने कहा कि लाखों प्रयासों के बावजूद भ्रष्टाचार सामाजिक नीति का हिस्सा बना हुआ है। जिन पर भ्रष्टाचार को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे इसे फलने-फूलने का धंधा कर रहे हैं। लघुकथा 'सोने की मुर्गी' में लेखक ने एक व्यापारी की कहानी के बहाने पुलिस व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। कैसे एक पुलिस केस में व्यापारी को फंसाया जाता है और उसका फायदा उठाया जाता है। इसी तरह लेखक ने लघुकथा 'नया धंधा' में पथराव की घटनाओं का जिक्र किया है। यह लघुकथा एक बेरोजगार युवक के भाग्य के बारे में बताती है। लघुकथा 'राजा और प्रजा' में राजा स्वयं भगवान बन जाता है। यदि राजा कोई नेक कार्य करे तो प्रजा उसे भूल जाती है। अब क्योंकि हर राजा चाहता है कि जनता उसके 'दरबार' में उसकी प्रशंसा करने के इरादे से उपस्थित हो, तो भारतीय राजनेताओं में उनके द्वारा किए गए नेक कामों को गलत कामों में बदलने की कला है। बाढ़ से बचाव के लिए बनाए गए मजबूत बांध को कमजोर करने के लिए राजा ने ऐसा किया।

डॉ पांडे ने कहा, "इस तरह, हर छोटी कहानी सच्चाई और आज की वास्तविकता के बहुत करीब है", "लेखक अपने समय की कहानियों को खुली आंखों से व्यक्त करता है।"

लघुकथा संग्रह 'ये मकान बिकाऊ है' के लेखन की शुरुआत कैसे हुई? इस सवाल का जवाब देते हुए धीमान ने कहा कि साल 2020 में कोरोना काल में वह व्हाट्सएप पर प्रसिद्ध हिंदी लेखकों के समूह "पाठक मंच" से जुड़े। "पाठक मंच" में कुछ लघु कथाएँ पोस्ट करने पर पाठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली, जिससे लेखन की निरंतरता बनी रही। इस तरह इन लघुकथाओं ने आखिरकार एक किताब का रूप ले लिया।

धीमान ने इस पुस्तक को प्रसिद्ध कवि, नाटककार और आलोचक डॉ. नरेंद्र मोहन को समर्पित किया है। उन्होंने  कहा कि डॉ. नरेंद्र मोहन ने न केवल उन्हें लघु कथाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें अपने प्रकाशक - अकादमिक प्रकाशन, दिल्ली से बात करने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने कहा, "मुझे जीवन भर पछताना पड़ेगा कि डॉ. नरेंद्र मोहन ने किताब प्रकाशित होने से पहले ही इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। नहीं तो आज अगर वह जिंदा होते तो किताब प्रकाशित होने के पश्चात जश्न का माहौल कुछ और होता।"

हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष व विख्यात लेखक कमलेश भारतीय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, "लघुकथाएं रोजमर्रा की घटनाओं या जीवन की स्थितियों से निकलती हैं। रचनाएं जमीन से जुड़ी हुई हैं। समाचार पत्रों की सुर्खियां, राजनीति में कोई भी मोड़ या हमारे चारों ओर का जीवन लेखक की लघु कथाओं की दुनिया है।"

पंजाब के जाने-माने हिंदी उपन्यासकार व पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि हिंदी साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अजय शर्मा ने कहा, "लघु कथाएँ एक पूरी कहानी कहती हैं। ऐसी तकनीक बहुत कम लघु कथाकारों में देखी जाती है।"  अंजू खरबंदा, संचालिका, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल (दिल्ली शाखा) ने कहा, "लघुकथा पढ़ते समय पाठक भी उन लघु कथाओं के साथ चलने लगता है। लघु कथाएँ जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हैं, जो सीधे लोगों के दिलों तक पहुँचती हैं।" दोआबा साहित्य एवं कला अकादमी, फगवाड़ा (पंजाब) के अध्यक्ष डॉ. जवाहर धीर ने कहा, "लघुकथाएं बहुत कम शब्दों में एक बड़ा संदेश देने में सक्षम हैं।"

एकैडमिक पब्लिकेशन, दिल्ली के राजेश कुमार ने कहा कि पुस्तक में आज के जीवन और घटनाओं से ओत-प्रोत लघु कथाएँ हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक निश्चित रूप से हिन्दी साहित्य में एक विशेष स्थान बनाएगी। उन्होंने कहा कि किताब जल्द ही अमेज़न पर उपलब्ध होगी।

लघुकथा संग्रह 'ये मकान बिकाऊ है' में कुल 164 पृष्ठ हैं और इसमें 120 लघु कथाएँ हैं।

यहां बताया जाता है कि मनोज धीमान ने इससे पहले तीन हिंदी पुस्तकें लिखी हैं। ये पुस्तकें थीं: 'लेट नाइट पार्टी' (कहानी संग्रह), 'बारिश की बूंदे' (कविता संग्रह) और 'शुन्य की ओर' (उपन्यास)। 'लेट नाइट पार्टी' पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित हो चुका है। अंग्रेजी अनुवाद प्रोफेसर शाहीना खान द्वारा किया गया था।

Tuesday, August 17, 2021

कविता कथा कारवां ने कराया एक यादगारी आयोजन

 17th August 2021 at 4:08 PM

 ज़ूम के ज़रिये शायरी से बुलंद किया तिरंगा 


लुधियाना
: 17 अगस्त 2021: (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन)::

कुछ लोग बुरे हालात के बावजूद ही नहीं दबते। उनकी जीवेषणा इतनी मज़बूत होती है कि उनको कहीं से उखाड़ कर फेंक दो तो वे फिर से वहीं पर अपनी जगह बना लेते हैं जहां हालात उन्हें फेंक देते हैं। जब कोविड के चलते लॉकडाऊन हुआ तो तकरीबन सभी आयोजन बंद हो गए। अन्य शहरों की तरह लुधियाना के स्कूल, कालज और सांस्कृतिक केंद्र बंद भी हो गए पंजाबी भवन, गुरुनानक भवन और अन्य संस्थान में भी आयोजनों का सिलसिला बंद हो गए। गेट पर ताले लग गए। इनके साथ ही बंद हो गए इनमें होने वाली छोटी छोटी सभाओं के आयोजन। कुछ देर मिल बैठने का एक अच्छा स्थान बन चुका था पंजाबी भवन। एक वीरानी, एक उदासी, एक ख़ामोशी सी छा गई पंजाबी भवन में। सिर्फ कुछ पंछी चहचहाते थे, कुछ तितलियां आती रहीं बाकी सब बंद हो गया। 

इसके साथ ही एक तड़प सी जागने लगी उन लोगों के दिलों में जो कभी यहां अपने मुशायरे किया करते थे। कभी अपनी किताबों को रिलीज़ करने की खुशियां बांटा करते थे। तड़प उठने वाले इन लोगों में शायर थे, लेखक थे, रंगमंच कर्मी थे, अच्छे श्रोते थे, अच्छे दर्शक थे। कंटीन वालों को भी घाटे उठा कर जाना पड़ा। वीरानी और बढ़ गई। कोविड और लॉकडाऊन के इन कटु प्रभावों  याद किया जाता रहेगा। इनमें से कुछ लोगों ने सोचा आखिर कोई तो रास्ता होगा? कुछ तो बात बनेगी? कभी तो फिर से कलमों वालों के मेले सजेंगे? 

इन तड़पते लोगों में से एक खूबसूरत शायरा जसप्रीत कौर फलक भी थी। फलक आसमान को कहते हैं। इस मैडम का तख्खलुस ही फलक ठहरा। वह जब भी वक्त मिलता आसमान की तरफ देखती रहती जैसे कह रही हो हो खुदा से कि कुछ तो मेहर कर! कोई तो चमत्कार दिखा! आंसू उसके शब्दों में आ जाते! वह पूछती दुनिया भर को जोड़ने वाले कलमकारों के दरम्यान क्यों पैदा हुईं इतनी दूरिया? कब जाएगा कोरोना? कब खत्म होगा लॉकडाऊन?  उसके सवाल खुदा के दरबार तक पहुंचत्ते रहे। कहते हैं न-दिल से जो बात निकलती है असर रखती है। इन  दुआयों का भी जल्दी ही असर हुआ और बहुत अच्छा असर हुआ। खुदा का संदेश जल्दी ही धरती पर पहुँच गया। बात समझ में आ गई और वह बोल उठी-वे फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं!

आखिर शुरू हुआ ज़ूम का सिलसिला। ऑनलाइन आयोजन तेज़ी से आयोजित होने लगे। अपने अपने घर में बैठ कर एक दुसरे के सामने बैठने जैसा अनुभव इस नई तकनीक ने दिया। बहुत से संगठनों की खुशियां लौट आईं। यूटयूब पर किताबें रिलीज़ होने लगीं। फ़िल्में रिलीज़ होने लगीं। इन्हीं बहानों के ज़रिये कलम से जुड़े लोग फिर से एकजुट होने लगे, मिलने जुलने लगे।  

साहित्य और कला से जुड़े मंच कविता कथा कारवां के तत्वाधान में भी एक ऐसा ही आयोजन हुआ। पंद्रह अगस्त 2021 को  जूम ऐप द्वारा एक अन्तरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें  विदेश  और अपने देश के विविध प्रदेशों के कवि-कवयित्रियों ने हिस्सा लिया और स्वतंत्रता दिवस के पाक अवसर पर देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत काव्य रचनाएँ  प्रस्तुत कीं और देश के अमर सपूतों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। 

डॉ राशि ने सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का आग़ाज़ किया। इस मंच की अध्यक्षा  जसप्रीत  कौर  फ़लक ने स्वागत-भाषण दिया और शहीदों को श्रद्धांजलिअर्पित करते हुए एक ग़ज़ल पेश की। रेडियो से जुडी दुनिया की जादूई शख्सियत डॉ रश्मि खुराना (इंग्लैंड) मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में विशेष रुप से उपस्थित थीं। डाक्टर रश्मि खुराना से पहली भेंट में ही मिलने वाला उनका कायल हो जाता है। उन्होंने भी ज़िंदगी के दुःख सहते हुए खुद को संतुलित रखा है। दिल में दर्द का सागर और चेहरे पर मुस्कान। यही खासियत है डाक्टर रश्मि खुराना की। जो लोग उन्हें आकाशवाणी जालंधर में मिलते रहे हैं वे इसे अच्छी तरह जानते हैं। उनकी किताब को भी कोविद ने बहुत देर रोके रखा। 

खैर बात तो मुशायरे की चल रही थी न। सुश्री मोनिका कटारिया ने बेहद जोशीले अंदाज में कार्यक्रम का संचालन किया। डॉ रश्मि  चोदा ने सस्वर सरस्वती वंदना गा कर कार्यक्रम का आगाज किया। डॉ दीप कमल (अमृतसर), डॉ अनु मेहता (गुजरात), कोमल दीप,डॉ सुमन शर्मा ज़ी (गुजरात),डॉ राजेश(जीरकपुर) की रचनाओं ने समा बाँध दिया और हमें सोंचने को मजबूर कर दिया कि हम देश के प्रति अपनी फर्ज़ अदायगी में कितने ईमानदार हैं। अंत मे मंच की सचिव रश्मि अस्थाना ने अपनी काव्य प्रस्तुति के साथ-साथ सभी सम्मानित गुणी जनों का धन्यवाद करते हुए सुश्री जसप्रीत कौर फ़लक के साहित्य प्रेम और कर्मठता की भूमि-भूमि प्रशंसा करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया ।राष्ट्रीय गान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।  जल्दी ही फिर से मिलने का वायदा करके यह आयोजन सम्पन्न हुआ। --कार्तिका सिंह 

Friday, July 2, 2021

काव्य गोष्ठी: नारी मन की थाह पाने का प्रयास रहा इस बार भी

Thursday: 1st July 2021 at 4:50 PM Via WhatsApp

महिला काव्य मंच ने किया एक और यादगारी आयोजन 

लुधियाना//ऑनलाइन मंच (कार्तिका सिंह//हिंदी स्क्रीन):: 

जुनून नज़र तो आ जाता है पर फिर भी इसे किस्मत वाले लोग ही देख पाते हैं। न तो यह सभी की किस्मत में होता है न ही सभी को यह नज़र आ पाता है। बस एक तूफ़ान सा मन में उठता है जिसे संभालना सभी के बस में होता भी नहीं। इसका अहसास हुआ जब पिछली बार लॉकडाउन लगा। इसके बाद कर्फ्यू का एलान हो गया। सब लोग अपने अपने घरों में बंद। कोरोना के आतंक ने और भी निराश कर दिया था। कभी कभी--हर हफ्ते जा हर महीने किसी न किसी शायरी  में पहुंचना एक अलग सा आनंद देता था। अपनी शायरी सुनना, दूसरों की सुनना-एक अलग सा परिवार बनता जा रहा। था। जनाब नरेश नाज़ और उनकी धर्मपत्नी के प्रयास रंग ला रहे हैं। शायरी के मैदान में निकलीं इन महिला कलमकारों का काफिला विशाल होता जा रहा है।

आप शायरी के वक़्त मुस्करा रही इन कलमकारों के चेहरों को ज़रा ध्यान से देखें तो आपको मुस्कान के पीछे छिपी हुई स्ट्रगल भी बहुत ही आसानी से नज़र आएगी। इनकी शायरी की पंक्तियां ज़िंदगी की आंख से आंख मिला कर बात करती हैं। पुरुष प्रधान समाज की सभी चालों को इनकी शायरी बहुत ही सलीके से बेनकाब कर देती हैं। इनके आयोजन होते रहते हैं। अब फर्क सिर्फ इतना कि आमने सामने या साथ साथ बैठ कर गरमा गर्म समोसे, गुलाब जामुन और चाय का मज़ा आम नहीं  रहा। जल्द ही वे दिन दोबारा आएंगे इसकी उम्मीदें सभी को हैं। इस बार का ऑनलाइन आयोजन भी अच्छा रहा। देखिए एक संक्षिप्त सी रिपोर्ट। 

महिला काव्य मंच, लुधियाना इकाई की मासिक काव्य गोष्ठी 29 जून 2021 को आजकल के चलन को सामने रखते हुए आनलाइन आयोजित की गई। लुधियाना इकाई की अध्यक्षा सुश्री बेनु सतीशकांत जी ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। डा. मोनिका शर्मा नें मंच संचालन बखूबी निभाया।  श्रीमती बेनु सतीशकांत ने गोष्ठी में जुड़ी सभी कवयित्रियों का स्वागत किया और मुख्य अतिथि पंजाब इकाई की उपाध्यक्ष श्रीमती इरादीप त्रेहन जी का स्वागत भी किया। गोष्ठी में उपस्थित सभी तीस कवयित्रियों ने बहुत ही बढिया विषयों को उठाया और सुंदर भावों के साथ प्रस्तुत कर समां बाँध दिया।

सीमा भाटिया, पूनम सपरा, पूर्वा सिंह, ममता जैन, रश्मि अस्थाना, मोनिका चौधरी, ममता शर्मा, शालू, मोनिका कटारिया, अनुराधा कटारिया, ममता वडेहरा, अलका शर्मा, रचना गुलाटी, संतोष गोतम, नीतू जोशी, बृज बाला, राधा शर्मा, अनु बहल, सोनिया बुधिराजा, श्रुति, निधि सागर, नैंसी शर्मा,ज्योति बजाज,श्रद्धा शुक्ला,अंशु मदान, सविता अबरोल, बेनु सतीशकांत ,इरादीप त्रेहन और डा. मोनिका शर्मा जी ने नारी मन, आंखों, नारी अस्मिता से जुड़े सवालों, प्रेम की सुकोमल भावनाओं, देश भक्ति और मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं पर बहुत ही खूबसूरत और भावपूर्ण रचनाओं से समां बांधा।

 कार्यक्रम के अंत में लुधियाना इकाई की अध्यक्ष श्रीमती बेनु सतीशकांत जी ने सबको धन्यवाद दिया।

Sunday, April 4, 2021

बुलंद हौसलों की परिचायिका कुलविंदर बुटृर

चार अप्रैल को सम्मान दिवस पर डा. भावना की तरफ से विशेष पोस्ट 

फाईल फोटो 


जालंधर: 3 अप्रैल 2021: (डा. भावना//हिंदी स्क्रीन)::

'उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि ना मनोरथै' मेहनत से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं मन की इच्छाओं से नहीं, को चरितार्थ करने वाली कुलविंदर बुटृर के हौसलों की उड़ान इस कथ्य को व्यापक फलक देती है। कर्मठता को जीवन का पर्याय बनाने वाली कुलविंदर बुटृर जहां अपने कार्य क्षेत्र में तल्लीनता रखती हैं, वहीं अपने समाज के प्रति भी उत्तर दायित्व निभाती हैं। पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के प्रति इनका दृष्टिकोण इनके व्यावसायिक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। पंजाबी भाषा को सिंचित करने वाली बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व की स्वामी कुलविंदर बुटृर का पंजाबी के संरक्षण एवं संवर्धन में विशेष योगदान रहा है। आकाशवाणी जालंधर में कार्यरत कुलविंदर बुटृर ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष पंजाबी बोली के संवर्धन के लिए समर्पित किए हैं। पंजाबी बोली के लिए पूर्ण रूप से समर्पित इनकी भावना ने ना सिर्फ भाषा के क्षेत्र में ही योगदान दिया अपितु 'निर्माता दूरदर्शन जालंधर पंजाबी' होने के नाते पंजाबी सभ्याचार का संदेशा घर-घर तक पहुंचाया। यह इनका सौभाग्य था कि इनका बचपन उस परिवेश में पला बढ़ा और बीता जहां  क्रांति और देश भक्ति की बयार बहती थी। गदरी बाबा और बाबा भगत सिंह बिल्गा जैसे क्रांतिकारियों का आशीर्वाद इनके व्यक्तित्व को तराशने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 'बाबा भगत सिंह सरकारी विद्यालय बिल्गा' से पूरी की, जबकि उच्च शिक्षा 'गुरू नानक गर्ल्स कालेज बाबा से ढेसिया' से प्राप्त की। तत्कालीन रेडियो के प्रसिद्ध कार्यक्रम 'युववाणी' में अपनी आवाज प्रतिभा और मेधा के बल पर अपना वर्चस्व स्थापित किया। इसी स्थान से इनके जीवन की एक महत्वपूर्ण और लंबी यात्रा प्रारंभ होती है, जो कदम दर कदम उन विचारों को छूती है जो इनके अंत:करण में उद्वेलित हो रहे थे। मीडिया से इनका जुड़ाव इन के सपनों को व्यापक फलक देता गया। यद्यपि उन्होंने अपना पढ़ाई का शौक भी पूरा किया लेकिन इनकी प्रतिभा ने उन्हें सन 1985 मैं दूरदर्शन की सरकारी सेवा से जुड़ने का अवसर प्रदान किया। इस मंच से जुड़ कर इन्होंने दूरदर्शन के क्षेत्र में अनेकों अनवरत  प्रयत्न किए। कड़ी मेहनत और इमानदारी ने इन्हें दूरदर्शन और पंजाबी सभ्याचार की चहेती बना दिया। इन्होंने पंजाबियत से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों और महान विभूतियों को अपने कार्य क्षेत्र से जोड़ा और अनेकों 'टेली फिल्में' , 'दस्तावेजी फिल्में ' और 'लाइव टीवी' कार्यक्रम करवाए। बचपन से ही भरी गई देशभक्ति की भावना ने उन्हें अनेकों देशभक्ति परक कार्यक्रम करवाने के लिए प्रेरित किया। 'धियां पंजाब दियां', 'सपनों की उड़ान', एवं 'नारी मंच' इनके बहुत चर्चित कार्यक्रम थे। नारी उत्थान को वह कई तरह से मुखरित करती रही हैं। कला, समाज, राजनीति जैसे कई अन्य क्षेत्रों में इन्होंने पंजाब की नारी को ऐसा मंच प्रदान किया कि जहां वह अपनी आवाज को बुलंद कर सकें और गौरवान्वित महसूस करें। अपनी दस्तावेजी फिल्मों में उन्होंने पंजाब के शहरों को बारीकी से उतारा है। इनके अथक प्रयास के फल स्वरूप भारतीय दूरदर्शन पर पहली बार 'मास्टर शैफ पंजाबी' जैसी प्रतियोगिताओं का आरंभ किया गया। बहुत से कार्यक्रमों में पर्दे के पीछे से मधुर आवाज देकर इन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

कुलविंदर जी के जीवन को सफल बनाने में इनके पति प्रो. गोपाल सिंह बुटृर का विशेष योगदान रहा है। यह उन्हें अपने जीवन की कूंजी मानती हैं। प्रगतिवादी एवं आशावादी जीवनी दर्शन के चलते यह जीवन में नई  ऊंचाइयों को छूना चाहती हैं। यह अपने पारिवारिक जीवन से पूर्णतः संतुष्ट हैं।'काम ही पूजा है' को ध्येय मानने वाली आपकी सोच जगी रहे, जगाती रहे और उत्तरोत्तर संवर्धित हो।

डॉ. भावना लायलपुर खालसा कॉलेज, जालंधर के हिन्दी विभाग में कार्यरत हैं